19 जून 2012

न करो तो ठीक और करो तो बङिया

जय श्री गुरुदेव महाराज की ! आज संयोग से कुछ ऐसी घटना घटी कि आपको मेल करना पड़ा । अभी हमारे यहाँ 10 बजे दिन में लाइट आई । मैं कुछ काम कर रहा था । खाली हो के तुरंत कम्प्यूटर स्टार्ट किया । और आपका ब्लॉग पढने लगा । जो कि रोज की आदत है । पहले आपका ब्लॉग पढूँ । फिर बाकी काम होता रहेगा । आज का पोस्ट - मै और मेरी तनहाई..अक्सर ये बातें करते हैं.. पढ़ा । पढने के बाद कुछ नया पढने के लिए साइड में आपके और ब्लॉग को देखने लगा । तो सबसे ऊपर find pease नाम से ब्लॉग मिला । जिसका लेख था - the fall of kal पर क्लिक करके वो ब्लॉग पढ़ा । पढने के बाद पता चला कि यह नया ब्लॉग
अशोक जी का है । जो कि आपके कहने से इंगलिश में शुरू हुआ है । मैं इसको पढने के तुरंत बाद ही इसका follower बन गया । और एक comment भी कर दी । क्योंकि इनकी लिखी इंगलिश ब्लॉग में सरल word का प्रयोग है । जिससे लोग आसानी से समझ सकते हैं । मेरे कमेंट का टाइम 11:35 था । इसके बाद मैंने अपना ई मेल चेक किया । जिसमें आपका भेजा हुआ massage मिला । जिसमे आपने इस ब्लॉग को पढने और कमेंट करने का सुझाव दिया था । ये संयोग की बात थी । या कुछ और ?
गुरु पूर्णिमा जो कि 3 जुलाई को पड़ रहा है । के अवसर पर चिंताहरण आश्रम के कार्यक्रम के बारें में भी कब क्या कैसे होगा ? अपने शिष्यों और पाठकों को बताने की कृपा करें । डॉ संजय केशरी । 
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Monday, June 18, 2012, 2:55:49 PM को डा. संजय का ये मेल प्राप्त हुआ ।
आजकल समय और तारीखों का हिसाब रखने की आदत सी पङ गयी है । जहाँ समय ही नहीं है । वहाँ का निवासी समय गणना करे । ये कुछ अजीव सा है ना ? पर हर चीज अपनी जगह पर महत्वपूर्ण है । परसों  ही मैंने हिसाब लगाया । ब्लाग शुरू किये मुझे लगभग 26 महीने हो गये । MARCH 2010 में मैंने ब्लाग शुरू किया था । अगर उद्देश्यपूर्ण ब्लागिंग की दृष्टि से गम्भीरता से देखा जाये । तो 6 महीने इसमें से हटाये जा सकते हैं । क्योंकि मैंने इसको बेहद हल्के फ़ुल्के ही लिया था । बीच बीच में काम भी रुक गया था । और सभी ब्ला्ग्स के URL अड्रेस चेंज करने से नये पाठक तो दूर पुराने स्थायी भी नहीं आ पाये । मेल द्वारा उन्हें नये अड्रेस का पता चला । इस तरह सिर्फ़ 20 महीने का आंकलन संतोषजनक से कहीं बहुत ऊपर के परिणाम घोषित करता है । पर मेरा उद्देश्य सफ़ल ब्लागिंग आदि तो दूर दूर तक नहीं है । कल मैं यही सोच रहा था । फ़िर क्या कुछ हासिल हुआ ? वास्तव में रिजल्टस चौंकाने वाले थे ।
अक्सर हम बहुत सी चीजों पर ध्यान नहीं दे पाते । यदि हमारे पास अपनी एक बङिया कोठी बंगला होता है । तो हम प्रायः उसका कोई महत्व नहीं समझते । जबकि दूसरे बहुत से अन्य अपने एक साधारण मकान की भी बङी तमन्ना रखते हैं । जो उनका अपना निजी हो । तव यही मेरे साथ है । उपलब्धियाँ अब मुझे आकर्षित नहीं करतीं । मेरा एक परिचित था । उसका तम्बाकू का बङा व्यापार था । उसके यहाँ छोटे नोट बोरियों में भरे जाते थे । और 100-100 के नोटों ( उस समय 500 या 1000 का नोट चलन में नहीं था ) की 
सील गड्डियाँ उसके पूरे बेड पर गद्दे के नीचे बिछी रहती थीं । आप ये न सोचें । ऐसा रईसी दिखाने या दौलत के घमण्ड की वजह से था । उसकी कंपनी में 24 घण्टे कार्य होता था । अतः पैसों का लेन देन चलता ही रहता था । तब बिस्तर से गद्दा हटाकर देना आसान था । मैंने अनुमान लगाया था । उसकी फ़र्म में स्वयं उसके कर्मचारी ही 10 लाख रुपया प्रतिमाह विभिन्न रूपों में चोरी करते थे । और ये बात उसे बखूबी पता भी थी । पर इस ( छोटी सी ) चोरी से उसकी सेहत पर कोई फ़र्क नहीं था । उपलब्धियाँ ही इतनी अधिक थीं । इसके बाबजूद वह जिन्दगी से उदासीन था । और बहुत से मामलों में बहुत बहुत गरीब था ।
- पैसा ही सब कुछ नहीं होता । वह अक्सर लोगों से कहता - और हर सुख किसी को नहीं मिलता ।
उसकी ये बात मुझे बिलकुल सही लगती है । अगर मैं अपनी ( योग ) सम्पदा का आंकलन करना चाहूँ । तो ये असम्भव ही है । क्योंकि निरंतर एकरसता एकाकीपन और पूर्ण निष्ठा से मुझे इसमें बहुत समय ( 10400 वर्ष ) हो गया । और अब यही मेरी नीरसता का कारण है । इसलिये मैं यहाँ एक तरह से Time pass कर रहा हूँ । जो कि मेरी मजबूरी ( संस्कारी प्रजनन देही की अंतिम औपचारिकतायें अगले 37 वर्ष तक ) ही है । मुझे शेष समय अब बहुत लम्बा प्रतीत हो रहा है । सच कह रहा हूँ । किसी फ़ौजी की पत्नी अपने पति के इंतजार में जिस तरह कलेंडर में तारीखों पर घेरा खींचती हुयी ( कि 1 दिन और कम हुआ ) खुद को तसल्ली देती है । ठीक वैसा ही । मैंने महाराज जी से बात की थी । मैं अपना टीका पूरना ( आयु को समय से पहले ही खत्म करना ) चाहता हूँ । 
उन्होंने कहा - कोई फ़ायदा नहीं । शेष संस्कारों के लिये आगे भी फ़िर इसी स्थिति से गुजरना होगा । फ़िर दोबारा यही लोग ( जिनसे संस्कार जुङे हैं । और ऊब महसूस होती है ) दूसरे रूपों में मिलेंगे । और उस वक्त तुम्हें इससे ज्यादा ऊब महसूस होगी । इसलिये धीरता और धैर्य से काम लो । देह धरे के दण्ड को भोगत है हर कोय । ज्ञानी भोगे ज्ञान से मूरख भोगे रोय । काया से जो पातक होई । बिनु भुगते छूटे नहीं कोई ।
इसी आधार पर मैं अक्सर सोचता रहता हूँ । सब कुछ मेरी जिन्दगी में ठीक वैसा ही चल रहा है । जिसकी महान आत्माओं को भी बेहद ख्वाहिश होती है । फ़िर भी 1 अनजानी सी ऊब है । मैंने महाराज जी से कहा - मैं एक बेहद लम्बी शीत निद्रा जैसी नींद में जाना चाहता हूँ । अब मुझसे ये सब नहीं होता
। महाराज जी हमेशा स्पष्ट ही उत्तर देते हैं । उन्होंने बहुत संक्षिप्त में इतना ही कहा - न करो तो ठीक । और करो  तो बङिया । इसका मतलब है । न करो तो ठीक स्थिति कहा जा सकता है । क्योंकि ( मेरा ) भजन तो फ़िर भी चलता ही रहेगा । और इस भजन के साथ इस विनाशी देह का परमार्थ कार्यों में उपयोग हो जाये । ये बङिया माना जायेगा । बात को गहरायी से समझें । ये कोई सामान्य उपदेश भर नहीं है कि ये भी ठीक । वो भी ठीक । ये घर की पंचायत भी नहीं कि चलो जैसे चाहा । निबटा ली । यहाँ किसी भी प्राप्ति में 1 सख्त कानून है 
। जिसके सभी बिन्दुओं पर गौर किया जाता है । और अखिल सृष्टि में किसी भी स्थिति पद के आंकलन का सिर्फ़ 1 ही गणित है । विभिन्न जटिल परिस्थितियों में दबाब सहन करने की क्षमता । और उसमें सम रहना ।  अगर उस समय ( अंतिम परिणाम )  दस्तावेज ये कहें । प्रत्येक परिस्थिति में प्रभावित होने का % 0 था । तो यही सर्वश्रेष्ठ स्थिति मानी जाती है । राम चाहो तो मर रहो । जियत न मिलयें राम । मरजीवा । मुरदे के समान जीना । यही सन्तमत का प्रमुख सिद्धांत है । और मुरदे को सुख दुख । मान अपमान । इच्छा अनिच्छा कुछ भी नहीं व्यापते । बस यहीं वो बिन्दु कह लीजिये । जहाँ मैं अंतिम सांसे लें रहा हूँ । अच्छा न लगना । ऊब होना । पर मैं जानता हूँ । ये भी मर जायेगा ।
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गुरु पूर्णिमा और अन्य पर श्री महाराज जी से बात होने पर ही सूचना प्रकाशित होगी । वैसे 3 दिन का कार्यकृम है । जिसमें अंतिम दिन भंडारा और 2 दिन सतसंग आदि होगा । 
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