04 जनवरी 2011

क्योंकि तुम्हारे शरीर को तो ऊर्जा को पैदा करना पड़ता है

कामवासना पकड़े । तब क्या करें ? ओशो - जब कामवासना पकड़े । तब डरो मत । शांत होकर बैठ जाओ । जोर से श्वांस को बाहर फेंको । उच्छवास । भीतर मत लो श्वास को । क्योंकि जैसे भी तुम भीतर गहरी श्वास को लोगे । भीतर जाती श्वास काम ऊर्जा को नीचे की तरफ धकाती है । जब तुम्हें कामवासना पकड़े । तब एक्सहेल करो । बाहर फेंको श्वास को । नाभि को भीतर खींचो । पेट को भीतर लो । और श्वास को बाहर फेंको । जितनी फेंक सको । धीरे धीरे अभ्यास होने पर तुम संपूर्ण रूप से श्वास को बाहर फेंकने में सफल हो जाओगे । जब सारी श्वास बाहर फिंक जाती है । तो तुम्हारा पेट और नाभि वैक्यूम हो जाते हैं । शून्य हो जाते हैं । और जहां कहीं शून्य हो जाता है । वहां आसपास की ऊर्जा शून्य की तरफ प्रवाहित होने लगती है । शून्य खींचता है । क्योंकि प्रकृति शून्य को बर्दाश्त नहीं करती । शून्य को भरती हैं । तुम नदी से पानी भर लेते हो घड़े में । तुमने घड़ा भरकर उठाया नहीं कि गङ्ढा हो जाता है । पानी में घड़े से । तुमने पानी भर लिया । उतना गङ्ढा हो गया । चारों तरफ से पानी दौड़कर उस गङ्ढे को भर देता है ।
तुम्हारी नाभि के पास शून्य हो जाए । तो मूलाधार से ऊर्जा तत्क्षण नाभि की तरफ उठ जाती है । और तुम्हें बड़ा रस मिलेगा । जब तुम पहली दफा अनुभव करोगे कि 1 गहन ऊर्जा बाण की तरह आकर नाभि में उठ गई । तुम पाओगे । सारा तन 1 गहन स्वास्थ्य से भर गया । एक ताजगी । यह ताजगी वैसी ही होगी । ठीक वैसा ही अनुभव तुम्हें होगा ताजगी का । जैसा संभोग के बाद उदासी का होता है ।
इसलिए जो लोग भी मूलाधार से शक्ति को सक्रिय कर लेते हैं । उनकी नींद कम हो जाती है । जरूरत नहीं रह

जाती है । वे थोड़े घंटे सोकर भी ही ताजे हो जाते हैं । फिर तो 2 घंटे सोकर उतने ही ताजे हो जाते हो । जितने तुम 8 घंटे सोकर नहीं हो पाते । क्योंकि तुम्हारे शरीर को तो ऊर्जा को पैदा करना पड़ता । निर्मित करना पड़ता है । भरना पड़ता है । और बड़ा पागलपन है । रोज शरीर भरता है । रोज तुम उसे उलीचते हो । यूं ही उम्र तमाम होती है । रोज भोजन लो । शरीर को ऊर्जा से भरो । फिर उसे उलीचो । और फेंक दो । ऊर्जा का ऊर्ध्व गमन बड़ा अनूठा अनुभव है । और पहला अनुभव होता है । मूलाधार से नाभि की तरफ जब संक्रमण होता है । यह मूलबंध ही सहजतम प्रक्रिया है । कि तुम श्वास को बाहर फेंक दो । नाभि शून्य हो जाएगी । ऊर्जा उठेगी नाभि की तरफ । मूलबंध का द्वार अपने आप बंद हो जाएगा । वह द्वार खुलता है - ऊर्जा के धक्के से । जब ऊर्जा मूलाधार में नहीं रह जाती । धक्का नहीं पड़ता । द्वार बंद हो जाता है ।
मूल बांधि सर गगन समाना - बस । तुमने अगर 1 बात सीख ली कि ऊर्जा कैसे नाभि तक आ जाए । शेष तुम्हें चिंता नहीं करनी है । तुम ऊर्जा को, जब भी कामवासना उठे । नाभि में इकट्ठा करते जाओ । जैसे जैसे ऊर्जा बढ़ेगी नाभि में । अपने आप ऊपर की तरफ उठने लगेगी । जैसे बर्तन में पानी बढ़ता जाए । तो पानी की तरह ऊपर उठती जाए । असली बात मूलाधार का बंद हो जाना है । घड़े के नीचे का छेद बंद हो गया । अब ऊर्जा इकट्ठा होती जाएगी । घड़ा अपने आप भरता जाएगा । ओशो ।
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मनुष्य हजारों वर्षों से इस तरह सोचता रहा है कि आदमी का शरीर अलग है । और आदमी की आत्मा अलग है । इस चिंतन के 2 खतरनाक परिणाम हुए । एक परिणाम तो यह हुआ कि कुछ लोगों ने आत्मा को ही मनुष्य मान लिया । शरीर की उपेक्षा कर दी । जिन कौमों ने ऐसा किया । उन्होंने ध्यान का तो विकास किया । लेकिन औषधि का विकास नहीं किया । वे औषधि का विज्ञान न बना सके । शरीर की उपेक्षा कर दी गई । ठीक इसके विपरीत कुछ कौमों ने आदमी को शरीर ही मान लिया । और उसकी आत्मा को इनकार कर दिया । उन्होंने मेडिसिन और औषधि का तो बहुत विकास किया । लेकिन ध्यान के संबंध में उनकी कोई गति न हो पाई । जबकि आदमी दोनों है 1 साथ । कह रहा हूं कि भाषा में थोड़ी भूल हो रही है । जब हम कहते हैं - दोनों है 1 साथ । तो ऐसा भ्रम पैदा होता है कि 2 चीजें हैं । जुड़ी हुई । नहीं । असल में आदमी का शरीर और आदमी की आत्मा 1 ही चीज के 2 छोर हैं । अगर ठीक से कहें । तो हम यह नहीं कह सकते कि बाडी + सोल । ऐसा आदमी है । ऐसा नहीं है । आदमी साइकोसोमेटिक है । या सोमेटोसाइकिक है । आदमी मनस शरीर है । या शरीर - मनस है ।
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ऐसी आग भी होती है । जो औरों को नहीं जलाती है । पर अपनी परिधि में रुकी । अपनी मर्यादा में बधी दिप दिप जलती है । हमें राख की शांति नहीं चाहिए । ऐसी आग भी होती । जो चिटकती नहीं । शोर नहीं मचाती । अपनी गरिमा से पुष्ट । अपनी शक्ति से संतुष्ट । अनवरत शांत मगन दहकती है । हमें राख की शांति नहीं चाहिए । ओशो
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जिस सत्य पर विश्वास किया जाता है । वह झूठ है - ओशो ।
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अष्‍टावक्र ने बड़ी कठिन परीक्षा ली । और जनक जैसे अभी अभी पैदा हुए आत्मज्ञानी की । अभी अभी जन्म हुआ । अभी अभी प्रकाश की किरण उतरी । अभी सम्हल भी नहीं पाये जनक । अभी आश्चर्य की तरंगें उठी जा रही हैं । अभी भरोसा भी नहीं बैठा कि जो हो गया है । वह हो भी गया । भरोसा बैठने में थोड़ा समय लगता है । जितनी बड़ी घटना हो । जितनी अज्ञात घटना हो । उतना ही ज्यादा समय लगता है । अभी तो गदगद हैं जनक । हृदय में नयी नयी तरंगें उठ रही हैं । जो हुआ है । वह हो भी सकता है । इस पर भरोसा नहीं आ रहा है । जो हुआ है । वह मुझे हो सकता है । इस पर तो और भी भरोसा नहीं आ रहा । जो हुआ है । वह इतने तत्‍क्षण हो सकता है । इस पर कैसे भरोसा आये ?
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कभी दिमाग कभी दिल कभी नज़र में रहो ।
ये सब तुम्हारे ही घर है किसी भी घर में रहो ।
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पंच तत्व का बना पिंजरा । जिसमें रहती मैना । खोज करो काया माहि रे साधो भाई । पाखंड में कुछ भी नहीं । कितने ही राम राम कर लेना । कुछ भी नही होगा । ये तो सब ऊपर ऊपर ही है । दिखावा है - अतीत का ।
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खुसरो दरिया प्रेम का जो । उलटी वा की धार ।
जो उबरा सो डूब गया । जो डूबा सो पार ।
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बस तुमसे 1 घंटा मांगता हूँ । और 24 घंटे मेँ तुम 1 घंटा न दे सको । इतने दीन तो नहीँ । इतना दीन तो कोई भी नहीँ । और मैँ नहीँ कहता कि मंदिर मेँ जाओ । और मैँ नहीँ कहता कि मस्जिद की फिकर करो । क्योँ कि मेरी दृष्टि यह है कि मंदिर और मस्जिद, गिरजे और गुरूद्वारे घातक सिद्ध हुए हैँ । इन्होँने यह ख्याल पैदा किया कि भगवान तुम्हारे घर मेँ नहीँ हैँ । मैँ तुमसे कहता हूँ । तुम जहाँ हो । वहाँ भगवान हैँ । इसलिए तुम जहाँ बैठ गये । वहीँ तीर्थ हो गया । बस जरा मौन बैठ जाओ । शांत बैठ जाओ । थोड़ी देर सबेर लगे । तो घबराना मत ।
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The less people know, the more stubbornly they know it  -  Osho.
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Love Is Dangerous, Sex Is Not Dangerous - People who are afraid of love are not afraid of sex. Love is dangerous; sex is not dangerous, it can be manipulated. There are now many manuals on how to do it. You can manipulate it – sex can become a technique. Love can never become a technique. If in sex you try to remain in control, then even sex will not help to reach the ultimate. It will go to a certain point and you will drop back, because somewhere it also needs a let-go.
That's why orgasm is becoming more and more difficult. Ejaculation is not orgasm, to give birth to children is not orgasmic. Orgasm is the involvement of the total body: mind, body, soul, all together. You vibrate, your whole being vibrates, from the toes to the head. You are no longer in control; existence has taken possession of you and you don't know who you are. It is like a madness, it is like a sleep, it is like meditation, it is like death-Osho,
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The Seeker Is the Sought - Man is almost mad - mad because he is seeking something which he has already got; mad because he's not aware of who he is; mad because he hopes, desires and then ultimately, feels frustrated. Frustration is bound to be there because you cannot find yourself by seeking; you are already there. The seeking has to stop, the search has to drop: that is the greatest problem to be faced, encountered. The problem is that you have something and you are seeking it. Now, how can you find it? You are too occupied with seeking, and you cannot see the thing that you already have. Unless all seeking stops, you will not be able to see it. Seeking makes your mind focus somewhere in the future, and the thing that you are seeking is already here, now, this very moment. That which you are seeking is hidden in the seeker himself: the seeker is the sought; hence, so much neurosis, so much madness- Osho, 
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