16 जनवरी 2011

योग 1 अस्तित्वगत प्रयोग है


गुरु का अर्थ है - जिसके भीतर परमात्मा सर्वाधिक सजगता से जी रहा है । और तो कोई अर्थ नहीं है । चट्टान के भीतर ही परमात्मा है । लेकिन बिलकुल सोया हुआ । तुम्हारे भीतर भी परमात्मा है । लेकिन शराब पिया हुआ । चोर के भीतर भी परमात्मा है - लेकिन चोर । हत्यारे के भीतर भी परमात्मा है - लेकिन हत्यारा ।  गुरु का क्या मतलब है ? गुरु का इतना ही मतलब है । जिसके भीतर परमात्मा अपने शुद्धतम रूप में प्रकट है । जिसमें अग्नि शुद्धतम रूप में जल रही है । जिसमें धुआं बिलकुल नहीं है । निर्धूम अग्नि - गुरु का अर्थ है । अगर तुम्हें वहां नहीं दिखाई पड़ती - अग्नि । तो तुम्हें कहां दिखाई पड़ेगी ? जहां धुआं ही धुआं है । वहां दिखाई पड़ेगी ? जब निर्धूम अग्नि नहीं दिखाई पड़ती । तो जहां धुआं ही धुआं है । वहां तुम्हें कैसे दिखाई पड़ेगी ? वहां तो धुएं के कारण तुम्हारी आंखें बिलकुल बंद हो जाएंगी । गुरु के पास तुम्हारी आंख नहीं खुलती । तो तुम्हारी आंख पत्थरों के पास कैसे खुलेगी ? गुरु तो केवल प्रतीक है । अर्थ है । जिसने जान लिया । अगर तुम उसके पास झुको । तो तुम भी उसकी आंखों से देख सकते हो । और तुम भी उसके हृदय से धड़क सकते हो । और तुम भी उसके हाथों से परमात्मा को छू सकते हो । 1 बार तुम्हारी पहचान करवा देगा वह । फिर तो बीच से हट जाता है । फिर बीच में कोई जरूरत नहीं है । पर 1 बार तुम्हारी पहचान करवा देना जरूरी है । गुरु का इतना ही मतलब है कि परमात्मा तुम्हें अपरिचित है । उसे परिचित है । तुम भी उसे परिचित हो । परमात्मा भी उसे परिचित है । वह बीच की कड़ी बन सकता है । वह तुम्हारी मुलाकात करवा दे सकता है । वह थोड़ा परिचय बनवा दे सकता है । वह तुम दोनों को पास ला दे सकता है । 1 दफा पहचान हो गई । फिर वह हट जाता है । उसकी कोई जरूरत नहीं है फिर । लेकिन यह मत सोचो कि तुम समर्पण अस्तित्व के प्रति कर सकते हो । कर सको । तो बहुत अच्छा । वही तो है सारी शिक्षा सभी गुरुओं की कि तुम समर्पित हो जाओ । अस्तित्व के प्रति । लेकिन धोखा मत देना अपने को । कहीं यह न हो कि गुरु से बचने के लिए तुम कहो । हम तो अस्तित्व के प्रति समर्पित हैं । अस्तित्व क्या है ? वृक्ष के सामने झुकोगे ? पत्थर के सामने झुकोगे ? कहां झुकोगे ? झुकने की कला अगर तुम्हें आ जाए । तो गुरु तो केवल 1 प्रशिक्षण है । वह तुम्हें झुकना सिखा देगा । तिब्बत में जब शिष्य दीक्षित होता है । तो दिन में जितनी बार गुरु मिल जाए । उतनी बार उससे साष्टांग दंडवत करना पड़ता है । कभी कभी - हजार बार । क्योंकि जितनी बार गुरु आश्रम में शिष्य रहता है । गुरु गुजरा । फिर शिष्य मिल गया । पानी लेने जा रहे थे । बीच में गुरु मिल गया । भोजन करने गए । गुरु मिल गया । जब मिल जाए । तभी साष्टांग दंडवत । पूरे जमीन पर लेटकर । पहला काम - साष्टांग दंडवत । 1 युवक 1 तिब्बती मानेस्ट्री में रहकर मेरे पास आया । मैंने उससे पूछा -  तूने वहां क्या सीखा ? क्योंकि वह जर्मन था । और 2 साल वहां रहकर आया था । उसने कहा कि - पहले तो मैं बहुत हैरान था कि यह क्या पागलपन है । लेकिन मैंने सोचा । कुछ देर करके देख लें । फिर तो इतना मजा आने लगा । गुरु की आज्ञा थी कि जहां भी वह मिलें । उसको झुकूं । फिर धीरे धीरे जो भी आश्रम में थे । जो भी मिल जाते । साष्टांग दंडवत में इतना मजा आने लगा कि फिर मैंने फिक्र ही छोड़ दी कि क्या गुरु के लिए झुकना । जो भी मौजूद है । फिर तो मजा इतना बढ़ गया कि लेट जाना पृथ्वी पर सब छोड़कर । ऐसी शांति उतरने लगी कि कोई भी न होता । तो भी मैं लेट जाता । साष्टांग दंडवत करने लगा - वृक्षों को । पहाड़ों को । झुकने का रस लग गया । तब गुरु ने 1 दिन बुलाकर मुझे कहा । वह युवक मुझसे बोला । अब तुझे मेरी चिंता करने की जरूरत नहीं । अब तो तुझे झुकने में ही रस आने लगा । हम तो बहाना थे कि तुझे झुकने में रस आ जाए । अब तो तू किसी के भी सामने झुकने लगा है । और अब तो ऐसी भी खबर मिली है कि तू कभी कभी कोई भी नहीं होता । और तू साष्टांग दंडवत करता है । कोई है ही नहीं । और तू दंडवत कर रहा है । उस युवक ने मुझे कहा कि - बस झुकने में ऐसा मजा आने लगा - ओशो ।
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दूर आकर्षित करता है । पास विकर्षित करता है । सातवें अंबर के पार बैठा भगवान हमे लुभाता है । ह्रदय में भी प्रभु बैठें हैं । इसका हमें यकीन नहीं होता । दूर के ढोल सुहावने । इसका असर ये होता है कि हम सदा भागते ही रहते हैं । भागते ही रहते हैं । पास की वस्तुओं का आकर्षण क्यों खो जाता है - मन में । और दूर की वस्तुओं पर क्यों लट्टू हो जाता है मन । इतनी सी बात समझ में आ जाय । तो यही टर्निंग प्वाइंट बन जाता है । और इसी बात पर बदल जाती है - जिंदगी ।
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तुर्गनेव की 1 बड़ी प्रसिद्ध कथा है । 1 गांव में 1 महामूर्ख था । लोग उस पर बहुत हंसते थे । गांव का महामूर्ख । सारा गांव उस पर हंसता था । आखिर गांव में 1 फकीर आया । और उस महामूर्ख ने उस फकीर से कहा कि - और सब पर तुम्हारी कृपा होती है । मुझ पर भी करो । क्या जिंदगी भर मैं लोगों के हंसने का साधन ही बना रहूंगा ? लोग मुझे महामूर्ख समझते हैं । और मैं हूं नहीं । फकीर ने कहा - 1 काम कर । जहां भी कोई किसी ऐसी चीज की बात कर रहा हो । जिसको सिद्ध करना कठिन हो । तू विरोध में हो जाना । जैसे कोई कह रहा हो कि ईश्वर की कृपा । तू फौरन पकड़ लेना शब्द कि कहां है ईश्वर । कैसा ईश्वर ? सिद्ध करो । कोई कहता हो । चांद सुंदर है । फौरन पकड़ लेना । जबान पकड़ लेना कि क्या प्रमाण है ? मैं कहता हूं । कहां है सौंदर्य ? कैसा सौंदर्य ? कोई कहता हो । गुलाब का फूल सुंदर है । कोई कहता हो । यह स्त्री जा रही है । देखो । कितनी प्रसाद पूर्ण है । कितनी सुंदर । पकड़ लेना जबान उसकी । छोड़ना मत । जहां भी सौंदर्य की । सत्य की । शिवम की कोई चर्चा हो रही हो । तू पकड़ लेना । क्योंकि न सत्य सिद्ध होता । न सौंदर्य सिद्ध होता । न शिवम सिद्ध होता । ये चीजें सिद्ध होती ही नहीं । इनके लिए कोई प्रमाण नहीं है । और कोई जब सिद्ध नहीं कर पाएगा । तो तू 7 दिन में देखना । गांव भर तुझे पंडित मानने लगेगा । उसने । महामूर्ख तो था ही । वह उसके पीछे पड़ गया लाठी लेकर । वह गांव में घूमने लगा । उसने लोगों की बोलती बंद कर दी । उसको लोग देखकर चुप हो जाते कि कुछ मत कहो । कोई कह रहा है कि शेक्सपियर की किताब बड़ी सुंदर है । वह खड़ा हो जाता कि किसने कहा ? कोई कहता - यह चित्र देखते हो । चित्रकार ने बनाया है । कितना प्यारा । वह कहता - इसमें है क्या ? रंग पोत दिए हैं । कोई मूरख पोत दे । इसमें रखा क्या है ? इसमें तुम्हें दिखायी क्या पड़ रहा है ? उसने सारे गांव को चौकन्ना कर दिया । 7 दिन के भीतर गांव में यह अफवाह फैलने लगी कि यह आदमी महा पंडित हो गया है । महामूर्ख नहीं है । यह ज्ञानी है । हमने अब तक इसे पहचाना नहीं । वह वही का वही आदमी है । लेकिन गांव की दृष्टि उसके बाबत बदल गयी ।
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ध्यान शुद्ध रूप से 1 समझ है । यह प्रश्न केवल शांत होकर बैठ जाने का नहीं है । न यह प्रश्न मंत्र जाप करने का है । यह प्रश्न तो मन की सूक्ष्म कार्य विधि को समझने का है । यदि तुम मन की कार्य विधि को 1 बार समझ गये । तुम्हारे अंदर 1 बहुत बड़ी जागरुकता या होश का उदय होता है । जिसका मन से कोई संबंध नहीं । इस जागरुकता का उदय तुम्हारे अस्तित्व से । तुम्हारी आत्मा से । और चेतनता से होता है ।.
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योग विश्वास नहीं है । इसलिए यह कठिन है । दुष्कर है । और कई बार
तो लगता है कि बिलकुल असंभव है । योग 1 अस्तित्वगत प्रयोग है । तुम किसी विश्वास के द्वारा सत्य को नहीं पाओगे । बल्कि अपने ही अनुभव द्वारा पाओगे । अपने ही बोध द्वारा उसे उपलब्ध करोगे । और इसका अर्थ हुआ कि तुम्हें आमूल स्वप्न से स्वपांतरित होना होगा ।
तुम्हारा दृष्टिकोण । तुम्हारे जीने का ढंग । तुम्हारा मन । तुम्हारे चित्त का पूरा ढांचा । यह सब जैसा है । उसे चकनाचूर कर देना होगा । कुछ नये का सृजन करना होगा । उसी नव तत्व के साथ तुम यथार्थ के सम्पर्क मे आ सकोगे ।
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