26 फ़रवरी 2017

माया के पार

तुम कहते हो कि एक परमेश्वरता या एक सर्वात्मा जो परमेश्वर है । वह ये सब काम कर रहा है । और मुझे अपने मित्रों पर हेतु व कारणों का आरोपण नहीं करना चाहिये । 
इससे एक प्रकार की भ्रान्ति, बाहरी भ्रान्ति परास्त हुयी । तुम्हारी उन्नति में यह एक पग है ।
किन्तु वेदान्त इससे आगे है और तुमसे कहता है - यदि तुम कहते हो कि परमेश्वर इन सबमें हैं तो यह पूर्ण सत्य नही है, इससे आगे बढ़ो ।  
ये सब रूप और ये सब प्रतिमायें और भेद या प्रभेद स्वयं परमेश्वर को धारण करते हैं । किन्तु साथ ही यह सब विभिन्न भ्रान्तियां और रूप मिथ्या हैं और रस्सी में साँप के तुल्य हैं । इससे आगे बढ़ो ! और तुम उस अवस्था को प्राप्त होते हो कि जो इन सब (बातों) से परे है । जो सम्पूर्ण कल्पना से परे है । और सब शब्दों से परे है । यह असत्य भी है ।
इस प्रकार तुम देखते हो कि वेदान्त सब धर्मों का परिपूरक है । यह संसार के किसी धर्म का खण्डन नही करता । यह कहना अनावश्यक है कि यह संसार इस परमेश्वर ने या उस परमेश्वर ने अवश्य रचा होगा । सिद्ध करें कि ये रूप और शक्लें, ये विभिन्न आकृतियां और स्थितियां ही दुनियाँ है और दूसरी कोई वस्तु नही है ।  
दो त्रिकोण (triangles) और एक समकोण (rectangle) है । ये दोनों त्रिकोण समद्विभुज (isosceles) हैं । दो भुजायें बराबर हैं । दोनों समान भुजायें अंक 3 से चिह्नित हैं और तीसरी भुजायें 4 से । समकोण में छोटे पार्श्व (sides) 3 से चिह्नित हैं और लम्बे पार्श्व 4 से ।
अब इनको इस तरह रखो कि एक संयुक्त आकृति हो जाये या त्रिकोण की जङ (व तल) का और समकोण की एक तरफ़ का संग हो जाये । तब वह क्या हो जायेगा ?
तब एक षटकोण (hexagon) हम पाते हैं, जिसके सभी पार्श्व 3 हैं । 4 अंकित पार्श्व आकृति के भीतर आ गये और अब वे पार्श्व नही रह गये ।
यह षटकोण हम कैसे पाते हैं ?

त्रिकोण और समकोण की भिन्न प्रकार की स्थिति या भिन्न प्रकार के संयोग से हमें इसकी प्राप्ति होती है । इन आकृतियों और इनसे बनने वाली आकृति के गुणों का क्या हाल है ?
परिणामभूत आकृति के गुण उसमें शामिल आकृतियों के गुणों से बिलकुल भिन्न हैं । अंशाकृतियों में
तीक्ष्ण कोण (acute angles) हैं । परिणामभूत आकृति में तीक्ष्ण कोण बिलकुल है ही नही । एक अंशाकृति में ऋजु कोण (right angles)  है और परिणामभूत आकृति में कोई ऋजु कोण नही है ।
अंशाकृतियों में 4 से चिह्नित लम्बे पार्श्व (sides) थे ।
परिणामभूत आकृति में उतनी लम्बाई की कोई दिशा (तर्फ़) नही है । अंशाकृतियां कोई भी समपार्श्व (equilateral) नही थीं । उनके संयोग से बनने वाली आकृति समपार्श्व है । उसके सब कोण बहिर्लम्ब (obtuse) हैं । किसी भी आंशिक भाग के कोण बहिर्लम्ब नही थे । 
यहाँ हम एक ऐसी सृष्टि देख रहे हैं । जिसके सब गुण पहले अज्ञात थे । ये बिलकुल नये गुण कहाँ से आ गये ?
ध्यान दें इस निरानिर नये गुणों की सृष्टि किसी सृष्टिकर्ता ने नही की । ये बिलकुल नये गुण घतकावयय (components parts) से नही आये है । वे एक नवीन रूप का नतीजा हैं ।
वे एक नवीन स्थिति, नवीन आकार का, जिसे वेदान्त ‘माया’ कहता है, परिणाम हैं ।
माया का अर्थ है - नाम और रूप । वे (गुण) नामों और रूपों के परिणाम हैं । 
यह कल्पना करो फ़िर देखो । इस त्रिकोण को ज (h) जलजनकवायु (hydrogen) होने दो । इस दूसरे को 2 और तीसरे को ओ (oxygen) होने दो । इससे तुमको ज2ओ (h2o) जल की प्राप्ति होती है ।
इन दो मूल तत्वों हाइड्रोजेन और आक्सीजेन (एक प्रकार की वायु) में अपने अपने निजी गुण थे और परिणामभूत योग एक निरानिर नवीन वस्तु है । हाइड्रोजेन और आक्सीजेन हमें जल देता है । हाइड्रोजेन भभक उठने वाला पदार्थ है, किन्तु जल ऐसा नही है ।
जल में एक ऐसा गुण है, जिससे हाइड्रोजेन बिलकुल अनभिज्ञ है । आक्सीजेन ज्वलन का सहायक है, किन्तु पानी ऐसी सहायता नही करता । उसमें अपना निजी एक गुण है, बिलकुल नया ।  
फ़िर हाइड्रोजेन बहुत हल्का है, किन्तु आक्सीजेन में वैसा हल्कापन नही है । गुब्बारों में भरा हाइड्रोजेन आकाश में उङा ले जाता है किन्तु जल परिणामभूत योग ऐसा नही करता । अवयव रूप तत्वों के गुण परिणामभूत योग से बिलकुल विभिन्न हैं ।  
परिणामभूत योग को अपने गुणों की प्राप्ति कहाँ से हुयी ? उसको ये गुण अपने रचियता से मिले या अवयवों से ?
नही, वे रूप से, नये रूप से, नवीन स्थिति से, आकार से आये । 
यह है जो हमें वेदान्त बताता है । वह बताता है कि जो कुछ तुम संसार में देखते हो, वह ‘नाम और रूप’ का परिणाम मात्र है । इसके और उसके लिये, जो नाम और रूप का परिणाम हैं । तुम्हें एक सृष्टिकर्ता की स्थापना करने की जरूरत नही है ।  
विज्ञान सिद्ध है कि कोयला और हीरा एक ही पदार्थ हैं । लेकिन कोयले के गुणों से बिलकुल भिन्न गुण हीरे में है । कठोर हीरा लोहे को काट सकता है । कोमल कोयला कागज पर घिसने से क्षरित होता है । हीरा अमूल्य, बहुमूल्य, प्रभापूर्ण है । कोयला सस्ता, कुरूप, काला है । दोनों के भेद पर ध्यान दो । तथापि वास्तव में वे दोनों एक ओर वही वस्तु हैं ।
वेदान्त कहता है कि यह एक अच्छी वस्तु है और यह एक बुरी वस्तु है । हीरा अच्छा है और कोयला खराब है । एक वस्तु है जिसे तुम अच्छा कहते हो और यह एक वस्तु है जिसे तुम खराब कहते हो । एक वस्तु जिसे तुम मित्र और एक वस्तु जिसे तुम शत्रु कहते हो ।
किन्तु वास्तव में उनके नीचे एक और वही वस्तु स्थित है ।
ठीक जैसे कि वही कार्बन (carbon) कोयले के रूप में प्रगट होता है और वही हीरे में ।
सो वास्तव में एक और वही ईश्वरता है जो दोनों स्थानों में प्रकट होती हैं । नाम और रूप में भेद है और किसी बात में नही । वैज्ञानिक बताते हैं कि कार्बन के कण कोयले की अपेक्षा हीरे में भिन्न प्रकार से स्थित हैं । हीरे के अणुओं के बनाने में भिन्न रूप के होते हैं ।
हीरे और कोयले में भेद नाम और रूप के कारण से है या उस कारण से है, जिसे हिन्दू माया कहते हैं । ये सब भेद नाम और रूप के कारण से हैं ।
इसी तरह अच्छे और बुरे के भेद का कारण माया, नाम और रूप है और कुछ नही । और ये नाम और रूप सत्य नही हैं क्योंकि वे अनित्य हैं । वे मिथ्या हैं क्योंकि हम उन्हें एक समय देखते हैं, दूसरे समय नही देखते हैं ।  
प्रथ्वी का यह अदभुत व्यापार नामों और रूपों के अतिरिक्त कुछ नही है । विभेदों, परिवर्तनों और संयोगों के सिवाय और कुछ नही है । और इन विभिन्न परिवर्तनों तथा संयोगों का कारण क्या है ?
उनका कारण है - आन्तरिक भ्रान्ति !
आन्तरिक भ्रान्तिमूलक इन नाम रूपों में, एक ब्रह्म अपने को प्रकट करता है । संसार के नामों और रूपों में, जो माया कहलाते हैं । परमेश्वर आप स्वयं आविर्भूत होता है । इसका कारण है, भीतरी भ्रान्ति ।
उसके पार जाओ और तुम सब कुछ हो जाते हो । वही वास्तव में देखता है । जो सबमें समान देखता है । उसी मनुष्य की आँखें खुली हुयी हैं जो सबमें एकसां एक परमेश्वर को देखता है ।

भारत के पतन का कारण ?

प्रश्न - भारतवर्ष राजनैतिक हिसाब से इतना नीच क्यों है ? भारत के पतन का कारण वेदान्त है । 
उत्तर - बिलकुल गलत ! भारत की दुर्दशा का कारण वेदान्त का अभाव है । तुम जानते हो, राम ने तुमसे कहा है कि वह हरेक देश का है । राम भारतवासी की, हिन्दू की, वेदान्ती की हैसियत से नहीं आता है ।
राम राम होकर आता है । जिसका अर्थ है - सर्व व्यापक !
राम न तुम्हारी चुपङ करना चाहता है, न भारतवासियों की, राम भारत या अमेरिका या किसी वस्तु का पक्षपाती नही है ।
राम ‘सत्य’ ‘पूर्ण सत्य’ और ‘शुद्ध सत्य’ का हामी है ।  
और उस हेतु से, उस स्थिति बिन्दु से, राम कहता है । जो कुछ वह कहता है ।
राम न भारत की चापलूसी करना चाहता है और न अमेरिका की । सत्य यह है कि जब तक वेदान्त भारत की जनता में प्रचलित था । तब तक वह अपनी महिमा के उच्चतम शिखर पर था । तब उसका सर्वश्रेष्ठ राज्य था और वह समृद्धिशाली था ।
वहाँ (भारत में) एक ऐसा समय आया कि यह वेदान्त एक विशेष श्रेणी के लोगों के हाथों में पङ गया । और तब वह भारत की जनता में नही पहुँचने पाया । और तब भारत का पतन शुरू हुआ ।
वेदान्त जनता में नही पहुँचने पाया और भारतीय जनता एक ऐसे धर्म में विश्वास करने लगी ।
- मैं गुलाम हूँ,  मैं गुलाम हूँ, ऐ परमेश्वर !  मैं तेरा गुलाम हूँ ।
यह धर्म यूरोप से भारत में आया था । यह एक ऐसा कथन है जिससे ऐतहासिक और दार्शनिक कहे जाने वाले लोग चकित हो जायेंगे । जो यूरोपियनों को चकित कर देगा ।
किन्तु राम ने बिना समझे बूझे यह बात नही कही है । यह एक ऐसा बयान है जो गणित की सी निश्चयात्मकता के साथ सिद्ध व प्रमाणित किया जा सकता है । जो धर्म यह चाहता है कि हम अपने आपको व आत्मा को तुच्छ दृष्टि से देखें और आत्मा की निन्दा करें । और अपने को कीङे, नीच, अभागे, गुलाम पापी कहें । वह (धर्म) भारतवर्ष में बाहर से आया था ।
और जब वह जनता का धर्म बन गया तब भारत का अद्यःपात शुरू हुआ ।    
और यूरोपियनों तथा अमेरिकनों के क्या हाल हैं ?
यूरोपियन भी अपनी गुलामी में विश्वास करते हैं - ऐ परमेश्वर ! हम तेरे गुलाम है ।
(फ़िर) राजनैतिक और सामाजिक दृष्टियों से उनका पतन क्यों नही हुआ ?

इसके दृष्टांत स्वरूप एक कहानी है । जिसका जिक्र प्रकृतिवादी और विकासवादी लेखक प्रायः करते हैं । उनका कहना है कि - कभी कभी कमजोरी बचाव का कारण हो जाती है । हमेशा योग्यतम ही नही बचते ।
दृष्टांत - टिड्डियों की बहुत बङी संख्या एक ओर को उङी जा रही थी । कुछ टिड्डियों के पंख जाते रहे और वे गिर पङीं । बाकी टिड्डियां जो भली चंगी थीं । वो उङती गयीं । किन्तु जब वे एक पहाङी पर पहुँची तो पहाङी जल रही थी । और सब टिड्डियां नष्ट (खत्म) हो गयीं । इसमें दुर्बल बच गया और योग्यतम नष्ट हो गया ।
भारतवासी कोई बात कहते हैं तो मन से कहते हैं । वे सच्चे हैं और धर्म को सर्वस्व मानते हैं । वे भीतर बाहर एक से थे ।
जब उन्होंने प्रार्थना की - ऐ परमेश्वर ! मैं तेरा अधम गुलाम हूँ । ऐ परमेश्वर ! मैं पापी हूँ ।
भारतवर्ष की जनता जब इस तरह प्रार्थना करने लगी, वह सच्ची थी ।
और कर्म की अटल, निष्ठुर कर्म व्यवस्था के अनुसार उन्हें अपनी आकांक्षाओं और अभिलाषाओं को पूर्ण होते देखना पङा । और उनकी कामनायें और इच्छायें सफ़ल हुयीं ।
वे गुलाम बना दिये गये । किसके द्वारा ?
तुम कहते हो - उन्हें परमेश्वर ने गुलाम बना दिया ।
क्या परमेश्वर की कोई शक्ल है, कोई आकृति है ?
यह परमेश्वर अपने निराकार रूप में आकर उन पर शासन नही कर सकता था । परमेश्वर आया । कौन परमेश्वर ! प्रकाशों का प्रकाश, श्वेत स्वरूप, श्वेत रूप अंग्रेजों के स्वच्छ चमङे में आया और उन्हें गुलाम बना दिया । गलत समझी हुयी ईसाईयत या गलत समझे गये गिर्जाघरपन ने भारतवर्ष का पतन सम्पादित किया ।
जाओ और भारतवर्ष का हाल देखो । और जो कुछ राम कहता है उसका तुम्हें विश्वास हो जायेगा । भारत के दूसरे स्वामी या दूसरे साधु जो कहते हैं । केवल उस पर यदि आप विश्वास करेंगे तो आप धोखा खायेंगे ।
भारत के पतन का कारण केवल वेदान्त का अभाव है । और गुलामी की उसी भावना के कारण यूरोपियन गुलाम क्यों नहीं हुये ?
यूरोपीय लोग धर्म की अपेक्षा धन की अधिक परवाह करते हैं । उनकी प्रार्थनाओं में, उनके धार्मिक मामलों में, जैसा कि पहले आपको बताया जा चुका है, ईश्वर केवल एक फ़ालतू चीज है । उसको उनके कमरे बहारने और साफ़ करने पङते हैं । धर्म केवल तस्वीरों या चित्रों की तरह केवल बैठक सजाने के लिये है । 
जो प्रार्थनायें ह्रदय और सच्ची अन्तरात्मा से निकलती थीं, वे प्रार्थनायें गुलामी के लिये नही थीं । बल्कि दौलत, सम्पत्ति और सांसारिक लाभ के लिये थीं । इसलिये उनका उत्थान हुआ । यह कर्म के नियम के अनुसार है । इतिहास हमें बताता है कि जब तक भारत के जन साधारण में वेदान्त प्रचलित था तब तक भारत समृद्धिशाली था ।
एक समय में फ़िनीशिया (phoenicians) के रहने वाले बङे शक्तिशाली थे । किन्तु उन्होंने भारत पर कभी चढ़ाई करके विजय प्राप्त नही की । मिस्री बङी उच्च स्थिति में थे किन्तु वे भारत पर अपनी हुकूमत नही जमा सके । ईरान का सितारा एक दिन बुलन्दी पर था परन्तु भारत पर दुश्मनी की नजर डालने की उसकी कही हिम्मत नही हुयी ।
रोमन सम्राट, जिसका गिद्ध प्रायः सारे संसार में उङता था, सम्पूर्ण ज्ञात प्रथ्वी पर जिसका शासनाधिकार था, भारत को अपने शासन में लाने का साहस न कर सके । यूनानी जब शक्तिशाली हुये तब सदियों तक एक बुरी दृष्टि भारत पर न डाल सके ।
सिकन्दर नाम का एक सम्राट वहाँ (भारत) आया । गलती से उसे महान सिकन्दर कहते हैं । उन दिनों में वेदान्त की वृत्ति तब तक जनता में प्रचलित थी । वह जन से चली नही गयी थी ।  
भारतवर्ष जाने से पहले उसने अपना जाना हुआ सारा संसार जीत लिया था । महा शक्तिशाली सिकन्दर जिसका बल बढ़ाने को विपुल ईरानी सेना थी । सम्पूर्ण मिस्री सेना का जो अध्यक्ष था, भारतवर्ष जाता है । और एक छोटा भारतीय राजा पुरुस उसका सामना करता है और डरा देता है ।
इस भारतीय राजा ने इस महान सिकन्दर को नीचा कर दिया और उसकी सब सेनाओं को चलता कर दिया । सब सेना पस्त कर दी और महान सिकन्दर लौटने को लाचार हुआ । 
यह इसलिये हुआ था क्योंकि उन दिनों भारत की जनता में वेदान्त प्रचलित था ।
तुम इसका प्रमाण चाहते हो । प्रमाणस्वरूप भारत का वृत्तांत पढ़ो । जो उन दिनों के यूनानी छोङ गये हैं । इतिहास में उस समय के यूनानियों, सिकन्दर के साथियों का लिखा हुआ हाल पढ़ो ।
तुम देखोगे कि जन साधारण में असली वेदान्त का प्रचार था और लोग बलिष्ठ थे ।
महान सिकन्दर को लौटना पङा था ।
एक ऐसा समय आया, जब एक साधारण आक्रमणकारी ने जो महमूद गजनवी कहलाता था, सत्रह बार भारतवर्ष को लूटा । सत्रह बार वह भारत से सारी दौलत ले गया । जो उसके हाथ में आयी ।
उन दिनों का जनता का वृत्तांत पढ़िये और आप देखेंगे कि जन साधारण का धर्म वेदान्त के ठीक विरुद्ध ध्रुव पर (अर्थात नितांत विरुद्ध) था । 
वेदान्त प्रचलित था किन्तु कुछ चुने हुये लोगों में । जनता उसे त्याग चुकी थी और इस तरह भारत नीचा हुआ ।

25 फ़रवरी 2017

शैतान का धर्म

प्रश्न - वेदान्त भारतवर्ष की ही संकीर्ण हदों के अन्दर बन्द है और केवल शिक्षित वर्ग का धर्म है, जन साधारण का नही । जबकि ईसाई धर्म सम्पूर्ण संसार में फ़ैल गया । (स्वामी रामतीर्थ से)

उत्तर - यदि ईसाईयत का वास्तव में कौमों पर शासन होता तो कहीं अधिक अच्छा होता । यदि ईसाईयत वास्तव में यूरोप में प्रचलित होती तो यह बङे हर्ष की बात होती । किन्तु यूरोप या अमेरिका में जो प्रचलित है । वह ईसाईयत नही, चर्चियेनिटी (churchianity) अर्थात गिर्जाघरपन है ।
और फ़िर यदि तुम समझते हो कि असली ईसाईयत जन साधारण में फ़ैल गयी है और यह (बात) ईसाईयत के पक्ष में बहुत बङी दलील है, तो भाई, भ्रम में न पङो ।
शैतान के धर्म के मानने वाले, ईसाई धर्म के अनुयायियों से अधिक हैं ।  
आप जानते हैं कि असदाचार, बुरी वासनायें, शत्रुता, विद्वेष, मनोविकार, कामुकता..यह शैतान का धर्म है । और शैतान का धर्म ईसाईयत से अधिक प्रचलित है ।
लंदन के पार्लियामेंट भवन में एक मनुष्य जो बङा वाग्मी (oralor) था, धिक्कारा दुत्कारा गया था ।
आप जानते हैं कि बाद में उसने क्या कहा ?
उसने कहा - क्या हुआ यदि बहुमत तुम्हारे पक्ष में है (दूसरे पक्ष से उसने कहा) opinions ought to be weighed, they ought not to be counted.
मतों की तौल (परख) होनी चाहिये । उनकी गिनती नही होनी चाहिये । बहुमत सत्यता का कोई प्रमाण नही है ।
एक समय था जब गैलीलियो (galileo) कोपरनिकस (copernicus) के मत का था ।
उसने कहा था कि - प्रथ्वी घूमती है न कि सूर्य ।
वह पूर्ण अल्पमत (minority) में था । वास्तव में वह अकेला था । सम्पूर्ण विशाल विश्व उसके विपरीत था । सम्पूर्ण बहुमत (majority) उसके विरुद्ध था ।
किन्तु अब सत्य क्या है ?

अल्पमत की बात सच्ची है या बहुमत की ? बहुमत और अल्पमत कोई चीज नही है ।
एक समय (जमाना) था, जब सम्पूर्ण बहुमत रोमन कैथोलिक (roman catholic) सम्प्रदाय के पक्ष में था । एक ऐसा समय आया, जब बहुमत दूसरे पक्ष के ओर था ।
एक समय वह था, जब ईसाईयत ग्यारह शिष्यों के ही अल्पमत तक परिमित थी । एक समय आया है जबकि यह ईसाईयत या गिर्जाघरपन देखने में बहुमत अपनी ओर रखता है ।  
बहुमत और अल्पमत कुछ भी नही है । हम शिला पर खङे हैं । हम सत्य पर स्थित हैं और सत्य अवश्य प्रकट होगा ।  
(एक और सम्बन्धित प्रश्न) ईसाई कौमें दुनियां में सारी तरक्की क्यों कर रही हैं । केवल ईसाई राष्ट्रों में ही उन्नति और सभ्यता है ।
उत्तर जारी - यदि यूरोप और अमेरिका, भारत, चीन, जापान से राजनैतिक  और सामाजिक मामलों में आगे बढ़े हुये हैं, तो ईसाईयत उसका कारण नही है ।
झूठे तर्क का उपयोग न करो ।
यदि सम्पूर्ण सभ्यता और सम्पूर्ण वैज्ञानिक उन्नति का सेहरा ईसाईयत के सिर बांधा जाना है, तो कृपा कर हमें बताओ कि - जब गैलीलियो ने वह छोटा सा आविष्कार किया था तब ईसाईयों ने उसके साथ कैसा (बुरा) बर्ताव किया था ?
ब्रूनो (bruno) जला दिया गया था । 
किसने उसे जलाया था ? ईसाईयत, ईसाईयत ने ।
हक्सले (huxley) स्पेंसर (spencer) और डार्विन (darwin) का ईसाईयत ने विरोध किया । उनके आविष्कारों और उन्नति तथा भाव-स्वाधीनता (independence of spirit) का उत्पादन और प्रोत्साहन ईसाईयत ने नही किया । ईसाईयत के चूर कर देने वाले सब प्रभावों के होते हुये भी वे जी रहे हैं ।
शोपेनहार (schopenhauer) की क्या गति हुयी थी । आप जानते हैं कि उसको कैसे निर्वाह करना पङता था ?
शोपेनहार को उतना ही महान बलिदान करना पङा था जितना कि ईसा को । 
ईसा अपने विश्वासों (convictions) निश्चयों के लिये मर गया और शोपेनहार अपने विश्वासों के ही लिये जीता रहा । 
और आप जानते हैं कि अपने विश्वासों के लिये मर जाना उनके लिये जीते रहने से सहज है । क्या आप जानते हैं कि शोपेनहार की स्वाधीन भावना को रोकने वाला कौन था ?
अपनी पीछे की पुस्तकों में उसने वह तेज और शक्ति खो दी । जो उसके पहले के लेखों में विशेष रूप से थी (व जिससे वह अपने पहले के लेखों में प्रसिद्ध व विशिष्ट था)
हेगल (hegel) और केन्ट (kant) के तत्वज्ञानों की दुर्बलता और हीनता का कारण ईसाईयत का प्रभाव है । 
क्या आप जानते हैं कि फ़िचेट (fichte) को अपना अध्यापक पद कैसे छोङना पङा और वह अपने देश से निकाला गया । इसका क्या कारण था ?
ईसाईयत थी ।
प्रारम्भ से ही ईसाईयत के विरुद्ध होते हुये भी सम्पूर्ण उन्नति हुयी है, न कि उसकी कृपा से ।
गलत निर्णय या अविचार न करो ।
एक भारत प्रवासी अंग्रेज, जो कुछ दिनों भारतवर्ष में रहा था, इंग्लैंड लौटने पर अपनी स्त्री से अपनी शक्ति और बल का घमण्ड करने लगा । वे अपने देहाती घर में रहते थे ।
तभी एन मौके पर एक भालू आ गया ।
भारत प्रवासी अंग्रेज भागकर एक पेङ की चोटी पर चढ़ गया । उसकी स्त्री ने हथियार उठाया और भालू को मार डाला ।
तब वहाँ कुछ दूसरे लोग आये और पूछा - भालू को किसने मारा ?
उसने कहा - मैंने और मेरी स्त्री ने भालू का वध किया ।
किन्तु (सत्य) बात (तो) ऐसी नही थी । 
इसी तरह जब बात पूर्ण हो गयी तब यह कहना कि - मैंने की है, ईसाईयत के द्वारा वह हुयी है । सत्य नही है ।
विज्ञान की सब उन्नति, यूरोप और अमेरिका में सम्पूर्ण दार्शनिक उन्नति, ये सब आविष्कार (inventions) और उपलब्धियाँ (discoveries) वेदान्त की वृत्ति के अमल में लाये जाने का फ़ल है ।
वेदान्त का अर्थ है - स्वाधीनता, स्वतन्त्रता ।
उन (वैज्ञानिक उन्नति आदि) का कारण है, स्वाधीनता की भावना, स्वतन्त्रता की वृत्ति, स्व-वशता की वृत्ति, शारीरिक आवश्यकताओं और आकांक्षाओं से ऊपर उठने की वृत्ति,
इस सारी उन्नति का कारण यही है और यही है वेदान्त का बेजान अमल में लाना ।
तुम इसे सच्ची ईसाईयत भी कह सकते हो । सच्ची ईसाईयत वेदान्त से भिन्न नही है । यदि तुम उसे ठीक ठीक समझो ।
वे कहते हैं कि हमने प्रथ्वीतल से गुलामी उठा दी है और हमने बहुत से सुधार किये हैं ।
भाईयो गुलामी हटाई गयी थी ?
अरे, राम बहुत चाहता है कि गुलामी हट गयी होती । यदि हम यह बयान मान लें कि गुलामी का अन्त हो चुका है, तो उसके दूर होने का कारण ईसाईयत नही है ।
ईसाईयत में गुलामी को हटा सकने वाली कोई चीज होती, तो गत पूर्ववर्ती सत्रह सौ साल में ईसाईयत ने गुलामी दूर क्यों नही कर दी ? 
कोई और ही बात थी ।
लोग अमेरिका को आये थे । यूरोपीय राष्ट्र इधर-उधर जा रहे थे । दूसरी कौमों से उनका संसर्ग हो रहा था । और उनको शिक्षा दी जा रही थी । उनके मन विशाल बनाये जा रहे थे ।
यह अमली वेदान्त है ।
गुलामी दूर होने का यह कारण था न कि ईसाईयत ।
राजनैतिक और सामाजिक अवस्थायें लोगों के ह्रदयों और आत्माओं को आन्दोलित कर रही थी । यदि अच्छी बातें तुम ईसाईयत के मत्थे मढ़ते हो तो नास्तिकों को दण्ड देना, टोनहिनियों (जादूगरनियां) का जलाना, सिर काटने का चक्र.. और आप जानते हैं कि नास्तिकों निमित्त विचार, इनक्वीजीशन (inquisition) क्या वस्तु है ?
एक समय सेन-फ़्रांसिस्को में उसका बेरोक-टोक राज्य था । 
अरे दारुण ! दारुण ! छाती से खून निकालना । इन सबके जिक्र की जरूरत राम को नही ।
ये किसके सिर थोपोगे ?

24 फ़रवरी 2017

समाधि लक्षण

सुनि शिष्य अबहिं समाधि लक्षण, मुक्त योगी वर्तते । 
तहं साध्य साधक एक होई, क्रिया कर्म निवर्तते । 
निरुपाधि नित्य उपाधि रहितं, इहै निश्चय आनिये । 
कछु भिन्न भाव रहै न कोऊ, सो समाधि बखांनिये । (गीतक)
- जहाँ योगी जीवन्मुक्त अवस्था में पहुँच जाता है । साध्य साधक में कोई भेद नहीं रहता और सभी क्रिया, कर्म, अकर्तव्य अवस्था में पहुँच जाते हैं अर्थात योगी का कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता । उस समाधि-अवस्था में आत्मा निरुपाधिक अथ च नित्य उपाधि रहित हो जाता है यह निश्चित समझ लो । जिसमें आत्मा से भिन्न कोई भाव नहीं रह जाता, उसे समाधि अवस्था कहते हैं ।
नहिं शीत उष्ण सुधा तृषा, नहिं मूरछा आलस रहै । 
नहिं जागरं नहि सुप्न सुषुपति, तत्पदं योगी लहै । 
इम नीर महिं गरि जाइ लवनं, एकमेकहि जांनिये । 
कछु भिन्न भाव रहै न कोऊ, सो समाधि वखांनिये । 
- (उस स्थिति में) योगी को न सर्दी, गर्मी सताती है, न भूख प्यास । न मूर्च्छा होती है, न आलस्य । योगी जिस पद को प्राप्त करता है वहाँ न जागरण है, न स्वप्न, न सुषुप्ति । जैसे पानी में नमक गिर जाने पर वह पानी के साथ एकमेक हो जाता है, और पानी नमक में कोई भेदभाव नहीं रहता इसी तरह समाधि अवस्था में भी जीव और ब्रह्म का ऐकात्म्य हो जाता है ।

नहिं हर्ष शोक न सुखं दुःखं, नहीं मान अमानयो । 
पुनि मनौं इन्द्रिय कृत्य नष्टं, गतं ज्ञान अज्ञानयो । 
नहिं जाति कुल नहिं वर्ण आश्रम, जीव ब्रह्म न जानिये । 
कछु भिन्न भाव रहै न कोऊ, सा समाधि वखांनिये । 
- योगी को कुछ प्राप्त होने पर न हर्ष होता है, न शोक, न सुख, न दुःख, न मान-अपमान का भाव होता है । मानों इन्द्रियों की वृत्तियां ही नष्ट हो जाती हैं (इन्द्रियां विषय की ओर नहीं जातीं) उनका विषय सम्बन्धी ज्ञान-अज्ञान सब नष्ट हो जाता है । उस समय उसे न जाति का, न कुल का, न वर्ण का, न आश्रम का कुछ भी अभिमान रह जाता है । यहाँ तक कि जीव और ब्रह्म का भी भेद बोध नहीं रहता । इसे समाधि-अवस्था कहते हैं ।
1 गीतक वा गीतिका छन्द है । इसमें ‘सज जभ रस लाग’ होते है 20 वर्ण का । परन्तु यहाँ यह ‘हरि गीतिका’ छन्द मातृक छन्द है । 16+12 मात्रा का । अन्त में लघु + गुरु हैं या रगण (‘।‘) । 
नहिं शब्द सपरश रूप रस, नहिं गंध जानय रंचहूं । 
नहिं काल कर्म स्वभाव है नहिं, उदय अस्त प्रपंचहूं । 
इम क्षीर क्षीरे आज्य आज्ये, जले जलहिं मिलानिये । 
कछु भिन्न भाव रहै न कोऊ, सा समाधि बखांनिये ।  
- योगी को शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध (आदि किसी भी इन्द्रिय के विषयों का) ज्ञान नहीं रहता । न काल, कर्म का स्वभाव उस अवस्था में रहता है, न सूर्य के उदय-अस्त के समय किये जाने वाले कर्म-काण्डों का प्रपञ्च ही । जैसे दूध में कुछ और दूध मिला दिया जाय, घी में कुछ और घी मिला दिया जाय, जल में कुछ और जल मिला दिया जाय तो भी पहले वाले से दूसरे में कोई भेद प्रकट नहीं होता । इसी को समाधि-अवस्था कहा जाता है ।
नहिं देव दैत्य पिशाच राक्षस, भूत प्रेत न संचरै । 
नहिं पवन पानी अग्नि भय पुनि, सर्प सिंहहिं ना डरै । 
नहि यंत्र मंत्र न शस्त्र लागहिं, यह अवस्था गानिये  । 
कछु भिन्न भाव रहै न कोऊ, सा समाधि बखांनिये । 
- योगी को देव, दैत्य, पिशाच, राक्षस, भूत, प्रेत का कोई भय नहीं रहता । न उसे वायु, जल, अग्नि, सर्प, सिंह का डर रहता है । न उसे किसी यन्त्र, मन्त्र, शस्त्र की चोट लग सकती है । न उनका असर पड सकता है क्योंकि वह योग ब्रह्म से तादात्म्य सम्बन्ध कर चुका होता है और योग शास्त्रोक्त काय सम्पत्ति को पूर्णतः प्राप्त कर चुका होता है । इस काय सम्पत्ति युक्त अवस्था को ही समाधि कहते हैं ।

1 आज्य = घृत । ‘दुग्धे क्षीरं घृते सर्पि’ गोरक्ष 2, 97 
2 योग की एक सिद्वि ऐसी भी वर्णन की गयी है जिसमें शरीर पर शस्त्र आदि का आघात या किसी मन्त्र आदि का प्रभाव नहीं हो सकता । 
जैसे
भेद्यः सर्वशस्त्राणामवध्यः सर्वदेहिनाम । 
अग्राह्यो मन्त्रयन्त्राणा योगी मुक्तः समाधिना । 
(गोरक्ष 2।8190 तथा
‘रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसम्पत’ (योगसूत्र 3।46) 
(उल्लास 1 ज्ञानसमुद्र 73) 
योग सिद्धांत सुनाइयौ, अष्ट अंग संयुक्त । 
या साधन ब्रह्महि मिलै, तेू कहिये, मुक्त । (दोहा)  
- मैंने तुझे आठ अंगों से युक्त योग का सिद्धान्त रूप वर्णन कर दिया । इस अष्टाङ्ग योग युक्त साधन के अभ्यास से जीव ब्रह्म से मिल सकता है । उस जीवब्रह्मैक्य अवस्था को ही मुक्त अवस्था कहते हैं । 

ये परदा हटा दो


की करदा नी ! की करदा, तुसी पुछोखां दिलवर की करदा ।
इकसे घर बिच वसदयां रसदवां, नहीं हुदा बिच परदा । 1
बिच मसीत नमाज गुजारे, बुतखाने जा बङदा । 2
आप इक्को, कई लाख घर अन्दर, मालिक हर घर घर दा । 3
मैं जितबल देखां, उतबल ओही । हर एक दी संगत करदा । 4
मूसा ते फ़रौन बना के, दो हो के क्यों लङदा । 5

1 एक ही घर में रहकर पर्दा नही किया जाता । मगर मेरा स्व-रूप मेरे दिल-रूपी घर में रहते हुये पर्दे में छुपा हुआ है । इसलिये ए लोगो ! तुम इस दिलवर (आत्मा) को पूछो कि - तू ये क्या लुक्कन छिप्पन खेल कर रहा है ।

2 कहीं तो मसजिद में छुपकर बैठा रहता है और उसके आगे नमाज होती है और कहीं मन्दिरों में दाखिल हुआ है जहाँ उसकी पूजा हो रही है । इसलिये ए लोगो ! दिलवर को पूछो कि - तू क्या कर रहा है ।

3 आप स्वयं तो एक अद्वितीय है मगर लाखों घरों (दिलों) के अन्दर प्रविष्ट हुआ हुआ हर एक घर का स्वामी बना हुआ है । इसलिये ए लोगो ! तुम दरयाफ़्त करो कि - यह दिलवर (प्यारा) क्या कर रहा है ।

4 जिधर मैं देखता हूँ उधर दिलवर ही नजर आता है । और हर एक के साथ वही (मिला बैठा) नजर आता है । इसलिये ए लोगो ! तुम दरयाफ़्त करो कि - दिलवर (ईश्वर) यह क्या कर रहा है ।

5 (मुसलमानों में हजरत मूसा और हजरत फ़रौन हुये हैं, जिनमें खूब झगङा हुआ था) इन दोनों को बनाकर या इस तरह से आप ही दो रूप होकर यह दिलवर क्यों लङता लङाता है ? 
इसलिये ए लोगो ! तुम दरयाफ़्त करो कि - यह दिलवर क्या करता है ?
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दिया अपनी ‘खुदी’ को जो हमने उठा,
वह जो पर्दा सा बीच में था, न रहा । 
रहे पर्दा में अब न वह पर्दानशीं,
कोई दूसरा उसके सिवा न रहा ।
न थी हाल की जब हमें अपनी खबर, 
रहे देखते औरों के एबो-हुनर ।
पङी अपनी बुराईयों पर जो नजर,
तो निगाह में कोई बुरा न रहा ।
‘जफ़र’ आदमी उसको न जानियेगा,
गो हो कैसा ही ‘साहिबे-फ़ैहो-जका’ ।
जिसे ऐश में यादे-खुदा न रही,
जिसे तैश में ‘खौफ़-खुदा’ न रहा ।
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बिना ज्ञान जीव कोई मुक्ति नही पावे । 
चाहे डार माला, चाहे बांध मृगछाला ।
चाहे तिलक छाप, चाहे भस्म तू रमावे । बिना..
चाहे रच के मन्दिर मठ, पत्थरों के लावे ठठ ।
चाहे जङ पदार्थों को सीस नित्य नवावे । बिना.. 
चाहे बजा गाल चाहे शंख, और बजा घङियाल ।
चाहे ढप चाहे डौरू झांझ तू बजाबे । बिना..
चाहे फ़िरे तू ‘गया’ ‘प्रयाग’, काशी में जा प्राण त्याग ।
चाहे गंगा यमुना चाहे सागर में नहावे । बिना.. 
द्वारका अरु रामेश्वर, बद्रीनाथ पर्वत पर ।
चाहे जगन्नाथ में झूठो भात तू खावे । बिना..
ज्ञानियों का कर ले संग, मूर्खों का तज दे संग ।
फ़िर तुझे मुक्ति का ठीक साधन आवे । बिना.. 

23 फ़रवरी 2017

जोगिया रे !


जोगी (साधु) का सच्चा रूप !

प्यारे ! क्या कहूँ ‘अहवाल’ की, अपने परेशानी ?
लगा ढलने मेरी आँखों से, इक दिन खुद ब खुद पानी ।
यकायक आ पङी उस दम, मेरे दिल पर यह हैरानी ।
कि जिसकी हो रही है यह, जो हर इक ‘जा’ ‘सनाख्वानी’ ।
किसी सूरत से उसको देखिये - कैसा है वह जानी ! 1
चढ़ा इस फ़िक्र का दरिया, भरा इस जोश में आकर ।
कि इक इक लहर उसकी ने, ले उङाया हवा ऊपर ।
‘करारो होशो अक्लो सबरो दानिश’ बह गये यक्सर ।
अकेला रह गया आजिज, गरीबो बेकसो ‘बेपर’ ।
लगा रोने कि इस मुश्किल की, हो अब कैसे आसानी ? 2
यह सूरत थी कि ‘जी’ में इश्क ने, यह बात ला डाली ।
मंगा थोङा सा गेरू, और वहीं कफ़नी रंगा डाली ।
बिना मुद्रे गले के बीच ‘सेली’ बरमला डाली ।
लगा मुँह पर भभूत, और शक्ल जोगी की बना डाली ।
हुआ अवधूत जोगी, जोगियों में आप गुरु ज्ञानी । 3
उठाई चाह की झोली, प्याला चश्म का खप्पर ।
बना कर इश्क का कंठा, तलब का सिर पै रख चक्कर ।
मुंडासा गेरुआ बांधा, रक्खा त्रिशूल काँधे पर ।
लगा जोगी हो फ़िरने ढ़ूंढ़ता, उस यार को घर घर ।
दुकां बाजार ओ कूचा ढ़ूंढ़ने की, दिल में फ़िर ठानी । 4
लगी थी दिल में एक आतिश, धुंआं उठता था आहों का ।
तमाशे के लिये ‘हलका’ बन्धा था साथ लोगों का ।
तलब थी यार की, और गरम था बाजार बातों का ।
न कुछ सिर की खबर थी, और न कुछ होश था पाओं का ।
न कुछ भोजन का अन्देशा, न कुछ ‘फ़िकरे-अमल’ पानी । 5
फ़िर इस जोग का ठहरा, अजब कुछ आन कर नक्शा ।
जो आया सामने मेरे, तो कहता उससे, सुनता जा ।
- कहो प्यारे ! हमारे यार को तुमने कहीं देखा ?
जो कुछ मतलब की वह बोला, तो उससे और कुछ पूछा ।
‘वगर’ यूं ही लगा कहने, तो फ़िर देना ‘अनाकानी’ । 6
कभी माला से कहता था, लगा कर जप से “ए माला” !
हुआ हूँ जब से मैं जोगी, तू ही उस यार को बतला ।
कभी घबरा के हँसता था, कभी ले स्वांस रोता था ।
लवों से आह, आँखों से, बहा पङता था दरिया सा ।
अजब जंजाल में चक्कर के, डाले है परेशानी । 7
कोई कहता था - बाबाजी ! इधर आओ, इधर बैठो ।
पङे फ़िरते हो रात दिन, टुक बैठो सस्ताओ ।
जो कुछ दरकार हो ‘मेवा मिठाई’ हुक्म फ़रमाओ ।
न कहना उससे - ले आओ, न कहना उससे - मत लाओ ।
खबर हरगिज न थी कुछ उस घङी, अपनी न बेगानी । 8
बङी दुविधा में था उस दम - कहाँ जाऊँ, कहाँ देखूँ ?
किसे देखूँ, किसे पूछूं, किधर जाऊँ, कहाँ ढ़ूंढ़ूं ?
करूँ तदवीर क्या ? जिससे मैं उस दिलदार को पाऊँ ।
निशां हरगिज न मिलता था, पङा फ़िरता था ज्यों मजनूं ।
अजब दरिया-ए-हैरत की हुयी थी, आ के तूफ़ानी । 9
उसी को ढ़ूंढ़ता फ़िरता हुआ, मस्जिद में जा पहुँचा ।
जो देखा वहाँ भी है, रोजों नमाजों का ही इक चर्चा ।
कोई जुब्बे में अटका है, कोई डाढ़ी में है उलझा ।
तसल्ली कुछ न पाई जब, तो आखिर वहाँ से घबराया ।
चला रोता हुआ बाहर, व अहवाले-परेशानी । 10
यही दिल में कहा - टुक मदरसे को झांकिये चल कर ।
भला शायद उसी में ही, नजर आ जाये वह दिलवर ।
गया जब वहाँ तो देखी ‘वाह वा’ कुछ और भी बदतर ।
किताबें खुल रही हैं, मच रहा है, शोरो-गुल अक्सर ।
हर इक मसले पै, फ़ाजिल कर रहे हैं - बैहसें-नफ़सानी । 11
चला जब वहाँ से घबरा कर, तो फ़िर यह आ गयी जी में ।
कि यह जगह तो देखी, अब चलो टुक ‘दैर’ भी देखें ।
गया जब वहाँ तो देखा, मूर्ति और घन्टों की झंकारें ।
पुकारा तब तो रोकर - आह ! किस पत्थर से सिर मारें ?
कहीं मिलता नही वह शोख, काफ़िर दुश्मने-जानी । 12
कहा दिल ने कि - अब टुक तीरथों की सैर भी कीजे ।
भला वह दिलरुबा शायद, इसी जगह पै मिल जावे ।
बहुत तीरथ मनाये, और किये दर्शन भी बहुतेरे ।
तसल्ली कुछ न पाई, तब तो हो लाचार फ़िर वहाँ से ।
मुहब्बत छोङ कर बस्ती की, ली फ़िर राह बियावानी । 13
गया जब ‘दशतो-स्वहरा’ में, तो रोया - आह ! क्या करिये ।
कहाँ तक ‘हिज्र’ में उस शोख के, रो रो के दिन भरिये ।
किधर जाईये, और किसके ऊपर आश्रय धरिये ?
यही बेहतर है अब तो, डूबिये या जहर खा मरिये ।
भला जी जान के जाने में, शायद आ मिले ‘जानी’ । 14
रहा कितने दिनों रोता, फ़िरा हर दशत में ‘नाला’ ।
गरीबो बेकसो तन्हा, मुसाफ़िर बे-वतन हैरान ।
पहाङों से भी सिर पटका, फ़िरा शहरों में हो ‘गिरया’ ।
फ़िरा भूखा प्यासा ढ़ूंढ़ता, दिलवर को सरगर्दान ।
न खाने को मिला दाना, न पीने को मिला पानी । 15
पङा था रेत में और धूप में, सूरज से जलता था ।
लगी थी दिल की आँखें यार से, और जी निकलता था ।
उसी के देखने के ध्यान में, हर दम निकलता था ।
वले महबूब से कुछ हाय ! मेरा वश न चलता था ।
पङे बहते थे आँसू ‘लालांगू’ लाले-बदखशानी । 16
जब इस अहवाल को पहुँचा, तो वह महबूब बेपरवाह ।
वही सौ बेकरारी से, मेरी ‘बालीन’ पै आ पहुँचा ।
उठा कर सिर मेरा जानूं पै, अपने रख के फ़रमाया ।
कहा - ले देख ले, जो देखना है, अब मुझे इस ‘जा’ ।
अयां है इस घङी करते, तेरे पै ‘भेदे-पिन्हानी’ । 17
यह सुन रख - पहले हम आशिक को अपने आजमाते हैं ।
जलाते हैं, सताते हैं, रुलाते हैं, बुलाते हैं ।
हर इक अहवाल में, जब खूब साबित, उसको पाते हैं ।
उसी को आके मिलते हैं, उसी को मुँह दिखाते हैं ।
उसे पूरा समझते हैं, हम अपने ध्यान का ध्यानी । 18
सदा महबूब की आयी, ज्यूंही कानों में वां मेरे ।
बदन में आ गया जी, और वहीं दुख दर्द सब भूले ।
फ़िर आँखें खोलकर, दिलवर के मुँह पर, टुक नजर करके ।
जमीनों-आसमान “चौदह तबक” के खुल गये परदे ।
मिटी इक आन में सब कुछ, खराबी और परेशानी । 19
हुयी जब आके यकताई, दुई का उठ गया पर्दा ।
जो कुछ ‘वहमो-दगा’ थे, उङ गये इक दम में हो पारा ।
‘नजीर’ उस दिन से हमने, फ़िर जो देखा खूब, हर इक ‘जा’ ।
वुही देखा, वुही समझा, वुही जाना, वुही पाया ।
बराबर हो गये हिन्दू-मुसलमां, ‘गिबरो-नुसरानी’ । 20     

दिलवर

प्रीत न की स्व-रूप से, तो क्या किया, कुच्छ भी नही ।
जान दिलवर को न दी, फ़िर क्या दिया, कुच्छ भी नही ।
मुल्क-गीरी में सिकन्दर से, हजारों मर मिटे ।
अपने पर कब्जा न किया, क्या लिया, कुच्छ भी नही ।
देवतों ने सोम-रस पिया, तो फ़िर भी क्या हुआ ?
प्रेम-रस गर न पिया, तो क्या पिया, कुच्छ भी नही ।
हिज्र में दिलवर के, हम जो उमर पाई खिजर की ।
बार अपना ना मिला, तो क्या जिया, कुच्छ भी नही ।
----------------------
मुल्क-गीरी - विश्वविजय करना । हिज्र - विरह ।
खिजर - मुसलमानों के फ़कीर का नाम, जिनकी आयु अनन्त बताते हैं ।
-------------------

इसलिये तस्वीर जानां, हमने खिचवाई नहीं ।
बात थी जो असल में, वह नक्ल में पाई नहीं ।
पहले तो यहाँ जान की, तन से शनासाई नही ।
तन से जां जब मिल गयी, तो उसमें दो ताईं नहीं ।
एक से जब दो हुये, तब लुत्फ़े-यकताई नहीं ।
हम हैं मुशताके-सखुन, और उसमें गोयाई नहीं ।
पाओं लंगङा हाथ लुंझा, आँख बीनाई नहीं ।
यार का खाका उङाना, यह भी दानाई नहीं ।
कागजी यह पैरहन है, दिल को यह भाई नही ।
दिल में डर है कि मुसव्वर, ही न बन बैठे रकीब ।
दाम माँगे था मुसव्वर, पास इक पाई नहीं ।
असल की खूबी कभी भी, नकल में आई नहीं ।
इसलिये तस्वीर जानां, हमने खिचवाई नहीं ।  
---------------
शनासाई - पहचान । दो ताई - द्वैत, दो होना । लुत्फ़े-यकताई - एकता का आनन्द ।
गोयाई - वार्ता के इच्छुक । बीनाई - रोशनी । खाका - उपहास । दानाई - बुद्धिमत्ता ।
पैरहन - वस्त्र । मुसव्वर - तस्वीर खींचने/बनाने वाला । रकीब - शत्रु, समान प्रियतम । 

22 फ़रवरी 2017

जो कोई रूह आपनी देखे

जिस तरह स्वाभाविक ही सहजग्राह्य होने से सगुण भक्ति और उसकी उपाधियां हिन्दू आदि जनमानस में लोकप्रिय हैं और निर्गुण निराकार ब्रह्म ‘समझ से परे’ होने के कारण अटपटा और नीरस लगता है । इसलिये सहज ही हिन्दू उसको समझने का झंझट ही नही चाहते ।
उसी तरह मुस्लिम धर्म परम्परा में भी सूफ़ी सिद्धांतों, मतों को हर-समय हर-स्थान पर उनका माकूल मुर्सिद न होने से (उन कठिन शब्दों के भाव और उनका पता, ठिकाना न मालूम हो सकने से) 
‘एकेश्वर’ और ‘निराकार’ का ठोस स्थापित सिद्धांत होने के बावजूद भी अधिकांश आम मुस्लिम अनुयायी हिन्दुओं की पूजा-पाठ की भांति ही नमाज, रोजे रखना और कुछ मजहबी क्रियाकलापों, जलसों, त्यौहारों से अतिरिक्त जानकारी नही रखते । 
सीधी सी बात है कि इस स्तर तक बताने वाले, समझाने वाले, अनुभव कराने वाले हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई आदि समुदायों में न के बराबर ही हैं । अतः उनकी कोई गलती भी नही है ।
- यह लेख ऐसे ही कुछ ‘शब्दों व स्थानों’ की जानकारी देता है ।
-----------------
खुदा के सौ नाम हैं । निन्यानवे नाम सगुण हैं और एक नाम निर्गुण है । लेकिन असली मुक्ति देने वाला ‘निर्गुण अल्लाह नाम’ ही है । वही खुद-खाविंद का नाम है । 

विशेष - राम नाम से ‘अल्लाह’ नाम निकला है । राम के मकार का रकार हुआ, आगे का पीछे आया तब ‘अर’ हुआ । अर ‘रा’ के पीछे आया तब अर राम हुआ । रल के अभेद से ‘अल्ला’ हुआ ।
व्याकरण, वर्ण विकार, वर्णकार, वर्ण विपर्यय, पृषोदरादि पाठ से सिद्ध शब्द को साधन के वास्ते प्रसिद्ध है । (यह वर्णन ठीक से समझ में नहीं आया)
जुलमत नासूत मलकूत में, फ़िरिस्ते नूर जल्लाल जबरूत में जी ।
लाहूत में नूर जम्माल पहिचानिये, हक्क मकान हाहूत में जी ।
बका बाहूत साहूत मुर्सिदवा रहै, जो रब्ब राहूत में जी ।
कहत ‘कबीर’ अविगत आहूत में, खुद खाविन्द जाहूत में जी । 
------------------
प्रकाश ब्रह्म - लामकान, 
मुसलमानों में पाँच मुकाम के दो नाम हैं - नासूत को आलम, अजसाम - शरीरधारी ।
मलकूत को आलम - मिसाल फ़िरिस्तों की दुनियां (देवलोक)
जबरूत को आलम - प्रथ्वी, जल, तेज, वायु ।
लाहूत को आलम - नूर ।
हाहूत - मुकाम मुहम्मदी (जहाँ मुहम्मद पहुँचे)
जिकर नासूत ‘लाईला हईलाहू’
जिकिर मलकूत ‘इलिल्लाहू’
जिकिर जबरूत ‘अल्ला अल्ला’
जिकर लाहूत ‘अल्लाह’
जिकिर हाहूत ‘हूंहूं’
(इनका दिन रात में पाँच हजार जप करे)
तब क्रम से ‘मजकूर’ पहुँचे अर्थात नूर, अल्लाह (निराकार - हँस स्वरूप)
पीरानपीर साहब के पास पहुँचे ।
पनाह अता (कवित्त)
देह नासूत सुरै मलकूत औ जीव जबरूत की रूह बखानै ।
अरबी में निराकार कहै, जेहि लाहुतै मानि कै मंजिल ठानै ।
आगे हाहूत लाहूत है जाहूत, जाहूत खुद खाबिंद जाहूत में जानै ।
सोई श्री राम पनाह, सब जगनाह पनाह अता यह गाने ।
तजै कर्मना सूत लहि, निरखै तब मलकूत ।
पुनि जबरूतौ छोङि कै, दृष्टि परै लाहूत ।
इन चारो तजि आगे ही, पनाह अता हाहूत ।
तहाँ न मरे न बीछुरै, जात न तहँ यमदूत ।
औ ‘जुलजलाल अव्वल’
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बेचूनै जग राचिया, साईं नूर निनार ।
तब आखिर के बखत में, किसका करो दीदार ?
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बाप पूत दोऊ भरम, आधकोश नव पाँच ।
बिन गुरु भरम न छुटे कैसे आवै सांच ?
कलमा बांग निमाज गुजारै, भरम भई अल्लाह पुकारे ।
अजब भरम यक भई तमासा, ला मुकाम बेचून निवासा ।
बेनमून वह सबके पारा, आखिर ताको करौ दीदारा ।
रगरै महजिद नाक अचेत, निंदे बुत परस्त तेहि हेत ।
बाबन तीस बरन निरमाना, हिन्दू तुरक दोऊ भरमाना ।
भरमि रहे सब भरम महँ, हिन्दू तुरक बखान ।
कहहिं ‘कबीर’ पुकार कै, बिनु गुरु को पहिचान ।
भरमत भरमत सब भरमाना, रामसनेही बिरला जाना ।
साई नूर दिल एक है, सोई नूर पहिचान ।
जाके करते जग भया, सो बेचून क्यों जानि ।
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आधकोश - अधामार्त्री (मुसलमानों का गुरुमन्त्र - ला एला इलिल्लाह मुहम्मदुर्रसू लिल्लाह !)
ला मुकाम - स्थान रहित । बेचून - निराकार । बेनमून - अदृश्य ।
बाबन तीस बरन (52 हिन्दी वर्णमाला 30 उर्दू)
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सरूप अखण्डित व्यापी, चैतन्य अचैतन्य ।
ऊँचे नीचे आगे पीछे, दाहिन बाँये अनन्य ।
बङा ते बङा छोटते छोटा, मीही ते सब लेखा ।
सबके मध्य निरन्तर साईं, दृष्टि दृष्टि सों देखा ।
चाम चश्म सों नजरि न आवै, खोजु रूह के नैना । 
चून चगून बजूद न मान तैं सुभा नमूना ऐना । 
ऐना जैसे सब दरसावै, जो कछु वेश बनावै । (ऐना - आइना)
ज्यों अनुमान करै साहिब को, त्यों साहिब दरसावै ।
जाहि रूह अल्लाह के भीतर, तेहि भीतर के ठाईं ।
रूप अरूप हमारि आस है, हम दूनहु के साईं ।
जो कोई रूह आपनी देखे, सो साहिब को पेखा ।
कहैं ‘कबीर’ स्वरूप हमारा, साहिब को दिल देखा ।
रेख रूप जेहि है नही, अधर धरो नहि देह ।
गगन मंडल के मध्य में, रहता पुरुष विदेह ।
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बहु परचै परतीत दृढ़ावै, सांचे को बिसरावै ।
कलपत कोटि जनम युग वागै, दर्शन कतहुं न पावै ।
परम दयालु परम पुरुषोत्तम, ताहि चीन्ह नर कोई ।
तत्पर हाल निहाल करत हैं, रीझत है निज सोई ।
बधिक कर्म करि भक्ति दृढ़ावै, नाना मत को ज्ञानी ।
बीजक मत कोई बिरला जानै, भूलि फ़िरे अभिमानी ।
कहि ‘कबीर’ कर्ता में सब है, कर्ता सकल समाना ।
भेद बिना सब भरम परे, कोई पूछे सन्त सुजाना । 
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यदि इससे आपको ‘अर्थ’ समझने में सुविधा होती है तो लेख सार्थक है ।
- मुझे स्वयं इस्लामी शब्दों के बारे में ठोस सुनिश्चित जानकारी नही है । अतः यदि किसी बन्दे को इस लेख में कोई गलती या जोङ, घटाने जैसा लगे तो कृपया टिप्पणी में लिखें । उसको संशोधित कर दिया जायेगा ।
- इसके अतिरिक्त आपके पास ऐसी कोई सन्तवाणी या लेख है जो ‘आत्मज्ञान’ के गूढ़ रहस्यों पर हो । तो भी कृपया हमें बतायें ।
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अन्त में एक पहेली 
पूर्व द्वार - आनन्दवन, पश्चिम द्वार - वृन्दावन ।
उत्तर द्वार - जनकपुर, दक्षिणद्वार - चित्रकूट ।

17 फ़रवरी 2017

पंचतत्व धारणा

1 - पृथ्वी तत्व धारणा 
यह चारो कोण ‘लकार’ हि युक्तं, जांनहुं पृथ्वी रूपं । 
पुनि पीत वर्ण हृदि मंडल कहिये, बिधि अंकित सु अनूपं । 
तहं घटिका पंच प्रांण करि लीनं, चित्त स्थम्भन होई । 
सुनि शिष्य अवनि जय करै नित्य ही, भूमि धारणा सोई । (चौपइ) 
- पृथ्वी आदि तत्वों को ध्यानस्थ बीज मन्त्र (ॐकार या गुरु उपदिष्ट मन्त्र) से ध्यान कर तत्वों पर अधिकार करना ‘धारणा’ है । धारणा के तत्व भेद से पाँच प्रकार हैं । पृथ्वी तत्व धारणा के लिये साधक को हृदय मण्डल में पृथ्वी रूप की परिकल्पना करना चाहिये । वहाँ चारों कोणों में ‘ल’ अक्षर का संयोजन करना चाहिये, भूमि पीले वर्ण की तथा वर्तुलाकार समझनी चाहिये । उस पर ब्रह्मा के अनुपम विग्रह की कल्पना करनी चाहिये । वहाँ पांच घङी तक प्रायाणाम विधि से चित्त निरोध का अभ्यास करे । पृथ्वी तत्व की धारणा से योगी पृथ्वी तत्व पर विजय पाता है ।
2 - जल तत्व धारणा 
अक्षर ‘वकार’ संयुक्त जानि, जल चन्द्र खण्ड निद्धरिं । 
पुनि ऋषीकेश अङ्कित अति शोभित, कंठ पारदाकार । 
तहं घटिका पंच प्राण करि लीनं, चित्त धारि कैं रहिये । 
विष कालकूट ब्यापै नहिं कबहू, वारि धारणा कहिये । 
- जल तत्व की कण्ठ में अर्धचन्द्राकार शुभ्र पारद के समान श्वेत मण्डल युक्त परिकल्पना करनी चाहिये । उसमें ‘व’ अक्षर तथा विष्णु के विग्रह की परिकल्पना करें । वहाँ पांच घङी तक प्राणायाम द्वारा चित्त निरोध का अभ्यास करे । जल तत्व की धारणा से योगी पर कालकूट आदि विषों का कोई प्रभाव नहीं होता । (उल्लास 1 ज्ञानसमुद्र 65)
ब्रह्मा विरुणुश्च रुद्रश्च, ईश्वरश्च सदाशिवः । 
एतास्तु देवताः प्रोक्ताः धारणाना क्रमेण तु ।  
(तुलना) गोरक्ष पद्धति 
3 - तेज तत्व धारणा 
यह अग्नि त्रिकोण ‘रेफ’ संयुक्तं, पद्यराग आभास । 
पुनि इन्द्र गोपु दुति मध्य तालुका, कहिये रुद्र निवासं । 
तहं घटिका पंच प्राण करि लीनं, ग्रन्थहि उक्त वषांनं । 
सुनि शिष्य अग्नि भयहन्ता कहिये, तेज धारणा जांनं । 

- तेज (अग्नि) तत्व की धारणा के लिये योगी अपने तालु प्रदेश में त्रिकोण पद्मराग मणि सदृश रक्तमण्डल की परिकल्पना कर उन तीनों कोणों में ‘र’ अक्षर को रखे । फिर इन्द्रगोप (बीरबहूटी) के रंग वाले रुद्र के वास की कल्पना करे । यहाँ योगी पांच घङी तक प्राणायाम से चित्तवृत्ति रोकने का अभ्यास करे ऐसा योग ग्रन्थों में है । अग्नि तत्व धारणा से योगी के सभी प्रकार के भय दूर हो जाते हैं ।
र्धेन्दुप्रतिमं च कुन्दधवलं कण्ठे‘म्बुतत्वं स्थितम, 
तत् पीयूषवकारबीजसहितं युक्तं सदा विष्णुना । 
प्राणं तत्र विलीय पत्र घटिकाश्चित्तान्वितं धारयेद, 
एषा दुःसहकालकूटजरणी स्यादाम्बवी धारणा । 
(तुलना) गोरक्ष पद्धति 2. 55 
यत् तालुस्थितमिन्द्रगोपसदृश तत्व त्रिकोणं ज्वलत, 
तेजोरेफयुतं प्रवालरुचिरं रुद्रेण यत सङ्गम । 
प्राणं तत्र विलीय पञ्च घटिकाश्चित्तान्वित धारयेद, 
एषा वह्निजयं सदा विदधती वैश्वानरी धारणा । 
(तुलना) गोरक्ष पद्धति 2. 56 सु. 2, 5 
4 - वायु तत्व धारणा 
भ्रुव मध्य ‘यकार’ सहित षटकोणं, ऐसो लक्ष विचारं । 
पुनि मेघ वर्ण ईश्वर करि अङ्कित, बारम्बार निहारं । 
तहं घटिका पंच प्राण करि लीनं, खेचर सिद्धि हि पावै । 
सुनि शिष्य धारणा वायुतत्व की, जो नींकैं करि आवै । 
- भ्रुवों के मध्य भाग में मेघ वर्ण वाले छह कोणों युक्त वायुमण्डल की कल्पना करे तथा उसमें ‘यकार’ वर्ण का संयोजन कर वहाँ ईश्वर विग्रह की परिकल्पना करे । उस विग्रह को बारम्बार देखते हुये योगी को पांच घङी तक प्राणायाम विधि से मन का निरोध करने का अभ्यास करना चाहिये ।
इस प्रकार वायु तत्व धारणा से, यदि यह सिद्ध हो जाय, योगी को खेचरी सिद्धि प्राप्त होती है ।
5 - आकाश तत्व धारणा 
अब ब्रह्मरंध्र आकाश तत्व है, शुभ्र वर्तुलाकार । 
जहं निश्चय जांनि सदाशिव तिष्ठति, अक्षर सहित ‘हकारं’ । 
तहं घटिका पंच प्राण करि लीनं, परम मुक्ति की दाता । 
सुनि शिष्य धारणा व्योम तत्व की, योग ग्रन्थ विख्याता ।  
- आकाश तत्व का स्थान है ब्रह्मरन्ध्र । वह गोल, सफेद चमकदार रंग वाला है । वहाँ सदाशिव का मनोहारी विग्रह है, ‘हकार’ अक्षर है । वहाँ यदि योगी पांच घडी तक प्राण अवरोध कर चित्तवृत्ति रोकने का अभ्यास करे तो आकाश तत्व का धारणा अभ्यास परमपद मोक्ष के द्वार को खोलता है । योग ग्रन्थों में इस तत्व धारणा का यही माहात्म्य है । (उल्लास 1 ज्ञानसमुद्र 67)
यद् भिन्नाञ्जनपुञ्जसन्निभमिदं वृत्तं भ्रुवोरन्तरे, 
तत्व वायुमयं यकारसहित तत्रेश्वरो देवता । 
प्राणं तत्र विलीय पञ्च घटिकाश्चित्तान्वित धारयेद, 
एषा खे गमनं करोति यमिनां वै वायवी धारणा ।  
(तुलना) गोरक्ष पद्धति (2. 57) 
आकाशं सुविशुद्धवारिसदृशं यद ब्रह्मरन्ध्रे स्थितम, 
यन्नाथेन सदाशिवेन सहितं सान्तं हकाराक्षरम । 
प्राणं तत्र विलीय पञ्च घटिकाश्चित्तान्वितं धारयेद, 
एषा मोक्षकपाटपाटनपटुः प्रोक्ता नभोधारणा । 
(तुलना) गोरक्ष पद्धति 2. 58) 
यह येक थंभिनी एक द्राविणी, एक सु दहनी कहिये । 
पुनि येक भ्रामिणी येक शोषणी, सदगुरु बिना न लहिये । 
ये पंच तत्व की पंच धारणा, तिन के भेद सुनाये । 
अब आगै ध्यान कहौं बहु बिधि करि, जो ग्रन्थनि महिं गाये । 
- उपर्युक्त पांच तत्वों की धारणाओं में प्रथम पृथ्वी तत्व की धारणा ‘स्तम्भिनी’ कहलाती है ।
- जल तत्व की धारणा ‘द्राविणी’ कहलाती है ।
- अग्नि तत्व की धारणा ‘दहनी’ तथा वायु तत्व की धारणा ‘भ्रामिणी’ कहलाती है ।
- आकाश तत्व की धारणा ‘शोषिणी’ कहलाती है ।
- ये सभी धारणाएं बिना सदगुरु के सिद्ध नहीं होतीं ।
इस तरह पांच तत्वों की पांच धारणाओं का भेद सहित वर्णन कर अब योग शास्त्र (प्रमाणिक ग्रन्थों) में कही ध्यान की बहुत सी विधि बताऊंगा । 

05 फ़रवरी 2017

स्वात्माराम

आदिसृष्टि से ही करोङों जन्मों तक अपनी कश्ती को अगम, अथाह, अपार भवसागर के पार या किनारे ले जाने के इच्छुक भटकते हुये व्यग्र आत्मविद्या के शोधार्थियों के चिन्तन, मनन हेतु गूढ रूपक !
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लौकिक (रूपक)
एक मद्रासी जो कम्बल और उपानहों (जूतों) से युक्त बूढ़े बैल के समान गुण धर्म वाला होने से जरद्‌गव वाहीक था । अपने घर के द्वार पर बैठकर मद्र देश में प्रसिद्ध गीतों को गाता था । उसे कोई ब्राह्मणी जो कि लहसुन से शान्त होने वाले रोगग्रस्त पुत्र के साथ किसी आवश्यक कार्य से समुद्र की ओर जाने वाली थी और साथ साथ वहाँ पर पुत्र का जीवन भी चाह रही थी ।
‘यह (मद्रासी) लवण समुद्र की ओर से आया है’ लोगों से यह सुनकर अत्यन्त आदरपूर्वक सम्बोधित करती हुयी पूछती है - हे राजन ! लवण समुद्र में लहसुन का भाव क्या है ?
(अर्थात क्या वहाँ लहसुन सस्ता है या महंगा है ?)
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पारमार्थिक भाव -
कम्बल के समान आवरण करने वाली अविद्या से तथा पादुकाप्राय लिंग शरीर से चक्षु आदि द्वारों पर विषय-भोग के लिये स्थित हुआ बूढ़े बैल के समान यह जीव वैषयिक स्त्री, पुरुष आदि के मंगल गीतों को बहिर्मुख होकर गाता है (अपने स्व-रूप को बिलकुल नही देखता)
उसे इस प्रकार पाकर ‘पुनामक संसार-नरक’ से उद्धार करने वाले ब्रह्मात्मरूपता ज्ञानस्वरूप पुत्र की इच्छा कर रही ब्राह्मणी की तरह ब्रह्म सम्बन्धिनी ‘श्रुति’ उससे पूछती है - हे राजन ! (अर्थात स्वयं प्रकाशरूप से विराजमान और अपने चैतन्य से सम्पूर्ण जगत को रंजित करने वाले हे आत्मदेव ! सभी विद्या, काम और कर्म के बीजों का विनाशक होने से समुद्र की तरह ऊषरप्राय, परमशुद्ध तुम्हारे स्वरूप के रहते हुये अत्यन्त अपवित्र होने से ब्राह्मणों द्वारा अभोग्य लहसुनतुल्य भोज्यों के विषय में तुम मूल्य ही क्या विचारते हो ?
अतः बाह्य दृष्टि छोङकर ‘स्वात्माराम’ हो जाओ ।
इसी आशय से वह पूछती है - यह आत्मा कौन है जिसकी हम लोग उपासना करते हैं (वह कौन सा आत्मा है) ?
जगत के ‘कारण ब्रह्म’ का क्या स्वरूप है । हम कहाँ से उत्पन्न हुये ?
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अन्त में माथापच्ची -
आत्मा (आ-त्मा) का सही शब्दार्थ, भावार्थ क्या है ?
संकेत - आ-जीवन, आ-मरण, आ-शंका, आ-भास आदि ।
अब सरल ही है !
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इसी लेख में प्रयुक्त ‘समुद्र की तरह ऊषरप्राय’ का क्या भाव है ?
संकेत - चित्रपट !
अब तो सरल है ।

02 फ़रवरी 2017

मोह-मन्दिर

अलख निरंजन लखै न कोई । जेहि बंधे बंधा सब लोई ।1। 
जेहि झूठे सब बाँधु अयाना । झूठी बात साँच कै माना ।2।
धंधा बंधा कीन्ह व्यौहारा । कर्म विवर्जित बसै नियारा ।3।  
षट आश्रम षट दर्शन कीन्हा । षटरस वस्तु खोट सब चीन्हा ।4।
चारि वृक्ष छव शाख बखानी । विद्या अगनित गनै न जानी ।5।  
औरो आगम करै विचारा । ते नहिं सूझे वार न पारा ।6।
जप तीरथ व्रत कीजे पूजा । दान पुण्य कीजे बहु दूजा ।7। 
(बीजक रमैनी -22)
मंदिर तो है नेह का, मति कोई पैठे धाय ।
जो कोई पैठे धाय के, बिन सिर सेती जाय । (साखी)
उस अलख (अदृश्य) निरंजन की परीक्षा कोई नहीं करता जिसके बन्धन में सब लोग बंधे हैं ।।1।।
जिस (असत्य) धारणा में सब (अबोध) जीव बंधे है, उस झूठी बात को उन्होंने सत्य (जानकर) मान रखा है ।। 2 ।।
यद्यपि जीव का शुद्ध स्वरूप सर्वथा कर्म-रहित है और उसकी स्थिति जड़ से नितांत भिन्न एवं असंग है, तथापि अपना स्वरूप भूलने से उसने गुलामी का धंधा उठा रखा है और विवशता का व्यवहार का रहा है ।।3।। 
मन ने (कल्पित, निराधार, अ-वस्तु, अ-पदार्थिक) छह आश्रम, छह दर्शनों की रचना की और छह रस का आस्वादन किया और छह सिद्धान्तों का निरूपण किया ।।4।।
चार (वेद रूपी) वृक्ष तैयार किये और उसमें छह (वेदांग रूप) शाखाओं का विस्तार किया । इतना ही नहीं, काल-मन ने अगणित विद्याओं का प्रवर्तन किया, एक व्यक्ति के लिए जानना असंभव तो है ही, उनकी गणना भी सरल काम नही ।।5।।
आगे और भी आगम शास्त्र विचारे, जिसमें वार-पार नहीं सूझता ।।6।। 
जप, तीर्थ, व्रत, पूजा, दान-पुण्य तथा ऐसे ही अनेकानेक नाना कर्म बना दिये ।।7।।
जिस मंदिर में आदमी कैद होता है वह तो स्नेह एवं मोह का है ।
हे कल्याणार्थी ! इसमें दौड़कर मत घुसो जो इस मोह-मंदिर में दौड़कर घुसेगा, वह व्यर्थ में अपना सिर कटा बैठेगा ।।22।।
अलख निरंजन अदृश्य काल है । 
काल के दो रूप हैं - एक समय की अवधि तथा दूसरा मन की कल्पना ।
इस रमैनी में मन की कल्पित अवधारणाओं को ही अलख निरंजन कहा गया है ।
सदगुरु कबीर कहते हैं कि - लोगों के मन की जो रूप-रेख रहित कल्पित अवधारणाएं हैं उन्हें वे परखने की कोशिश नहीं करते । आदमी का बन्धन गलत अवधारणाएं एवं कल्पनाएं ही है । आदमी रस्सी, लोहे की जंजीर या काष्ठ आदि में बंधा हो, तो उसे अपने बन्धन दिखाई दें, किन्तु बन्धन तो अदृश्य हैं । वे आदमी को सहज दिखाई भी नहीं देते । मन के अदृश्य बन्धनों को कोई बिरला देखता है ।
‘जेहि झूठे सब बाँधु अयाना’ 
बन्धन झूठे हैं, किन्तु जिन्हें ज्ञान नहीं है, वे इस झूठे को ही सच मान रहे हैं और खुशी खुशी बंधे हैं । मोह में बुद्धि भ्रमित होती है ।
‘धंधा बंधा कीन्ह व्यवहारा’ 
बंधा ही बन्धन का धंधा एवं व्यवहार करता है । बंधा का अर्थ है वशवर्ती एवं गुलाम ।
स्वतन्त्र जीव मन के मिथ्या बन्धन में पड़कर गुलाम हो गया ।
सदगुरु कहते हैं
‘कर्म विवर्जित बसै नियारा’ 
जीव कर्मों से अलग और जङ प्रकृति से सर्वथा पृथक एवं असंग है । अपने असंगत्व का बोध न होने से जीव सब में फँसा है । अपने आपको दृश्यों में मिला देना पीड़ा है और अपने ‘असंगत्व’ का सदैव भान रहना अमृतत्व है ।
सदगुरु कहते हैं कि - ऐसा शुद्ध असंग जीव सब में मिल-मिलकर बंधा है ।
इन बन्धनों से छूटने के लिए मनुष्यों ने छह आश्रम, छह दर्शन, छह रस एवं छह वस्तुओं की अवधारणाएं कीं । 
ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास ये चार आश्रम हैं । इनमें ‘हंस’ एवं ‘परमहंस’ जोड़कर छह आश्रमों की अवधारणाएं हुई ।
योगी, जंगम, सैवड़ा (जैनी-बौद्ध), संन्यासी, दरवेश (फकीर) और ब्राह्मण ये छह दर्शन हैं ।
‘षटरस बास’ छह रसों का आस्वादन है ।
(यहाँ प्रसिद्ध षडरस - मीठा, नमकीन, कड़वा, तीता, कसैला तथा खट्टा अर्थ नहीं है)
बल्कि छह नामों का जप है ।
ब्राह्मणों का ‘ॐ’ सन्यासियों का ‘सोऽहं’ दरवेशों, सूफियों का ‘हू’ (अल्ला हूं) 
योगियों का ‘महीनाद’  सेवड़ा का ‘तत्वनाम’ एवं जंगमों का ‘निरंजन’ जप है । 
इस प्रकार षडदर्शनों के छह जप हैं ।
और भक्तजन अविनाशी राम-नाम जप करते हैं ।
ये सब अपने अपने नाम-जप का आस्वादन करते हैं । इसके अलावा भी अनेक प्रकार नाम एवं मंत्र आदि के जप हैं ।
‘षटै वस्तु चीन्हा’ 
उन्होंने अपने अपने सिद्धांत का अलग अलग निरूपण किया ।
ब्रह्मचारी ब्राह्मणों का ‘अद्वैत परमात्मा’ 
सन्यासियों का ‘अहं ब्रह्मास्मि’
फकीरों का ‘वायु का वायु में मिल जाना’ 
योगियों का ‘पिंड से उठकर ब्रह्मांड में पहुंचना’
जैनियों का ऊपर ‘आलोक आकाश में चंद्रशिला पर मुक्त होकर रहना’ 
जंगमों (शिवाचारियों) का ‘आकाशवत परमात्मा शिव में मिलना’
यह छह दर्शनों के सिद्धांत हैं ।
और भक्तों का विलक्षण सिद्धांत है कि - राम पुरुष है और सब जीव नारि रूप है । 
(ऐसा मानकर माधुर्य भक्ति करना)
इसके अतिरिक्त भी नाना मतों द्वारा नाना सिद्धांतों का निरूपण किया गया ।
‘चारि वृक्ष छव शाख बखानी’ 
चार वृक्ष छौ शाखा, चार वेद एवं छह वेदांग के लिए रूपक है ।
मनुष्यों के कल्याण के लिए चारों वेद (ऋक, यजु, साम, अथर्व) की और छह वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण निरुक्त, छंद, ज्योतिष) की रचना की गई ।
जो वेदाध्ययन तथा वेद मंत्रों के विनियोग एवं संस्कारों में सहायक होते हैं, उन्हें वेदांग कहा जाता है, वे उक्त छह हैं ।
वेद-मंत्रों के उच्चारण का विज्ञान बताने वाला ‘शिक्षा’ अंग है । 
कर्मकांड या अनुष्ठान पद्धति और यज्ञों, संस्कारों की विधियां ‘कल्प’ में बताई हैं ।
व्याकरण वह वेदांग है जिसमें भाषा के शब्दों, उनके रूप प्रयोग आदि पर विवेचन है ।
निरुक्त वह ग्रंथ है जिसमें वैदिक शब्दों की व्याख्या की गई है ।
(ईसा पूर्व सातवीं-आठवीं सदी के यास्क मुनि की प्रसिद्ध रचना ‘निरुक्त’ है)
छंदों का रूप बताने वाला छंद है ।
ज्योतिष का अर्थ है नक्षत्र विद्या या गणित ।
‘विद्या अनणित गनै न जानी’ 
विद्याएं असंख्य है । इतिहास, पुराण, उत्पाद-शास्त्र, निधि विद्या, तर्क विद्या, भूत विद्या, धनुर्विद्या, संगीत विद्या, प्राणी विद्या, वनस्पति विज्ञान, मनोविज्ञान, शरीर विज्ञान, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, कहाँ तक कहा जाए गिनकर समाप्त करना कठिन है, एक व्यक्ति का जानना असंभव है ।
‘औरो आगम करे विचारा’
मनुष्य और भी आगे बहुत शास्त्रों का विचार करता है ।
आगम का अर्थ है - वेदादि मान्य ग्रंथ, शास्त्र, दर्शन, तंत्रशास्त्र आदि ।
‘वाराही तंत्र’ नामक ग्रंथ के अनुसार सृष्टि, प्रलय, देवतार्चन, सर्वसाधन, पुरश्चरन, षटकर्म (शांति वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन और मारण) का साधन तथा ध्यान-योग इन सात लक्षणों से युक्त ग्रंथ को आगम कहते हैं ।
इस प्रकार लोग असंख्यात विद्याओं का विचार करते हैं ।
वाणी-जाल का इतना विस्तार है कि उसमें मनुष्य को ‘वारपार’ नहीं सूझता ।
‘ते नहिं सूझे वार न पारा’ 
बड़ा वजनदार वचन है । वार पार सूझने का मतलब है - अपने लक्ष्य का दिखाई न देना !
यदि मनुष्य अपने लक्ष्य को न देख सका तो बहुत विद्या पढ़कर क्या हुआ ?
इसीलिए सदगुरु का महानिर्देश है -
‘सार सार को गहि रहे, थोथा देय उड़ाय ।’
लोग कल्याण के लिए ही नाना नाम, मंत्रों का जप करते हैं । देश के बहुत या सभी तीर्थों में बारंबार भ्रमण करते हैं । एकादशी, अष्टमी, चंद्रायण इत्यादि व्रत उवास करते हैं । पेड़, पहाड़, पानी, पाषाण आदि में देवी देवता मानकर उनकी पूजा करते हैं । अनेक प्रकार दान पुण्य करते हैं । 
ठीक है । अपनी अपनी समझ शक्ति के अनुसार कुछ धर्म-कर्म करना अच्छा है ।
किंतु इनसे भी कुछ आगे है, इसे सत्संग-विवेक द्वारा समझने का प्रयत्न करना चाहिए ।
मन्दिर तो है नेह का, मति कोइ पैठो धाय । 
जो कोइ पैठे धाय के, बिन शिर सेती जाय ।
बहुत महत्वपूर्ण साखी है ।
सदगुरु कहते हैं कि - मोह के मन्दिर में दौड़कर मत घुसो । उपर्युक्त वर्णित सारी विद्याएँ एवं सारे खट-करम मोह के मन्दिर हैं । इनमें दौड़ दौड़कर मत घुसो । मोह के मन्दिर में घुसने से मनुष्य का सिर कट जाता है अर्थात जो मोह से आवृत होता है उसका विवेक सो जाता है । धन-सम्पत्ति का मोह, जमीन-मकान का मोह, परिवार-समाज का मोह, मान-प्रतिष्ठा का मोह, शास्त्र-परम्परा का मोह, विद्या-वाणी का मोह, संप्रदाय-मान्यता का मोह, रस्म-रिवाज का मोह, देह तथा मन के संकल्प-विकल्पों का मोह, कहाँ तक गिनाया जाये ।
यह ‘दृश्य मात्र का मोह’ ही तो गले की फाँसी है । जिसने मोह का परित्याग किया वह अपने शुद्ध चेतन-स्वरूप में स्थित हुआ । वह अपने ‘असंगत्व’ में प्रतिष्टित हुआ ।
वही सच्चे अर्थ में मानवता का अन्नायक है ।
‘कहहि कबीर ते उबरे, जाहि न मोह समाय ।’
(बीजक चाचर 1)
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साभार - गोविन्द दास 
(कुछ शब्दान्तर के साथ)

01 फ़रवरी 2017

पूर्ण परमेश्वर और उनकी इच्छा ?

परमेश्वर को कोटि कोटि नमन !
प्रणाम राजीव जी !
मेरी भी एक Help करो जी, बहुत परेशान हूँ । मेरे 5 Question हैं जी, प्रभु के भय में, उनका
Answer दो जी ।
1- सत्य क्या है और उसको पाने का सही मार्ग क्या ?
2- अविनाशी जीवन पाने के लिये क्या करें ?
3- जब सबसे बङी Tension ये हो जाये कि बस सत्य को पहचानना है जितना जल्दी हो सके और कुछ न मिले, क्योंकि जहाँ देखो मार्ग भटकाने वाले साधन हैं तो क्या करें ?
4- पूर्ण परमेश्वर कौन है और उनकी इच्छा क्या है ?
5- परमेश्वर सर्व समर्थवान है तो, जीव, जगत और ब्रह्म में ये व्यवस्था बिगङी क्यों हुयी है ?
कृपया दया करें जी बतायें । (प्रश्नकर्ता - प्रकाश मान)
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प्रश्न - सत्य क्या है और उसको पाने का सही मार्ग क्या ?
उत्तर - स्वयं (प्रकाश मान) से लेकर दृष्ट, अदृष्ट, गम्य, अगम्य, वैचारिक, अवैचारिक यानी परमात्मा, सृष्टि और जीव आदि आदि ये जो कुछ भी अनुभूत हो रहा है । यह सभी सत्य ही है, इसमें असत्य और जङ कुछ नही है । यह सर्वत्र सिर्फ़ शाश्वत चेतन परमात्मा ही है । यही सत्य है, इसके सिवाय और कोई दूसरा सत्य नही ।

पाने का सही और एकमात्र मार्ग - देह और मन का निरन्तर अध्यास (दोनों के प्रति अभिमान रहित होना) और ‘स्व या आत्मा’ का कई या स्व-उपर्युक्त कोई एक विधि से पुनः पुनः निरन्तर अभ्यास ।
फ़िर जैसे घनी, मोटी परत वाला कोहरा (मैं शरीर या मन हूँ यह अज्ञान) सिर्फ़ सूर्य के उदय (प्रकाशमान आत्मा) होने से बिना प्रयास ही छंट जाता है । वैसे ही तुम भी सत्य और स्वयं को जानोगे । यानी स्व-बोध और उसका अनादि सत्य ।
विशेष - जीव की पात्रता अनुसार कभी कभी ‘ध्यान-समाधि’ जैसी यौगिक क्रियायें भी विशेष सहायक होती है ।
तथा यह भी एक सरल सहज उपाय है । नीचे -
बंधे को बंधा मिला, छूटे कौन उपाय ।
कर सेवा निरबंध की, पल में लेय छुङाय ।
------------------
प्रश्न - अविनाशी जीवन पाने के लिये क्या करें ?
उत्तर -
मोह सकल व्याधि कर मूला, जासे पुनि उपजत भवशूला ।
जीवन सदैव अविनाशी ही है । सिर्फ़ ‘मध्य की कल्पनायें’ ही उत्पन्न होती मरती हैं । निःयोग से एक बार चित्त को पूर्ण खाली कर दो । बस यह खाली चित्त ही अपने आप में ‘विशेष’ है । एक बार खाली हो जाने पर यह नित्य बर्ताव से बनी भोग के बाद की शेष वासनाओं को खुद ही नष्ट कर देता है और काल्पनिक जन्म-मरण से सर्वदा रहित होकर मोक्ष (मोह-क्षयी) को प्राप्त अविनाशी ही हो जाता है । इसमें थोङा भी संशय नही ।
ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुखराशी ।
जङ चेतन ग्रन्थि परि गयी, जद्यपि मृषा छूटत कठिनई ।
जनक के ऐसे ही प्रश्न के उत्तर में अष्टावक्र ने कहा था - नींद में दिखने/अनुभव होने वाला स्वपन कुछ क्षणों का है और जीवन भी (खुली आँखों से अनुभूत) एक बङा स्वपन ही है । और स्वपन जब कष्टदायक हो तो ‘नींद से जागना’ ही एकमात्र उपाय है ।
सपने में सिर काटे कोई, बिनु जागे दुख दूर न होई ।
ये स्वपन भयानक बंधन के समान कष्टकारी इसलिये हुआ कि तुम बन्दर की भांति मुठ्ठी के चने (माया, सांसारिक आसक्तियां, मोहजनित राग) छोङना नही चाहते और बिना मुठ्ठी खोले हाथ उस छोटे लोटे से बाहर नही आयेगा । अर्थात (स्व) विराट के विस्मृत हो जाने के कारण (तुच्छ) जागतिक अंश में फ़ंसे हो और स्वयं ही फ़ंसे हो, क्योंकि तुम्हारे और तुम्हारी (सभी सांसारिक) कल्पनाओं और वासनाओं के अतिरिक्त दूसरा कोई है ही नही, जो तुम्हें बांधे ।
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प्रश्न - जब सबसे बङी Tension ये हो जाये कि बस सत्य को पहचानना है जितना जल्दी हो सके और कुछ न मिले, क्योंकि जहाँ देखो मार्ग भटकाने वाले साधन हैं तो क्या करें ?
उत्तर - किसी भी चीज का ‘कृमबद्ध ही ज्ञान होना’ प्राकृतिक नियम है । कोई भी चीज स्व-तप (निरन्तर अनुसंधान) के बिना कभी भी ‘होने’ की स्थिति में नही हो सकती । फ़िर भले ही वह आपके घर में ही रखी हो या आपके माता, पिता जैसे अति निकट सम्बन्धियों से प्राप्त हो सकती हो, तो भी बिना तप प्राप्त नही होगी ।
अब अपने इन शब्दों पर विशेष गौर करिये - क्योंकि जहाँ देखो मार्ग भटकाने वाले साधन हैं तो क्या करें ?
और इससे ठीक ऊपर आपने ही लिखा कि - कि बस सत्य को पहचानना है जितना जल्दी हो सके ।
इसका सीधा सा अर्थ है कि आपने बहुत से असत्य को स्वयं ही पहचान लिया है और सत्य को जानने की ओर अग्रसर हैं ।
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प्रश्न - पूर्ण परमेश्वर कौन है और उनकी इच्छा क्या है ?
उत्तर - जैसा कि पहले उत्तर में बताया कि - यह कण कण ‘सब कुछ’ स्वयं पूर्ण परमेश्वर ही है और वह (पैर के नख से सिर तक) और कोई नही स्वयं तुम्ही हो । और यह इन्द्रियादि अनुभवों का बाह्य स्थूल जगत महज तुम्हारा वासना प्रकाशन यानी कल्पनाओं का साकार होना ही है ।
सिर्फ़ भ्रांतिवश, मायावश, निद्रावश, अज्ञानवश या इन सभी के मूल मोहवश तुम अपनी स्वयं-सत्ता भूल गये हो इसलिये यह प्रमाद (दुःख) उत्पन्न हुआ ।
मोहनिशा सब सोवनहारा, देखिअ सपन अनेक प्रकारा ।
दुनियां में फ़ंसकर वीरान हो रहा है । 
खुद को भूलकर हैरान हो रहा है ।
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प्रश्न - परमेश्वर सर्व समर्थवान है तो, जीव, जगत और ब्रह्म में ये व्यवस्था बिगङी क्यों हुयी है ?
उत्तर - कोई व्यवस्था न तो बिगङी है न सुधरी है । बल्कि वह जैसी है, है । केवल जिनके मन अनुसार नही हो पा रहा । उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा है ।
जाकी रही भावना जैसी, हरि मूरत देखी तिन तैसी ।
अर्थात जैसा तुम चाह रहे हो वैसा ही सब (मगर तय और पूर्व नियत कृम में) हो रहा है । पर दरअसल अपने को भूल जाने के कारण तुम ‘अस्थिर चित्त’ हो गये । इसलिये यह दुःख उत्पन्न हुआ ।
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अब एक माथापच्ची - कभी आपने सोचा कि ये ‘माया’ क्या है ?
संकेत - <0> = 0 = .
अब तो आसान है ।
(लेकिन निश्चय ही कठिन फ़ंस गये)

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