21 जनवरी 2011

मौत की हंडिया ।

1981 मैं ग्यारह साल का था । और अभिभावकों की सर्विस की वजह से हम एक छोटे शहर में रह रहे थे । जहाँ दस किमी के क्षेत्र में तांत्रिकों मांत्रिकों का बेहद बोलबाला था । लेकिन उस समय मैं न तो इन बातों को ठीक से जानता था । और न ही मेरी कोई दिलचस्पी थी । लेकिन उन दिनों जो पहली घटना मेरे साथ हुयी । उसने मेरी दिलचस्पी इन बातों में स्वाभाविक ही पैदा कर दी । हुआ दरअसल ये कि मैं सुबह के समय दूध लेने और टयूशन पढने के लिये जाता था । फ़रबरी माह के शुरूआत की बात है । मैं सुबह साढे चार बजे के लगभग डोलचे में दूध लेने जा रहा था कि मेरी 32 वर्षीय पङोसन उसी गली में एकदम नंगी तेजी से चली जा रही थी । स्वाभाविक ही मेरे मुँह से निकलने वाला था कि ताई तुम नंगी क्यों हो ? और कहाँ जा रही हो ? पर जीवन में पहली बार किसी महिला को नग्न और रहस्यमय स्थिति में देखने के प्रभाव ने मेरे मुँह पर ताला जङ दिया । और मैं चुपचाप उनके पीछे पीछे खुद को छुपाता चलने लगा । गली के अंत में एक खाली अहाते में बबूल बेरी आदि के कांटेदार वृक्ष कुछ अन्य वृक्षों के साथ लगे थे । उस औरत ने लङकियों द्वारा चोटी में बाँधा जाने वाला रिबन ( पहले ज्यादातर लङकियाँ एक चोटी या दो चोटी करके रंग बिरंगे फ़ीते फ़ूल सा बनाकर बाँध लेती थी । ) और कलावा ( हिंदुओं की सत्यनारायण कथा में हाथ पर बाँधा जाने वाला । गेरुआ सफ़ेद मिक्स कलर का धागा । ) बेरी के वृक्ष में बाँध दिया । और लोटे से वृक्ष पर जल चङाकर तेजी से लगभग घर की तरफ़ वापस भागती चली गयी ।..मैंने माँ से आकर इस बात का जिक्र किया । तो वो एकदम घबरा सी गयीं । उस पङोसन को उसके आदमी ने छोङकर 15 किमी दूर शहर की एक अन्य औरत को रख लिया था । और अब उसी के पास रहता था । जिसके लिये उस लाचार पङोसन ने यह टोटका किया था । अब जैसा कि स्वाभाविक था । दो तीन दिन तक इन बातों की उस पङोसन के पीछे चर्चा होने लगी । उसी चर्चा में मैने यह सुना कि जब पानी बिलकुल नहीं बरसता । तब भी कुछ औरतें एकदम नग्न अवस्था में खेत में प्रतीकात्मक हल चलाती हैं । और नग्न युवा औरतों से प्रसन्न होने वाला । पानी बरसाने का आदेश देने वाला । इन्द्र देवता जल बरसा देता है ।..इस घटना से हुआ ये कि मुहल्ले की सभी औरतों ने अपने बच्चों को सतर्क कर दिया कि इस औरत के घर कतई न जायें । और खाने की कोई चीज या प्रसाद आदि दे । तो उसको कतई न खायें । और फ़ेंक दें । साथ ही घर आकर अवश्य बतायें ।
खैर..ये मेरे जीबन में तंत्रमंत्र से पहला परिचय था । इसके चार महीने बाद जून माह में मैं घरवालों के साथ छत पर लेटा हुआ था । रात के साढे दस बजने वाले थे । और मैं अपना प्रिय कार्य यानी आसमान के तारों को एकटक देखने में तल्लीन था कि तभी मेरी निगाह एक अदभुत चमकीली चीज पर गयी । लगभग दस ग्यारह इंच ऊँचाई वाली ये चीज जमीन से कोई 700 मीटर की ऊँचाई पर एक पक्षी की गति से उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर जा रही थी । मैंने तुरन्त अपने माता पिता को बताया । तो उन्होंने एकदम भयभीत सा होकर उस चीज को देखने से मना कर दिया । पर बेहद जिग्यासावश मैं चादरे के अंदर से छिद्र बनाकर उसे तब तक देखता रहा । जब तक वह दिखती रही । वैसे उस समय ऐसे उङते हुये प्रकाश को देखना कोई अचरज नहीं था । क्योंकि कुछ शौकीन रात के समय कंडील वाली पतंग उङाते थे । जिसका केवल प्रकाशयुक्त कंडील ही नजर आता था । पर ये पतंग या तो एक ही जगह स्थिर नजर आती थी । या कभी कभी थोङा सा लहराते समय बीस तीस फ़ुट की दूरी में ही घूमती नजर आती थी । और कभी इधर तो कभी उधर होती थी । पर ये चमकीली चीज सीधी एक दिशा में सामान्य गति से जा रही थी । रात भर मुझे इसकी जिग्यासा बनी रही । और सपने में भी वही नजर आई । पर सुबह इसका भेद खुल ही गया । क्योंकि छत पर सोये कई लोगों ने इसे देखा था । और ये उस दिन मुहल्ले में चर्चा का विषय थी ।
लोगों के अनुसार ये हंडिया थी । मौत की हंडिया । किसी तांत्रिक द्वारा । किसी व्यक्ति के लिये किया गया । मौत का तांत्रिक मांत्रिक । मारण अनुष्ठान । उनकी बातचीत से पता चला कि ये हंडिया ( एक छोटे दस इंच के घङे के समान मिट्टी का बर्तन । टेसू झांझी में झांझी जैसा पात्र । औरतों के करवाचौथ वृत में अर्क चढाने वाले पात्र करवा जैसा बर्तन । ) तांत्रिक मारण अनुष्ठान से अभिमंत्रित करके लक्ष्य की तरफ़ भेज दी जाती है । इसको तैयार करने के लिये । टारगेट व्यक्ति के सिर के बाल । वस्त्र । या उसके इस्तेमाल की कोई प्रमुख चीज । या कई चीजें । करवाने वाले व्यक्ति द्वारा तांत्रिक को मुहैया करानी होती है । फ़िर तांत्रिक एक मिट्टी । कपङे या काठ की । टारगेट की । गुङिया के साइज की मूर्ति । टारगेट के लिंग के अनुसार बनाता है । यानी स्त्री है । तो स्त्री गुङिया । पुरुष टारगेट है । तो पुरुष गुड्डा । इसके बाद टारगेट व्यक्ति के बाल । वस्त्र आदि उसके लगाकर गुङिया को मंत्र से बाँध दिया जाता है । फ़िर लक्ष्य व्यक्ति का नाम आदि हंडिया के साथ मंत्रों में अभिमंत्रित करके उस मूर्ति को मृत्यु उन्मुख करके हंडिया को मारण लक्ष्य की ओर रवाना कर दिया जाता है । तब आश्चर्यजनक रूप से ये निर्जीव हंडिया किसी पक्षी के समान सजीव होकर । मन्त्र शक्ति से उङती हुयी लक्ष्य के सामने जाकर गिर जाती है । और अनेक कारणों से ( मुँह से खून निकलना । सीने में अचानक दर्द । पेट में भयानक दर्द आदि की शिकायत होकर । ) लक्ष्य तङपता हुआ । उसी समय या एकाध दिन में दम तोङ देता है ।..उस दिन स्वाभाविक ही इस प्रकार की चर्चायें जारी रहीं । जिनमें कोई चोरी आदि कबूलवाने के लिये एक छोटी कटोरी लक्ष्य को लक्षित करके चलाई जाती हैं । ये बेहद छोटा प्रयोग होता है । जमीन पर स्वतः मंत्रशक्ति से चलती हुयी कटोरी लक्ष्य के सामने जाकर रुक जाती है ।..फ़िर उसी दिन अभिमंत्रित सरसों के दाने । किसी के बुरे के लिये प्रयोग करना ।..किसी बकरे आदि जानवर का सिर या हड्डी । किसी के दरबाजे पर लगा देना । या दरवाजे के आसपास जमीन में गाङ देना ।..किसी को मारने हेतु पुङिया पढवाकर खाने आदि में देना ।..सेही चूहे का कांटा किसी की दीवाल में घुसाकर उसके घर में कलेश करवा देना ।..किसी शराब न पीने वाले के नाम से । किसी जिन्न बसेरा । वृक्ष बबूल आदि पर । शराब का एक क्वार्टर चढाकर । शराब से नफ़रत करने वाले को भी घोर शराबी बना देना..आदि जैसी तांत्रिक क्रियाओं की जानकारी मुझे उन्ही दिनों सुनने को मिली । पर मेरी दिलचस्पी इनमें से किसी में न होकर । निर्जीब हंडिया उङ कैसे जाती है ? और निर्जीब कटोरी अपने आप चल कैसे जाती है ? इस बात में ज्यादा रहने लगी । अपने खोजी स्वभाव से मजबूर मैं इसी पर प्रयोग करने लगा । मेरे पिता पेशकार होने से फ़ील्ड में रहते थे । माँ अध्यापिका होने से निश्चित समय पर आती थी । इसलिये निश्चित होकर मैं पुरानी हंडिया और कटोरी लेकर उन्हे सुने आधार पर रंग रंगाकर औम..तङोम..कङोम आदि मंत्र बोलता हुआ । मुझ पर दादागीरी दिखाने वाले । सुनील दीपक आदि लङकों को मार डाल । कहता हुआ । हंडिया के उङने का इंतजार करता । पर उङना तो बहुत दूर । हंडिया कटोरी हिली तक नहीं ।..लेकिन इन अनोखी रहस्यमय जिग्यासाओं के कारण बीज मेरे बाल मन में पङ गये । लेकिन बाद में..आज तक किसी भी ऐसे तांत्रिक मांत्रिक से मेरा भेंटा नहीं हुआ । जो इसका जानकार हो । और इस क्रिया को मैं प्रत्यक्ष देखूँ । जबकि इससे कहीं बहुत ऊंची स्थिति के जानकार मिले । समय गुजरता गया ।..1989 की बात है । मैं किशनी के पास बेला विधूना में उन दिनों था । और लगभग 19 का हो चुका था । हमारे पास उमेश नाम का 20 साल का हट्टाकट्टा लङका रहता था । जो अपने परिवार में सबसे बङा था । उसके परिवार में दो अन्य बहनें और एक छोटा भाई था । उमेश के खानदानी लोगों से खेत की जमीन को लेकर भूमि विवाद था । और वे उसे हङपना चाहते थे । उमेश के घरवाले सभी सीधे थे । पर उमेश दादा टाइप था । और उसका हट्टेकट्टे लङकों का पूरा एक गिरोह जैसा था । जाहिर था कि उन लोगों की उमेश की वजह से दाल नहीं गलती थी । और वे उसे रास्ते से हटाना चाहते थे । तब हंडिया मेरे जीवन में दूसरी और अब तक अंतिम बार आई । ये हंडिया उमेश को लक्ष्य करके भेजी गयी थी । लेकिन सौभाग्य से उमेश बन्द दरबाजे की पीछे कमरे में था । अतः हंडिया ग्यारह फ़ुट बाहर आगे गिरकर फ़ूट गयी । इसके बाद उमेश पर इसका क्या असर हुआ ? यह तो उसके घरवालों ने किसी को बताया नहीं । पर उन्होंने शीघ्रता से इसका कोई उपाय कराया । और उसे रिश्तेदारी में अग्यात स्थान पर भेज दिया । ये अच्छी बात थी कि उमेश अंदर होने के कारण इस मारण प्रयोग से बच गया था । क्योंकि कहते हैं । इस प्रयोग की सफ़लता के लिये लक्ष्य का खुले में होना आवश्यक है । ये हंडिया भी रात आठ बजे के समीप आयी थी । और इसको तीन चार स्थानीय लोगों ने चालीस फ़ुट ऊँचाई से उतरते देखा था । पर जैसा कि निश्चित है । इन तांत्रिक चीजों से बङे से बङे दादे भी पंगा नहीं लेते । इसलिये फ़िजा में तीन चार दिन भय की तरंगे फ़ैलती रही ।


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