20 अक्तूबर 2011

कुण्डलिनी - 10 सवाल

इस बार मैं आपसे 10 सवाल ‘कुण्डलिनी जागरण’ क्रिया के बारे में पूछ रहा हूँ ।
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प्रश्न 1 कुण्डलिनी जागरण से तो हर कोई वाकिफ़ होगा पर असल में यह क्या है ? यह कोई नहीं जानता । तो मेरा प्रश्न यह है कि कुण्डलिनी जागरण किस तरह की अवस्था है ? यह कैसे की जाती है और इसको करना क्या आम लोगों के बस की बात है ?
उत्तर - इस संसार में जो शक्ति काम कर रही है और जिसके द्वारा इस संसार की सभी रचना हुयी है । इस शरीर में भी वही शक्ति कार्य करती है । उसको कुण्डलिनी महामाया कहते हैं । इसका स्थान नाभि के नीचे है ।
पेट में मांस का 1 कमल है । इस कमल के बीच में ह्रदय कमल है । इस कमल के अन्दर 2 और कमल हैं । 1 कमल नीचे और दूसरा ऊपर, 1 कमल आकाश रूप और दूसरा प्रथ्वी रूप । ऊपर के कमल में सूर्य का निवास और नीचे के कमल में चन्द्रमा का निवास, इन दोनों के बीच में रहती है - कुण्डलिनी महामाया । ये साँप के समान साढे 3 लपेटे मारकर बैठी है । वह एकदम दूधिया सफ़ेद मोतियों के भण्डार के समान प्रकाशित है ।
इससे स्वतः वायु निकलती है जो साँप की फ़ुफ़कार के समान ‘प्राणवायु’ और ‘अपान वायु’ रूप में स्थित रहती है । यह दोनों वायु जब आपस में टकराती हैं तो इनसे 1 प्रकार की संघर्ष शक्ति पैदा होती है ।
प्राण और अपान के परस्पर टकराने से ह्रदय में बङा प्रकाश होता है । कुण्डलिनी वासनाओं से भरी हुयी होती है । तमाम सांसारिक वासनायें उसका विषय है । जब कुण्डलिनी में स्फ़ुरण पैदा होता है । तब ‘मन’ प्रकट होता है ।
सब कर्म धर्म इसी से प्रकट होते हैं । यह स्थूल रूप से बृह्माण्ड में विराजमान है । पिंड से बृह्माण्ड के लिये सुष्मणा नाङी से होकर मार्ग गया है । सुष्मणा के भीतर जो बृह्मरन्ध्र है । उसमें पूरक द्वारा कुण्डलिनी शक्ति स्थित होती है अथवा रेचक प्राणवायु के प्रयोग से 12 अंगुल तक मुख से बाहर अथवा भीतर ऊपर 1 मुहूर्त तक 1 ही बार स्थित होती है । मनुष्य की सामान्य अवस्था में ये सोयी हुयी और नीचे मुँह किये होती है ।
कुण्डलिनी जागरण का मतलब चक्रों को जगाना या जानना है । चक्रों की स्थिति अनुसार इसके अलग अलग पहुँच वाले गुरु हो सकते हैं । वे चक्रों पर ध्यान करना सिखाते हैं और ध्यान की बारबार ठोकर से ये जागती है । आम और खास लोग कहना वास्तव में अज्ञान है । जो कुछ प्राप्त करना चाहता है । जिसमें सीखने की ललक लगन है । वही आम से खास हो जाता है ।
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प्रश्न 2 -  कुण्डलिनी से प्रथम साक्षात्कार, पहचान, जागृति, क्रियाशील, सिद्धि कैसे की जाती है ?
उत्तर -  समर्थ गुरु के सानिध्य में चक्रों पर ध्यान करके ही यह सब होता है । सिद्धियों के अलग अलग स्वरूप होते हैं । उनके बहुत से प्रकार हैं । कुण्डलिनी जागृत होते ही अंतर जगत के दृश्य और अलौकिक अनुभव और प्रबल उर्जा आवेश का अनुभव होने लगते हैं । यही इसकी पहचान है ।
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प्रश्न 3 - पिछले किसी लेख में आपने कुण्डलिनी जागरण से सम्बन्धित कुछ बातें बताई थी और कुछ मंत्र भी बताये थे और यह भी कहा था कि बिना गुरू के सानिध्य में इसे न करें । अन्यथा परिणाम भयंकर हो सकते हैं । तो अब ये बतायें कि इस क्रिया को ठीक से जानने वाले गुरू कहाँ मिलेंगे ? क्या आप ऐसे किसी इंसान को जानते हैं । जो इस क्रिया में पारंगत हो और ट्रेनिंग वगैरह देते हों ।  हमने तो आज तक न कभी ऐसे किसी इंसान के बारे में सुना और न कभी देखा ।
उत्तर - इसका कोई एक निश्चित गुरु या स्थान नहीं होता । वह किसी शहर कस्बे गाँव जंगल हिमालय आदि कहीं भी हो सकता है पर उससे पहले महत्वपूर्ण ये हैं कि आप क्या चाहते हैं ? 12 वर्ष के अष्टावक्र ने 80 वर्ष के राजा जनक को सिर्फ़ 5 सेकेण्ड में ये ज्ञान कराया था । बस सीखने वाला व्यक्ति पात्र होना चाहिये ।
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प्रश्न 4 - कुण्डलिनी जागरण क्रिया को पूरा करने में कितना समय लगता है और इसको करने के लिए कोई विशेष स्थान वगैरह जैसे निर्जीव स्थान, नदी, पर्वत, आश्रम, वन, घर, गुफा आदि कहाँ किया जाता है । यह किस समय की जाती है ?
उत्तर - किसी भी सात्विक ध्यान साधना की शुरुआत में एकान्त पवित्र और शान्त स्वच्छ स्थान का बेहद महत्व है । फ़िर वह किसी प्रकार का निर्जीव स्थान नदी, पर्वत, आश्रम, वन, घर, गुफा या आपके घर का एकान्त कमरा आदि कुछ भी हो । इससे अधिक मतलब नहीं है ।
समय गुरु की समर्थता और साधक की स्थिति पर निर्भर है । दस मिनट से लेकर दस साल और दस जन्म भी लग सकते हैं । मुख्यतः समय प्रातःकाल 4 to 6 और सांय 5 to 7 अच्छा होता है । सुबह उगते सूर्य की तरफ़ मुँह और शाम को अस्त होते सूर्य की तरफ़ मुँह करके ज्यादातर ज्ञान ध्यान किया जाता है ।
ग्रह स्थितियों की अनुसार नवरात्र आदि जैसे दिनों में सिद्ध मुहूर्त बनते हैं । तब ऐसे योग सरलता से होते हैं पर अद्वैत में किसी नियम को कोई महत्व नहीं दिया जाता । वहाँ नियम खुद गुलाम होते हैं ।
कर्म धर्म दोऊ बटें जेबरी । मुक्ति भरती पानी ।
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प्रश्न 5 - यह तो सभी जानते ही हैं कि कुण्डलिनी के विभिन्न स्वरूपों को क्रम अनुसार किया जाता है  पर कुण्डलिनी जागरण क्रिया की शुरूआत कैसे की जाती है । कुण्डलिनी के दर्शन मूलाधार में कैसे होते हैं । क्या मूलाधार में कुण्डलिनी माँ के दर्शन के स्वरुप का दर्शन करना ही जागृत कुण्डलिनी की पहचान है ?
उत्तर - वही समर्थ गुरु और उसकी पहुँच के अनुसार चक्र का ध्यान करना । जरूरी नहीं इसको मूलाधार चक्र से ही शुरू किया जाये । गुरु अपने तरीके अनुसार इसे ऊपर से भी शुरू कर सकता है । हमारे यहाँ शुरूआत ही आज्ञा चक्र से होती है । अंतर में तेज अलौकिक प्रकाश या दिव्य प्रकाश देखना ही खास पहचान है । साधक के पुण्य संस्कार अनुसार उसे देवताओं के दर्शन भी हो सकते हैं ।
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प्रश्न 6 - क्या चिरनिद्रित कुण्डलिनी की निद्रा को भंग कर देना ही कुण्डलिनी की जागृतावस्था है । जागृति के समय साधक को किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है । अगर यह ठीक से न हो  तो क्या इसमें साधक को भारी नुकसान भी उठाना पड सकता है ?
उत्तर - चिरनिद्रित से मतलब ये नहीं कि ये शक्ति सोयी हुयी है । वो तो बराबर अपना काम कर रही है । बस आप में यह ज्ञान या स्थिति या क्रिया जागृत नहीं है । ध्यान द्वारा इससे योग होना ही जागृतावस्था है । परिस्थितियाँ भी चक्र, मन्त्र, जागरण का तरीका और गुरु की ताकत के अनुसार लाखों बनती हैं ।
शक्ति का प्रवाह होता है तब साधक की मजबूती के अनुसार उसे डर भय रोमांच सिहरन आदि बहुत सी स्थितियाँ बनती हैं । केवल कोई भी योग मनमाने तरीके से नियम के विपरीत हठ पूर्वक करने पर ही नुकसानदायक है । वैसे ये अलौकिक ज्ञान है और कोई भी ज्ञान कभी नुकसानदायक नहीं होता । ये एक प्रकार का अति शक्तिशाली करेंट ही है । ऊर्जा है । अब बिजली से कोई मूर्खतापूर्वक छेङछाङ करेगा । तो अंजाम एक ही होगा..भयंकर दुर्घटना या फ़िर मौत । इसीलिये अनुभवी समर्थ गुरु का बहुत महत्व है । बिजली आपको सभी सुख देती है । अति आवश्यक भी है पर जानबूझ कर उसके नंगे तारों से खिलवाङ करोगे तो अत्यधिक हानि ही होगी ।
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प्रश्न 7 - जिस किसी व्यक्ति ने अपनी कुण्डलिनी को जाग्रत कर लिया हो तो उनकी पहचान क्या है । इसको करने वाले मुख्यतया वे लोग कौन होते हैं । इससे उन्हें क्या लाभ होता है । क्या वे अपने शरीर को आत्मा से अलग करने में सक्षम होते हैं । क्या उनमें दिव्य शक्ति आ जाती हैं । और वे निरोगी हो जाते हैं । और चिरायु को प्राप्त होते हैं । क्या उनको ज्ञान प्राप्त होता है ?
उत्तर - मनुष्य का स्वभाव बङा विचित्र है । एक करोङपति आदमी भी हो सकता है, गन्दे फ़टे कपङे पहनने का शौकीन हो । वहीं मामूली कमाई वाले उतने में ही ठाठ बाठ से रहने के शौकीन होते हैं । इसलिये कुण्डलिनी जागरण करने वाला भी इंसान ही होता है । वह एक भिखारी से लेकर राजा स्टायल कुछ भी हो सकता है । गूढ ज्ञान को जानने वाले को पहचानना साधारण आदमी के लिये कठिन ही नहीं असंभव है । दिव्य शक्ति का ये ज्ञान ही है । जैसी दिव्यता को वे प्राप्त होते हैं । वैसा ही लाभ भी होता है । हाँ कुण्डलिनी से निरोगता और चिरायु होना निश्चय ही प्राप्त होता है । ज्ञान और शरीर से अलग होना साधक की स्थिति के अनुसार है । वैसे ये आत्मज्ञान नहीं हैं और न ही इससे मुक्त होते हैं । इससे सिर्फ़ शक्ति और दिव्यता आती है ।
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प्रश्न 8 - मूलाधार के इन चक्रों का अपना क्या महत्व है । इन चक्रों पर अपना नियंत्रण कैसे रखा जाता है ?
उत्तर - आप अपने खाये हुये भोजन पर खाने के बाद कोई नियन्त्रण नहीं कर सकते फ़िर चक्र तो बहुत बङी बात है ।
दरअसल किसी भी सिस्टम से जुङकर क्षमता अनुसार उससे लाभ प्राप्त होता है । उसका असल नियन्त्रण महाशक्तियों के हाथ में होता है । बाजार में दुकान खोल लेने का मतलब ये नहीं कि आप बाजार पर नियन्त्रण कर लोगे । वहाँ भी आप अपने व्यवहार सौदा क्षमता लेन देन के अनुसार लाभ ही प्राप्त करते हो । चक्र हो या कोई योग हो । योग का मतलब ही प्लस हो जाना है । जीवन में जहाँ भी आप प्लस होते हो । उसका भाव अनुसार लाभ होने लगता है । फ़िर वो एक साधारण आदमी औरत से ही प्लस होना क्यों न हो ।
चक्रों का महत्व थोङे शब्दों में समझाना कठिन है । ये जीवन हो या अलौकिक जीवन, सभी स्थितियों में मुख्य बात ये है कि आप क्या चाहते हैं ? उसको प्राप्त करने की आपके अन्दर कितनी क्षमता हैं और फ़िर कितना प्राप्त कर पाते हैं । बस वही आपका है । वास्तविकता में एक पति अपनी पत्नी को नियन्त्रण में नहीं रख पाता । पत्नी पति को नहीं रख पाती । ये दोनों बच्चों को नहीं रख पाते फ़िर शक्ति को नियन्त्रण करना हँसी खेल नहीं है । केवल विभिन्न रंग बिरंगी स्थितियों में इंसान अपने को कंट्रोल रखे । यही बहुत बङी बात है ।
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प्रश्न 9 - कुण्डलिनी को जाग्रत करना और इस मनुष्य के इस जीवन का क्या भेद है । कुण्डलिनी जागरण को पूर्ण करने वाले व्यक्ति की क्या अवस्था है और उनका क्या कार्य है अथवा मृत्यु के बाद इसका क्या स्थान है ?
उत्तर - एक मामूली व्यक्ति से प्रधानमन्त्री बनने के बीच तक बहुत से स्तर होते हैं । अब वह कौन सी स्थिति को प्राप्त करता है । वही उसे लाभ होगा । ये सामान्य जीवन में पाना है । अलौकिक जीवन में भी यही बात है । वह किस स्थिति को प्राप्त होता है । उनकी अवस्था और कार्य भी स्थिति अनुसार विभिन्न ही होंगे । मृत्यु इंसानी जीवन का रिजल्ट है, निचोङ है । जो आपने यहाँ बोया हैं । वही काटेंगे । अतः देवता, सिद्ध, गण, तांत्रिक, भगवान, ईश्वर बनना आदि बहुत परिणाम हो सकते हैं ।
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प्रश्न 10 - और आखिरी सवाल में मैं आपसे जानना चाहूँगा कि क्या आपने कभी कुण्डलिनी जागरण जैसी जटिल क्रिया को करने के बारे में नहीं सोचा । आप इस बारे में क्या सोचते हैं । कृपया अपना मत जरूर रखें । आज के समय में और आमजन लोगों के सोच और विचारों की बात की जाये तो आपको क्या लगता है कि लोग कभी इसकी तरफ आकर्षित होंगे । जबकि हम सभी जानते हैं कि उनसे योग तो ठीक से होता नहीं । बस भोग में ही लगे रहते हैं ।
उत्तर - कुण्डलिनी जागरण और जटिल या सरल ! मैंने इस बारे में क्या सोचा ? ये सब ज्ञान से प्राप्त होता है - समर्थ गुरु और साधक की लगन, मेहनत से । द्वैत ज्ञान में इसका पूर्ण ज्ञान बहुत ऊँचा माना जाता है पर अद्वैत में इसकी अधिक महत्ता नहीं हैं ।
वहाँ इस भाव में देवी भक्ति सबसे ऊँची होती है । हर युग में हर समय में ये ज्ञान देने वाले और लेने वाले लगभग हमेशा रहते हैं पर आदमी अपने वर्ग की जानकारी में जीवन जीता है । इसलिये उसको ये सब अजीब लगता है । कोई भी अपने स्वभाव के अनुसार स्वभाव वाले लोगों के मेलजोल में अधिक रहता है । इसलिये ये सब अजूबा सा लगता है ।
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आप सबके अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।
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प्रश्नकर्ता - राज मल्होत्रा (ई मेल से)
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