03 जून 2012

ये सपना मुझे बार बार क्यों दिखता है

प्रिय कुलश्रेष्ठ जी ! नमस्कार । मैं महेन्द्र प्रसाद भिलाई से निर्मल बंसल का दोस्त । आपको पहली बार मेल भेज रहा हूँ । मैं गुरुजी से पहली बार 1 may को मिलकर और 2 may को मुझे हँस दीक्षा का दान मिला । जिसमें मुझे पहली बार बङे अच्छे अनुभव प्राप्त हुये । और हो रहे हैं । पर मेरी एक समस्या है कि मुझे हँस दीक्षा से पहले से कुछ सपने बराबर आते रहे हैं । जो कि  अक्सर सच हो जाते हैं । मैं उनको लेकर के परेशान रहता हूँ । जो अब भी बदस्तूर जारी हैं । इसके पीछे भी एक घटना है । मैंने और मेरे दोस्त ने मिलकर एक मकान किराये से लिया था । जब मैं पहली बार वहाँ रहने के लिये गया । तो जैसे ही मैं दरवाजा खोलने लगा । तब ना जाने कहाँ से एक बहुत बङा साँप आ गया । और मेरे बराबर खङा होकर फ़ूँ फ़ूँ करने लगा । और मेरी डर से एक तरह से घिघ्घी बंध गयी । और ना जाने क्या हुआ कि वह साँप फ़िर पलट कर चला गया । ये सीन जब भी याद आता है । तो मेरे रोंगटे खङे हो जाते हैं । उसके बाद में कभी भी उस मकान में नहीं गया । और अब भी मुझे सपने में साथ सोया हुआ या घूमता हुआ दिखाई देता है । ये सपना रुटीन में हर एक दो दिन में दिखाई देता है । इसका क्या कारण हो सकता है ? और मेरा आपसे एक प्रश्न है कि - सगुण भक्ति में आदमी भौतिक सुखों को प्राप्त करता है । जबकि अद्वैत भक्ति में वैराग्य को प्राप्त करता है । ये मेरा अनुभव है । ऐसा क्यों ?  आपका - 
महेन्द्र प्रसाद ।
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महेन्द्र जी ! सत्यकीखोज पर प्रथम प्रत्यक्ष आगमन पर आपका बहुत बहुत स्वागत है । आपसे मिलकर बेहद खुशी हुयी । हालांकि आप चित्र रूप में पहले ही ब्लाग पर आ गये । पर शब्द रूप में अभी आये । आते रहियेगा । और अपने रोमांचक सपने बताते रहियेगा । 
चलिये आपकी स्वपन जिज्ञासा पर बात करते हैं । इसी ब्लाग पर आपके जैसे समस्या गृस्त कुछ लोग मुझे मिले । जिनमें कोलकाता के मनोज जी थे । पटियाला के - हैप्पी । और अभी याद नहीं आ रहे । नेट जाल से बाहर संसार के माया जाल में तो कई लोग मिले ।
दरअसल जिन्दगी में - अच्छा बुरा । सुखद दुखद । सुहावना डरावना । रंगीन गमगीन । सभी संस्कारों का खेल है । पर ज्यादातर क्योंकि सामान्य संस्कार होते हैं । अतः हम उनके अभ्यस्त होते हैं । क्योंकि हम देखते हैं कि - वैसा अन्य बहुतों के साथ हो रहा है । अतः वह हमें प्रभावित नहीं करता । पर कुछ अलग सा स्पेशल सा - शऽऽशऽऽऽ कोई है ? वीराना । तहखाना । पुरानी हवेली । पुराना मन्दिर । जी हारर शो । हमें कुछ डरा देते हैं ।
कोई बात नहीं । दरअसल आपके साथ जो घटता है - वह आपका ऐसा ही प्रबल संस्कार है । पर खुशी इस बात की है कि - ये आपका दुश्मन संस्कार नहीं है । बल्कि मित्र संस्कार हैं । पर क्योंकि आपका ये ( पूर्व
जन्मा ) मित्र अपने कर्माकार से सर्पाकार हो गया है । इसलिये आपको भय लग जाता है । जी हाँ ! अक्सर पूर्व जन्मों ( भले ही लाखों वर्ष पहले ) के 84 लाख योनियों में गये परिचित लोग अपने क्षीण या प्रबल संस्कारों के चलते उसी जन्म की दोस्ती दुश्मनी के अनुसार जब इस जन्म में मिलते हैं । तो भी - हाय हैल्लो कहने से नहीं चूकते । अगर दुश्मन रूप होते हैं । तो 84 के बाबजूद भी दुश्मनी निकाल लेते हैं । आपने देखा होगा । नागिने कैसे ( अपने पूर्व जन्म के प्रेमी के इस जन्म में ) आदमियों के गले पैरों में लिपट जाती हैं । क्योंकि वे बावफ़ा होती हैं । आपने किसी नाग को किसी औरत से लिपटते कभी देखा ? नहीं देखा ना । क्योंकि आदमी हमेशा बेवफ़ा होता है । वह उसी जन्म मुश्किल से झेलता है । इसी तरह लोगों के घरों में पले गाय भैंस बकरी कुत्ते कुतिया तोता मैंना आदि भी खामखाह नहीं होते । वे पूर्व जन्म के किसी न किसी रूप में सम्बन्धी ही होते हैं । घर के माँ बाप ( मुखिया के ) अक्सर कुत्ता या कुतिया के रूप में संस्कार पूरा करने आते हैं । और फ़िर अपने ही नाती बहुओं से डंडा खाते हैं । सन्तों की बात सुनते नहीं । व्यर्थ जन्म गंवाते हैं । और पशुवत जीवन से 84 में जाते हैं ।
खैर ..कुल मिलाकर जो साँप राजा आपको सपने या हकीकत में डराता है । वो वास्तव में आपका मित्र रूप परिचित है । उससे आपको कैसा भी कोई खतरा नहीं है । लेकिन मित्र रूप ज्ञात हो जाने पर भी । अब उससे 
मित्रता न करना । अब क्योंकि आप हँस ज्ञान में हो । ये संस्कार बहुत जल्दी क्षीण हो जायेगा । और फ़िर आपको दिखना बन्द हो जायेगा । बात खत्म ।
सगुण भक्ति में भौतिक सुख जबकि अद्वैत भक्ति में वैराग - वास्तव में ये सब तोताराम पंडित का फ़ैलाया भृम जाल है । हकीकत में ऐसा कुछ नहीं है । लोगों ने सगुण निर्गुण ज्ञान वैराग द्वैत अद्वैत शब्द बच्चों की तरह याद कर लिये हैं । उनके सही अर्थ भी उनको मालूम नहीं । और अपने अपने मन अनुसार मनगढंत कथायें सोच ली हैं । जिस अद्वैत भक्ति से ही सबको ( महा शक्तियों ) ऊर्जा और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है । उससे भला वैराग कैसे हो सकता है ? आपको राजीव बाबा किसी भी एंगल से वैरागी लगता है । हमारे घर के पास ही हाइडिल कालोनी ( अद्वैत ) है । उनकी लाइट भी कभी नहीं जाती । मुफ़्त में जलाते हैं । हीटर पर खाना । कूलर । ए सी जाने किस किस तरह विधुत का प्रयोग करते हैं । वो भी बिलकुल मुफ़्त । और हम जो बिल देते हैं । हमारी लाइट फ़िर 
भी काट दी जाती है । क्योंकि वो जनता ( द्वैत - सगुण ) कनेक्शन के अंतर्गत आती है । आप गहरायी से सोचिये । हम सगुण भक्ति ( बिल भरने के बाद भी ) के बाद भी लाइट जाने पर वैरागी बनने पर मजबूर हैं - नारि मरी घर सम्पत्ति नासी । चाँद घुटाय भये सन्यासी । और वे निर्गुण ( मुफ़्त में ) भक्ति के बाद भी मौज करते हैं - मम दर्शन फ़ल परम अनूपा । जीव पाये जब सहज सरूपा । अतः आपका ये अनुभव एकदम तथ्य हीन और वास्तविकता रहित है - सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिमि हरि शरण न एक 1 हू बाधा । अतः बेहतर होगा । आप अपना अनुभव किस तरह से है ? क्यों है ? कुछ बतायें । तो फ़िर मैं परमात्मा को सूचना अधिकार कानून के तहत कंपलेंट कर पूछता हूँ । क्या मामला है । आपके अनन्य भक्त साधु बने कीर्तन करें । और आपके अन्य अन्य भक्त - ऊ ला ला करें । विश्वास रखें । मैं आपको सही जबाब दिलवाऊँगा । साहेब ।
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