24 जनवरी 2011

महामन्त्र का मामला एकदम अलग और विलक्षण है ।

जय हो सतगुरु श्री शिवाननद जी महाराज परमहँस जी की जय हो । नमस्कार राजीव कुमार साहेब । मैं आपके ब्लाग का एक पाठक हूँ । मैंने आपके ब्लाग के आर्टीकल पढे थे । मुझे पढकर बहुत अच्छा लगा । विश्वास करें । एक बार को तो दिल हुआ था कि भागकर आपको मिलने आगरा आ जाऊँ । बट टाइम निकाल नहीं पाया । कुछ मजबूरियों की वजह से । मैं आपसे कुछ जानना चाहता हूँ । बहुत जरूरी है । मैं हरियाणा का रहने वाला हूँ । मैंने आपके आर्टीकल में पढा था । सुरति शब्द साधना के बारे में । जो आपके अनुसार महामन्त्र से की जाती है । जो ढाई अक्षर का नाम है । हरियाणा में मैं राधा स्वामी सतसंग में गया था । एन्ड वहाँ उन्होंने कहा कि सुरति शब्द योग की साधना पाँच शब्दों का नाम है । उससे की जाती है । मैंने राधा स्वामी संस्था की पुस्तक भी पढी थी । किसी दोस्त से लेकर । जो वहाँ पर नौकरी करता है । उस पुस्तक में भी अनामी पुरुष और काल पुरुष एन्ड माया आदि के बारे में लिखा हुआ था । मैं ये प्रश्न सिर्फ़ अपनी जिग्यासा हेतु पूछ रहा हूँ । ना कि आपका टेस्ट लेने हेतु । या आपको परेशान करने हेतु । क्योंकि जब तक कोई सही इंफ़ोर्मेशन नहीं होगी । सही फ़ैसला भी नहीं हो पायेगा । इसलिये राजीव कुमार साहब मेरा प्रश्न ये है कि क्या सुरति शब्द योग दो हैं ? या एक है ? क्योंकि आपके अकार्डिंग ढाई अक्षर के नाम की साधना सुरति शब्द योग की साधना है । एन्ड राधा स्वामी के अकार्डिंग पाँच शब्द के नाम की साधना सुरति शब्द योग है । कृपया आप इसके बारे में विस्तार से अपने आर्टीकल में लिखें । और इन दोनों नामों ( ढाई अक्षर वाला और पाँच शब्द वाला ) की महिमा समझायें । मेरी प्रार्थना है कि आप शान्त मन से इसके बारे में पूरा एक लेख लिखें । मेरे ख्याल से ये भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है । क्योंकि मैंने इस पाँच शब्द वाले नाम की बहुत महिमा सुनी है । मैं पहली बार आपको सम्पर्क कर रहा हूँ । ई मेल की तरफ़ से । इसलिये कृपया इस प्रश्न पर विशेष ध्यान देते हुये । इस बारे में जितनी जानकारी आप दे सके ( नियम अनुसार ) आने आने वाले लेख में जरूर दें । ये भी बता दें कि सुरति शब्द साधना या सुरति शब्द योग या आत्मग्यान साधना या ग्यान योग या सहज योग या राजयोग या सांख्ययोग या केवल्य की साधना या निर्वाण की साधना । क्या ये सब एक ही साधना के नाम हैं । जिसको मुक्ति की साधना या मोक्ष की साधना बोलते हैं । अगर कोई बात आपको मेरी ठीक न लगी हो । तो कृपया क्षमा करें । जय हो सतगुरु श्री शिवानन्द जी महाराज परमहँस जी की जय हो । ( श्री सुशील कुमार जी । हरियाणा । ई मेल से । )
मेरी बात.. सबसे पहले तो सुशील जी । काफ़ी महत्वपूर्ण और सर्वजन उपयोगी प्रश्न पूछने के लिये आपका बेहद धन्यवाद । आभार ।..अब आपके प्रश्नों का प्वाइंट टू प्वाइंट उत्तर देने की कोशिश करूँगा ।
आप आगरा या जहाँ भी मेरी या महाराज जी की उस समय उपस्थिति हो । आ सकते हैं । आपका । सबका । किसी का भी । स्वागत हैं । परन्तु कृपया पहले से पूछकर आयें । तो आपको खाली वापस लौटने की स्थिति नहीं आयेगी । क्योंकि साधु संतो की.. रमता जोगी बहता पानी.. वाली स्थिति होती है ।..लेकिन बेहतर होगा कि आने में किराया । धन । समय । परेशानी आदि को देखते हुये । इससे सस्ता और बेहतर उपाय आप महाराज जी से निसंकोच फ़ोन पर बात करके अपनी शंकाओं का समाधान कर लें । बात लम्बी हो । तो ई मेल या ब्लाग कमेंट द्वारा मुझसे पूछ सकते हैं । जब आपकी सभी शंकाओं का समाधान हो जाय । तब आपको आने का वास्तविक लाभ प्राप्त होगा । मतलब आपके भाव पूरे । श्रद्धायुक्त और स्थायी हो जाने से लाभ कई लाख गुना हो जायेगा ।..संत मिलन को चालिये । तजि माया अभिमान । ज्यों ज्यों पग आगे धरो । कोटिन यग्य समान ।
सुरति शब्द योग दो नहीं हैं । एक ही है । पर इसमें महत्वपूर्ण बात ये होती है कि जहाँ तक का पहुँचा हुआ गुरु आपको मिला है । वो वहीं तक आपको ले जा सकता है । उदाहरण के लिये ररंकार निरंकार भी सुरति शब्द योग ही हैं । पर ये राधास्वामी के पंचनामा से काफ़ी नीचे की स्थिति है । ढाई अक्षर का नाम आपके दीक्षा के शुरूआत के समय ही प्रकट होकर आपको आखीर तक ले जाता है । जबकि पंचनामा की साधना अलग तरह से होती है । और ये मुँहजबानी दिये गये नाम असल रूप में किसी विरले के ही प्रकट हो पाते हैं । हालांकि राधास्वामी मत भी कालातीत ग्यान है । और ये भी किसी सच्चे गुरु से मिल जाय । तो उसका भी बेङापार ही समझो । पर ये वो ग्यान नहीं हैं । ये वो मार्ग नहीं हैं । जिसकी चर्चा मेरे ब्लाग्स में है । यदि ऐसा होता । तो मैंने किसी न किसी स्थान पर अवश्य इसका जिक्र किया होता कि भाई राधास्वामी का पंचनामा और महामन्त्र एक ही बात है । महामन्त्र का मामला एकदम अलग और विलक्षण है ।..शबद शबद सब कोय कहे । शबद न जाने कोय । आदि शब्द जो गुप्त है । बूझे बिरला कोय ।.इसी को सरल भाषा में इस तरह कहा गया है ।..नाम नाम सब कोय कहे । नाम न जाने कोय । आदि नाम जो गुप्त है । बूझे बिरला कोय ।..पहले तो राधास्वामी मत में जो आपने लोगों की भरमार देखी होगी । वो इसी मत के अनुसार वहाँ तक भी नहीं पहुँच पाते । जो उनका मत कह रहा है ।..लेकिन किसी प्रकार कोई पहुँच भी जाय । तो यह अंतिम स्थिति नहीं है । इससे आगे बहुत कुछ है...? जहाँ पंचनामा नहीं ले जा सकता ।
लेकिन आपके प्रश्न के प्रसंग में मैं अपने सभी पाठकों को यह बता देना चाहता हूँ । कि किसी भी साधना या परमात्मा की नामभक्ति को भी हलवाई की दुकान का रसगुल्ला मत समझो । जिसको खाना आसान है । अगर किसी ने आपसे यह कहा है । कि ये मन्त्र ले लो । पंचनामा ले लो । बस हो गया काम । हो गया उद्धार ? नहीं । ऐसा हरगिज नहीं है । ऐसा कहने वाला सफ़ेद झूठ बोल रहा है ।.. ये भी एक पूरी पढाई है । चाहे राधा स्वामी हो या अन्य कोई मत । उसमें नियमानुसार साधक को पहले हँसदीक्षा दी जाती है । इस दीक्षा का ग्यान ही इक्का दुक्का लगनशील ही पास कर पाता है । हँसदीक्षा बृह्ममंडल में पहुँचाकर छोङ देती है । यानी वहाँ इसका कार्य समाप्त हो जाता है । तब जब साधक की शरीर से निकलने की स्थिति ( हँस पूरा कर लेने पर । ) बनने लगती है । फ़िर उसको आगे बङाते हुये अन्य दीक्षा दी जाती है । इसके बाद भी एक दीक्षा है । जो सब गोपनीय मैटर है । तो कहने का मतलब आप हँस पूरा कर लो । यही बहुत बङी उपलब्धि होती है ।..जैसे उसी कार्य । उसी नौकरी के अमेरिका में अच्छे पैसे मिलते हैं । ये कोई जान तो गया । पर अमेरिका में सैटल होना । बातों द्वारा जानने जैसा आसान नहीं है ।..चलिये एक मिनट के लिये मान लेते हैं । पानी पियो छान के । गुरु करो जान के । की तर्ज पर आप जान गये कि महामन्त्र ही सर्वोच्च है । और राजीव के माध्यम ( महाराज जी से ) से बात बन ही जायेगी । आप आगरा भी आ गये । नामदान मिल भी गया । सब बात ठीक से समझ में आ भी गयी । तो इससे फ़ायदा तो हुआ । लेकिन उद्धार नहीं हुआ ।..दरअसल असली बात तो अब शुरू हुयी है । अभी तक तो आपका संशय रूपी कचरा हटा है । अब आपको बहुत मेहनत करनी है । बहुत पढाई करनी है । सुरति शब्द साधना । या सुरति शब्द योग । या आत्मग्यान साधना । या सहज योग या राजयोग एक ही है । बाकी चीजें अलग हैं ।.. जिसको मुक्ति की साधना या मोक्ष की साधना बोलते हैं ?...मुक्ति अलग है । मोक्ष यानी मुक्त होना अलग है । मुक्ति द्वैत ग्यान में होती है । यानी इस कष्टमय भवसागर और 84 लाख योनियों से लम्बे समय के लिये मुक्त हो जाने को मुक्ति कहा गया है । ये चार प्रकार की होती है । मुक्त हमेशा के लिये होता है । मुक्त कालातीत ( काल की सीमा से पार । ) हो जाता है । मुक्तिवाला काल की सीमा यानी बृह्ममंडल तक ही जा पाता है ।
पाँच शब्द वाले नाम की महिमा के बारे में ..जैसा कि आप जानते ही हैं । राष्ट्रपति देश का सर्वोच्च होता है । फ़िर प्रधानमन्त्री होता है । फ़िर गृहमन्त्री । रक्षामन्त्री । मुख्यमन्त्री आदि ।..अब आप गृह .. रक्षा .. मुख्यमन्त्री आदि की कम वैल्यू नहीं समझ सकते । इनके पास भी काफ़ी पावर होती है । इसी तरह पंचनामा की महिमा वाकई बहुत है । पर वो राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री हरगिज नहीं है । इसमें कोई शक नहीं है । वो सबका बाप और इन सबका भी बाप अलग ही है । वो लाटसाहब सबसे अलग ही है । वो साहेब सबसे अनूठा अलग ही है । इसलिये मेरी बातों का सही भाव गृहण करते हुये दिन में जितनी बार याद आ जाये । साहेब..साहेब करते हुये संतो की तरह पुकारना सीख लो ।..और सबसे महत्वपूर्ण बात हरेक पाठक के लिये । उस लाटसाहब ( देखा । उससे यारी का फ़ायदा । आप में से कोई ऐसे मेरी तरह कह सकता है उससे ? ) ने नियम बना रखा है कि बिना संत । बिना गुरू के वो किसी से नहीं मिलता ।..चिंता न करें । नो प्राब्लम । मैं आपसे खुद को या अन्य किसी को भी गुरू बनाने की नहीं कह रहा । बस आप जो .. हाय .. हल्लो .. नमस्कार ..नमस्ते..प्रणाम..राम राम..राधे राधे..जय शंकर की..गुड मार्निंग..सलामवालेकुम..गाड ब्लेस यू..गुडबाय..वङक्कम जी..वेलकम..ग्लैड टु मीट यू..नाइस टु मीट यू..आदि अभिवादन करते हो । बस इसकी जगह । जय जय श्री गुरुदेव । जय गुरुदेव की । ये दो अभिवादन छोटे बङे सभी से करें । सभी को सिखायें । प्रेरित करें । अकेले में भी इसको दोहरायें । चिंता परेशानी आदि स्थितियों में बारबार रिपीट करें । इसको अपने जीवन में इस तरह उतार लें कि स्वतः ही ये आपके मुख से निकलने लगे । फ़िर अपने जीवन में इसका कमाल देखना ।.. अब इसका तकनीकी पक्ष समझो । मैं यहाँ किसी गुरू विशेष की बात नहीं कर रहा । परमात्मा जो सच्चे गुरू के रूप में । आंतरिक गुरू के रूप में । आपके अन्दर विराजमान है । उससे आपका सीधा सम्बन्ध जुङ जाता है । बाह्य गुरू । सच्चा शरीर गुरू यही तो करता है । वो आपको आपके अन्दर के गुरू से मिला देता है । अब संक्षेप में नाम यानी महामन्त्र की बात जो आपका मुख्य प्रश्न है । वास्तव में नाम या शब्द एक ही है । लेकिन इस बात को ठीक से समझने के लिये आप डीजे पर बजते हुये उस गीत की कल्पना करें । जो आपसे दो किमी ( उदाहरण के लिये इतनी दूरी मान लें । वैसे दो किमी से डीजे सुनाई नहीं देगा । ) दूर बज रहा है । जाहिर है । इतनी दूरी से अस्पष्ट ही सुनाई देगा । आप कुछ कदम उस दिशा में चले । आवाज पहले से साफ़ हुयी । फ़िर कुछ चले । और साफ़ । फ़िर..और साफ़ । इस तरह ज्यों ज्यों आप उसके नजदीक पहुँचते जाते हैं । आवाज क्लीयर होती जाती हैं । अंत में डीजे के बिलकुल पास पहुँच जाने पर सब कुछ क्लीयर हो जाता है । यही स्थिति नाम या शब्द के बारे में है । राधास्वामी आदि तमाम मत अपने अपने मंडल तक की बात करते हैं । और डीजे से आपकी दूरी की ही तरह । इस एक ही नाम की भी अलग अलग स्थितियाँ बन जाती हैं । जिसको अलग अलग खोजियों ने अपने हिसाब से कहा है । पर जहाँ सुरति शब्द में समा ही गयी । फ़िर कोई नाम नहीं बचता । यानी पंचनामा का सफ़र पूरा करने पर पता चला कि अभी भी नाम ध्वनि आगे दूर से सुनाई दे रही है । इसका मतलब बात कुछ और भी है । पर सुरति के शब्द में समा जाने के बाद सब समाप्त हो जाता है । जाप मरे..अजपा मरे..अनहद हू मर जाय । सुरति समानी शव्द में । ताको काल न खाय । राम खुदा सब कहें । नाम कोई बिरला नर पावे । है । बिन अक्षर नाम । मिले बिन दाम । सदा सुखकारी । बाई शख्स को मिले । आस जाने मारी । बहुतक मुन्डा भये । कमन्डल लये । लम्बे केश । सन्त के वेश । दृव्य हर लेत । मन्त्र दे कानन भरमावे । ऐसे गुरु मत करे । फ़न्द मत परे । मन्त्र सिखलावें । तेरो रुक जाय कन्ठ । मन्त्र काम नहि आवे । ऐसे गुरु करि भृंग । सदा रहे संग । लोक तोहि चौथा दरसावें । कोटि नाम संसार में । उनसे मुक्ति न होय । आदि नाम जो गुप्त है । बूझे बिरला कोय ।..धन्यवाद । यदि मेरी अग्यानतावश कोई बात रह गयी हो । तो आप निसंकोच पुनः पूछ सकते हैं ।
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