23 जनवरी 2011

असली पूजा के रहस्य ???

आईये आज आपको असली पूजा । असली भक्ति । असली इवादत के बारे में बताते हैं । जिसके सिर्फ़ चार तरीके हैं । और जिसको ग्यान मुद्रा भी कहते हैं । 1 भूचरी मुद्रा । 2 खेचरी मुद्रा । 3 अगोचरी मुद्रा । 4 उनमनी मुद्रा । आप किसी भी जाति । किसी भी धर्म । किसी भी अवस्था । किसी भी स्थिति में क्यों न हो । यदि आप इंसान है । तो भगवान । अल्लाह । रब्ब । GOD की भक्ति का यही असली एकमात्र उपाय है ।
1 भूचरी मुद्रा ।.. भूचरी मुद्रा चेतनधारा से खुद को जोङकर उसमें रमण करना होता है । यह विधि अत्यंत सरल होती है । और कई प्रकार के शारीरिक मानसिक कलेशों का शमन करती है । इसी मुद्रा को महामन्त्र के साथ रमण किया जाय । तो इसकी शक्ति करोङों गुना बङ जाती है । भू चरी का अर्थ है । जमीन पर फ़ैली हुयी । या गति करती हुयी । हँस रूपी आत्मा विषय वासना में फ़ँसकर अग्यान की भूमि पर विचरने लगी है । और इसी को सत्य मान बैठी है । भूचरी में रमण करने से असार खुद ही अलग होने लगता है । और सार गृहण होने लगता है ।..सार सार को गहि रहे थोथा देय उङाय । जैसा कि मैंने पहले भी कहा है । इन अपरिचित और रहस्यमय शब्दों पर ना जायँ । सुरति शब्द साधना के किसी भी ग्यान ध्यान में बेहद सरल क्रियायें और आनन्द ही आनन्द होता है । राम..रमैया..रमता जोगी इसी के साधक को कहा गया है । सृष्टि के कणकण में विधमान परमात्मा के आनन्दधाम जाने का पथ इसी भूचरी मुद्रा से ही जाता है ।
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आगे की बात कुछ रहस्य वाली है ।..प्रमुख मार्ग तीन हैं । दाँया मार्ग । जो सिद्धों का क्षेत्र है । बाँया मार्ग । इसमें तो आप अरबों साल से । पहले से ही जन्म जन्म से चल रहे हो । साइंस के अनुसार भी आप मष्तिष्क के बायें हिस्से का बेहद न्यूनतम उपयोग करते हो । क्योंकि शास्त्र के अनुसार जीव को अल्पग्य कहा गया है । यह काल भगवान और उसकी पत्नी माया का क्षेत्र है । इसी की भक्ति द्वैत भक्ति के अंतर्गत आती है । जिसको सही रूप से करने पर स्वर्ग और देवादि उपाधियाँ आदि प्राप्त होती हैं । इसमें चार प्रकार की मुक्ति होती है । पर जीव सही रूप में मु्क्त नहीं होता । और काल माया के जाल में फ़ँसा रहता है । ( मैं काल की पत्नी को मायावती डार्लिंग के नाम से बुलाता हूँ । समस्त जीव इसी के चंगुल में विषय वासना के हथकन्डों द्वारा फ़ँसे हुये हैं । पर यह संतों की उपस्थिति की छाया मात्र से ही अत्यंत भयभीत हो जाती है । इससे बचने का उपाय संतो का दिया ग्यान और उस पर चलकर अपने को उद्धार करना ही है । ) मध्यमार्ग । यानी दाँये बाँयें के बीच में जो सीधा मार्ग जाता है । यही संतों का मार्ग है । यही सतलोक या अमरलोक का रास्ता है । यही परमात्मा के घर जाना है । वास्तव में यही अपने घर जाना है । इस मार्ग के किसी भी सच्चे संत द्वारा ग्यान मिलने पर मायावी ( सिद्ध ) और कालमाया ( असार जीवन ) का प्रभाव छँटने लगता है ।
2 खेचरी मुद्रा ।..इस मुद्रा की सिद्ध के सबसे फ़ेमस उदाहरण अंजनी पुत्र हनुमान जी हैं । जो इसी मुद्रा की शक्ति से सैकङों योजन का सागर पार करके रावण धाम लंका गये थे । हनुमान जी ऋषियों के शाप से अपना यह ग्यान भूल गये थे । उसी शाप के अनुसार आवश्यकता पङने पर उन्हें यह ग्यान याद आ गया था । इस मुद्रा का अभ्यास मुँह के अंदर ऊपर तालू में ( पौन इंची गोल गङ्ङा सा होता है । जहाँ हड्डी नहीं होती । ) जीभ को लगाने का निरंतर अभ्यास करने से होता है । निरंतर अभ्यास से यहाँ एक छोटा सा छेद बन जाता है । जिसमें से अमीरस ( अमृतरस ) मुँह के अन्दर गिरने लगता है । तब अदभुत आनन्द की अनुभूति होती है । एक अजीव सी स्थायी शान्ति में जीव चला जाता है । आगे और अभ्यास से यह मुद्रा सिद्ध हो जाती हैं । तब साधक को कई प्रकार की अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं । भूचरी की अपेक्षा ये काफ़ी ऊँचे परिणाम देने वाली मुद्रा हैं ।..लेकिन इसमें साधक को बिना मार्गदर्शन और किसी संत का संरक्षण प्राप्त न होने पर डरावने अनुभव हो सकते हैं । अतः मेरी सलाह यही है । अत्यंत उच्चस्तर की सिद्धियाँ देने वाली इस साधना को सावधानी से और किसी संरक्षण में ही करें ।..इसी कृम में एक मिलती जुलती साधारण बात आपको बता रहा हूँ । जिसका किसी पूजा किसी साधना से कोई सम्बन्ध न होकर शरीर के रहस्यों से सम्बन्ध है । वो ये कि आप अपनी जीभ को निकालकर नाक की तरफ़ लाने का अभ्यास करें । यह काफ़ी कठिन अभ्यास है । पर निरंतर प्रयास से जीभ बङने लगेगी । जिस दिन आपकी जीभ नाक की नोक को छूने लगेगी । उस दिन आप पर किसी भी प्रकार के विष का असर नहीं होगा । जिनकी जीभ सामान्य से बङी होती है । लचकीली होती है । उनके लिये तो ये अभ्यास करना बेहद सरल होता है ।
3 अगोचरी मुद्रा ।..तुलसीदास ने कहा है ।..गो गोचर जहाँ लगि मन जायी । सो सब माया जानों भाई । अर्थात इन्द्रियाँ ( गो ) और उनके विचरने का स्थान ( गोचर ) जहाँ तक मन जाता है । वह सब माया है । तो जैसा कि इस मुद्रा के नाम से ही स्पष्ट है । अगोचरी । यानी जहाँ इन्द्रियों ( 5 ग्यान इन्द्रियाँ । 5 कर्म इन्द्रियाँ । और मन । ) का जाना नहीं हो सकता । वह अगोचर है । इसके लिये संतमत में कई दोहे हैं । जिनमें दो बेहद फ़ेमस हैं ।..आँख कान मुँह ढाँप के । नाम निरंजन लेय । अंदर के पट तब खुलें । जब बाहर के देय । तीनों बन्द लगाय कर । अनहद सुनो टंकोर । सहजो सुन्न समाधि में । नहिं सांझ नहिं भोर ।..ये मुद्रा कई तरह के नाम ध्यान में प्रयोग की जाती है । जैसे ॐ ध्यान में भी इसी को करते है । जिन्होंने बाबा रामदेव का प्रोग्राम देखा होगा । तो प्रोग्राम के लास्ट में बाबाजी कान । आँख । मुँह बन्द करके ॐ..ॐ..ॐ..ॐ का गहरा गम्भीर उच्चारण करते हैं ।..पर बाबा रामदेव के अभ्यास की जगह..जो बात में बता रहा हूँ । वो बेहद अलग और ऊँची राम स्थिति है । ॐ शरीर है । निरंजन राम है । लेकिन तरीका वही है । अंगूठे के पास वाली दोनों उंगली दोनों कानों में इतनी टाइट मगर सहनीय घुसायें । कि कान बाहरी आवाज के प्रति साउंडप्रूफ़ हो जाँय । अब बीच वाली दोनों बङी उंगली से । दोनों आँखे मूँदते हुये । थोङा ही टाइट ( ताकि दुखने न लगें । ) रखकर दबायें रहें । शेष बची दोनों उंगलियाँ । मुँह बन्द करते हुये होठों पर रखकर हल्का सा दबायें रहें । दोनों अंगूठे । गर्दन पर । या आपकी शरीर की बनाबट के अनुसार जहाँ भी सरलता से । आरामदायक स्थिति में रख जाँय । रख लें । इनके कहीं भी होने से कुछ ज्यादा अंतर नहीं होता । बस अभ्यास करते समय असुविधा और कष्ट महसूस न हो । यह ख्याल विशेष रखना है ।..अब जैसा कि बाबा रामदेव ॐ..ॐ..ॐ करते हैं । ऐसा कुछ नहीं करना । कोई जाप नहीं करना । कुछ बोलना नहीं है । कुछ विशेष नहीं करना । बस अंदर मष्तिष्क के बीचोबीच में स्वत सुनाई देने वाली आवाज को सुनते रहना है । यह बेहद आसानी से हरेक को पहली ही बार में सुनाई देगी । शुरूआत में रथ के पहियों के दौङने की घङघङाहट सुनाई देगी । यह सूर्य का रथ है । इसको काल पहिया या चक्र भी कह सकते हैं । पर एक कालचक्र दूसरा भी होता हैं । ये आवाज किसी किसी को घर की चाकी चलने से निकलने वाली आवाज जैसी भी सुनाई देती है । वास्तव में सृष्टि में पाप पुण्य वाले दो पहियों का रथ निरंतर दौङता रहता है । और जीव इन्ही दोनों पहियों से बँधा अग्यान में घिसटता रहता है । समदर्शी संत पाप पुण्य दोनों में लात मारकर इसी रथ के ऊपर बैठकर जीवन सफ़र तय करता है । इसी स्थिति के लिये कबीर ने कहा है । चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय । दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय । अर्थात जीव अपने स्वरूप को भूलकर पाप पुण्य के दो पाट वाली चाकी में अनंतकाल से पिस रहा है ।..खैर..इस रथ की आवाज के बाद आपको किसी बाग में चहकती अनेकों चिङियों की आवाज सुनाई देगी । इसके बाद निरंजन यानी राम धुनि यानी ररंकार सुनाई देगा । यही ध्वनि रूपी असली राम का नाम है । शंकर जी ने पार्वती को यही अमरकथा सुनाई थी । यह घटाकाश में निरंतर गूंज रहा है । तुलसीदास ने रामायण में संकेत रूप में इसी के अखंड पाठ की सलाह दी थी । न कि भोंपू लगाकर । रामायण को पढकर । पङोसियों के कान फ़ोङने की ।..कागभुशुंडि ने भी इसी के बारे में कहा था कि मैं निरंतर राम कथा का पान करता हूँ ।..इसके सुनते वक्त बस ये ध्यान रखना है । कि मष्तिष्क के बीचोबीच वाली आवाज ही सुनें दाँये बाँये की नहीं ।
4 उनमनी मुद्रा । मुझे बङी हैरत है कि विश्व के लाखों लोग इसका प्रतिदिन अभ्यास करने के बाबजूद इसके बारे में कुछ भी नहीं जानते । शायद इसी को कहा गया है । घर में छोरा । शहर ढिंढोरा ।..जी हाँ । यानी जो आप करते हैं । मेडीटेशन । पर ठीक से करना नहीं जानते । क्योंकि किसी ने बताया ही नहीं । जैसा बताया । वैसा करते हो । चलिये आज मैं ही बता देता हूँ । क्रिया वही । मेडीटेशन वाली । यानी भोंहो के मध्य ध्यान टिकाना । उनमनी याने संसार से उदासीनता का भाव । उन ( यानी प्रभु ) मनी ( मन लगा देना ) प्रभु से मन लगा देना । जय हो । जय हो । कितनी सुन्दर बात है ।..मेरे कहने का आशय यह है कि ध्यान के समय संसार से उदासीन होकर प्रभु से प्रेम भाव से मन को जोङना । आईये इसका भी सरल तरीका आपको बतायें । शुरूआत करते समय । खुली आँखों से कुछ देर तक नाक की नोक को देखते रहें । इससे सुरति एकाग्र होकर स्वतः ही नाक की जङ ( बिन्दी या तिलक के ठीक नीचे का स्थान । भ्रूमध्य के ठीक नीचे । ) पर पहुँच जायेगी । और आपकी आँखे आटोमेटिक बन्द होती चली जायेंगी । अपने को ढीला छोङ दें । और इसके बाद कुछ न करते हुये । जो हो रहा है । उसको होने दें । कुछ अभ्यास के बाद इसी स्थिति के बीच लेट जाने का प्रयत्न करें । इसके लिये अभ्यास गुदगुदे गद्दे पर करें । तो आरामदायक महसूस करेंगे । इसकी सही क्रिया जान लेने पर यह आंतरिक लोकों की सहज यात्रा कराती है ।
विशेष - जिस तरह बिजली का सावधानी से सही इस्तेमाल आपके जीवन को सुख सुविधा और भरपूर आनन्द देता है । लेकिन असावधानी से गम्भीर परिणाम या मौत के मुँह में पहुँचा सकता है । ठीक यही बात साधना पर लागू होती है । इसलिये मनमुखी आचरण के बजाय किसी जानकार से पहले मार्गदर्शन लेना उचित रहता है ।
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