05 जनवरी 2011

मुहम्मद साहब और 3 बातें । 1

मुहम्मद साहब से सिर्फ़ एक चूक हुयी थी । लेकिन मुसलमानों से कई चूक हो रहीं हैं । और मुसलमान ही क्यों हिंदू , सिख ,ईसाई कोई भी इन चूकों से अछूता नहीं है । शास्त्र क्या कह रहें हैं ? धर्मग्रन्थ क्या कह रहे हैं ? साधु , संतो ने , पीर , फ़कीरों ने , पैगम्बरों ने क्या कहा था ? और हम क्या समझ बैठे ?? बस यही चक्कर  है ? और इसमें आपका कोई दोष  नहीं है । ये काल और उसकी पत्नी माया का प्रभाव  होता है । जो आपको  सत्यता नहीं जानने देता ? ये दोनों ही नहीं  चाहते कि कोई जीव सत्यता जान जाय । और संतो की वाणी से मुक्त होकर आवागमन के चक्र से  निकल जाय । काल न तो आत्मा को मार सकता है । न जला सकता है । और न ही किसी अन्य प्रकार से नुकसान पहुंचा सकता है । बस वो एक काम कर सकता है कि तुम्हें अपनी माया के प्रभाव में लेकर विष के समान विषयों में उलझाये रखे । और स्वर्ग नरक का खेल  खिलाता रहे । जबकि आत्मा का मुकाम  बेहद ऊंचा है ???? एक बात और भी है । आत्मा सहज इन विषयों में नहीं फ़ंस सकती थी । तब इन दोनों ने विषयों को ( खासतौर पर SEX को ) मीठी चाशनी में लपेटकर पेश किया । और ये जीव काल के भारी हथकन्डों में फ़ंस ही गया । आप खुद सोचो । पूरा बृह्माण्ड ही माया के पर्दे में  निर्मित है  ।..बृह्माण्ड निकाया निर्मित माया । रोम रोम प्रति वेद कहे..? ( मन्दोदरी भी कह रही है । )..सुन रावन बृह्माण्ड निकाया । पाय जासु बल विरचित माया । अब काल की भी एक सीमा है । इसीलिये कालातीत शब्द है । इतना समय ( टाइम ) हो गया । हमारी इतनी आयु हो गयी । हम इतने जिंदा रहेंगे  । दो हजार साल पहले ये हुआ  था । दस हजार साल  पहले ये हुआ था ? ये हमारे जीवन में काल की उपस्थित है । ( जवकि आत्मा तो अजन्मा अविनाशी है  । तो फ़िर उसकी आयु कैसे हो सकती है ?? )
अब माया पर बात करते हैं । खूब मालूम है । संसार की किसी भी चीज पर हमारा वश नहीं है । कितना भी बना लें । कितना भी कुछ कर लें । नंगे आये  थे । और नंगे  ही जायेंगे ?? फ़िर भी जीवन भर मेरा तेरा करते हैं । लडते झगडते हैं । एक एक दो दो रुपये के लिये इंसान इंसान की जान ले लेता है । देखिये कहा भी है । न तेरा है ।  न मेरा है । बस चिडिया रैन बसेरा है । जीवन 2 दिन का डेरा है..हंस फ़िर उड जायेगा ??.. मैं और मोर , तोर तैं माया । जिन वश कीन्हें बृह्माण्ड निकाया ।..माया महा ठगिनी हम जानी । तिरगुन फ़ांस लिये कर डोले । बोले मधुरी वानी । इसने बडे बडे देवताओं , साधु , संतो को नहीं छोडा । तो साधारण इंसान की बात ही क्या है ?? तो देखा आपने । ये माया है । हिंदुओं ध्यान से सुनो । तुलसीदास क्या कह रहे है ।.. मात पिता भगिनी सुत दारा । ये सब माया कृत परिवारा । अर्थात माता , पिता , बहन , बेटा , पत्नी ये सब माया का रचा हुआ परिवार है । हजम कर लोगे ये बात ?? जब ये सब माया है । तो धन दौलत आदि इन सम्बन्धों के सामने एकदम फ़ीके हैं । कोई महत्व ही नहीं हैं ? या है ?? तो ये हमारे जीवन में माया है ।
खैर..मैं मुहम्मद साहब की बात कर रहा था । मुहम्मद साहब पर जिन दिनों ग्यान उतरा था । कुरआन उतरा था । वे एक पहाडी पर जाते थे । ( ईसामसीह भी एक पहाडी पर जाते थे । ) अलौकिक आवेश उन पर होने लगता था । और वे भयभीत हो जाते थे । ( प्रत्येक साधक , साधु जब अंतरजगत में प्रवेश करता है । तो अलग अलग स्तर पर कम ज्यादा भयभीत होता ही है । ) उन्हें बुखार सा चढ आता था । और वे घर आकर सर्दी जैसे थरथर कांपते हुये लेट जाते थे । तब एक दिन उनकी बेगम ने पूछा । क्या बात है ? आपकी ऐसी हालत क्यों है ? मुहम्मद साहब ने बताया । कि नूर ( दिव्य प्रकाश ) में कोई आता है । और मुझसे बात करता है । इसी से मेरी हालत ऐसी हो जाती है । मुझे भय लगता है । तब उनकी बेगम ने कहा । आपको उनसे बात करनी चाहिये ।..इस तरह धीरे धीरे मुहम्मद साहब का भय खत्म हो गया । और उन पर कुरआन उतरा ।..इसी तरह तुलसीदास पर रामचरितमानस उतरा । वाल्मीकि पर  रामायण उतरी । ईसामसीह पर बाइबिल उतरी । मूर्ख कालीदास पर ग्यान उतरा । एक ही तरीका था । एक ही तरीका है ।
अब मैं बात करूंगा । मुहम्मद साहब से क्या चूक हुयी थी ? ग्यान की ये अवस्था जब पूरी होने को आयी । और इम्तहान की घडी आ गयी । यानी साधना पूरी हो गयी । और अब फ़ल प्राप्त होना था । (  ध्यान रहे । हर ग्यान । हर साधना में ये स्थित आती है । जिसे शिखर या पीक लेवल कह सकते हैं  । ) तब मुहम्मद साहब के लिये आकाशवाणी ( ध्यान की उसी अवस्था में । अंतरजगत में गूंजने वाली गैवी आवाज । ) हुयी ।.."  मुहम्मद । मेरे लिये अपनी सबसे प्रिय चीज की कुरवानी दे ?? "..यही वो संवेदनशील बिंदु था ।  जगह थी । जहां मुहम्मद साहब सोच में पड गये । उन्होंने विचार किया । सबसे प्रिय तो मेरा पुत्र ही है । अतः इसी को कुरबान कर देता हूं । लिहाजा उन्होंने अपने पुत्र को आगे कर दिया..?
तब ईश्वरीय प्रेरणा से पुत्र हट गया । और उसकी जगह एक मेंढा आ गया ।..इसी कारण इस्लाम में बकरा आदि की कुरबानी देने की प्रथा चालू हो गयी ।..अब यहां चूक क्या हुयी थी ?? किसी भी इंसान को सबसे ज्यादा प्रिय उसका । अहम । होता है । उसकी कुरवानी देनी थी । किसी इंसान या जीव की कुरवानी से भला ईश्वर का क्या सरोकार ? और अगर उसकी ही कुरवानी उसे चाहिये । तो बिना किसी इंसानी माध्यम के वो खुद ही ले लेगा । अगर जीव का मरना ही कुरवानी है । तो वो लाखों कुरवानी वैसे ही ले लेता है ?? और लगातार ले रहा है । वास्तव में ईश्वर को तुम्हारे अहम की कुर्बानी की जरूरत है । अगर इसको हिंदू ( जैसा कि एक धर्म के लिये कहा जाता है । जबकि ये सनातन धर्म है । ) धर्म के हिसाब से देखा जाय । तो कदम कदम पर अहम या । मैं । को ही सबसे बडा दुश्मन बताया गया है । इसी को त्यागने पर जोर दिया गया है । अहम या मैं को ही आत्मा या परमात्मा के बीच में परदा बताया  है । मैं की प्रियता ही समस्त विनाश का कारण होती है । संतमत मैं सबसे पहले । मैं । की ही गरदन काटी जाती है । याद करे नानक जी  ने पंज प्यारे कैसे चुने थे ।..ये तो घर है प्रेम का । खाला का घर नाहिं । शीश उतार भूमि धरो । तब पैठो घर माहिं । जब मैं ? था । तब हरि नहीं । जब हरि था । मैं ? नाहिं । सब अंधियारा मिट गया । दीपक देख्या मांहि ।
इस तरह मुहम्मद साहब आखिरी इम्तहान में एक बिंदु पर चूक गये । लेकिन इसके बाबजूद वो माया के परदे से पार हो गये । और आवागमन से मुक्त हो गये । कैसे..? इसका प्रमाण आगे देखना ?
वैसे मैंने मुहम्मद साहब पर पहली बार लिखा है । अतः लेख काफ़ी बडा हो सकता है । इसलिये अभी मैं सिर्फ़ दो मुद्दे ही उठाऊंगा । एक आवागमन का सच वाली बात ? और दूसरी कयामत के दिन रूहों के हिसाब किताब के बाद उनको । जन्नत या दोजख मिलने की बात । क्योंकि मैंने देखा है । मुसलमानों में इन दोनों बातों का महत्व ज्यादा है । और इसको लेकर उनके पास बहुत तर्क भी हैं ।
 सबसे पहले आवागमन वाली बात ? मुहम्मद साहव ने यही कहा था ना । कि जीव का आवागमन नहीं होता ??? बिलकुल सही कहा था । लेकिन आप लोगों ने समझने में बहुत बडी गलती कर दी ।..ये बात मुहम्मद साहब ने माया के परदे से पार होकर कही थी । ( ऊपर का लेख ध्यान रखना । ) उनका मतलव था कि आवागमन महज माया के परदे में हो रहा है । जैसे ही जीव काल माया की सीमा लांघ जाता है । ( यानी कालातीत होना । ) आवागमन का चक्र समाप्त हो जाता है । और मुहम्मद  साहब उस वक्त माया के परदे से बाहर थे । तो उन्होंने ( वहां से ही । )  सच ही कहा था कि आवागमन ( उस स्थिति में पहुंच जाने पर.. है ही नहीं  । ) नहीं होता । पर भाई लोगों । आप दुकान और मकान मैं कान शब्द के अर्थ से तो वाकिफ़ थे । इसलिये दुकान और मकान में भी कान की तलाश करने लगे । अगर पूरी बात ठीक से समझी होती । तो कोई  बात ही नहीं थी ।..अब अगर मैं जन्म मरण और आवागमन रहित हो जाना पर हिंदू धर्मग्रन्थों से उदाहरण दूं । तो उदाहरणों के ढेर लग जायेंगे । और प्रायः सब जानते ही हैं । हिंदू  धर्म का पूरा ग्यान बंधन और मोक्ष को ही लक्ष्य करके है । और जन साधारण और अन्य धर्मी भी उससे परिचित ही हैं । ( यहां मैं एक बात कहना चाहूंगा । जिस प्रकार कबीर आदि संतो की फ़कीरी वाणी के लोग अर्थ नहीं निकाल पाते । इसी प्रकार कुरआन ए पाक ( मूल भाषा ) का अर्थ निकालना भी आसान नहीं हैं । क्योंकि वह मनुष्य की वाणी न होकर उतरा हुआ ग्यान है । दिव्यवाणी है । मेरी इच्छा भी है कि अरबी की मूल आयत ( लेकिन इसी प्रकार की अलौकिक विषय के वर्णन वाली । ) और उसके ( शब्दों के हिंदी अर्थ ) शब्दार्थ ( भावार्थ नहीं । ) मुझे कहीं प्राप्त हो जाय । तो मुहम्मद साहब ने यही कहा । रूह जब माया के परदे से बाहर चली जाती है । तो आवागमन नहीं होता । कृमशः ।  ( दूसरा भाग इसी के साथ प्रकाशित है ।
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