14 जून 2013

मुक्तमंडल की हंसदीक्षा अब दिल्ली में भी

परम पूज्य सदगुरुदेव श्री शिवानन्द जी महाराज ‘परमहंस’ के तत्वावधान में मनुष्य जीवन के लिये परम कल्याणकारी हंसदीक्षा (ब्रह्म दीक्षा) अब दिल्ली में भी सदगुरुदेव के अधिकारी शिष्य श्री राकेश महाराज जी ‘परमहंस’ द्वारा सुलभ कराई जा रही है । 
हंसदीक्षा में दीक्षा के समय ही समर्थ, सक्षम, सच्चे, अधिकारी एवं ‘समय के सदगुरु’ के द्वारा आपके शरीर के अंदर स्वतः गुंजायमान अनहद शब्द एवं अजपा जाप को प्रकट किया जाता है तथा ‘आत्मप्रकाश’ को जाग्रत किया जाता है । 
जिससे करोङों जन्म जन्मान्तरों के अज्ञान और मायामोह से ग्रसित अपने स्वरूप को विस्मृत कर चुका जीव अपने निज स्वरूप को जान सकता है और कष्टपूर्ण आवागमन से मुक्त होकर निज सत्यधाम को जा सकता है ।  
इसे जान लेने के बाद कुछ भी अनजाना नहीं रह जाता । यही वह नाम है जिसका विवरण हर एक धर्म के ग्रन्थ करते हैं और यही परमात्मा को जानने का एकमात्र साधन है ।
जो जिज्ञासु भक्त, योगी, साधक (हमारे मुक्तमंडल अथवा अन्य किसी भी मंडल से दीक्षित) जन अपने ध्यान मार्ग सम्बन्धी प्रश्न अथवा समस्या का समाधान प्राप्त करने के लिए इच्छुक हैं । हम सदैव ही उनका हार्दिक स्वागत करते हैं । 
ध्यान एवं प्रवचन का कार्यक्रम दिनांक 15 जून 2013 से प्रारम्भ किया जा रहा है ।
ध्यान एवं प्रवचन का दिन तथा समय -
प्रत्येक रविवार, दोपहर 12 बजे से 4 बजे तक ।
हंसदीक्षा गुरु पूर्णिमा - 22 जुलाई 2013 - के बाद प्रारंभ होगी ।

09 जून 2013

धन आप किससे कमाते हैं - तानसेन

Q18 ) Dvait, Advait, Aur Vihangam Marg, Kundalini jagaran, surti sabad yog, ya aap jisko raj yog ya sahaj yog kahte ho ye ek hi ceez hai kripya bataye ? 
- द्वैत शास्त्रों का बहु प्रचलित शब्द है । जिसका शाब्दिक अर्थ 2 होता है । वास्तव में इसके सबसे उच्च और गूढ अर्थ में जाया जाये । तो द्वैत का अर्थ पुरुष ( चेतन ) और प्रकृति ( भावना या जङ सृष्टि ) ही होता है । और जब चेतन और प्रकृति का परस्पर संयोग होता है । तो तमाम पदार्थ ( पद + अर्थ ) उपाधि । स्थिति आदि का निर्माण होता है । क्योंकि इसके बाद भी चेतन निर्लेप ही रहता है । इसीलिये वह परमात्मा ( कहा गया ) है । अब इस मूल ( सृष्टि ) ज्ञान के बाद इसमें कोई भी भगवान । देवी । देवता । स्त्री । पुरुष । तत्व । महाभूत । महाशक्तियाँ आदि आदि कुछ भी जिसको आप जान सको । वह द्वैत ही कहलायेगा । सार ये कि - जहाँ 2 हैं । वही द्वैत है ।
अद्वैत - सिर्फ़ परमात्मा को ही कहते हैं । ध्यान रहे । यहाँ प्रकृति भी नहीं रहती । वह परमात्मा में ही लय हो जाती है । इसीलिये एक महत्वपूर्ण आध्यात्म सूत्र है - एकोह्म द्वितीयोनास्ति । अर्थात वही एक सभी में है । उसके अतिरिक्त कुछ भी दूसरा नहीं है ।
विहंगम मार्ग - पक्षी के समान सर्वत्र इच्छानुसार मुक्त गति को कहते हैं । इसका गुरु खास और दुर्लभ होता है । मजे की बात ये है । इससे ऊपर भी कुछ श्रेष्ठ गतियाँ होती है । पर मैं उनका खुलासा नहीं करूँगा । क्योंकि पाखण्डी बनाबटी साधुओं ने वैसे ही चोरी के ज्ञान से जनता को भृमित कर रखा है ।
कुण्डलिनी जागरण - कुण्डलिनी शक्ति रीढ के निचले पिछले हिस्से में कुण्डली मारे सोयी नागिन के समान है । यह मूलाधार से उठकर सहस्ररार चक्र तक जाती  है । यदि कोई साधक सिर्फ़ मूलाधार चक्र को ही जगा लेता है । तो उसका भी कुण्डलिनी जागरण ही माना जायेगा । यह अलग बात है । वह इसको कहाँ तक कर पाता है ।
सुरति शब्द योग - या  राज योग या सहज योग एक ही बात है । इसमें सटीक शब्द सुरति शब्द योग है । मन । बुद्धि । चित्त । अहम । इन चार भागों से बना अंतकरण जब एक होकर कार्य करता है । उसको सुरति कहते हैं । इसका काम ( अंतर के शब्द व ध्वनि आदि ) सुनना है । इसके अतिरिक्त एक निरति होती है । वह अंतर के दृश्य देखती है । शब्द अंतर वाणी या अंतर में होने वाले ध्वनि रूपी अनहद शब्द को कहते हैं । ये सुरति ऊर्ध्व ( ऊपर की ओर ) गमन करती हुये इसी शब्द ( को सुनती हुयी इसमें ) में लय हो जाती है । इसी को सुरति शब्द योग कहा गया है । शब्द की कई मंजिले हैं । सबसे ऊपर जो शब्द है । उसमें सुरति के लय होने पर परमात्मा का साक्षात्कार होता है ।
Aaj kal TV ke famous maharaj Kumar Swami, koi beej Mantar ki diksha dete hai ? ye kya locha hai beej mantar ka ? isse kya jo lakho log khade hokar apna phayda hota hai kai log us samagam me jate Hai Bhai Janta ke liye sahi apko is visay par kuch to lekh ke madhyam se hi Batana Hoga ? 
- मुझे भारतीय जनता को लेकर अफ़सोस है । या तो वह वैधानिक रूप से किसी जानकार के सानिंध्य में यह सब बीज मन्त्र आदि का जाप करते । या साधारण भाव भक्ति ही करते । पर एक बात अच्छी भी है । भारतीय जनता भेङचाल में आकर उस चीज को ( वास्तव में लालच भावना से ) यकायक ले तो लेती है ।  पर ध्यान नहीं देती । अभी लगभग 2 माह पूर्व हमारे नये शिष्य योगेश को पूर्व में किसी मूर्ख साधु ने पढाई के आधार पर बीज मन्त्र का जाप कराया । योगेश लालच भावना से इसको बङी गम्भीरता और गहराई से करते थे । बीज मन्त्र की अनियन्त्रित विध्वंसक ऊर्जा पैदा होने लगी । लेकिन उसको लगाने के लिये कोई यन्त्र तन्त्र प्रयोग उपयोग आदि उस साधु के पास कुछ भी नहीं था । लिहाजा योगेश के मुँह से खून आने लगा । और उनकी मानसिक स्थिति बिगङने लगी । कुण्डा प्रतापगढ के इस साधु ( योगेश का पूर्व गुरु जो अभी के कुम्भ मेले में बना था ) से जब योगेश ने परेशानी बतायी । तो वह बोला - करते रहो । तुम्हें विश्वास नहीं है । इसलिये ऐसी परेशानी आती है । संयोगवश नेट के द्वारा योगेश ने मुझसे फ़ोन पर सम्पर्क किया । और अपनी स्थिति के बारे में जानना चाहा । मैंने सपाट शब्दों में कहा - तुम्हारी मृत्यु की गिनती शुरू हो गयी । और मरना कौन चाहता है । योगेश तुरन्त भागकर मेरे पास आये । और आज सहजता से बिना किसी अतिरिक्त श्रम के उससे बहुत ऊँचाई वाला दुर्लभ राज योग कर रहे हैं । पहले ( के ) ध्यान से घवराहट गर्मी बैचेनी आदि होती थी । अब आनन्द शीतलता और गहन शान्ति का अनुभव होता है ।
Aur ye Bhi jo maine upar sadhnaye puchi hai usme kis kis sadhna ko karne se kya-kya prapt hota hai aur un sadhnao ko karne walo ki kya-kya gati hoti hai Ye Bataye ?
- प्रश्न करते समय ये ध्यान रखना चाहिये - हम क्या पूछ रहे हैं ? कभी कभी प्रश्नों में भारी अज्ञानता का समावेश रहता है । आपको हैरत होगी कि भारी भरकम धर्म ग्रन्थों में भी ज्ञान के बारे में जानकारी महज स्थूल रूप में है । सिर्फ़ संकेत मात्र । बारीक और सूक्ष्म स्तरीय जानकारी कहीं नहीं है । यदि संसार में प्रचलित वैज्ञानिक नजरिये से देखा जाये । तो कहीं भी नहीं । तब यदि मैं आपके 2 लाइन के प्रश्नों का स्थूल रूप से भी उत्तर दूँ । तो सिर्फ़ कुण्डलिनी पर ही ग्रन्थ लिख जायेगा । क्योंकि इसमें ही असंख्य साधनायें प्राप्तियाँ और गतियाँ होती है । पूर्व निर्धारित तरीके में थोङा फ़ेरबदल बदलाव एक नई स्थिति प्राप्ति का निर्माण कर देता है । फ़िर भी यदि कोई इच्छुक है । तो इस हेतु ढेरों धार्मिक साहित्य उपलब्ध है । उसका अध्ययन करके फ़िर जहाँ समझ में न आये । वहाँ पूछना तर्कसंगत और उचित है । यदि कुछ पाना चाहते है । तो तन मन धन का उपयोग कर कठोर श्रम करना होता है ।
Q 19 ) Akhil sristi me ghumne ka adhikari aadmi kab tak aur kaun si sadhna karne ke baad ban jata hai jara spast karkne ki kripa kare ?
- जिस तरह किसी वाहन में जितना ईंधन होगा । और वाहन की जितनी क्षमता होगी । और जैसी यान्त्रिकी होगी । वह वाहन उससे आगे ( यहाँ ऊपर ) नहीं जा सकता । अखिल सृष्टि में सिर्फ़ पूर्ण मुक्त पुरुष ही विचरण कर सकता है । जो शब्द के पार जा चुका हो । अगर सरल शब्दों में कहा जाये । तो परमात्मा से साक्षात्कार किया हुआ साधु । जिसकी मौज फ़क्कङ हो जाती है । यह सिर्फ़ आत्मज्ञान की सुरति शब्द साधना से ही सम्भव है । क्योंकि आदि सृष्टि से यही मूल और सनातन ज्ञान है । दूसरा कोई नहीं । जपु आदि सचु जुगादि सचु है भी सचु नानक होसी भी सचु । कब तक पूरा कर पायेगा ? इसके लिये साधक की पात्रता । लगन । मेहनत । समर्पण । यात्रा ।  ग्रहणता । अमलता आदि आदि गुणों के ऊपर निर्भर करता है । इसकी एक बङी शर्त यही है कि - गुरु पूरा होना चाहिये । जहाँ तक का गुरु होगा । वहीं तक जा पायेगा । फ़िर आगे का गुरु चाहिये । शब्द ध्वनि के रूप में वास्तव में ऊपर गुरु ही होता है । जो शिष्य की सुरति को अपनी चुम्बकीय ( गुरुत्व ) शक्ति से ऊपर खींच लेता है । यदि कोई एक ही पूर्ण गुरु परमात्मा की कृपा से मिल जाये । तो फ़िर बार बार गुरु बदलने की आवश्यकता नहीं होती । कोई भी साधक जिस ऊँचाई तक पहुँच जाता है । वह उसकी प्राप्ति ही होती है । और वह नीचे से वहाँ तक कहीं भी विचरण कर सकता है ।
aur usko kya kya adhikaar prapt hote hai yani purn Mukt Sant ya Aatma Gyani Sant ki bat kar raha hu ?
- ऐसी कोई प्राप्ति कोई अधिकार नहीं होता । जो उसे प्राप्त न हो । वास्तव में वह इनसे भी ऊपर होता है ।
aaj asharam bapu ke bare me bhi log kehte hai ki unko bhi aatm gyan prapt hua hai to kya ye satya hai kyoki aapki aur unki bate bilkul alag hai ?
- आत्मज्ञान किस चिङिया का नाम है ? आशाराम को दूर दूर तक नहीं पता । वास्तव में कुण्डलिनी के ही अंतर्गत आने वाले 5 तत्वों में से 1 तत्व का भी आशाराम को ज्ञान नहीं है । हाँ बहुत छोटे स्तर की सिद्धियां अवश्य हैं । यदि कोई निम्न स्तर का अच्छा तामसी तांत्रिक भी आशाराम के ऊपर प्रयोग कर दे । तो लेने के देने पङ जायेंगे । दूसरे आत्मज्ञानी कभी बेहूदा टायप बातें नहीं करते । शाब्दिक तन्त्र मन्त्र की बातें कर गुमराह नहीं करते । अनेकों मन्त्र । रास्ते नहीं बताते । आत्मज्ञान में सिर्फ़ निर्वाणी ध्वनि रूप मन्त्र होता है । जिसको अंतर में प्रकट किया जाता है । इससे हटकर जो भी बोलता है । वह गुरु बिना शक काल का दूत ही है । जो तुम्हें उबारने नहीं डुबोने का कार्य करता है ।
Ye ekadashi vrat karne par pandit Bhai Bahut jor dete hai Kya in vrato, tirtho Ko karne ka Bhi koi Phal Hai Ya aisi hi hai.. bataye?
- 5 ज्ञानेन्द्रियों 5 कर्मेन्द्रियों और 1 मन को एकाग्र कर प्रभु भक्ति (  अनहद ध्वनि ) में लगाना ही एकादशी ( 11 ) वृत ( वरतना ) है । 5 + 5 + 1 = 11 बाकी तोताराम पण्डितों द्वारा सुझायी गयी भक्ति भाव पूजा है । यह  ठीक इसी तरह है । जैसे हम किसी से कहते हैं - खाना खा लीजिये । तो हमारा उसके प्रति भाव ही हुआ । लेकिन वास्तविक व्यवहार तभी होगा । जब हम खाना खिला देंगे । और उसका पेट भर जायेगा । तब यह क्रियात्मक हो जायेगा । एकादशी को देवता विष्णु से खास इसलिये जोङा जाता है । क्योंकि सत्व गुण की वृद्धि और शुद्धता ही हमें ऊपर की और ले जाती है । क्योंकि सत्व गुण ही योग में ईंधन का कार्य करता है । दूसरे कार्यों में यह हमें बल भी देता है । हम नीचे से ही ऊपर की ओर जा सकते हैं । मूल शास्त्रों में वर्णित एकादशी वृत विधान सटीक है । पर लालची ( सिर्फ़ जाति के विद्वान नहीं ) पण्डितों ने मनमाने ढंग से इसे विकृत किया है । यहाँ याद रखें । शास्त्र आधार पर ही चलें । तो किसी भी यज्ञ वृत आदि का परिणाम तुरन्त या निश्चित समय में इसी जीवन में मिल जाता है । न कि मरने के बाद । जैसा कि पण्डित किसी भी धर्म कर्म की फ़ल प्राप्ति मरने के बाद बताते हैं । क्योंकि अनजान जीव को इसी आधार पर ठगा जा सकता है ।
Q20 ) Kaun se Daan  aur  Punya karm insaan ko karne chahiye jsse usko agle janam me Kafi Paisa Mile ya wo reach person bane, use sunder Biwi mile etc ?
-  जो बोओगे । वो काटोगे के सिद्धांत अनुसार यदि अगले जन्म में बेहद पैसा चाहिये । तो पैसा ( का दान ) बोओ । सच्चे साधु सन्त । निर्धन और जरूरतमन्द की धन से वस्तुयें आदि खरीदकर सेवा परमार्थ करें । यदि इतना समय नहीं । तो सीधा धन भी दे सकते हैं । सुन्दर पत्नी के लिये स्त्रियों के प्रति कोमल भाव । काम आसक्ति । और उनको उपहार देना । उनसे प्रिय बातें करना आदि जरूरी होता है । लेकिन इससे भी जरूरी किसी महत्वपूर्ण देवी की लगभग दिव्यता गुण लिये पत्नी और दिव्य सुन्दरता और दिव्य अंग वाली पत्नी हेतु आराधना की जाती है । ये  दोनों बातें मनुष्य स्तर पर हैं । लेकिन किसी भी अच्छे योग से जुङ जाने पर ये दोनों चीजें और पद शक्ति आदि अलग से प्राप्त होते हैं । याद रखें । बिना मेहनत और निवेश के कुछ भी प्राप्त नहीं होता ।
kya aaj ka kiya hua punya byaj ke saath kal yani agle janam me milta hai ? aapke lekho ke Hisab se mai kah raha hu ki aapne kaha tha ki hum apne Punyo ya Kamai ka Balance Bhi khud dekh sakte Hai ,wo kaise hota hai kripya lekh ko vistar se bhale hi thoda time lage Bhidu kyoki Ye jo public Hai ye kuch nahi janti Hai ye to public Hai...? 
- निश्चय ही मिलता है । और ब्याज के साथ ही मिलता है । पर मूल और ब्याज का % इस बात पर निर्भर करता है कि पुण्य का निवेश आपने कौन से तरीके और किस योजना के तहत किया है । वास्तव में आज आपको जो भी घर परिवार स्त्री बच्चे माँ बाप धन सुख दुख आदि आदि प्राप्त है । वह आज का नहीं । कभी के पूर्व जन्मों का ही कर्मफ़ल है ।
Ya keval Hans diksha ki Naam kamai se hi sab Mil jayega, Jaisa aapne apne blog ke kisi lekh Mai Divya Stri se Vivah Karna Chahta Hu Me kaha tha ?
- सच्ची हँस दीक्षा किसी उच्च महंगे और प्रतिष्ठित महाविधालय में प्रवेश मिलने जैसा है । जाहिर है । यहाँ  तक पहुँचने वाला गुणी और पुण्य का पूर्व धनी ही होगा । ये दीक्षा हरेक को नहीं मिलती । अब बिल गेटस लक्ष्मी मित्तल और वारेन वफ़ेट जैसे ही ऐसे विधालय में अपने बच्चे को पढा सकते हैं । और उनको यह सब सहज उपलब्ध होता है । बाद में भी होता रहता है । कहने का मतलब यहाँ तक पहुँचने के लिये बहुत कुछ करना होता है । अतः बाद में निसंदेह बहुत कुछ या सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है ।
Q 21 ) Aapke lekho me padha tha ki kisi sisya ko aapne kaha tha ki aap sisya hi nahi ho kyoki wo guru ashram nahi aaya tha ? diksha ke baad to phir aap ye bataye ki Hans diksha prapt aadmi ko diksha ke baad Apni padhai puri karne ke liye Aur usme PHD lene ke liye Guru ki kis prakar Tan, Man, Dhan, aur samarpan se seva karni padti Hai ?
- जिस तरह सिर्फ़ स्कूल में एडमिशन ( दीक्षा ) से पढाई और डिग्री पूरी नहीं हो जाती । तन मन धन तीनों के सहयोग से कठिन मेहनत करनी होती है । जिन्दगी में आप जो भी प्राप्त करना चाहते हैं । उसके लिये आवश्यक सभी चीजों को जुटाना फ़िर कार्य कराना भी आवश्यक होता है । उदाहरण के लिये आप मकान बनाना चाहते हैं । तो सिर्फ़ मकान का नक्शा या जमीन के लिये बयाना ( जमीन खरीद पक्की करने के लिये दी गयी कुछ अग्रिम धम राशि ) दे देने से मकान नहीं बन जाता । सीमेंट बालू ईंटे आदि दूसरी बहुत सी अन्य चीजों और क्रिया हेतु धन तथा आवश्यक समय और पूर्ण देख रेख की भी आवश्यकता होती है । तब मकान निर्माण होता है । गौर करें । तो यही सिद्धांत हर प्राप्ति में काम करता है । चाहे वह नौकरी । शादी । या बच्चे पैदा करना क्यों न हो । तब साधना के भी जरूरी अंग और जरूरतें होती हैं ।
Maan lo koi Sadhak India me nahi rehta lekin wo Satnaam ki sadhna Diksha lekar ( aapke Mandal ) se karna chata hai to wo Dhan se to sewa kar sakta hai, ye bhi maan lete hai kabhi 1-2 baar darshan ke liye aa jata hai ? lekin apna kaam dham chodkar guru ki hi keval Seva kaise kareg ?
- धन आप किससे कमाते हैं ? तन मन के सहयोग से ही न । तो फ़िर धन से सेवा भी तन मन से सेवा हो जाती है । यदि आप तन से कोई सेवा करते हैं । तो व्यवहारिक रूप से वह भी धन ही है । क्योंकि मेहनत को धन में परिवर्तित किया जा सकता है । कुछ लोग बुद्धि ( मन ) से कमाते हैं । यदि गौर से सोचें । तो वह भी धन ही है । क्योंकि बहुत से लोग मन से श्रम और क्रिया करके धन कमाते  हैं । अगर गौर करें । तो तन मन धन आपस में घुले मिले हुये हैं । बिना तन मन के धन कैसे कमाया जा सकता है ? कभी सोचा है ? बाकी परिस्थितियोंवश आ नहीं सकता । तो भाव और मन से उसे गुरु में ध्यान लगाना चाहिये ।
kyoki use to apne pariwar ko palna bhi Hai, Biwi ko Chat bhi khilani padegi, alu pyaj bhi lana hai, bill bhi jama karna hai, Aur raat me Biwi ke saat chahe aadmi ki icha ho na ho Taak Dhina Dhin Match bhi khelna Hai ? aur agle din gadha Majduri karne office bhi jana hai ? To Kul mila ke Mere jaise Nakare log diksha lekar kis prakar Apna jeevan Sarthak Kar Sakte hai ? Ache se Samose me chatni Daal kar ? Bataye ? In Public interest also,  this question in very important ......Satyanveshi Byomkesh Bakshi
- वास्तव में जीवन एक युद्ध ( विभिन्न मोर्चों पर संघर्ष ) की भांति है । यदि कोई व्यक्ति ऊपर आपके बताये अनुसार सामान्य जीवन जी रहा है । और उसे कोई आपदा लग जाती है । तो उसे इसी जीवन चर्या में से समय धन आदि निकालकर उसे हल करना होता है । और यदि कोई व्यक्ति अपनी मौजूदा स्थिति से अधिक उन्नति करना चाहता है । तो भी उसे तन मन धन से ( इसी जीवन से ) उस तरफ़ जुङना होता है । जिस तरह किसी युवा को किसी महत्वपूर्ण क्षेत्र विशेष में सफ़लता के लिये तमाम तैयारी करनी होती है । और उसके परिजन भी इसमें पूरा सहयोग करते हैं । क्योंकि पूर्व जन्म के कर्मों अनुसार ऐसा शानदार जीवन या उपलब्धि उसकी किस्मत में पूर्व ही लिखी होती है । तब सभी हालात वैसे ही बन जाते हैं । जा पर कृपा राम की होई । ता पर कृपा करे सब कोई । तब कोई भी मनुष्य अपने पूर्व जन्म के सात्विक कर्मों के अनुसार भक्ति पदार्थ इस जन्म हेतु संचय कर लाया होता है । तब उसके सभी हालात भी उसी अनुसार बन जाते हैं । सहज योग में साधारण पूजा जितना पाखण्ड भी नहीं है । गीता में श्रीकृष्ण के माध्यम से आत्मदेव ने कहा था - हे अर्जुन युद्ध कर । और निरन्तर भजन कर । तब अर्जुन बोला - मैं लाखों बाणों का मुँह मोङ सकता हूँ । पर युद्ध करते समय भजन कैसे संभव है ? तब श्रीक्रुष्ण ने समझाया - यह ऐसा ही भजन सुमरन है । जो युद्ध करते समय भी किया जा सकता है । जैसे पनिहारिन मटकी सर पर रखे साथ ही साथ अन्य कार्य भी कर लेती है । जैसे कछुआ ध्यान से अण्डों को सेता है । कर से कर्म करो विधि नाना । रखो ध्यान जहाँ कृपा निधाना । आपको आश्चर्य होगा । यह सुमरन शौच और काम रति के मध्य भी होता है । ऐसा हमारे कई साधकों के अनुभव में आया है । और यह कोई पाप भी नहीं है ।
Q22 ) Shirdi ke Sai Baba ke bare me apne to suna hi hog ? kripya ye bataye ki Sai Baba ko kya aatm gyan hua tha ? Aapke lekh ke anusar Sai ek padvi hoti hai ?  To sai baba kya koi avtari purush the ya kya the ? unki yog yatra kaha tak thi kripya batane ka kast kare ?
- ज्ञान ( और समाधि अवस्था ) 2 प्रकार का होता है । 1 चेतन ज्ञान और 2 जङ ज्ञान । द्वैत के अधिकतर ज्ञान जङ ज्ञान के अंतर्गत आते हैं । क्योंकि उसमें लक्ष्य ( जङ ) प्रकृति की क्रियायों से किसी निर्माण का होता है । चेतन ज्ञान सिर्फ़ चेतन पुरुष या परमात्मा से जुङने हेतु किया जाता है । यह सर्वोच्च ज्ञान है । क्योंकि इसी से सबमें चेतना है । और चेतना ( तथा ऊर्जा ) के बिना कोई क्रिया सम्भव नहीं । सिर्फ़ शिरडी के साई को जङ ज्ञान ( समाधि ) में कुछ उपलब्धि थी । ये एक प्रकार के बहुत छोटे सिद्ध होते हैं । जिनकी भक्ति से भक्ति स्थान को " आन " लग जाती है । यह आन एक निश्चित समय तक के लिये ही होती है । फ़िर प्रभावहीन हो जाती है । उससे लोगों के छोटे मोटे कार्य होने लगते हैं । जैसे - किसी छोटी मोटी दैवीय आपदा से किसी बहाने से छुटकारा । किसी कार्य में कोई छोटी मोटी दैवीय शक्तियाँ विघ्न डाल रही हैं । तो उनसे समझौता सौदा करके छुटकारा । सरल शब्दों में यह निम्न स्तरीय देवताओं के ऐजेंट का कार्य करते हैं । मामूली जङ ज्ञान से जुङे साई बाबा का आत्म ज्ञान से दूर तक का वास्ता नहीं था । न ही वह कोई अवतारी पुरुष थे । दिवंगत गुलशन कुमार की बदौलत वैष्णो देवी । फ़िल्म अभिनेता मनोज कुमार की बदौलत साई बाबा और किसी अन्य फ़िल्मकार की बदौलत सन्तोषी माँ और किसी छोटे मोटे प्रकाशक की वजह से वैभव लक्ष्मी वृत और TV चैनलों की वजह से खाऊ कमाऊ बाबा आदि जैसी गुमनाम चीजें भी अस्तित्व में आ जाती हैं । वास्तव में किसी अच्छी उपयोगी चीज का प्रकाशित होना बुरी बात नहीं । पर वह वाकई में जन समाज के लिये हितकारी हो । मैंने सुना है । फ़िल्म अभिनेत्री रानी मुखर्जी ने शिरडी के साई से प्रभावित होकर 50 लाख का भवन निर्माण शिरडी में कराया । और खास तभी से उसकी किस्मत डूब गयी । अमिताभ बच्चन पहला बच्चा नाती हो । इसके लिये मुम्बई के सिद्ध विनायक में 51 लाख रिश्वत देकर आये । और नातिन हो गयी । उनकी योग यात्रा ऐसी ( और इतनी ही ) थी कि - जैसे चींटी को खोजने के लिये हिमालय पर्वत पर चढा जाये ।
iske alawa Nizamudin Auliya, Sufi Sant salim sekh chisti, aur Baaba Pharid aadi ke bare me bhi bataye ki in santo peero phakiro, auliya aadi ki gati kya hoti hai ? aur ye aatmgyan me inki pahuch kaha tak hai ?
- आत्मज्ञान इतना सरल सुलभ और सस्ता होता । और ऐसे ही भीङ के भीङ सत्य ज्ञान के ज्ञानी होते रहते । तो किसी स्वर्ग और सचखण्ड के लिये किसी प्रयास की जरूरत ही नहीं होती । प्रथ्वी पर ही ये सब होता । और हमेशा सतयुग ही रहता । ऊपर लिखे नामों या ऐसे ही अन्य लोगों के जीवनकाल का अध्ययन आप करें । तो ये साधारण व्यक्ति ही थे । बस किसी अलौकिक ज्ञान से इनका जुङाव अवश्य रहा था । अपने जीवनकाल में इन्हें कोई खास पूछता तक न था । ये सब खुराफ़ातें बाद के धन्धेबाजों द्वारा फ़ैलायी जाती हैं । जैसे एक अजीव सा सत्य उदाहरण देखिये । वास्तविक आत्मज्ञान के सन्त शिरोमणि कबीर के सिर्फ़ चार शिष्यों को ( वो भी ध्यान रहे स्वयं कबीर के द्वारा ) पूर्ण ज्ञान हुआ था । पर आज कितने ही कबीर पंथी जाने किन किनका ढिंढोंरा पीटते हैं कि वह पूर्ण सन्त हुआ या हैं । खुद बहुत  से कबीर पंथी लाइन से सदगुरु बने बैठे हैं । जबकि समय का सदगुरु सिर्फ़ 1 ही होता है । स्वयं कबीर ने अनुराग सागर आदि में पूर्ण विस्तार से इनकी कलई खोली है । पर लोग ध्यान से इन बातों का चिंतन नहीं करते ।
Q 23 ) Maine Tantra sadhna ki web site me padha tha ki lal pari aur saha hazrat ki bhi pariya hoti hai kya apsarao ke alawa bhi ye lok hai yani Muslim Lok aadi ?
- बात कहने योग्य नहीं है । पर प्रश्न और विषय के अनुसार कहना पङ रहा है । एक मजेदार घटिया सा शेर है - कुदरत में प्रीत  की रीत भी अजीव है । दिल आया गधी पर तो परी क्या चीज है । नेट की किसी घटिया वेबसाइट या 50 रुपये की किसी किताब से 4 मन्त्र और कुछ फ़ूल पत्ती प्रसाद आदि से लाल नीली परियाँ अप्सरायें मिलने लगें ( तो यह चीज कभी की सिद्ध हो जाती । और अति उपयोगी होने के कारण परम्परा से सदा सिद्ध रहती ) तो शायद बहुत से लोग स्त्रियों से विवाह ही न करें । बलात्कार की घटनायें क्यों हों । रण्डुये क्यों तरसे । देह बाजार का इतना बङा विश्व बाजार क्यों हो । और ये इंटरनेट पर करोङों साइटस भी क्यों हों । हाँ ये सब कुछ होता है । सत्य है । पर इतनी आसानी से नहीं । जितना बताया जाता है । और इस तरह भी नहीं । जैसे ये लोग बताते हैं ।
aur Muslim log kya marne ke baad unke liye alag se janaat aur dojakh Hota hai ? Muslim jo namaaz ada karte hai uska kya phal hota hai ? aur jo kurbaani wo dete hai eed ke festival me wo kya hai ?
- अगर भगवान को ऐसा ही कोई विभाजन करना होता । तो वह मनुष्य की बनावट में भी फ़र्क कर देता । आज जितने भी ( मगर विकृत रूप ) धर्म हैं । वह सब लगभग 2000 वर्ष के अन्दर वास्तव में किसी संघर्ष को लेकर उपजे हैं । थोङा चौंकिये । ईसाई धर्म ( विरोध में बना ) मुस्लिम धर्म । सिख धर्म । बौद्ध धर्म  ( कुछ अपवाद ) और यहाँ तक कि हिन्दू धर्म भी यदि सूक्ष्म आंकलन किया जाये । तो अधर्म ( दुष्टतापूर्ण व्यवहार ) से पीङित लोगों का संघर्ष मात्र हैं । अतः मूल सनातन धर्म ही है । आगामी 8 साल के अन्दर ये सभी धर्म जङ से नष्ट हो जायेंगें । और फ़िर से शुद्ध सनातन धर्म की स्थापना होगी । तब 10-20 000 साल के इन फ़सली धर्मों के लिये क्या भगवान अलग से जन्नत दोजख बनायेंगे ? यह सिर्फ़ भाषान्तर है । मुस्लिमों को नमाज से वही फ़ायदा होता है । जो हिन्दुओं को घण्टा बजाऊ अगरबत्ती जलाऊ फ़ूल चढाऊ पूजा से होता है । यानी भगवान में सिर्फ़ आस्था भाव का पैदा होना । कुरवानी हो या अन्य कोई हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई धार्मिक अनुष्ठान ये बीच के ( पण्डित मौलवी आदि ) लोगों के बनाये धार्मिक बाजार विकसित करने के प्रपंच है । जिसमें मूर्ख जनता पूरा सहयोग करती है । यदि धार्मिक बाजार में बेतहाशा आमदनी और मौज न हो । तो ये पण्डित मुल्ले खोजे से नहीं मिलेंगे । और जो हैं । वो सब्जी बेचने लगेंगे । हाँ तब गिने चुने सही लोग ही धर्म शिक्षक के रूप में होंगे । कुरबानी हमेशा अपने अहम की दी जाती है । मुर्गों बकरों भैंसों की नहीं । वह कुरबानी नहीं दावत उङानी का बहाना मात्र है । जो खास इन्हीं भगवान के ठेकेदारों का पेट भरता है ।
Q24 ) Karn Pisachini, Panchaguli ke bare me bataye kya  ye bhi manusyo ko pane ke liye icha
- ये सब नीच वृतियाँ हैं । जो अभिष्प्त दुराचारी और कुत्सित भाव की स्त्री जीवात्माओं से बनती हैं । वैसे ये मनुष्यों को पाने जैसी कोई इच्छा नहीं रखती । मगर मूर्ख और लालची मनुष्य विभिन्न प्रलोभनों का शिकार होकर खुद इनके शिकंजों में फ़ँस जाते हैं । और भीषण दुर्गति को प्राप्त होते हैं ।
Q25 ) Rajeev ji, Agar koi aadmi Satnam Hans Diksha sache Sadguru se Ya aapke Mandal se  lekar uska abhyas karta Hai to uske Pap karm kis prakar se khatm hote hai ya pap karm nast ho jate hai ?
- रामचरित मानस में एक चौपाई है । सनमुख होय जीव मोहे जबहीं । कोटि जन्म अघ ( पाप ) नासों तबहीं । पूर्ण पापों का भस्म हो जाना परमात्म साक्षात्कार के समय हो जाता है ।
kyoki aapne apne pichle lekho me ye kaha hai ki kaya se jo patak hoi bin bhugte chute Na Koi  to phir Satya Naam Hamari Bhakti, sumiran, dhyan, guru seva , use pap ke phal se hame kaise bachati hai ya kis Prakar se uska prabhav kam kar deti hai kripya samjhaye.
- बाकी अलग अलग भक्ति अंगों से पाप कर्म क्षीण हो जाते हैं । नष्ट भी हो जाते हैं । ध्यान सुमरन आदि सात्विक कमाई में वृद्धि होना ही है । मान लीजिये । आप लाखों के कर्जदार है । और आपका कोई बिजनेस या नौकरी ( यहाँ सच्ची भक्ति ) आदि का प्रबन्ध हो जाता है । तो वह भारी कर्ज ( यहाँ पाप ) आपको राहत पूर्ण लगने लगेगा कि धीरे धीरे आप उससे मुक्त हो जायेंगे । अब आपकी वो नौकरी या बिजनेस ( यहाँ योग का स्तर और प्राप्ति ) किस स्तर का है । उससे क्या प्राप्ति है ? उसी आधार पर पापों का शमन होगा । कुछ ध्यान से । कुछ समाधि से । कुछ गुरु सेवा से । और कुछ दान से । कुछ क्षीण % से भोगने पर आदि । ये सब संयुक्त ( या जितने आप कर पायें ) या कुछ कम के आधार पर उसी अनुपात में पाप नष्ट होने लगते हैं ।
Q26 ) Kya purn Aatma Gyan Ho jane ke baad swayam aatma ka astitva hi khatm ho jata hai ? Kya wo parmatma me leen ho jati hai ? kya hota hai aatmgyan prapt hone par ?
- आत्मज्ञान होने पर आत्मा का अस्तित्व खत्म नहीं हो जाता । बल्कि वह पूर्ण प्रकाशित हो उठता है । जीव भाव । जीव आवरण । और मिथ्या मायावी संसार आवरण किसी दुस्वपन की भांति खत्म हो जात्ता है । और जीवात्मा मुक्तात्मा होकर आनन्दमय हो उठता है । परमात्मा में लीन होने का मतलब है । उसी जैसा हो जाना । अर्थात एक हो जाना ।
aaj jo Jain dharm hai, Budh dharm hai kya wo jo sadhna jis bhi Marg se wo kar rahe hai kya unhe koi prapti hogi ya unki bhakti Bhi keval kaal ki hi Bhakti Hai ? Gol Mol Jawab Nahi Mangata Apun, Sir Sidhe Sidhe is baat ko Clear kijiye ? 
- जैसाकि मैंने ऊपर बताया । इन धार्मिक शाखाओं का भी मूल ( जो इनके भी प्रतिनिधियों ने तय किया था ) विकृत हो चुका है । ये वास्तविक ज्ञान को भूलकर मनमानी व्याख्यायें करने लगे हैं । और - रहिमन बिगरे दूध को मथे न माखन होय । तो चाहे वो हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई जैन बौद्ध कोई भी क्यों न हो । खराब दूध से मक्खन नहीं निकाल सकते ।
Mahaveer Aur Gautam Budha ko Kya Aatma gyan ki prapti Nahi hui thi Bataye ? Aur aaj jo Jain samaj ke digambar Muni itna kast jhelte hai aur jo tap kar rahe hai kya unka koi parinaam unhe prapt hoga ki Nahi ?
- महावीर और गौतम छोटे अवतारों की श्रेणी में आते हैं । द्वैत के ऋषि मुनि और ये लगभग समान पहुँच वाले कहे जा सकते हैं । इन्होंने शून्य अवस्था और शून्य समाधि को जाना था । इन्हें सत्य बोध ( कि वास्तविक सत्य अन्दर है । ) हुआ था । न कि आत्मबोध । बुद्ध नाम ही बुद्धत्व की ओर इशारा करता है न कि आत्मबोध की तरफ़ । बाकी आजकल के लोग धार्मिक परम्पराओं का ढोल अधिक बजा रहे हैं । वास्तविक ज्ञान से इनका कोई लेना देना नहीं । जिस प्रकार बबूल के पेङ पर कभी आम नहीं लगते । उसी प्रकार वास्तविक ज्ञान और सच्चे सदगुरु बिना कभी कोई प्राप्ति नहीं होती । हाँ ! आज जो ये कर रहे हैं । उसी प्रकार धीरे धीरे करके सत्यता शाश्वतता की ओर कृमशः इनकी जन्म जन्म की यात्रा शुरू हो जाती है । और  थोङा थोङा करके ये उस तरफ़ जाने लगते हैं । भले ही साधारण लोग इन्हें कुछ भी समझें । ये स्वयं बखूबी जानते हैं कि वास्तव में वे 0/0 ही हैं । कुछ अच्छे शिक्षित लोग दिमागी लोग इनसे थोङी ही बातचीत में ढोल की पोल समझ जाते हैं ।
Q27 ) Srimad Bhagwat katha ya Raam katha Aaj har Bade Sehro me aayojit ki ja rahi hai Lakho log inme jakar Anand ka anubhav karte hai to kya is se keval unka Bhakti bhav aage ke liye banega ? 
- बस सत्य इतना ही है कि आगे के लिये भाव बनता है । और कोई प्राप्ति नहीं होती । जैसे किसी बिज्ञान प्रदर्शनी किसी पुस्तक प्रदर्शनी में हमें तमाम आविष्कारों तमाम नये विषयों पर जानकारी तो मिल जाती है । पर वास्तविक लाभ तभी है । जब हम उस अविष्कृत वस्तु को खरीद कर लाभ उठायें । और बात वही है । इसके लिये सच्चे क्रियात्मक गुरु चाहिये । व्यवसायिक कथावाचक नहीं ।
kya Parikshit ki tarah ye log moksh ke adhikari Nahi Honge ? Spst rupe se Bataye? unki Gati kya hogi ?
- अगर परीक्षित को सुनाई गई शुकदेव कथा से वहाँ बैठे 88 000 सभी ऋषि मुनि और अन्य भी श्रोता मोक्ष पा जाते । तो बङे जोर शोर से यह जिक्र स्वयं भागवत कथा में ही होता । पर ऐसा कुछ नहीं है । जाहिर है । मोक्ष सिर्फ़ परीक्षित का हुआ । वो भी शुकदेव जैसे सन्त के द्वारा । मोक्ष सिर्फ़ योग क्रियाओं से होता है । कथायें गीत संगीत या भगवत चापलूसी से कदापि नहीं । तमाम लोग सिर्फ़ अपना धन और समय नष्ट कर रहें हैं । इससे सिर्फ़ विचारों में क्षणिक शुद्धता आती है ।
Kya Aatm gyan ki prapti ka marg keval surti sabad sadhana hi hai aur kisi anya yog kundline, dvait, Vihangam Marg, Jain, Muslim, isai Dharm ke dwara is gyan ki prapti Nahi Ho Sakti Taaki Bhai Logo Ka Sansay Bole To Sara Lafda Hamesha ke liye Khatam ho jaye aur Wo in Tanto ko chod kar keval aur keval Ek hi Sadhe Sab Sadhe Kar Sake ?
- एकहि साधे सब सधे सब साधे सब जाये । रहिमन सींचों मूल को फ़ूलहि फ़लहि अघाय । सिर्फ़ सुरति शब्द साधना का क्रियात्मक ज्ञान ही मोक्ष दिला सकता है । कुण्डलिनी महा देवत्व तक दिला सकता है । किसी भी रूप में जीव हत्या और माँसाहार करने वालों के लिये प्रभु का एक ही नियम है - GO TO HELL फ़िर किसी प्राप्ति की तो बात ही जाने दें । हाँ नर्क 100% प्राप्त होगा । बाकी धर्म शाखाओं के लोग यदि मूल उपदेशों को गम्भीरता से गहनता से आचरण में लाते हैं । तो निश्चय ही उनके लिये सनातन धर्म के रास्ते बनने लगते हैं । इतना अवश्य होता है ।

08 जून 2013

ये सभी धार्मिक व्यापारी है -तानसेन

Q 13)  Kya Hum Hans Diksha me dhyan karke apne kisi parichit ya ristedar ya anya kisi ke jiska hum chahe sanskar dekh sakte hai aisa kaise sambhav ho sakta Hai mujhe samjhaiye?
- यहाँ भी वही बात है । साधारण साधक नहीं देख सकते । उच्च स्तरीय ही देख सकते हैं । हाँ यहाँ थोङा अन्तर आ जाता  है । जैसे साधक और उस व्यक्ति के कोई खास संस्कार आपस में जुङ रहे हों । तो साधारण साधक उन्हें देखते हुये काटता या उपचार करता है । इसका अपवाद भी होता है । हमारा एक शिष्य सिर्फ़ 5 दिन से जुङा था । उसके पिता बीमारी से चल बसे थे । उसकी इच्छा देखते हुये मैंने उसे पिता से मिलवाया था । कभी कभी बिना दीक्षा वालों को भी मैंने मिलवाया है । या उपचार कराया है । दरअसल यहाँ परमात्मा का नियम कार्य करता है । इच्छित वस्तु का तय भुगतान । वो धन ( दान ) के रूप में हो । या फ़िर योग ( नाम कमाई आदि ) तब यदि सामने वाले पर कुछ नहीं होता । तो कभी कभी यह भुगतान मैं करता हूँ । आप यकीन करें । यदि धन मुद्रा में इसका आंकलन किया जाये । तो सिर्फ़ इसी काम में मुझे लाखों का घाटा होता है । बस यहाँ शर्त यही है । वह व्यक्ति वास्तव में किसी भी प्रकार से मोल चुकाने में असमर्थ हो । लेकिन इसके बाद वह व्यक्ति मेरा कर्जदार हो जाता है । और आगे उसे ब्याज सहित यह मोल चुकाना होता है । परमात्म सत्ता से कोई छल कपट नहीं कर सकता । और भागकर छुप भी नहीं सकता ।
Q 13 ) Daan Kise kahte hai ? aur kya agar koi vyakti ya sadharan aadmi Bina sadguru se diksha liye kisi vyakti ko koi daan ya punya karm karta hai to kya wo sab nishphal hota hai ? Kabeer ke dohe ki anusar bin guru karta daan, jap sab nishphal jaan ke hisab se ? To phir agar Hum Hans Diksha lete hai to phir Hum dikshit sadhako ko kaise daan dena chahiye jara khulkar bataye kyoki ye publick ki aneko Bhrantiyo ka niwaran karne wala answer hoga ? Ye sare Prashan Mai keval apne hi liye nahi waran sabhi padhne walo ki jigyasao ko dhyan me rakhte hu apse puch raha hu kripya samadhaan kare ?
- अपने द्वारा उपार्जित किये अन्न धन आदि को जो व्यक्ति स्वयं अपने या परिवार के साथ ही खाता है । वास्तव में वह पाप खाता है । यानी पाप से पोषण कर रहा है । उसके शरीर भाग्य और आसपास के माहौल में भी वैसा ही पापमय प्रभाव होने लगेगा । जैसे बीमारियाँ । झगङे । ग्रह कलेश । हानि आदि से नुकसान और तामसिक और नीच मनोवृति का हो जाना । ये प्रभाव तो यहीं होने लगता है । किसी भी व्यक्ति को अपनी कमाई का 10% हमेशा ही दान करना चाहिये । यदि वह विशेष परेशानियों से घिरा है । तो उसे 25% दान करना चाहिये । आप आश्चर्य

करेंगे । आज के समय अनुसार भले ही वह 20 रुपये  प्रतिदिन कमाता हो । भोजन मुश्किल से जुटता हो । फ़िर भी यदि वह निष्काम भाव से 5 रुपये ( 25% ) रोज दान करे । तो न सिर्फ़ तेजी से समस्यायें कटेगी । उसकी स्थिति में भी सुधार होने लगेगा । बिना गुरु के किया हुआ दान भैरव खाते में जाता है । इसका बहुत ही क्षीण लाभ थोङा थोङा करके आगामी जन्म श्रंखलाओं में होता है । जब हम किसी भी सच्चे गुरु या सदगुरु से दीक्षा ले लेते हैं । तो दीक्षा के समय तन मन धन या सर्वस्व अर्पण करते हैं । तो फ़िर हमारे पास बचता ही कुछ नहीं । सिर्फ़ गुरु आदेश का पालन करना होता है । अतः गुरु दीक्षा प्राप्त शिष्य को अलग से दान करने की आवश्यकता नहीं होती । समय समय पर गुरु सेवा में अर्पित किया धन । या गुरु द्वारा संचालित विभिन्न कार्यों से ही ये उद्देश्य पूर्ण हो जाता है । दीक्षा प्राप्त शिष्य को कानून के अनुसार आय का 10% गुरु को अर्पण करना होता है । दान और दान लाभ का भी एक विशाल संविधान है । जिसे थोङे शब्दों में नहीं बताया जा सकता है । किसी स्थिति विशेष के लिये आप प्रश्न कर सकते हैं ।
Q14 ) Karm phal aur karmo ki gati par aapne kisi pathak ke answer me kaha tha ki yaad dila dena uske baad wo baat aayi gayi ho gayi to aaj mai wohi prashn aapse nivedan karta hu karmo ke sidhant aur phal prapti par koi lekh bataye ? 
- यह अनुरोध मुझसे कई लोगों ने किया है । शीघ्र ही मैं इस पर काम करूँगा । ये बङा सूक्ष्म और तरीके से समझाने का विषय है । पर अधिक जल्दी न करें । अभी मैं एक बङी कहानी पर भी काम करूँगा ।
kaafi dino se kisi bhi patahk ke naye jawab aapke blog me padhne ko nahi mil rahe hai ? aap thik to hai na mera matlab aapki tabiyat se hai agar aisa hai to Hum intzaar karenge kyoki liye sabse jaruri ham logo ke liye aap hai phir hamari prashn to kripya kabhi baithe to mujhe mail kar kevl itna to bata dijiyega ki aap jawab kab tak de denge aap ke jawab ke intazar me gaayak tansen urf satyanweshi Byomkesh Bakshi
- जैसी आप लोग सामान्यतया कल्पना भावना कर लेते है । वह मेरा जीवन नहीं है । सोचिये नासा का सिर्फ़ एक आदमी मंगल की भूमि पर उतर जाये । तो विश्व में कम से कम 2 साल तक हंगामा रहेगा । और मेरे लिये पूरे विराट में भृमण करना आम बात है । वास्तव में मैं शब्दों के रूप में और आंतरिक क्रियात्मक ज्ञान के रूप में बहुत ही कम बता पाऊँगा । ना के बराबर । क्योंकि वह अपार है । यदि मैं उसकी रिपोर्टिंग टायप ही करता रहूँ । तो मुश्किल ये है कि आपके सामने असंख्य प्रश्न खङे हो जायेंगे । और उन जिज्ञासाओं का समाधान मैं न कर सका ( क्योंकि इतनी तेजी से समझाना । सबको संतुष्ट करना संभव नहीं होता ) तो बार बार यही न्यूज चैनल आदि में आने लगेगी - सत्यकीखोज पढकर आज दस मरे ।..आज...? अक्सर उत्तर देते समय मैं ऐसी बात गोल कर जाता हूँ । जिससे 100 अन्य प्रश्न पैदा होने की संभावना होती है ।
Q15 )  Apke lekh Kasuti sisya ki me padha tha ki aapke jaisi sthiti Har ek sisya ko prapt nahi hoti aur kabeer ke bahut se sisyo me se sirf 4 ko hi aatmgyan hua tha to phir baaki logo ka kya hua wo log aaj kal  kaha Bhai Giri Kar rahe Hai ? samjhaye ?
- जैसे कार्यकर्ता से प्रधानमन्त्री तक एक सफ़र सा होता है । और आवश्यक नहीं कि सभी अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचे । पर कुल मिलाकर उन्हें न होने से बहुत लाभ और एक नया ज्ञान नयी सोच मिल जाती है । फ़िर ज्ञान बीज कई जन्मों तक आपको उबारने का कार्य करता है । बशर्ते आप उसको ठीक से समझ लो । ज्ञान बीज बिनसे नहीं होवें जन्म अनन्त । ऊँच नीच घर ऊपजे होय सन्त का सन्त । इसलिये 0 से लेकर 100 तक जो जितनी मेहनत से ज्ञान या योग प्राप्त करता है । उसका अन्तिम फ़ल वही हो जाता है । जो नर्क या 84 की तुलना में बहुत अच्छा होता है । यह सत्य है शीर्ष या ऊँचाई पर गिने चुने ही जा पाते हैं । पर जो उनसे नीचे होते हैं । उनके स्तर और प्राप्तियाँ भी कल्पना से परे होती हैं । आप लोगों में ऐसा लालायित भाव दरअसल मेरे लेखों से ही जागा है । और ये कतई दोषपूर्ण न होकर शुभ ही है । क्योंकि आप ऊँचाई के लिये प्रेरित होते हैं ।
Agar hum hans diksha lekar aapke lekho ke anusar hi hamar yaha se agar koi hans diksh leta hai to satyalok tak ki prapti ho jati hai padhai karne par wo to thik hai ? to Last tak ka gyaan jin logo ko nahi hua wo to satyalok me hi niwas karti hai phir wo aage nahi badh paati kya ?
- सबसे पहले आप सत्यलोक का मतलब समझें - सत्य स्थान यानी माया से रहित । बाकी आपका कहना लगभग सही है । साधारण साधक को सबसे कम प्राप्ति 12 सूर्यों का आत्म प्रकाश होकर प्रकाशित हँस जीव बन जाता है । ये प्रथ्वी वाला पीला विनाशी सूर्य नहीं हैं । यह एकदम दूधिया सफ़ेद बेहद चमकीला शीतल प्रकाश होता है । आप इसी से अन्दाजा लगा लें । प्रथ्वी के सूर्य के 12 महीने के 12 देवता नियुक्त हैं । यानी जो देवत्व प्राप्त हुआ । वो भी एक बटा बारह । ये इसलिये कि इन्हें विभिन्न क्रियाओं से भोग प्राप्त होता है । जबकि समय पर इनकी मृत्यु भी होती है । जबकि हँस जीव अमर हो जाता है । और उसके इस सूर्य जैसी कठिन ड्यूटी भी नहीं है ।
Phir wo mukt kaha hua wo bhi to purn gyan ke aabhav me freequently kahi bhi bindaas aa ja nahi sakta na Bhidu ? Un Hanso ka kya hota hai aur is jeev ko Hans Hans karke kyo bulaya jata hai kya satyalok me wo kisi pakshi ki tarah hans ho jata hai spast kare ? 
- आत्मज्ञान या मुक्त ज्ञान में भी अलग अलग स्थितियाँ है । यदि आपके सामने अवसर है । सहयोग है । फ़िर भी आप उसको प्राप्त करना नहीं चाहते । तो दोष उसी का है । वास्तव में हँस जीव मुक्त ही होता है । क्योंकि वह हँस की तरह ही नीर क्षीर यानी सार असार विवेचन जानता है । सोहंग जीव की तुलना में वह बहुत श्रेष्ठ होता है । अमीरस उसका आहार होता है । त्रय ताप आदि शूल उसे नहीं सताते । हँस का प्रकाशयुक्त विलक्षण शरीर होता है । कर्म बन्धन जन्म मरण आदि से मुक्त होता है । इसलिये उसे मुक्त ही कहा जाता है । क्योंकि मुक्त क्षेत्र का ही निवासी  होता है ।
Aurl last lok tak pahuche huye lok hi mukt kahlate hai to phir ye satlok ke hans purna mukt kaha huye ye to wahi atak gyae na ? last wale lok me kya hot hai jar batane ka kast kare waha ke vaibhav ke bare me bhi bataye ?
- शब्दों में कुछ भी कह देना एक तरह से बहुत आसान होता है । अब्राहम लिंकन कोयले की अंगीठी के प्रकाश में शिक्षा प्राप्त कर अमेरिका के राष्ट्रपति बन जाते हैं । आप गौर करें । तो संसार के तमाम जाति धर्म
अधिकतर अन्तिम लक्ष्य तुच्छ स्वर्ग पर ही अटके हुये हैं । खास ईसाई और मुसलमानों में तो ये बहुत लोकप्रिय है । सोचने वाली बात है कि स्वर्ग का सबसे बङा देवता इन्द्र होता है । भारतीय जनमानस में इसकी कामी और ऐश विलास वाली छवि है । सभी जानते हैं । इससे बङे देवता कई हैं । कई ऋषि मुनि और रावण मेघनाथ जैसे लोगों से भी यह भयभीत रहता है । सभी जानते हैं । विष्णु शंकर आदि इससे बहुत बङे पद हैं । इससे सिद्ध  होता है । बात बहुत आगे भी है । मैंने अक्सर लिखा है । सफ़ल हँस साधक काल के सिर पर पैर रखकर जाता है । यानी त्रिलोकी का राष्ट्रपति भी उससे छोटा हुआ । बाकी गूढ धार्मिक जानकारियाँ साधकों के मार्गदर्शन और जीव को प्रेरित करने के लिये अधिक होती हैं । किस्से कहानी और मनोरंजन या जनरल नालेज के लिये नहीं । इसलिये ऐसी जिञासाओं को अति प्रश्न कहा गया है । जबकि आप पर दस रुपये भी न हों । और आप करोंङों की बात करें । तो यह हास्यापद ही है ।
Q16 ) Kisi pathak ke lekh ke answer me apne satlok ke bare me bataya hai uske aage ke loko me kya suvidhaye hoti hai ? vaibhav kis tarah ka hota hai ? kya waha bhi apsara, devi sundari etc milti hai ? 
- जितना ऊँचा जाते है । कृमशः पद शक्ति और अधिकारों में बढोत्तरी होती जाती है । परमात्मा के बाद सबसे बङी शक्ति प्रकृति है । और यह सिर्फ़ परमात्मा के ही अधीन है । इससे नीचे स्थिति अनुसार बदलाव होते जाते हैं । एक भाव में प्रकृति स्त्री रूपा है । इसी से अन्दाजा लगाया जा सकता है । एक बहुत बङी लगभग परमात्मा समतुल्य ही स्थिति के बारे में कहा है - बिनु पग चले सुने बिनु काना । कर बिनु कर्म करे विधि नाना । आनन रहित सकल रस भोगी । बिनु वानी वक्ता बढ जोगी । इसी से समझ लें ।
Kyoki aapne kaha tha ki aatm gyani santo ki seva me aisi devi sundariya har tarah ki seva karti hai to phir satlok ke jeev kya keval waha Bhajan gate rahte hai khali aanad aand Ya Rasgula Rasgul karte rahte hai ? Jaise swarg me hota hai waisa hi nazara hai kya Sabhi Bangduo ko Bata do kyoki Agar Niche sab forward ho jayega to uper ke bare me soch kar hi sahi kuch  sadhna kar lega ? nahi to bolega ki yaaha se bhi gaya aur waha se bhi gaya ? kuch din aur Jehela Jhali Kabhi to Milega O Taaki O Taaki Karne ka Mauka....Mai sidhe sabdo me Bhog vilas vaibhav satlok aur usse upar ke lok me kya hota janan chata hu Bas ab ..............Bata do ? 
- जैसा आप सोच रहे हैं । बात उससे कूछ अलग है । ये सिर्फ़ वासनात्मक ख्याल है । जो सभी आनन्दों का मूल है । अगर वह मिल जाये । तो फ़िर सभी आनन्द स्वतः प्राप्त हो जाते हैं । जो सभी रसो का रस है । वह मिल जाये । तो सभी रस स्वयं ही प्राप्त हो जाते हैं । जो सभी स्वादों का स्वाद है । वह मिल जाये । तो सभी स्वाद स्वतः प्राप्त हो जाते हैं । अगर ये बात आप समझ सकते हैं । तो फ़िर समझना आसान हो जायेगा । बाकी अनुभव से अधिक जाना जाता है । विचारों जानकारी से सिर्फ़ प्रेरणा होती है । उनमें रस नहीं होता ।
kyoki aisi sadhna ka lalch Sri Srimali & compny Apsra sadhna blog ke madhyam se khub karti hai aur wo bhi  bhai lok 7 dino me hi apsara prapt karne ki vidhi bhi puchte hai taki aam ka  aam ho jaye aur guthliyo ke daam ho jaye ? Esliye jeevo ko jagao aur ye sab cheeze jo attrackt karti hai unke bare me offer ke bare batao ki niche ke loko se bhi mast item song waha hai bhidu ? niwarn kare......Baki Gaayak tansen to diksha lekar hi rahega  aur uttar jaldi dene ki kosis karna ?
- नारायणदत्त श्रीमाली उर्फ़ निखिलेश्वरानन्द ? की लगभग 50 रुपये की आप कोई सरल तन्त्र मन्त्र साधना की कोई पुस्तक खरीद लें । तो उसमें आपको धन । स्त्री भोग । शक्ति । दुश्मन को पराजित करना आदि जैसे सभी उपाय मिल जायेंगे । जो एक मनुष्य को बहुत जरूरी रूप से चाहिये होते हैं । और वो भी 40 दिन या 6 महीने में ही । यहाँ एक सवाल आता है कि श्रीमाली को अप्सरा यक्षणियों आदि से धन । कामभोग । मनचाहे व्यक्ति या स्त्री पर वशीकरण आदि आदि जैसे हुनर आते थे । तो फ़िर उन्हें व्यवसायिक रूप से किताबें बेचने की क्या जरूरत है ( थी ) साधना भक्ति कम व्यवसायिक  तरीके से धन कमाने की क्या जरूरत थी ? जब सब कुछ मन्त्र जपने से ही प्राप्त था । जरा सोचिये । दाल में कुछ काला था न ।
Q 17 ) Rajeev Bhai, Ek question man me ayela hai aap to kahate ho ki aatm  gyan Hans diksha yane apke mandal se prapt diksha ki sadhna karne par ho sakta hai lekin kal mai tv pe shayad koi dharmik channel dekh raha tha to usme bhi Ek aadmi ya sant kah lo vo Vihangam Marg ke guru aur uski sadhna ke bare me bata raha tha kya ye aapke hi mandal ki tarah Dhyan karne wale logo ki ek shelly hai spast karne ki kripa kare ?
- क्योंकि आजकल सभी कुछ पुस्तकों में परिभाषा और अर्थों सहित प्रचुर मात्रा में मौजूद है । और धर्म के व्यवसाय से अधिक सफ़ल और फ़ायदेमन्द आजकल कोई व्यवसाय नहीं हैं । मैंने सुना है । वृन्दावन में तो कथावाचक बनाने की पढाई और ट्रेनिंग आदि का कोर्स शुरू हो गया है । अभी मेरी एक युवा लङकी से मुलाकात हुयी थी । जो इसी क्षेत्र में कैरियर तलाश रही है । वह कहीं भी सतसंग भागवत आदि धार्मिक प्रोग्राम हो । वहाँ प्रवचन कीर्तन आदि में मुफ़्त भागीदारी करती है । फ़िर मंच से घोषणा कराती है । अगर कोई उससे भागवत कराना चाहे । तो वह मुफ़्त में कर देगी । जाहिर  है । लोग धार्मिक कार्य में श्रद्धावश कुछ न कुछ देंगे ही । और उसका प्रचार भी हो जायेगा । फ़िर वह धीरे धीरे मनचाहा भुगतान लेने लगेगी । 20 साल की ये लङकी सिर्फ़ सुरीली रट्टू मैना ( या तोती ) ही है । लेकिन इसी तरह धीरे धीरे वह प्रसिद्ध सन्त देवी या कोई गुरु माँ ( हँसी की बात है न गुरु माँ ?  ) बन जायेगी । वास्तव में गुरु के साथ माँ शब्द कभी नहीं जोङा जाता । वह सिर्फ़ गुरु ही होता है । विहंगम पक्षी को कहते हैं । पर आज कोई इसका सही अर्थ भाव ही बता दे कि - विहंगम मार्ग का योग क्या होता है । तो ही मैं उसे गुरु मान लूँगा । ये सभी धार्मिक व्यापारी है ।
कुछ प्रश्न उत्तर और भी हैं । 

07 जून 2013

सत्यनाम मार्ग पर प्रेरित करने का लाभ - तानसेन

Rajeev Ji, Mujh Agyani, ke liye aapne jo aapka amulya samay dekar  aatmgyan ke visyo pr jo prakash dala hai uske liye mai aapka bahut bahut aabhari hu, Haalanki maine prasno ko mazakiya lehje me aapse pucha tha phri bhi aapke dwara mere prasno ka tark sangat rup se uttar prastut kiya jiske liye mai aapka Dil se aabhar dhanyvaad prakat karta hu
Saath hi aapse apne prasno ke madhyam se ki gayi galtiyo ke liye tatha mere uthaye gaye prasno se kisi pathak ko yadi koi thesh pauchi ho to sabhi blog padhne wale dosto se bhi mai chama chahta hu .
He Malik Sahib   chahe mujh se bhakti kara ya na karana pr itni fariyaad jarur karna chahunga ki sache santo ka mere se kabhi apmaan na ho jaye  isliye rajeev Ji Mai aapse apne dwara kiye gaye uljalul prashno se jinse ki kisi bhi prakar se mere dwara aapka apmaan hua ho to mai punh Chama Chaunga.

Chalt chalte ek prsn aur Ki agar kisi jeev ko satyanaam ke marg me kisi jeev dwara laya jata hai to use kaisa aur kis prakar ka punya labh milta hai ?
Aaap Jaise Santo ke Charno me Tujh Manav
GAAYAK TANSEN Ka sadar pranaam swikaar kare dhanya waad
- किसी भी सन्त को मान अपमान अच्छे बुरे से कोई फ़र्क नहीं पङता । सन्त की कोशिश यही रहती है कि उसके द्वारा किसी का अहित न हो । हालांकि सन्तों के कार्य । रहनी । और वाणी आदि अटपटापन लिये होती है । और कभी कभी सन्त बेहद अजीव से कार्य भी करते हैं । जैसे खिज्र द्वारा बादशाह के लङके का हाथ तोङकर उसे झाङी में अकेला छोङ आना । जबकि बादशाह ने उन्हें सवारी के लिये घोङा दिया था । जहाँ तक बात आपके द्वारा पश्चाताप भाव की है । उसमें मुझे विशेष कुछ ऐसा नहीं लगा । जो दोष पूर्ण हो । आपने प्रश्न करके मुझे सहयोग ही किया है । ये बङा आश्चर्यजनक है कि पूर्ण मोक्ष ( को छोङकर ) से पहले किसी भी जीवात्मा का स्वभाव कभी नहीं बदलता । चाहे वह कितना ही बङा देवता भगवान आदि क्यों न हो जाये । उसका मूल स्वभाव कायम रहता है । दिव्यत्व को प्राप्त हुये विभिन्न लोगों देवताओं भगवान आदि के धार्मिक प्रसंग इस बात की पुष्टि करते हैं । फ़िर आप तो अल्पज्ञ और विषय वासना मोहित मानव की श्रेणी में आते हैं । जो काम क्रोध लोभ मोह मद इन 5 विकारों से सदा विकारी रहता है । जबकि कोई भी आत्मज्ञान से जुङा सन्त मन के इन 8 भावों - काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर ज्ञान वैराग से परे 1 भाव प्रेम ( धारा ) में रहता हुआ 1 ( परमात्मा ) से ही जुङा रहता है । इसके बाद सभी 0 ही है । अतः परमात्मा से सृष्टि और फ़िर शून्यता तक यही कृम चलता है ।
उत्तर - पहली बात तो ये है कि जब तक आप स्वयं किसी चीज का महत्व रस आदि नहीं जानते । दूसरे को प्रेरित नहीं कर सकते । हाँ सूचनात्मक टायप की जानकारी  प्रसंगवश अवश्य दे सकते हैं । फ़िर भी यह मान लिया जाय । कोई आत्मज्ञान रहित जीव किसी जीव को प्रेरित कर उस मार्ग पर चला दे । तो यह कुछ कुछ वैसा ही होगा । जैसे कोई स्वयं अनपढ व्यक्ति पढाई का महत्व समझते ( या देखते ) हुये किसी दूसरे को शिक्षित कराने में तन मन धन आदि या तीनों से सहयोग करे । और वह शिक्षा से लाभ उठाये । तो यह अच्छे परोपकार की श्रेणी में आयेगा । अगर एकदम सटीक नियम द्वारा इसका आंकलन किया जाय । तो सृष्टि में सभी अच्छे बुरे कार्यों का प्रतिफ़ल उसका कर्मफ़ल बन जाने के बाद लगभग उसी जैसे रूप में कम से कम 8 गुणा और अन्य परिस्थितियों में 1000 गुणा होकर मिलता है । मान लीजिये । आपने सिर्फ़ 10 फ़लदार वृक्षों का बाग सिर्फ़ परोपकार भावना ( निष्काम भाव ) से लगाया । याने उसके फ़लों आमदनी आदि से आपको कोई लोभ न था । तो कालान्तर ( आगामी जन्मों ) में आप 80 या 8000 फ़लदार वृक्षों के बिना परिश्रम ( विरासत । दान आदि कोई माध्यम से ) के बनेंगे । ये मैंने स्थूल स्तर पर बताया है । सूक्ष्म स्तर पर कर्म और कर्मफ़ल की गति देवता भी आंकलन नहीं कर पाते । इसलिये आपके द्वारा आत्मज्ञान के लिये प्रेरित किया जीव जब सुखी होगा । तो उसी के आधार पर आपका पुण्यफ़ल बनेगा । अब महत्वपूर्ण यही है कि आपने जिस पात्र का चयन किया । वो कितना योग्य है । और उसका क्या लाभ ले पाता है ।
शिवोह्म शिवोह्म - सबमें मैं ही हूँ । सबमें मैं ही हूँ । साहेब साहेब ।

एक जिज्ञासु शिष्य से मेरी बातचीत

इसी पेज पर कई अन्य पार्ट जोङे जायेंगे - हालांकि मैंने यह सब किसी सफ़ाई हेतु नहीं लिखा । न मुझे इससे कोई परेशानी है । पर यह आडियो रिकार्डिंग सुनने के बाद जो मुझे बैज्ञानिक द्रुष्टि से महसूस हुआ । वह बता रहा हूँ । मैंने जीवन में पहली बार ही अपनी डिजिटल आवाज सुनी है । इसी ब्लाग पर पोस्ट करने के बाद । और यकीन मानिये । अगर कोई मेरी बिना जानकारी में मुझे ही यह आडियो क्लिप देता । तो मैं कभी नहीं पहचान पाता कि - ये मेरी ही आवाज है । ये बातचीत भोपाल से फ़ोन पर बात करते हुये रिकार्ड की गयी है । मैंने अन्दाजा लगाया । इसके कई कारण हो सकते हैं । एक तो फ़ोन की रिकार्डिंग क्वालिटी पर  निर्भर करता है । दूसरे प्रश्नकर्ता मनोज भोपाल से अपने ही फ़ोन पर बोल और रिकार्ड कर रहे थे । जाहिर है । मनोज की आवाज सीधे फ़ोन में जा रही थी । जबकि मेरी आवाज एक लम्बा संचार तन्त्र तय करके उसके फ़ोन तक पहुँच रही थी । इसके भी अलावा मनोज कमरे आदि बन्द जगह से बात करते थे । जबकि मैं दूर दूर तक खुली जगह से । जहाँ आवाज बिखर जाती है ।
लेकिन इन सबसे बङा कारण है । मेरा स्मोकिंग करना । इससे भी आवाज में बेस प्रभावित होकर बिखराव हो जाता है । इसके अतिरिक्त मुझे अक्सर लगातार 7-8 घण्टे से अधिक बोलना होता है । अक्सर आश्रम आदि की व्यवस्था संभालते हुये साधुओं आदि पर चिल्लाकर नियन्त्रित करना । जैसे छोटे बच्चों की टीचर बच्चों पर चिल्लाती रहती है । इसके अतिरिक्त मैं दूध से बनी चीजें और शीतल पेय ( यहाँ ) कम ही ले पाता हूँ । जो आवाज की स्पष्टता में बेहद सहायक होते हैं । ये कुछ मुख्य कारण थे । जो मुझे समझ में आये ।
बस एक बात समझ में नहीं आयी । फ़ोन में मेरी आवाज किसी धीर गम्भीर अधेङ व्यक्ति जैसा ठहराव लिये है । जबकि मैं बहुत तेजी से बोलता हूँ । और किसी बात को सुनते समय मैं सुनने समझने के उपकृम में हूँ॓ऽउ शीघ्रता से बोलता हूँ । जबकि इसमें वह दीर्घ है । वैसे मैंने शुरूआती 2 पार्ट सिर्फ़ 2-2 मिनट ही सुने हैं । अतः फ़ायनली कोई बात कह नहीं सकता । मुझे याद भी नहीं । मेरी क्या और कैसी बातचीत हुयी थी । पर स्वपनिल और मनोज का कहना है - वह महत्वपूर्ण है । जो भी है । यदि वह आपाको लाभ पहुँचाती है । तो उसका उद्देश्य सफ़ल ही है । साहेब ।।
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ये एक जिज्ञासु शिष्य से मेरी बातचीत है । आप लिंक पर सुन सकते हैं । पिछली बार ये फ़ाइल्स अपलोड साइट ने हटा दिये थे । अबकी बार इन्हें यू टयूब पर डाला गया है । राजीव कुलश्रेष्ठ  

06 जून 2013

इससे अच्छा सौदा कौन सा है ?

Rajeev Ji, Namskar asha Mai aapke blog ka 2 mahine purana pathak Jigyasu kumar urf gayak tansen apse kuch sawal puchna chahta hu halaki mai aapko mail pehili baar hi kar raha hu aur asha karta hu ki rajeev ji aap mere in sawalo ke jawab jald se jald jarur denge Aur ye  kah ke palla Nahi jhadoge ki sawal karna To Bada asan hai aur Jawab dena bahut muskil, Ya  Baki agle lekh me lekh bada ho jane ke karan, ya phir key board me kharabi aa gai hai etc karke baat talna nahi, aisi mai ummid karta hu bhale hi time lage par sare sawalo ke jawab ek sath dena aur mujhe mail karke ye bhi bata dena ki kab tak de pavoge mere jawab ? kyoki satya ki khoj kar kar ke mere andar bhi khoj ho gai hai aur is khoj khaj ke khel  ki khujai aap hi mita sakte ho ? Bolo thik Hai Na to phir sidhe prasha karta Hu Baki Meri Marji wale lekh ki tarah mat likh dena Meri Marji
Q 1 - Kaal purush Ne Satypurush se door rakhne ke liye 84 banai ye baat thik hai to phir usne Manav Yoni ka nirman kis karan kar diya use kya khujli machi hui thi aur wo chahta to nahi bana sakta tha ? 
- आपने अक्सर पढा सुना होगा - यत पिण्डे तत बृह्माण्डे ।  ये बात दरअसल मनुष्य शरीर ( पिण्ड ) के लिये ही कही गयी हैं । ये ठीक विराट पुरुष या सृष्टि की बनाबट जैसा ही है । दूसरे सिर्फ़ यही वो शरीर या योनि है । जिसमें जीवात्मा कर्म द्वारा अपना उत्थान या पतन कर सकता है । इसमें मनुष्य घृणित नारकीय जीव से लेकर स्वयं परमात्मा तक हो सकता है । सत्य पुरुष या शाश्वत आत्मा से ही सभी चेतन पुरुषों की स्थिति उपाधि का सृजन हुआ । तो इस तरह सत्य पुरुष से ही काल पुरुष का भी सृजन हुआ । सिर्फ़ इस बिन्दु पर गौर से सोचिये । यदि मानव योनि जैसी कर्म योनि का सृजन न हुआ होता । जीवात्मा का उत्थान पतन का खेल न होता । तो फ़िर जो जैसा एक बार बन गया । वैसा ही रहता । यदि आपसे कह दिया जाये कि आप भी भगवान बन सकते हैं । तो आपको कितनी खुशी होती है । इसको एक सरल उदाहरण से समझिये । इसी प्रथ्वी पर मनुष्य के लिये नारकीय जीवन और स्वर्गिक सुख जैसी दोनों स्थितियाँ हैं । जिसने अपना उत्थान कर लिया । वह स्वर्ग के मजे लूटता है । और जिसने पतन किया । वो दुखी रहता है । तो उसने बिना भेदभाव के सबको समान अवसर दिया । उत्थान पतन के इस खेल का चक्र सदा जारी रहता है । गहराई से सोचें । तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है ।
Aurag sagar me maine padha tha wo jeevo ko khata hai param purush ne use shrap diya par aisi taisi to jeevo ki ho gai phir kaal pursh ka isme kya dosh hai wo to parm pita ke haath me hai use mitata kyo nahi taki ye lafda hi khatm ho jaye ,
- काल पुरुष कोई हौव्वा नहीं है । यदि किसी व्यक्ति पर कोई मुकद्दमा चल रहा हो । तो न्यायाधीश उस अपराध का पूरा काल । गतिविधियाँ । उचित अनुचित आदि पर संविधान अनुसार विचार विमर्ष कर उस व्यक्ति को सजा देता है । गौर करें । तो ये भी तो न्यायाधीश ने उस व्यक्ति को कर्म अनुसार खा लिया । दूसरे शब्दों में यह जीव का शोधन ही तो हुआ । ठीक यही काल पुरुष का कार्य है । यदि वह जीव को खाये न । तो सृष्टि का कृम कैसे चलेगा ? जैसे 84 के किसी जीव की मृत्यु हुयी । तो उसका भोग काल पूरा हो गया । फ़िर अगला भोग शुरू हुआ । लेकिन यदि मनुष्य की मृत्यु ( काल आहार ) हुयी । तो उसके पूरे जीवन का निचोङ निकाल कर सार पदार्थ ( कर्म । संस्कार आदि को ) को आगे की गति हेतु भेज दिया । फ़िर तुम मरने वाले काम करते ही क्यों हो । वह सभी को खाता ही है । ऐसा भी नहीं । पुण्यात्मा उच्च देव पदों पर सुशोभित होते हैं । अतः यह अपने कर्म फ़ल ही हैं । यदि बारीकी में जाया जाये । तो काल का भी काल ( महाकाल ) होता है । वह काल को खा जाता है । इसलिये यदि आप ज्ञान युक्त हैं । तो काल महाकाल आपका कुछ भी नहीं बिगाङ सकते । वरना अज्ञानी तो हर स्थिति में दुख ही भोगता है । फ़िर वह बस पकङने जैसा मामूली काम ही क्यों न हो । आपने बिलकुल ठीक लिखा - सत्यपुरुष काल पुरुष को मिटाता क्यों नहीं । मिटाता है । आत्म ज्ञान युक्त हँस जीव काल और फ़िर कृमशः महाकाल को भी खा जाता है । जब सभी सुविधायें मौजूद हैं । तो उसका लाभ उठाना न उठाना तुम्हारे हाथ में है ।
kyoki kaal purh ki tarah use bhi koi hisab magne wala nahi to mita de aur sabhi jeevo ko chuda le ye ul jalul ke khel me kya phayda mila sidhe jeevo ke hitaisi param purush use satyalok me posting kyo nahi de deta kyoki jeev to usi ke ansh hai aur wo bhi vivesh ?
- वास्तव में यह हँस जीव यहाँ त्रिलोकी में सृष्टि रूपी मेला देखने आया था । पर्याप्त धनी था । मुक्त था । अमृत इसका आहार था । पर ये त्रिलोकी की वासनाओं से इस कदर मोहित हुआ कि बेहद गरीब होकर काल का कर्जदार हो गया । हँस से काग ( कौआ ) वृति हो गयी । और विषय रूपी विष्ठा ( काम । क्रोध । लोभ । मोह । मद ) इसका आहार हो गये । तब यह काल माया का कैदी हो गया । तो गलती किसकी थी ? वास्तव में यह वायदा करके आया था कि अपना परिचय ( हँस ) और आपको ( सत्यपुरुष ) याद रखूँगा । और जल्द ही लौट आऊँगा । मगर यहाँ माया ( माता पिता पत्नी बच्चे भाई बहन धन सम्पत्ति मान प्रतिष्ठा ) जैसे कुचक्रों में फ़ँस गया । जबकि ये सिर्फ़ मेले के साथी थे । जीवन में दो दिन का मेला जुङा । हँस जब भी उङा तब अकेला उङा ।
Q2 ) Kaal purush urf krishna kumar, maya bhabhi urf astangi ke hatho se is Satyanaam ke prabhav se jeev aajad ho jayenge to phir ek na ek din to uska khel khatm hoga hi, aur ye srishti khali ho hi jayegi kyoki parmpursh apne jeeevo ko stlok bulana chata hai To phir Last me Kaal purush ka Kya hoga Kyokig aurag sagar ke hisab se to wo stlok se bhaga diya gaya hai yani shapit hai To phir kya ye dono hi "jangal me Mangal"( Kaal purush aur astangi ) karte rahenge ya phir Satyapurush phir se inhe jeevo ki aisi taisi karne ke liye Prime Minister Bana ke Kisi aur lok Me posting de dega Kaal purush ka kya hoga Bhai ? ye Jarur Batana kyoki Sabhi Phasad ki Jad ye dono Baap Beta hi hai Jeev ki to jaise......Maa......bhen ek kar rakhi hai Ganga gaye to ganga daas Aur Jamuna gaye to Jamuna daas jaisi wali sthiti Kabeer ke dohe me Chalti Chakki dekh kar diya kabeera roy Baap ( Satyapursh ) Beta ( Kaal purush ) ke khel Me Sabut Bacha Na Koy ?
- ऐसा लगता है । आपने अनुराग सागर या अन्य धर्म ग्रन्थों या मेरे ब्लाग्स को ठीक से नहीं पढा । या आप बात की गहराई ठीक से नहीं समझना चाहते । आदि सृष्टि के बाद से ही ये सृष्टि चल रही है । और अनन्त काल तक चलती रहेगी । क्योंकि ये आत्मा से स्वपनवत है । क्या आप विराट सृष्टि में जीव आत्माओं की संख्या का अनुमान लगा सकते हैं ? दूसरे लाखों जन्मों के पुण्य संचय के बाद आत्म ज्ञान की तरफ़ झुकाव होता है । और फ़िर मोक्ष मार्ग की यात्रा शुरू होती है । कभी कभी ये कई जन्मों का सिलसिला होता है । और हरेक कोई इसमें पूर्णतया  सफ़ल भी नहीं होता । मैं इसका सही सूत्र विस्तार से किसी बङे लेख में बताऊँगा । पर संक्षेप में इतना समझ लो । आत्मा ( अनादि ) में जब कोई वैचारिक हलचल ( स्फ़ुरणा ) पैदा होती है । तब मन ( काल पुरुष ) पैदा  होता है । क्योंकि ये इच्छाशक्ति ( अष्टांगी ) के द्वारा भोग करता है । तब तीन पुत्र ( या गुण - सत रज तम ) उत्पन्न कर स्वपनवत ( माया के परदे पर ) सृष्टि करता है । ये ( वैचारिक ) वासना द्वारा उत्पन्न ( मगर आत्म स्तर पर आभासित । जैसे मनुष्य को स्वपन सच लगना ) सृष्टि को - मन + इच्छाशक्ति + तीन गुण + 33 करोङ मनोवृतियों को मिलाकर जो संयुक्त इच्छा शरी्र निर्मित होता है । उसी की संज्ञा जीव है । कैसा अदभुत खेल बनाया । ईश्वर बृह्म जीव और माया । अर्थात ये चारों ज्ञान के धरातल पर एक ही है ।
Q3 ) Ye yam Lok kaha hai iski duri prithvi se kitni hai ?
- इसकी ठीक दूरी अभी मुझे ज्ञात नहीं । फ़िर भी स्मृति आधार पर यह लगभग 24 000 योजन है । 1 योजन 4 कोस यानी 10 किमी के बराबर होता है । इस तरह यह लगभग 1 00 000 किमी के करीब है ।
aur Mrityu ke baad kya sabhi jeevo ko waha le jaya jata hai agar kuch jeev apne samanya karmo ke hisab se 84 me jate hai to ? aise kaun se log hai jo yam lok ki hawa khane ka special paap karte Hai ?
- प्रायः माँसाहारी भोजन करने वाले । जीवहत्या करने वाले निश्चय ही बने पाप अनुसार नर्क में जाते हैं । फ़िर वह किसी भी देश काल जाति धर्म समुदाय आदि आदि के हों । कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं कह सकता कि हमारे धर्म में माँसाहार जायज है । स्वांस स्वांस का करो विचारा । बिना स्वांस का करो आहारा । इसके अतिरिक्त पर स्त्री या पर पुरुष से से काम भोग करने वाले । हत्या करने वाले । पराया धन हङपने वाले आदि बहुत प्रकार हैं । जो निश्चय ही फ़लानुसार विभिन्न नर्कों में गिरते हैं । लेकिन आप इसको रामचरित मानस के एक दोहे से बखूबी समझ सकते हैं - परहित सरस धर्म नहीं भाई । पर पीङा  सम नहीं अधिकाई । यानी दूसरे को दुख पहुँचें । ऐसा कार्य ही सबसे बङा पाप है । इम्हें उपहार स्वरूप निश्चय ही घोर नर्क प्राप्त होता है ।
Mr. Chitragupta & Company Yamlok me is prithvi par hi le lijiye 7 Kharab ke as pass ki aabadi Hogi ye mai anuman se kah raha hu itne logo ka lekha Zokha rakhne me to super computer ki bhi halat kharab ho jayegi phir ye inki company ka management kis tarah se karte hai kripya batane ka kast jarur kare ? 
- जिस प्रकार एक कम्प्यूटर में बहुत सा बहुत प्रकार का डाटा रिकार्ड होता है । लेकिन नेट में आप जो शब्द खोज करते हैं । वही परिणाम आता है । इसी प्रकार प्रत्येक जीवात्मा में अंतकरण । चेतना ( पावर यूनिट ) जीव पाप पुण्य परिणाम जैसी प्रोग्रामिंग होती है । जो पलक झपकते ही सब बता देता है । ध्यान रहे । कुरआन में भी इसी किताब का जिक्र है । पर जानकारी के अभाव में वह उसका गलत मतलब समझ बैठे हैं । कुरआन में कयामत या प्रलय शब्द दरअसल जीवात्मा की मृत्यु का ही संकेत देता है । जीवन सृष्टि और मृत्यु प्रलय का ही घोतक है ।
Yamduto ke dwara jeev ko yampuri le jane me kitna Time lagta hai ?
- प्रथ्वी से यमपुरी की सीमा तक बहुत हद चार मिनट लगते हैं । लेकिन यमपुरी की सीमा में पहुँचने के बाद मृतक जीवात्मा की यात्रा के कई तरह के नियम है । एक निश्चित दूरी बाद यमदूत बदल जाता ( जाते हैं ) है । यम दरबार में पेशी होने से पूर्व इसे कई अजीवोगरीब अनुभवों से गुजरना होता है । यमपुरी की खासियत यह है कि इसके वातावरण में कुछ कुछ कालापन सा है । जैसे काली आंधी आने पर लगता है । भवन आदि का रंग भी कालेपन की अधिकता लिये मटमैला सफ़ेद जैसा है । आपको भूत प्रेतों का वर्णन रोचक लगता होगा । पर यहाँ के मृत्यु कन्या आदि परिवार के लोग ( निवासी ) उन्हें बहुत फ़ीका कर देते हैं ।
ajamil ki katha to apne suni hogi wo hi ek numbari sari jindagi aish ki aur ladke ka naam rakha narayan aur yamduto ke dwara uski raksha Vishu ke duto dwara ki gayi Ye kaise hua kyoki usne to Advait se koi diksha Nahi li thi phir  iska matlab wo Narayan kehne se Hi bach gaya lekin apke lekho ke hisab se sache sant dwara diksha (advait) mil jane ke baad ye Tanta wahi tut jata  hai is theyori ko khul kar clear kare kyoki ? 
- यदि राम का उल्टा मरा मरा जप कर वाल्मीकि बृह्म समान हो गये । उल्टा नाम जपा जग जाना । वाल्मीकि भये बृह्म समाना । तो कितने ही दिन रात सीधा राम राम जपते रहते हैं । फ़िर तबसे आज तक
1 भी । ध्यान दें 1 भी ? वाल्मीकि क्यों नहीं हो पाया । इसका मतलब आज राम राम कहने वाले सभी मूर्ख हैं । अजामिल जैसी कथायें सिर्फ़ काल पुरुष और उसके एजेंटों द्वारा फ़ैलाया मायाजाल है । आपने कई ऐसे लोगों को मृत्यु के समय देखा होगा । जिनके परिजन उनसे मृत्यु के समय अपने अपने धर्म अनुसार राम राम । गीता पाठ । गंगाजल पिलाना । बछिया पुजवाना ( गाय का बच्चा ) तुलसी पत्र खिलाना । भगवान आदि की फ़ोटो से मस्तक नवाना आदि क्रियायें कराते हैं । इतने प्रपंचों के बाद भी किसी एक के भी यहाँ विष्णु का दूत आया । जब आपको पता है । जीवन भर पाप करो । और मृत्यु के समय राम बोल दो । तो इससे अच्छा सौदा कौन सा है ? बहुत से बोलते हैं । कभी देवदूत बचाने आये । आपने भगवान के लिये यह सुना होगा । जिसको मारा । उसको तारा । फ़िर राम के हाथों मरा रावण अगले जन्म में शिशुपाल कैसे बना ? जब तर गया था । ध्यान रहे यह कृम - जय विजय । हिरणाकश्यप हिरण्याक्ष । रावण कुम्भकरण । कंस शिशुपाल तक तो बङे स्तर पर ही गया । झूठी कथाओं के सिलसिले में आपने एक और चीज देखी होगी । फ़लानी लङकी विश्वास के आधार पर नदी चलकर पार कर गयी । कोई भगवान को भोग लगाने का मतलब सचमुच खिलाना समझ बैठा । तो भगवान को प्रकट होकर रोटी खानी पङी । मैं कह रहा हूँ । इस तरह की घटनायें आपकी या आपके पूर्वजों की जानकारी में कहीं घटी ? एक राजा था ( कब था ? ) एक ब्राह्मण था ( मगर कब और कौन था ? ) यदि अता पता था भी । तो इतना पुराना कि आपके पूर्वजों के भी पूर्वज उस समय डायपर ही पहनते होंगे । जाहिर है । यह सब झूठों द्वारा फ़ैलाये गये झूठ ही हैं ।
Aaj kal Bahut se log yamlok ko Bakwas samjhte hai aur diksha lene wale ko bewkuf ? Aur waise bhi Lato ke bhut Bato se Nahi Mante Lekin apke utar se Mere Jaise Log Bhale hi der se sahi Manenge to ? To isliye Jawab Jalebi ki Tarah nahi Samosa ki tarah Hona Jaruri Hai
- जानिये जीव तबही जग जागा । जम का डण्ड जो सर पे लागा । आछे दिन पाछे गये किया न हरि से हेत । अब पछताये होत का जब चिङिया चुग गयी खेत । बचपन खेल में खोया । जवानी मेल में खोयी । बुढापा देख के रोया । आयी मौत तो रोकर बोला - अब का होया । अब का होया ? ऐसे ही लोगों के लिये कहा है ।
Q4 ) Ek din me lakho-croro log mar jate hai yadi usme se 50,000 ki Bhieshi yamlok me hoti ho to waha uske sare janam ka record khangale me Ya Chalan pesh karne me Mr. Chtiragupta ko kitna samay lagta hoga aur peshi kitne dino chalti hogi ? 
- निगुरा ( हँसदीक्षा रहित ) ज्ञानरहित जीवन बिताने वाले सामान्यतया 84 लाख योनियों में ही जाते हैं । हँसदीक्षा वाले या तो अगला मनुष्य जन्म या फ़िर मुक्त हो जाते हैं । सच्चे गुरु से जुङे धार्मिक प्रवृति के साधारण लोग जिन्होंने पुण्य धर्म दान आदि बहुलता से किये हों । स्वर्ग आदि के पुण्यफ़ल अनुसार अधिकारी होते हैं । द्वैत के कुण्डलिनी आदि के अच्छे साधक साधना के अनुसार छोटा या बङा देव पद प्राप्त करते हैं । सिर्फ़ योग साधना करने वाले सिद्ध आदि हो जाते हैं । तीन प्रमुख देवताओं की उनके गुण के आधार पर साधना लरने वाले कृमशः बृह्मा के - यमदूत टायप कार्यकर्ता या सृष्टि विषयक अन्य छोटे मोटे कार्यों में सहायक गण बनते हैं । विष्णु के अच्छे किस्म के देवदूत आदि कार्यकर्ता । शंकर के भूत प्रेत बेताल योगिनी डाकिनी शाकिनी आदि गण बनते हैं । आपके प्रश्न भाव के अनुसार यमलोक सिर्फ़ पापी ही जाते हैं । जिन्हें नर्क प्राप्त होता है । स्वर्ग प्राप्त हुये लोग यमलोक नहीं जाते । पाप पुण्य का रिकार्ड हमारे अंतकरण में ही रिकार्ड होता है । यह मृत्यु के समय स्वचालित तरीके से फ़िल्मी रील के समान घूमता है । मृतक को स्पष्ट अपने कर्म और उसका फ़ल दिखाई देता है । मुश्किल से 15 मिनट में यह रील घूमकर ठहर जाती है । और इसी के फ़लानुसार जीवात्मा की अगली गति तय हो जाती है । यह सब मृत्यु के बाद थोङी ही देर में हो जाता है । सिर्फ़ नर्क प्राप्त व्यक्ति को स्थिति अनुसार अधिक समय इधर उधर कष्ट सहना होता है । जैसे एक गम्भीर कैदी को हवालात जेल सजा आदि प्रक्रियाओं से गुजरना होता है ।
Kya Prithvi lok ke judgeo ki tarah Hi waha Bhi Yamraj ki post hoti Hai jo ek se adhik ho agar yamraj ek hi Hai to phir itne logo ki ek din me peshi kaise hogi ? Khul kar bataye lekh bada hone ki chinta mat karna kyoki ye sab sawalo ki jawab sab panter log Jalebi Bai ki hi tarah dete hai Bhale hi Der ho lekin ek hi lekh me dijiye.........varna aap keh sakte hai mujhe eska jawab nahi malum mai samajh jaunga ..ki satya ki  khoj karne me time lag sakta Hai ?
- लोगों में फ़िल्मी यमराज की कल्पना अधिक है । वास्तव में मुख्य यमराज 1 प्रथ्वी का 1 ही होता है । पर उसके सहायक अधीनस्थ कुछ अधिक होते हैं । यह यमलोक पूरा एक बहुत बङे नगर के समान छोटा लोक है । मेरे अनुभव के अनुसार यह उत्तर दक्षिण दिशा के मध्य में प्रथ्वी से कुछ ही हजार योजन की दूरी पर है । ऊँचाई भी अधिक नहीं है । नर्क आदि या कठिन सजाओं को प्राप्त जीवात्मा को कुछ लम्बे समय तक विभिन्न मुकद्दमे के समान परिस्थितियों से गुजारा जाता है ।
Q5 ).Ek (  Hans Diksha ) prapt sadhak ke parivar ke log yadi hans diksha sadhak ke ma baap ne na li ho to uski mrityu ho jane par uske maa baap ki kya Gati hogi ?
- साधारण स्तर के साधक के माँ बाप की काल पुरुष के संविधान अनुसार उनके ( जीव ) कर्मों के आधार पर ही गति होगी । क्योंकि आत्मा के स्तर पर जीव के माँ बाप जैसे सम्बन्ध नहीं होते - मात पिता भगिनी सुत दारा । यह सब माया का परिवारा । यह ठीक उसी तरह है । जैसे एक लङका पढे । और आप कहें कि उसके घर के सभी को सरकारी नौकरी और तनखाह मिले । लेकिन साधक यदि उच्च स्तर का राम भक्त है । तो घर वालों को भी लाभ मिलता है । ये ठीक उसी तरह है । घर में कोई D.M या मिनिस्टर हो जाये । तो सभी को कु्छ अंशों में लाभ होता है ।
Ya Hans diksha wale Sadhak ko apne maa baap ki sadgati ke liye kya kriya karni hogi vaidik riti wali taaki unki atma ko shanti mile ? aur kya Dhyan me ja kar wo sadhak apne maa baap se mil sakta hai ya dekh sakta hi jaise nark lok, swarg lok, etc me sukshm sarir ke dwara ja sakta hai kya ?
- सबसे पहले तो जहाँ ( जिस घर में ) आत्मज्ञान का प्रवेश हो जाता है । वहाँ के दूसरे अन्य जीव माता पिता आदि भी इन तरंगों से अछूता नहीं रह पाते । लेकिन फ़िर भी वे यदि जङ बुद्धि टायप या हठी हैं । और साधक उनका कल्याण करना ही चाहता है । तब वह गुरु से निवेदन कर दान ( धन आदि ) भक्ति ( अपनी नाम कमाई से ) आदि क्रियाओं से उन्हें सदगति दिला सकता है । जो उन पर उस भक्त पुत्र की कर्ज रूप होगी । और अधिकतम एक मनुष्य जीवन का ही मौका मिलेगा । सिर्फ़ नगण्य % लोग ही हठता के शिकार होकर अधोगति को प्राप्त होते हैं । वरना अक्सर सुधर जाते हैं । कोई भी अच्छा साधक इसी जीवन में उनकी प्राप्त स्थिति को बखूबी देख सकता है ।
Nark me yadi ho to kyoki bina diksha ke Nigura chahe koi bhi ho Nark hi jayega na isliye maa baap se milne ke liye ja sakte Hai hans diksha ke madhyam se.........Jarur bataye ?
- दरअसल ज्ञान होते ही माता पिता पत्नी आदि यह माया का भृम टूट जाता है । फ़िर कोई भी जीव सबमें परमात्मा ही है । ऐसा ही देखता है । फ़िर भी आपके प्रश्न के अनुसार साधक उनकी स्थिति को तो देख सकता है । पर मिलना आदि बङे साधक के लिये ही सम्भव होता है । सबके लिये नहीं ।
Q6 ) Hans Diksha prapt karne par kitna abhyas karne par ya kitni naam kami ya sadhan karne par vakti param Hans diksha prapt karne ka adhikari ho jata Hai ?
- 1 दिन से लेकर 10 जन्म तक । क्योंकि यह सब स्वयं व्यक्ति की पात्रता लगन मेहनत पूर्व जन्म के संस्कार भक्ति संचय आदि बहुत सी चीजों पर निर्भर करता है । बृह्माण्ड की चोटी तक पहुँच जाने के बाद परमहँस दीक्षा होती है । यहीं से परमात्म क्षेत्र की सीमा शुरू हो जाती है ।
Q.7) Yadi koi hans dikshit sadhak Niyamnusar sumiran dhyan bhajan etc karta hai to dhyan me wo kis prakar ki chadhai karta hai mera matlab use praranbhik awastha me kya kya dikhta hai step by step bataye ?
- प्रत्येक व्यक्ति की पूर्व पात्रता अनुसार यह अलग अलग होता है । फ़िर भी अक्सर घूमता हुआ बङा सा
प्रकाश चक्र अधिकतर दिखाई देता है । इसके बाद हमारे यहाँ सूक्ष्म शरीर से यात्राओं के बजाय साधक को इससे अगले चरण कारण शरीर से जोङ देते हैं । इससे वह तेजी से मुक्त होता है । व्यर्थ के उलझाव और फ़ँसने से बच जाता है । कारण शरीर में वह अपने विभिन्न मनुष्य जन्म और संस्कार नष्ट होते हुये देखता है । इसके अतिरिक्त भी बहुत कुछ घटता है । जो थोङे शब्दों में नहीं बताया जा सकता ।
Q8). Hans diksha me As a Turist aadmi kitni sadhna karne par Man Chahe loko me Ghumne Phirne ka visa Prapt karta hai Jara Khul ke bataye ?
- साधना में जो ऊँचाई और स्थिति प्राप्त होगी । उतनी ही ऊँचाई तक और उससे नीचे के सभी स्थान ( लोक ) अपनी ( प्राप्त ) क्षमता अनुसार घूम सकता है । पूर्णत मुक्त हुआ पुरुष ही सर्वत्र गति करता आ जा सकता है । सन्तों योगियों के असंख्य स्तर बनते हैं । अतः आपके भाव अनुसार बता पाना सम्भव नहीं है । इसको मनुष्य जीवन से ही समझ सकते हैं । यहाँ भी समर्थ धनी पुरुषों का ( वो भी व्यक्तिगत जम्बो जेट से ) एक पैर यहाँ तो दूसरा धरती के दूसरे कोने पर होता है । वही योग में भी है । क्योंकि योग का मतलब ही धन से है ।
Kyoki dhyan karna waise hi bada boring hai ?
- यह  सिर्फ़ आप कह रहे हैं । ध्यान के अनुभवी ही जानते हैं । इससे ज्यादा आनन्ददायक कुछ भी नहीं है ।
Aur log to dhyan karna hi nahi chahte 
- सभी धर्मों में तमाम पूजा पँथ के ढकोसलों के बजाय आज जनसंख्या का बहुत बङा % किसी न किसी तरह के ध्यान से जुङा है । आप शायद कुँये में रहते हैं । इसलिये उससे अधिक नहीं सोच पाते । 
lekin agar koi turist type ka aadmi agar is yog ko karta hai to uske labh ya Tour Package ke bare me bata diya jaye to phir swabhavik hi us Tour package ko paane ke liye lalayit hoga hi na ?
- आपके ही शब्दों में टूर टूरिस्ट टूर पैकेज ये सब किसके काम हैं ? धनी लोगों के । वे अपनी क्षमता अनुसार टूर । टूर पैकेज आदि तय करते हैं । आपके पास जितना माल है । उतनी ही मौज होगी । ठीक यही बात योग में हुयी प्राप्ति के आधार पर तय हो सकती है । अब कोई गाँव का रामलाल हलवाई सिंगापुर टूर के सपने देखे । तो यह मूर्खता से अधिक नहीं है । सिर्फ़ लालायित होने से कुछ नहीं होता । जी तोङ मेहनत करनी होती है ।
Q9) As a tourist ( Hans diksh visa prapt ) Mai dhyan avastha me yaksh lok aur swarg lok ki apsaro ke darshan aur other benifit bhi lena chaunga kya wo milegi kyoki kundlini me to yahi sab hota hai to hans wale ko kya bhog karne ke liye koi mauka nahi milega wo kya sirf Mithai dekh kar lalchata hi rahega ki ye kesar barfi, wo gulab jamun etc.
- ज्ञान चाहे द्वैत ( कुण्डलिनी ) का हो । या अद्वैत का । ये सभी कुछ दोनों में जीवात्मा के संस्कार अनुसार आता है । हँस जब तक बृह्माण्ड की चोटी पार नहीं हो जाता । ऐसे बहुत से खेल तमाशे हैं । इतना ही नहीं । अद्वैत के योगियों के लिये देवी स्तर की दिव्यात्मायें भोग को प्राप्त होती है । लेकिन अद्वैत का विमान तेजी से उङता है । इसलिये जल्दी पार हो जाता है । द्वैत में भोग विलास ही अधिक है । अतः प्राप्त होने तक और उसके बाद भी ऐसे अवसर सदा बने रहते हैं । परन्तु ध्यान रहें । अवधि  पूरी होने पर द्वैत की कोई भी उपाधि सिर्फ़ और सिर्फ़ 84 में ही गिरेगी । इसलिये ज्ञानी इस तरफ़ आकर्षित नहीं होते । जहाँ तक भोग की बात है । अद्वैत के नौकर चाकर द्वैत के मन्त्रियों से अधिक ही वैभव वाले होते हैं । पर ये सब कठोर तप धैर्य  और कङी मेहनत से मिलता है । 
are bhai sabko forward kar doge to picture kab dikhaoge thoda enjoy ka bhi mauka is diksha wale ko milta hai ki sukha hi uper udta rahta hai ki tum yahi atak jaoge Uper bahut kuch hai lekin niche bhi to kuch kam Nahi to uska bhi sukh lene ki ktni chut is sadhna me hoti hai warna wahi bat hogi  aadhi chod sari ko dhave Na adhi khave Na sari Khav ?
- इसको एक लाइन में समझा जा सकता है । सभी कुछ संस्कार ( जीव के अन्दर पदार्थ ) पर निर्भर करता है । जो आपको अप्रिय लग रहा है । उसी में जीव का भारी हित होता  है ।
apke lekho me padha tha ki intersting lok me dhyan jane par guru waha andher kar deta hai yani adult philm suru hone ke baad editing kar dete ho to phir theatr me hi kyo ghusate ho sidhe satlok hi kyo nahi dikha dete agar rasta wahi hai to thoda enjoy bhi karne do bhai ? waise hi waha koi ja nahi pata aur jata hai to bhukhe hi phir kya maza ? Humko to koi phi mele yakshini, apsra, ya phir devi sundari ? aisa julm kyo karte ho aap log..........kamaal karte ho aap Rajeev Ji uttar jarur Jalebh Nahi banana Bura mat Manana lekin mujhe to aisi hi sadhna karna hi phir dhire dhire uper ke lok dekhenge Ha...ha.. Ha.....
- ऐसे अनुभव छोटे स्तर पर होते हैं । अधिक होने पर जीव भृमित हो सकता है । या और अधिक माया में फ़ँस सकता है । गुरु नियम अनुसार अपनी ड्यूटी निभाता है । ये ठीक वैसा ही है । आपरेशन थियेटर में आप डाक्टर से कहो - बार बार ऐसा ही नशे का इंजेक्शन लगाकर मुझे बेहोश रहने दो । यहाँ ठंडक में बङी अच्छी नींद आती है ।
Q10). Agar koi panter type ya Mere type ka aadmi ( Hans Diksha ) lekar khalas ho jata hai yani mar jata hai to uski bangdu wali adat to abhi chuti hi nahi uska dhyan to masala pane ke liye hi lalayit tha to phir us Bangdu ki kya gati hoti hai use koi divya lok me thoda stya karne ka mauka dete ho ya phir khali kanglaa aa gaya karke waha se sidhe manav bana dete hai ?
- वास्तव में ऐसी स्थिति होने पर इसके ठीक विपरीत होता है । उसकी पशु मानसिकता अनुसार हँस दीक्षा होने के बाद भी उसे दण्ड स्वरूप थोङे समय विभिन्न पशु योनियों में जाना होता है । जो आप चाह रहे हैं । वह मिलना तो बहुत दूर रहा । वैसे मैं इसको अपवाद ही मानता हूँ । क्योंकि प्रायः ऐसा होता नहीं है ।
सच्ची हँस दीक्षा उसी को प्राप्त होती है । जो पहले द्वैत में चलकर आया हो । या सन्त सेवा या पुण्य़ संचय किया पुण्य़ात्मा हो । आपके कहने का भाव ऐसा है । जैसे जाहिल मूर्ख गंवार को आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिल जाये । और ऐसा कभी नहीं होता । बल्कि पृष्ठभूमि के आधार पर होता है । और ऐसा व्यक्ति इस तरह का पागलपन नहीं करता ।
Agar thodi sadhana ki ho to wo kya waha icha anusar ek hi din sahi kuch time to gujare gujraat me kar sakta Hai kya ? ye jarur batana ?
- हँस दीक्षा की थोङी भी साधना होने पर प्रायः तुरन्त अगला मनुष्य जन्म ही प्राप्त होता है । 
Q11)  Rajeev Baba Ji aapke hi lekho me padh chuka tha ki Hans diksha wale Bhagwan Ya us se bhi Bade Post par Ja sakte hai Ye kaise ? Kya Bramha, Vishnu, Mahesh Ki post Bhi UPSC ( hans diksh ) Ke exam ki tarah hai  aur Jo isme achi Rank Lata Hai uski Posting IAS, IPS, IFS ya Bhagwan Jaise pado ko prapt kar lete hai ye kuch samj nahi paya tha thoda khul kar batye ki for the post of Bhagwan How to prepare in hans Diksha & when we will get the post of bhagwan ? kya phir Hame bhi unhi ke equal me vaise hi lok kisi aur sristhi me milnge usi power ke sath kripya bataye ?
- कुण्डलिनी के द्वैत योग में भी सायुज्य ( क्लोन ) सारूप्य ( इष्ट के समान रूप अधिकार ) सालोक्य ( उसी के समान लोक ऐश्वर्य की प्राप्ति ) सामीप्य ( इष्ट की निकटता ) ये चार प्रकार की मुक्ति या पद का विधान है । जाहिर है । द्वैत में भी भगवान पद प्राप्त करने का प्रावधान है । अन्यथा ये असंख्य विष्णु शंकर काल पुरुष आदि आते कहाँ से हैं ? फ़िर अद्वैत के पदों की तो बात ही अलग है ।
Taaki Bhai log Choti Moti IAS IPS IFS ki tayari ko chod kar aur President aur Pepsodent jaise Pad chod kar is or ki badi Padhai ki aur lalah se hi sahi Aa sake ?  Kyoki Hira ye Na kahe Lakh taka mero Mol ?
- IAS IPS आदि ही लोहे के चने चबाना है । तब फ़िर ये कितना कठिन होगा । अन्दाजा लगाया जा सकता है । बातें करना और बात है । जब करने की बात आती है । तब नानी याद आती है ।
Q12 ) Aapke lekh Mujhe Nind Na aaye Me padha tha ki Nind aapko nasib Nahi ye kya lafda hai rajeev ji aap chah kar bhi nahi so sakte kyo ki aapka dhyan nind me Jate hi kisi lok me pahuch jata hai Jaha aap logo ke Nange Sanskar dekh leto ho, Jaise koi vasnatmak aur bhi Mast raam wale sanskar phir aap un sanskaro ki bhi aisi taisi karke raat 3 baje prithvi par aate ho? Ye kya mazra hai jara publik ko khul kar samjaho ki unka software kaise delete karte ho
- किसी भी विशेष प्रशिक्षु साधक का यह सत्ता द्वारा आदेशित कर्तव्य होता है । जैसे सूर्य रोज निकलता है । और उसकी किरणें प्रकाश के साथ साथ गन्दगी पर भी पङती है । तब गन्दगी सूर्य ताप के साथ अवशोषित होकर नष्ट होने लगती है । यही नंगे संस्कार देखना और उनका नष्ट करना है ।
aur ye sab karke apko kya fayda milta hai aap hi ke blog sisya ki kasuti me bhi aapne ye hi kaha tha ? Ye Sanskar lok bhi Hota hai kya ?
- संस्कार लोक नहीं होता । वरन यह शिष्य की ( यथा ) व्यापक चेतना ( सूर्य प्रकाश ) के  साथ आदेशित जीवों के संस्कार जुङ कर नष्ट होते हैं । जैसे जूसर फ़ल का रस निकाल कर उसका अवशेष हटा देता है । उसी प्रकार संस्कारित  शिष्य के प्रति यह कसौटी साधक और प्रकृति ( साधक का आंतरिक शरीर । चेतना । विधुत आदि अन्य अंग ) के सौजन्य से शोधन प्रक्रिया होती है । साधक के स्तर अनुसार ही उसको फ़ायदा होता है । जैसे अब सृष्टि की कोई भी प्राप्ति । कोई भी पद मेरे लिये सिर्फ़ हँसी मजाक का विषय है । यह सव करना मेरे लिये कर्तव्य बोध है । और अन्तिम वासना शरीर के औपचारिक दायित्व भी । 
आगे और भी प्रश्न उत्तर हैं । कुछ इंतजार करें । साहेब साहेब ।

श्री महाराज जी दिल्ली में

आज जहाँ तमाम धर्मगुरु किसी भी साधारण जीव को जैसे जादू से (सिर्फ़ उनकी शिष्यता ग्रहण कर लेने पर ही) सीधे सतलोक पहुँचाने का दावा करते हैं तो कोई कोई वाणी के शब्द ‘सतनाम’ को ही महामन्त्र या कबीर साहब का ज्ञान या सन्तमत ज्ञान बताते हैं ।
कोई दावा कर रहा है, कबीर ने सिर्फ़ उसी को जीवों को मुक्त करने का अधिकार दिया है और कोई कह रहा है - परमात्मा का न रूप है न रंग है न आकार है फ़िर भी ? उसने परमात्मा को देखा है ? लेकिन मैंने ऐसी कोई बात कभी नहीं की । मैं श्री महाराज जी से सिर्फ़ 11 साल से जुङा हूँ और पहला शिष्य हूँ । इसी बीच सदगुरुदेव श्री महाराज जी ने कुछ हजार लोगों के ही अंतर में ज्ञानबीज (हंसदीक्षा) बोया, अंतर के प्रकाश से मिलाया । 
अगर तमाम गुरुओं से तुलना करें तो इसका 1% भी वो नहीं कर पाये ।
क्योंकि बुझे दीपक से कभी अन्य दीपक नहीं जलता । इसलिये आज जब जीव अज्ञानी, वेशधारी गुरुओं के फ़ैलाये भृमजाल से बुरी तरह दिग्भृमित है, यह उपलब्धि ठीक ही है ।
आपको आश्चर्य होगा लगभग 11 वर्ष के क्रियात्मक ज्ञान प्रसार में (हमारे यहाँ) सिर्फ़ 1 ही जीव पूर्णता या आवागमन से मुक्त या गर्भवास से छूटकारा या जन्म मरण के बन्धन से मुक्त हो पाया और इनका नाम है - श्री राकेश शर्मा ।
शिमला मूल के निवासी राकेश जी पेशे से मैंनेजर हैं और दिल्ली के ईस्ट आफ़ कैलाश में रहते हैं । राकेश जी को हमसे जुङे लगभग 1 ही वर्ष हुआ है कोई 1 वर्ष पहले ही नेट के द्वारा मुझसे सम्पर्क हुआ फ़िर फ़ोन पर मुझसे बात हुयी और राकेश जी हमारे चिंताहरण आश्रम पर आये । 
जो इनके साथ होना था वह गुरुकृपा से मैंने इन्हें आने से पूर्व ही फ़ोन पर बता दिया ।
श्री महाराज जी ने नियमानुसार इन्हें ‘हँसदीक्षा’ दी ।
फ़िर कुछ ही घण्टे बाद उन्होंने कहा - तुम परमहँस ज्ञान के अधिकारी हो ।
और अगली परमहँस दीक्षा कर दी और इसके कुछ ही समय बाद समाधि का ज्ञान कराया ।

अगर आप अभी तक सामान्य जीवन के प्राणी रहे हैं और आश्चर्यजनक अलौकिक बातें सिर्फ़ पत्र पत्रिकाओं और धार्मिक पुस्तकों में ही पढ़ते रहे हैं तो आप स्व संस्कार वश एक वर्गीय जीवन जीते रहे हैं । ये बात मैं क्यों कह रहा हूँ आपको आगे समझ में आ जायेगी ।
इत्तफ़ाकन अभी पिछले दिनों जितने भी लोग मेरे सम्पर्क में आये । उनमें विभिन्न छोटे बङे स्तरों पर अलौकिकता की पूर्वजन्म की चिंगारी दबी हुयी थी । उन्हें अजीब अजीब संकेत क्रियायें होती थी । दरअसल ये अचानक नहीं होने लगी । ये पूर्वजन्म के चले हुये योग यात्री थे जो अलग अलग दूरी तक मंजिल तय कर पाये थे और इसके बाद उनकी जीवन आयु पूरी हो गयी थी । 
इनके अनुभवों में किसी को सोते में या आँखे बन्द कर लेने पर तारों भरा आकाश दिखाई देना, किसी को मष्तिष्क में कोई सीटी, घण्टा, कोई अन्य ध्वनि आदि बारबार सुनाई देना, किसी को कोई विचित्र आकृति दिखाई देना या किसी को LCD जैसी स्क्रीन जैसा साफ़ कोई विचित्र रहस्यमय स्वपन दिखाई देना आदि थे ।
दरअसल राकेश जी भी ऐसे ही एक योग यात्री थे । ये बचपन से ही अचानक जमीन पर गिर पङते थे और इन्हें मस्तिष्क के अन्दर विभिन्न वाद्य (संगीत) यन्त्रों की ध्वनि अलग अलग सुनाई देती थी । और कभी कभी प्रकाशयुक्त गुफ़ा जैसी चीजें दिखाई देती थी और ये डर से लगभग बेहोश से हो जाते थे ।
कुछ समझ विकसित होने पर इन्होंने घर वालों को बताया कि - इन्हें क्या महसूस होता है ? 
तो उनके मानों होश ही उङ गये ।
और जैसा कि ऐसे केस में हमेशा ही होता है । घर वाले इन्हें झाङ फ़ूँक वालों के पास ले जाने लगे पर कोई भी फ़ायदा नहीं हुआ । 
उपचार की इसी प्रक्रिया के दौरान राकेश जी कृमशः एक ‘नाथयोगी’ के पास पहुँचे और उन्हें कुछ राहत मिली । तबसे इनकी योग क्रियायें नियन्त्रित हो उठी और ये कुछ कुछ समझने लगे । आनन्द सा आने लगा पर इनका योग ठहर गया ।
क्योंकि जहाँ तक का गुरु होता है वहीं तक का योग होता है ।
तब ये श्री महाराज जी के सम्पर्क में आये और 1 साल में ही ये परम सत्य को जान गये । श्री राकेश महाराज जी अब गुरु स्तर के आत्मज्ञानी हैं । जो महा-राज को अनुभूत तौर पर जान जाये । वास्तविक रूप में उसे ही ‘महाराज’ कहते हैं ।  
दिल्ली से अक्सर लोग मुझे फ़ोन करते रहते हैं कि - सदगुरुदेव श्री शिवानन्द महाराज जी दिल्ली कब आयेंगे ? 
ये लेख खास इसी सूचना को देने के लिये है । 
इसी रविवार 9 JUNE 2013 को श्री महाराज जी दिल्ली में होंगे ।
अतः मिलने के इच्छुक लोग श्री राकेश महाराज जी से फ़ोन पर सम्पर्क स्थापित कर समय लेकर उनसे मिल सकते हैं ।
श्री राकेश महाराज जी के फ़ोन नम्बर हैं । 
0 98183 12908 
0 84478 15644 

05 जून 2013

25 NOV 2013 से 4 JUNE 2013 तक

एक अंतर के साधु का जीवन तुलनात्मक एक दुनियावी व्यक्ति बहुत जुदा होता है । क्योंकि उसकी भूमियाँ बेहद विस्त्रत होती है । कार्यक्षेत्र बहुत अधिक होता है । अलौकिक दिव्य सम्बन्धों का दायरा लगभग असीमित होता है । और ये सृष्टि व्यवहार उसे निभाना ही होता है । तब जबकि ऊपर की लाइनें सिर्फ़ द्वैत के साधु के लिये कही गयी हों । तब भी एक अति व्यस्त व्यक्ति के तुलनात्मक यदि % द्वारा आंकलन किया जाये । तो यह लगभग 1% ( सामान्य दुनियाँ का अति व्यस्त व्यक्ति ) और 150% ( द्वैत का साधु ) के अनुपात में आयेगा । तब यदि साधु अद्वैत का हो । तो फ़िर उसकी भूमियों । कार्यक्षेत्र । कार्य । अद्वैत सम्बन्धों के बारे में मानवीय बुद्धि से आंकलन हरगिज नहीं किया जा सकता । फ़िर जो आनन्द जो रोमांच क्रियाओं में है । वह लिखने में कभी नहीं । अतः 

लिखना मेरे लिये सिर्फ़ अंतःप्रेरणा भर है कि मैं इसको लिख सकता हूँ । और इससे दूसरे बेहद लाभान्वित होंगे । एक और वजह भी है । जो मैं लिख सकता हूँ । वह सिर्फ़ मैं ही लिख सकता हूँ । अतः इसलिये भी लिखने की ( कभी कभी ) प्रबल इच्छा होने लगती है । मैंने कई बार स्पष्ट किया है । मेरे लिये एक व्यक्ति को चेताना सृष्टि के अन्य सभी कार्यों से बढकर है । क्योंकि वास्तव में हम सभी कार्य व्यवसायिक बुद्धि से ही करते हैं । फ़िर वह अद्वैत मोक्ष की परमात्म भक्ति ही क्यों न हो । आप कोई भी क्रिया ऐसी नहीं बता सकते । जिसके प्रतिक्रिया या फ़लस्वरूप आप अधिकाधिक और मनवांछित की इच्छा नहीं करते । अतः मैं कभी इस सिद्धांत को मानने को तैयार नहीं कि ( सिर्फ़ ) परमार्थ के कारने साधुन धरा शरीर । बहुत कम लोग जानते होंगे । 1 जीव को ( आत्मज्ञान हेतु ) चेताने का फ़ल जो होता है । वह सृष्टि के सभी कार्यों से मानदेय में सबसे ऊँचा है । अतः मैं तमाम कार्यों में से इसी को प्राथमिकता देता हूँ ।

मेरे कहने का आशय है । इस तरह अद्वैत के साधु का जीवन उन जगहों उन क्रियाओं से सयुंक्त रहता है । जिनके बारे में सिर्फ़ कल्पना ही की जा सकती है । यदि सिर्फ़ 25 NOV 2013 से आज 4 JUNE 2013 तक की अपनी डायरी ही लिखूँ । तो शायद वह असंभव होगी । क्योंकि इसके लिये अरब खरब शब्दों की आवश्यकता होगी । फ़िर भी स्मृति के आधार पर प्रमुख रोचक और अलौकिक घटनाओं को बताने की कोशिश करूँगा ।
इसी बीच बहुत से लोगों ने जिज्ञासा प्रश्न किये । जिनमें शायद तानसेन कुमार का पेज मेरे कम्प्यूटर में मौजूद है । उनके उत्तर मैंने लिखना भी शुरू कर दिया है । I.T.O  में कार्यरत हमारे एक शिष्य ने मेरे साथ फ़ोन पर बातचीत की रिकार्डिंग की है । जो अलग अलग आध्यात्म विषय पर लगभग 17 घन्टे की है । ये आडियो बातचीत आपको आजकल में ब्लाग पर ही उपलब्ध हो जायेगी ।

श्री महाराज जी का मैं पहला शिष्य हूँ । इसके बाद कुछ हजार शिष्य बने । लेकिन इन सभी में ( बहुत बाद में बने ) शीर्ष पर पहुँचे । दिल्ली के मैंनेजर राकेश शर्मा जी । ये गुरु स्तर पर पहुँच गये । मतलब इनमें दैवीय समस्याओं । आंतरिक यात्रायें ( अन्य को कराने की ) । दिव्य प्रकाश दिखाने । ध्यान जोङने आदि आदि अलौकिक विषयों की पूर्ण क्षमता है । अतः दिल्ली के आसपास के सहज योग सीखने के इच्छुक इनसे फ़ोन पर समय लेकर मिल सकते हैं । इनके फ़ोन नम्बर हैं - 098183 12908 और दूसरा 084478 15644 श्री राकेश जी के योग सफ़र पर एक पूरा लेख भी लिखूँगा । आश्रम आदि के बारे में जानकारी और अध्यात्म से जुङे प्रश्न भी इनसे पूछे जा सकते हैं ।
25 NOV 2013 से 4 JUNE 2013 तक मैंने कई जीवों को चेताया है । इनमें कम्प्यूटर इंजीनियर साहिल तिवारी भी हैं । 24 वर्षीय साहिल वैश्विक और खगोलीय स्तर पर बारीक बिन्दुओं के अच्छे जानकार हैं । मुझसे मिलने से पहले यह सर्व व्यापी बीमारी बिज्ञान मेनिया से प्रभावित उसके प्रबल समर्थक थे । अब यह गहन चिंतन में लगे उस एक एक सूत्र को समझने का प्रयास कर रहे हैं । जो मैंने इन्हें 15 दिन आश्रम में सिखाये थे ।
प्रेत जगत या अलौकिक कहानियों के शौकीन पाठकों के लिये भी कुछ लिखना चाहता हूँ । संभवतया जल्दी ही लिखूँगा । और ये प्रसून का ( अब तक प्रकाशित के अनुसार ) सबसे बङा कारनामा होगा । दूसरे " कामवासना " की तरह मेरी आगामी हर कहानी में मानवीय संवेदनाओं का प्रवल पक्ष भी मौजूद होगा । ओमियो तारा को लेकर भी बहुत पाठकों में बैचैनी है । यदि कुछ स्थिर रहा । तो इसको भी पूरा करूँगा ।
बस एक ही बङा व्यवधान हो सकता है । कोई पात्र या अधिकारी जीव आ जाने पर मैं सभी महत्वपूर्ण कार्य छोङ देता हूँ । बात वही है । इसके प्रतिफ़ल में जो भुगतान मुझे प्राप्त होता है । वह स्वर्ग के राजा इन्द्र के लिये भी ईर्ष्या का विषय हो सकता है ।
इसके अतिरिक्त आध्यात्म के बारीक पहलुओं के लेखन पर भी जोर होगा । मैं अपने कुछ सहयोगी भी तैयार कर रहा हूँ । ऐसा होने पर मुझे अधिक कार्य करने में सुगमता होगी । आज इतना ही ।
सबके अन्दर विराजमान सर्वपूज्य शाश्वत आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।

03 जून 2013

ये ही मिस्टर परमात्मा है ?

Mukesh Sharma ने आपकी पोस्ट  " अब आजकल के साधु कैसे होते हैं ? " पर 1 टिप्पणी छोड़ी है: 
गुरूजी आपको मेरा शत शत प्रणाम । आपने मेरे द्वारा पूर्व में पूछे गए सभी प्रश्नों के उत्तर आश्रम कार्यो की व्यस्तता के बावजूद बड़े प्रेम से दिए हैं । जिनसे में पूर्ण रूप से संतुष्ट हूँ । गुरुजी आपको इसके लिए साधूवाद देता हूँ । अतएव गुरूजी मैं पुनः आपकी सेवा में उपस्थित हूँ । कुछ प्रश्नों के उत्तर और देकर आप मेरी जिज्ञासा शांत कीजिये । 
1 हम जीवधारी इस दुनिया में क्यों आये है । मुझे पता नहीं । परन्तु हम इस दुनिया में रहकर जो भी कार्य करते हैं । वो एक अनुभूति के लिए करते हैं । चाहे वो अनुभूति ख़ुशी की हो । अहंकार की हो । अथवा स्वार्थ या ईर्ष्या को संतुष्ट करने की । और ज्ञानी लोग कहते हैं कि हमारा अंतिम और प्रथम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति का होता है ? मोक्ष प्राप्ति क्या है ? या क्यों प्राप्त करना चाहिए ? सिर्फ एक अलौकिक अनु्भूति के लिए या कुछ और भी है ।
- बहुत ही कम शब्दों में कहा जाये । तो मोक्ष का अर्थ कर्म और कर्मफ़ल की विवशता रूपी जंजीरों से छुटकारा हो जाना है । आवागमन यानी जन्म मरण के चक्कर से मुक्त हो जाना है । यहाँ थोङा समझना आवश्यक है । बहुधा लोग इस तरह के मोक्ष का अर्थ ये लगा लेते हैं । कोई ऐसी कल्पित जगह जो स्वर्ग या परमात्मा का लोक है । जहाँ सब प्रकार के सुख ही सुख हैं । और दुख कुछ भी नहीं । ये एकदम गलत

ही है । वास्तविकता ये है कि मुक्त आत्मायें भी इच्छानुसार शरीर धारण करती हैं । पर उसमें किसी प्रकार की भोग विवशता नहीं होती । मुक्त आत्मा को शरीर धारण करने के लिये गर्भवास में नहीं जाना होता । वह स्व संकल्प से प्रकट होते हैं । परवश जीव स्ववश भगवन्ता । जीव अनेक एक श्रीकन्ता । मोह का सर्वदा के लिये क्षय हो जाना ही मोक्ष है । मोह सकल व्याधि कर मूला । जाते पुन उपजत भवशूला । एक महत्वपूर्ण बात और भी है । कोई भी जीवात्मा करोङों जन्म क्यों न भटकता रहे । जब तक मोक्ष रूपी ज्ञान को प्राप्त नहीं होगा । तब तक उसे सुख शान्ति नहीं मिल सकती ।
2 ज्योतिष ( जन्म कुण्डली ) के बारे में आपके क्या विचार है । 
- ज्योतिष ग्रह नक्षत्र पर आधारित एक सिद्ध और प्रमाणित विज्ञान है । लेकिन इसकी काल गणना और सिद्ध आंतरिकता का बेहद उच्च स्तरीय तरीका है । जो इसे बहुत कुछ आंतरिक साधना से जोङता है । न कि सिर्फ़ गणित के आधार पर ग्रह नक्षत्रों की स्थिति के आधार पर फ़ालादेश बताना । मेरे कहने का मतलब है । एक ज्योतिषी जब किसी जातक के बारे में कोई बात बताता है । तो वह अदृश्य आंतरिक स्तर पर भी अपनी साधना 

के अनुसार सम्पर्क स्थापित कर सटीक फ़लादेश बता पाता है । लेकिन ( इतने पर भी ) फ़िर भी यह 80% ही बता सकता है । अपवाद स्वरूप यदि विधि ( संस्कार ) विपरीत हो । और फ़लादेश शुभ आ रहा हो । तो विधि का पलङा ही भारी रहेगा । उदाहरण - फ़लादेश में राम का राजतिलक था । और विधि के अनुसार उन्हें कठोर वनवास हुआ ।
3 मनुष्य को पूर्वजन्म की बातें कैसे याद रहती हैं । यादों का संग्रह तो दिमाग में होता है । और मरने के पश्चात तो दिमाग के साथ साथ मनुष्य का पूरा भौतिक शरीर नष्ट हो जाता है । तो यादें कहाँ संगृहीत रहती है । 
- अंतकरण जो मन बुद्धि चित्त अहम इन चार पार्टस का ( संयुक्त ) कम्प्यूटर की हार्डडिस्क की तरह एक उपकरण होता है । इसी को दूसरे नम्बर का सूक्ष्म शरीर भी कहा जाता है । किसी भी योग क्रिया में । मृत्यु के बाद । या कोई दूसरा शरीर धारण करना । परकाया प्रवेश । या फ़िर प्रेत योनि प्राप्त होने पर यही शरीर रहता है । मैं कई बार बता चुका हूँ । यह अदृश्य अवश्य होता है । पर सूक्ष्म शरीर के देहधारी को खुद का बिलकुल स्थूल शरीरी होने जैसा ही भान होता है । इस शरीर का भोजन मुख्यतयाः भोजम आदि से निकलमे वाली गन्ध जैसे सूक्ष्म पदार्थ होते हैं । जीवित शरीर होने की दशा में यह प्राणी द्वारा खाये हुये भोजन का निर्धारित सार अंश ग्रहण करता है । जब मनुष्य का भौतिक शरीर जल जाता है । तब यही बाहर चला जाता है । मतलब मृत्यु होते ही यह निकल जाता है । इसमें सिर्फ़ 1 पूर्व जन्म का ही नहीं अनेकों जन्मों का डाटा जमा होता है । मुक्त होने के बाद यह शरीर हमेशा के लिये छूट जाता है ।
4 टेलीपैथी का उपयोग प्राचीन काल में बड़े बङे योगी महात्मा करते थे । क्या आज के समय में भी कोई इसका उपयोग कर सकता है । 
- टैलीपैथी कोई बहुत बङा बिज्ञान नहीं है । अतः यह कहना गलत है कि प्राचीनकाल में बङे बङे ? योगी महात्मा इसका उपयोग किया करते थे । संसार या सृष्टि में हरेक ज्ञान समय परिस्थिति के अनुसार कम या अधिक % में सदैव रहा है । बस फ़र्क इतना है कि हम अपने जैसे लोगों के व्रर्ग में रहते हैं । अतः प्रायः इन बातों को किस्से कहानियों से अधिक नहीं जान पाते । आपको किसी बङे महात्मा की तलाश की आवश्यकता नहीं । मैं कुछ सरल तरीकों से ही इसे आपको सिखा दूँगा ।
5 मेरे दादाजी ने संसार की मोह माया त्याग दी थी । और हमेशा ध्यान में लीन रहते थे । परन्तु मेरे पिता को शुरू में ये सब पसंद नहीं था । और वो बहुत महत्वाकांक्षी है । परन्तु वो अब भगवान की सुबह शाम पूजा करते है । मेरा सवाल है कि जब मैं अध्यात्म की किसी भी सामग्री का अध्ययन करता हूँ । तो मुझे समझने के लिए सामान्य लोगों की तुलना में ज्यादा प्रयास नहीं करना पड़ता । मुझे एक ही रीडिंग में समझ आती है । और समझने के साथ साथ अनुभव भी करता हूँ । और साथ साथ भौतिक जगत में मेरी महत्वकांक्षा भी बहुत ज्यादा है । तो क्या ये गुण मुझे अनुवांशिक तौर पर मिले हैं । और मेरे पुर्वजों को भी अनुवांशिकी तौर पर मिले हों । या ये गुण वातावरण से मेरे पूर्वजों ने प्राप्त किये हैं । और मुझे अनुवांशिकी तौर पर मिले हों । क्योंकि मेरे घर में अब अध्यात्म का कोई माहौल नहीं हैं । वैसे बृह्मांड का सारा ज्ञान मनुष्य में समाहित होता है । पर मैं आपके विचार जानना चाहता हूँ ।
- ये गुण आपको आनुवांशिक तौर पर नहीं मिले । वरन पूर्व जन्म के संस्कार वश मिले हैं । इसको सरलता से समझने के लिये ये जानिये कि आदि सृष्टि के समय से ही अभी तक आप सत ( साधुता या ऊर्जा ) रज ( क्रियाशीलता ) और तम ( अज्ञान या दुष्टता समान राक्षसी ) गुणों से अनेकानेक शरीरों द्वारा विभिन्न जीवन खेल खेलते रहे हैं हैं । इसमें गुणों से अगले जीवन पदार्थ का निर्माण होता है । तब यदि पूर्व जन्म में सत गुण की अधिकता रही हो । और कृमशः ( 84 लाख योनियों को भोगने के बाद ) प्राप्त आगामी जमीन में यदि सात्विक भूमि ही प्राप्त हो । तब कुल पदार्थ के % के अनुसार भक्ति भाव की अधिकता रहती है । मैं यह मौटे तौर पर ही बता रहा हूँ । सूक्ष्मता के स्तर पर बात बेहद जटिल होती है । यह बात सही है कि बृह्माण्ड का सारा ज्ञान मनुष्य के अन्दर समाहित होता है । पर कितने लोग हैं ? जो अपने ही अन्दर के इस ज्ञान से जुङ पाते हैं । जान पाते हैं । उदाहरण के लिये प्रथ्वी पर ही अनेकों स्थान पदार्थ ज्ञान विभिन्नतायें आदि बहुत सी अन्य चीजें बहुलता से मौजूद हैं । पर कितने लोग इन सबको जान पाते हैं । अनुभव आदि कर पाते हैं । अतः ये इतना सरल नहीं हैं ।
6 क्या आत्मज्ञान और बृह्मांड के सम्पूर्ण ज्ञान और भूत भविष्य का ज्ञान रखने वाला कोई महान योगी आज भी उपस्थित है । या सम्पूर्ण ज्ञान महाभारत के युद्ध के बाद ख़त्म हो गया । क्या हिमालयों में तपस्या करने वाले और सम्पूर्ण ज्ञान को रखने वाले महान योगी आज भी है ? और महाभारत का योद्धा अश्वत्थामा आज भी है ? 
- आपको आश्चर्य होगा । महाभारत के युद्ध के समय बृह्माण्ड का सम्पूर्ण ज्ञान या आत्मज्ञान ( आपके प्रश्न भाव के अनुसार ) रखने वाला कोई महान योगी नहीं था । स्वयं श्रीकृष्ण भी नहीं । हाँ महाभारत युद्ध के दौरान स्वयं श्रीकृष्ण ( को निमित्त बनाकर ) पर जो आत्मदेव द्वारा ज्ञान उतरा था । वह आत्मज्ञान की झलक अवश्य था । बाकी महाभारत के बहुत बाद एक से एक दिग्गज शक्तियाँ  समय समय पर अपना प्रभाव दिखाती रही हैं । लेकिन उन सबको एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता । उनके स्तर अलग अलग थे । आपको एक और आश्चर्य होगा कि इस समय प्रथ्वी पर विभिन्न मनुष्यों को आवेशित कर सभी दिग्गज शक्तियां अपना कार्य कर रही हैं । क्योंकि ये सनातन धर्म की पुनर्स्थापना का अदभुत समय है । द्वैत अद्वैत के विभिन्न स्तरों के अच्छे योगी हमेशा से रहे हैं । पर वो टीवी पर नहीं । गुप्त  एकान्त स्थानों पर मिलते हैं । वो प्रवचन नहीं देते । बल्कि योग सूत्र बताते हैं । पर ऐसी महान दुर्लभ हस्तियों से मिलना अति भाग्य वालों को नसीब होता है । जिन्होंने पूर्व जन्म में इस हेतु पुण्य संचय किया हो ।
7 क्या सब कुछ पूर्व लिखित होता है । या ( हरेक संभव बृह्मांड की रचना होती है ) अर्थात हर एक जीव हर संभव रूप में होता है । जैसा कि कागभुसण्डि कहते हैं कि मैं अलग अलग बृह्मांड देख रहा हूँ । उनमें सभी के अलग अलग रूप हैं । और यही बात भौतिक विज्ञानं की शाखा क्वांटम भौतिकी ​​ कहती है कि हर एक कण अपने हर संभव पथ में गमन गमन करता चाहे । वो अति सूक्ष्म कण हो । या वृहद अर्थात हरेक संभव बृह्मांड की समान्तर रूप से रचना होती जाती है । इस बिंदु को शायद मैं पूर्ण रूप से समझा नहीं पा रहा हूँ । उसके लिए मुझे और शब्दों की आवश्यकता होगी । और बिंदु बड़ा हो जायेगा । आप अपनी समझ के अनुसार उत्तर दे दीजये ।
- आपके इस प्रश्न के उत्तर के लिये विस्त्रत वर्णन की आवश्यकता है । वैसे कहीं न कहीं मेरे लेखों में ये उत्तर आपको प्राप्त हो जायेगा । न होने पर फ़िर से पूछ लेना ।
8 बाबा रामदेव योग के क्षेत्र में कहाँ  तक उपलब्धि रखते हैं । 
- रामदेव कुछ योगासन । और 3-4 योग क्रियायें । इससे ज्यादा नहीं जानते । पतंजलि के मुख्य ज्ञान से बाबा रामदेव का दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है । धारणा ध्यान समाधि किस चिङिया का नाम है ? रामदेव को सपने में भी नहीं पता । रामदेव के नाम के साथ योगाचार्य ? शब्द का प्रयोग भी गलत है । उन्हें योगासन शिक्षक निसंदेह कहा जा सकता है ।
9 क्या धर्म ग्रंथों का परमात्मा और विज्ञानं का ब्लैक होल एक ही है । क्योंकि यदि धर्म और विज्ञानं के ज्ञान जोड़कर देखा जाये । तो दोनों एक ही बात कहते हैं कि इसका न कोई रूप है । न आकार । न ही कोई रंग । गीता में श्रीकृष्ण भगवान कहते हैं कि सभी मुझ में से उत्पन्न  होते हैं । और मुझ ही में समाहित होते हैं । यही थ्योरी ब्लैक होल की भी है ।
- ब्लैक होल और परमात्मा का आपस में दूर दूर तक कोई मेल नहीं हैं । ब्लैक होल अंतरिक्ष में स्थित है । और परमात्मा सबसे परे । वह शाश्वत है । और तब भी था । जब कहीं कुछ नहीं था । बाकी ये बेबकूफ़ ही कहते  हैं कि परमात्मा का न कोई रूप है । न रंग है । न आकार है । नाम रूप दोऊ अकथ कहानी । समझत सुखद न जात बखानी । वास्तव में ( आज या आदि सृष्टि के बाद से ) परमात्मा सगुण साकार और निर्गुण निराकार दोनों ही है । यहाँ बेहद सोचने वाली बात है । जिसका कोई रूप रंग आकार आदि कुछ भी नहीं है । फ़िर किस चीज  को उन्होंने परमात्मा बताया । या कैसे निश्चित किया कि - ये ही मिस्टर परमात्मा है ? या फ़िर साक्षात्कार आदि भक्ति क्रियाओं में क्या प्रत्यक्ष होता है ? अधिकतर व्यवसायिक साधुओं की मानसिकता इस तरह की है । झूठा से झूठा मिला । हाँ जी हाँ जी होय । कान में कर दी कुर्र । तुम चेला हम गुर्र ।
गुरुजी शब्दों के इस्तेमाल में मुझसे जल्दी जल्दी में जो गलती हुई है । क्षमा करें ।
mukesh sharma ,alwar 
प्रणाम गरु देव !  आपने कहा - प्रहलाद का नाम अवश्य सुना होगा । अपनी भक्ति के चलते इन दोनों को ही देवराज इन्द्र का पद और स्वर्ग लोक प्राप्त हुआ था । जिसमें अभी तक इन्द्र पद पर प्रहलाद था । अब उसका कार्यकाल समाप्त हो रहा है । उसे नीचे फ़ेंक दिया जायेगा । और उसकी जगह नया इन्द्र ध्रुव बनेगा । बस इस कार्य हेतु कार्यवाही जारी है । प्रथ्वी से जाने के बाद इतना समय ध्रुव ने दिव्य लोकों में ऐश्वर्य भोगते हुये गुजारा । आप इनके प्रथ्वी पर होने के कालखण्ड से अभी तक की समय गणना करते हुये अलौकिक रहस्यों के नये ज्ञान से परिचित हो सकते हैं । गंगा 1 महीने से कुछ ही पहले प्रथ्वी पर अपना शाप और उतरने के अन्य उद्देश्य पूरा कर वापस चली गयी 
1 कृपया आप अपनी बात को विस्तार से समझायें । गंगा तो अभी भी बह रही है । 
- जैसे बहुत से राजाओं के राजमहल आज खण्डहर ( अवशेष ) के रूप में मौजूद हैं । पर वह राजा और उनका वैभवशाली राज्य समाप्त हो गया । तो उसका प्रभाव भी समाप्त हो गया । ताजा उदाहरण सद्दाम हुसैन का है । इसी उदाहरण से आप गंगा की बात समझ सकते हैं । गंगा में आज गंगा जैसा कुछ नहीं है । क्योंकि उसका कार्यकाल समाप्त हो चुका है । अब वह सिर्फ़ साधारण नदी का बहता पानी है । उसकी यौगिक शक्ति समाप्त हो चुकी है ।
2 आप कहते हैं कि शरीर छोड़ने के बाद यदि हमने योग की से महत्वपूर्ण अवस्था प्राप्त की है । तो हमें भोग के लिए हमें अप्सराए और अनेक पदार्थ मिलेंगे । मैं पूछना चाहता हूँ कि भौतिक शरीर के नष्ट होने के पश्चात उनका उपभोग कौन करता है ।
- जैसा कि मैंने ऊपर बताया कि अंतकरण रूपी सूक्ष्म शरीर पर ( मुक्त होने तक ) स्थिति अनुसार अनेक शरीर ( का आवरण ) पहनाये जाते हैं । आपने देव । सिद्ध । भगवान आदि जो भी पद ( स्थिति ) प्राप्त किया । वही शरीर सूक्ष्म शरीर के ढांचे पर पहना दिया जाता है । उदाहरण के लिये कोई व्यक्ति अपने पुण्य धर्म अनुसार देवता बनता है । तो शरीर छूटने के बाद मानसरोवर में उसको स्नान कराया जाता है । वही पर उसका शेष कलुषित आवरण धुल जाता है । और वह डुबकी के बाद ऊपर आता है । तो अपने नये दिव्य शरीर में जगमगा रहा होता है । प्राप्त स्थिति अनुसार यही भोग करता है ।
3 निर्मल बाबा के बारे में आपके क्या विचार है । ये कोई ठग है । आत्म प्रेरित है । या तत्व ज्ञानी । 
- मैंने नेट पर ही एक बहुत अच्छी कहावत देखी थी । जब तक मूर्ख अच्छी संख्या में मौजूद है । चतुर व्यक्ति बिना परिश्रम के मौज करता है । इसकी तो बात छोङो । मैं बहुत से प्रसिद्ध अन्य के बारे में बता रहा हूँ - ठगियन ने बात बिगाङी । धर वेश ठगे नर नारी ।
4 एक बार तत्व ज्ञान और आत्म ज्ञान और इससे सम्बंधित अन्य ज्ञान के बारे में विस्तार से बताईये ।
- इसको एक ही जगह एक ही बार में विस्तार से बता पाना सम्भव नहीं । लेकिन मैं अपने जीवनकाल में अनुभवजन्य वह रहस्य बताने की कोशिश करूँगा । जो इससे पहले ( उपलब्ध जानकारी में ) कोई भी न बता पाया हो । उस तरीके से बताऊँगा । जो कोई भी न बता पाया हो । और ऐसा अभी भी है । यदि आप फ़र्क कर सकें । और तुलनात्मक नजरिये से देखें तब ।
m.k sharma

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