18 जनवरी 2011

कब्रें कब्रें सब 1 जैसी होती है

जब तक तुम सत्य को स्वीकार करते हो । तब तक वह सत्य ही नहीं रह जाता । इतनी देर लगा देते हो स्वीकार करने में । लड़ने झगड़ने में । विवाद में इतना समय गंवा देते हो कि तब तक सत्य पर बहुत धूल जम जाती है । धूल जाती है । तब तुम स्वीकार करते हो । क्योंकि तब सत्य तुम्हारे शास्त्र जैसा मालूम होने लगाता है । तुम्हारे शास्त्र पर भी धूल जमी है बहुत । जब समय की धूल जम जाती है  शास्त्रों पर । तो वह परंपरा बन जाता है । जब शास्त्र सत्य को जन्माता नहीं । सत्य
की कब्र बन जाता है । तब तुम स्वीकार करते हो । इसीलिए तुम स्वीकार करते हो । कब्रें कब्रें सब 1 जैसी होती है । क़ब्रों में तो सिर्फ नाम का ही फर्क होता है । जिंदा आदमियों में फर्क होता है । कब्र किस
की है । पत्थर पर लिखा होता है । बस इतना ही फर्क होता है । और तो कोई फर्क नहीं होता । धम्म पद । जब कब्र बन जाता है । तो गीता की कब्र । और कुरआन की कब्र । और वेद उपनिषद या बाइबल की कब्र में कुछ फर्क नहीं रह जाता है । तब तुम स्वागत करते हो । तुम पुराने का स्वागत करते हो । सत्य जब नया होता है । तब सत्य होता है ।
जितना नया होता है । उतना ही सत्य होता है । क्योंकि उतना ही ताजा
ताजा परमात्मा से आया होता है । जैसे गंगा गंगोत्री में जैसी स्वच्छ है । फिर वैसी काशी में थोड़ी ही होगी । हालांकि तुम काशी जाते हो पूजने । काशी तक तो बहुत गंदी हो चुकी । बहुत नदी नाले गिर चुके । बहुत अर्थ मिश्रित हो चुका । न जाने कितने मुर्दे बहाये जा चुके । काशी तक आते आते तो गंगा अपवित्र हो गई । कितनी ही पवित्र रही हो गंगोत्री में । जैसे वर्षा होती है । तो जब तक पानी की बूंद न जमीन नहीं छुई । तब तक वह परम शुद्ध होती है । जैसे ही जमीन छुई । कीचड़ हो गई । कीचड़ के साथ 1 हो गई । ओशो
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25 दिसम्बर 1973 वुडलैंडस अपार्टमेंट । बम्बई । भारत । पतंजलि योग सूत्र । Alfa & Omega - पतंजलि बुद्ध पुरुषों की दुनिया के आइंस्टीन हैं । वह अंतर्जगत के सबसे बड़े वैज्ञानिक हैं । वे ही प्रारम्भ हैं । वे ही अंत हैं । 5 000 वर्षों में कोई उनसे ज्यादा उन्नत नहीं हो सका । लगता है । उनसे ज्यादा उन्नत हुआ ही नहीं जा सकता । वे अंतिम वचन ही रहेगें । क्योंकि यह जोड़ ही असंभव है । वैज्ञानिक द्रष्टिकोण रखना । और आतंरिक जगत में प्रवेश करना । करीब करीब असंभव संभावना है । वे बड़ी मजबूत तर्कसंगत प्रष्ठभूमि बनाये रखते हैं । वे विश्लेषण करते हैं । विच्छेदन करते हैं । पर उनका लक्ष्य हृदय ही है । वे चाहते हैं कि तुम तर्क के द्वारा तर्क के पार चले जाओ ।
पतंजलि के योग सूत्र के पहले सूत्र " अथ योगानुशासनम " अर्थात अब योग का अनुशासन समझने का प्रयास करें । अब शब्द मन की उस अवस्था की ओर संकेत करता है कि अब तुमने सभी इच्छाओं की व्यर्थता को पूरी तरह जान लिया है । संसार का सारा पागलपन अच्छी तरह तुम्हारी समझ में आ गया है । तुम्हारा मोह भंग हो गया है । अब जीवन अर्थहीन हो गया है । भविष्य के लिए अब कुछ बचा नहीं ।
पतंजलि कहते हैं कि यदि ऐसा क्षण आ गया है । तो अब योग का अनुशासन, जिज्ञासा जब मुमुक्षा बन जाती है । 1 अभीप्सा जाग उठती हैं । आशाओं और सपनों की सारी गति समाप्त हो जाती है । तभी योग का अनुशासन प्रारम्भ होता है । अनुशासन का अर्थ है - अपने भीतर 1 व्यवस्था निर्मित करना । तुम जो हो अन्दर से विचारो की 1 भीड़ हो । योग तुम्हारे भीतर एकजुट केंद्र का निर्माण करना चाहता है । अब तुम्हें लयबद्ध होना होगा । 1 बनना होगा । और जब तक तुम स्वकेन्द्रित self centered   न हो जाओ । तुम सीख नहीं सकते । क्योंकि अनुशासन सीखने की क्षमता देता है । तो योग के अनुशासन का अर्थ है - होने की क्षमता । जानने की क्षमता । सीखने की क्षमता ।
पतंजलि कहते हैं - यदि तुम अपना शरीर हिलाये बिना मौन रहकर कुछ घंटे बैठ सकते हो । तब तुम्हारे भीतर होने की क्षमता बढ़ रही है । पर शरीर सतत चंचल है । बिना हिले डुले, बिना खुजलाये तुम बैठ ही नहीं सकते । यह सभी हिलने के बहाने हैं । अर्थात तुम शरीर के मालिक नहीं हो । आत्मस्थ नहीं हो । तुम 1 सतत कंपित ज्वरग्रस्त हलचल हो । 1 आसन पर बिना हिले डुले बैठने से शरीर गुलाम बनता है । और जितना ही शरीर तुम्हारा अनुगमन करेगा । उतना ही अधिक शक्तिपूर्ण और विराट बनेगा - तुम्हारे भीतर का अस्तित्व । स्थिर आसन केवल शारीरिक प्रशिक्षण नहीं है । गतिहीन शरीर के साथ मन भी गतिमय नहीं हो सकता । मन को गतिवान होने के लिये शरीर का सहयोग चाहिये । अंतस में केन्द्रस्थ होकर ही तुम विनम्र, ग्रहणशील बनोगे । खाली हो सकोगे । और इसी रिक्तता में गुरु अपने को तुममें उड़ेल सकता है ।
पतंजलि योगसूत्र - स्मृति के सब प्रकार से शुद्ध हो जाने पर जब वह स्मृति अपने मूल स्वरुप शून्य 0 के अर्थ में परिणत हो जाती है । तो उस अवस्था में नाम, रूप, ज्ञान तीनों ही नहीं रहते । इसे ही निवितर्क समाधि कहते है । इसमें साधक स्वयं ब्रह्मरूप ही बन जाता है । अतः उसे तत्परायण कहते हैं । इस निर्विकल्प समाधि का फल । जो कि निर्बीज समाधि है । वही वास्तव में ब्रह्म की प्राप्ति है । इसे समापत्ति कहते हैं । इस अवस्था में पहुंचे हुए पुरुष को ब्रह्मवेत्ता कहते हैं । शुद्ध ब्रह्मतत्त्व ( साक्षी ) से प्रथम मन सत्ता उपजी । उसने जब आकाश को चेता । तब आकाश हुआ । उसके उपरान्त पवन हुआ । फिर अग्नि और जल हुआ । और उसकी दृढ़ता से पृथ्वी हुई । तब चित्त शक्ति के दृढ़ संकल्प से 5 भूतों को प्राप्त हुई । और अन्तःकरण जो सूक्ष्म प्रकृति है । पृथ्वी, तेज और वायु से मिलकर भोजन में बना । उसको जब पुरुष भोजन करते हैं । तब वह परिणाम होकर वीर्य और रुधिर रूप होकर गर्भ में निवास करता है । जिससे मनुष्य उपजता है । पुरुष जन्म मात्र से वेद पढ़ने लगता है । फिर गुरु के निकट जाता । और क्रम से उसकी बुद्धि विवेक द्वारा चमत्कारवान हो जाती है । तब उसको ग्रहण और त्याग और शुभ अशुभ में विचार उपजता है । और निर्मल अन्तःकरण सहित स्थित होता है । और क्रम से सप्त भूमिका चन्द्रमा की तरह उसके चित्त में प्रकाशती हैं ।
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किसी क्षण केवल जीकर देखो - जीवन का आदर्श क्या है ? 1 युवक ने पूछा है । रात्रि घनी हो गयी है । और आकाश तारों से भरा है । हवाओं में आज सर्दी है । और शायद कोई कहता था कि कहीं ओले पड़े हैं । राह निर्जन है । और वृक्षों के तले घना अंधेरा है । और इस शांत शून्य 0 घिरी रात्रि में जीना कितना आनंदमय है । होना मात्र ही कैसा आनंद है । पर हम " मात्र जीना " नहीं चाहते हैं । हम तो किसी आदर्श के लिए जीना चाहते हैं । जीवन को साधन बनाना चाहते हैं । जो कि स्वयं साध्य है । यह आदर्श दौड़ सब विषाक्त कर देती है । यह आदर्श का तनाव सब संगीत तोड़ देता है । अकबर ने 1 बार तानसेन से पूछा था - तुम अपने गुरु जैसा क्यों नहीं गा पाते हो ? उनमें कुछ अलौकिक दिव्यता है । उत्तर में तानसेन ने कहा था - वे केवल गाते हैं । गाने के लिए गाते हैं । और मैं । मेरे गाने में उद्देश्य है । किसी क्षण केवल जीकर देखो । केवल जीओ । जीवन से लड़ो मत । छीना झपटी न करो । चुप होकर देखो । क्या होता है । जो होता है । उसे होने दो । जो है - उसे होने दो । अपनी तरफ से सब तनाव छोड़ दो । और जीवन को बहने दो । जीवन को घटित होने दो । और जो घटित होगा । मैं विश्वास दिलाता हूं - वह मुक्त कर देता है । आदर्श का भ्रम सदियों पाले गये अंधविश्वासों में से 1 है । जीवन किसी और के लिए । कुछ और के लिए नहीं । बस जीने के लिए है । जो " किसीलिए " जीता है । वह जीता ही नहीं है । जो केवल जीता है । वही जीता है । और वही उसे पा लेता है । जो कि पाने जैसा है । वही आदर्श को भी लेता है । उस युवक की ओर देखता हूं । उसके चेहरे पर 1 अदभुत शांति फैल गयी है । वह कुछ बोलता नहीं है । पर सब बोल देता है । कोई 1 घंटा मौन और शांत बैठकर वह गया है । वह बदलकर गया है । जाते समय उसने कहा है - मैं दूसरा व्यक्ति होकर जा रहा हूं ।
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जब तुम सिनेमा हाल में बैठते हो । तो हर चीज तुम्हारे सामने पर्दे पर दिखती है । रंगों का बहाव, रूप, गीत और संगीत, सब कुछ । लेकिन मजेदार बात यह है कि पर्दे पर कुछ भी नहीं है । सब कुछ तुम्हारे पीछे है । जहाँ प्रोजेक्टर लगा हुआ है । वहाँ से चीजें पर्दे पर प्रक्षेपित की जा रही हैं । और हम उन्हें पर्दे पर देख रहे हैं । जहाँ वे असल में नहीं हैं । तुम कभी भी वहाँ नहीं देखते । जहाँ वे हैं ? बल्कि तुम उनकी तरफ पीठ रखते हो । ओशो
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