04 जून 2012

बरसात की एक रात

श्री सदगुरु महाराज की जय । कभी कभी लगता है कि आप अपने उपर रख कर मेरी ही बात कर रहे होते हैं । क्योंकि मेरा भी बचपन ठीक इसी तरह की विद्याओं को सीखने में गुजरा है । शुरुआत मैंने और मेरे एक दोस्त ने सम्मोहन विद्या सीखने के साथ की । हम त्राटक ( बिंदु । मोमबत्ती । एवं घूमते शंकु चक्र । देखने का आइना ) पर ध्यान केन्द्रित करते थे । परन्तु कुछ खास उपलब्धि न मिली । फिर तंत्र को अपनी कसौटी पर कसने लगे । तंत्र में भी सम्मोहन में प्रयोग होने वाले तिलक में 1 रक्त की जरूरत होती है ( आप जानते ही है ? ) परन्तु हम दोनों में से कोई भी किसी स्त्री को नहीं जानता था । और उस रक्त ? का माँगना तो बहुत दूर की बात है । कुछ छोटे मोटे टोटके और मन्त्र तो मेरे मित्र ने सिद्ध कर लिये थे । परन्तु अधिकतर बड़े प्रयोग भैरवी के बिना नहीं हो सकते थे । सो उसे इसीलिये छोड़ दिया ।
फिर मैंने पुरे शौकिया तौर पर ज्योतिष की कई किताबे पढ़ी । और खास तौर पर स्त्रियों और लडकियों पर ज्योतिष की आजमाइश की । इसकी एक ख़ास वजह ये है कि - स्त्रियां अपने भविष्य को लेकर काफी उत्सुक होती हैं । और उनकी उत्सुकता वे प्रकट भी कर देती है । कई बार जीवन के 
उतारों में जब मेरी माँ मुझे किसी ज्योतिषी के पास लेकर जाती । तो जब वो किसी ग्रह की दृष्टि गलत राशि पर बताता । तो मेरी उससे बहस हो जाती थी कि - वो गलत है । आज समालखा में 1 परिवार मुझे न जाने क्या समझता है । वजह उनके प्रेम विवाह के लिये कुछ उपाय ( लाल किताब से ) जो कि हो भी गया । और मेरी खुशकिस्मत देखिये । वो 1 सफल प्रेम विवाह रहा । अन्यथा मेरी स्थिति उनकी नज़र में आज कुछ और ही होती । मेरी पत्री में ज्योतिषी योग भी बनता है । लग्न से तीसरे पर सूर्य शनि एवं बुध की युति से ( लग्न वृष ) पर ये सब कभी भी प्राथमिक नहीं रहा । प्राथमिक तो हमेशा से कुछ और ही रहा हैं ? आपका ब्लॉग पढते समय मैं 
वापिस अपने वर्तमान में लौट गया था । आज वो बीती बातें बहुत ही बचकानी लगती है । खैर ये 1 व्यक्तिगत पत्र है । बाकी जैसी प्रभु इच्छा ।
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अभी कल रात 4 june 2012 की ही आपको बात बताता हूँ । कल शाम 4 बजे से ही आगरा में मौसम अक्समात ठण्डा हो गया था । रात में हल्की बूँदा बांदी भी हुयी । कल शाम का लेख अधूरा रह जाने की वजह बाहर अलग अलग स्थानों से आये 1 रिटायर्ड शिक्षक और मेरे 1 पुराने परिचित थे । शाम 7 से कुछ पहले ये लोग वापिस हो गये । रात 9 बजे के लगभग जब मैं लेटा हुआ था । तभी मुझे लगा । कुछ गङबङ हो गयी । एक कंचा आकार की गोली मेरे अन्दर उतर गयी । घोर लापरवाही और उपेक्षा से मैं उसे निगल गया । 1 क्षण के लिये
झन्नाटा सा हुआ । भाङ में जा - मैंने उपेक्षा से कहा । कल मानसून वाली रात थी । खुली खिङकी से ठंडी हवा के तेज झोंके खिङकी से ही एकदम सटे मेरे बिस्तर पर समुद्री लहरों की तरह आ रहे थे । और बिस्तर के दूसरी तरफ़ एकदम नजदीक रखा टेबल फ़ैन अलग से फ़र्राटे भर रहा था । होण दे मौजा ही मौजा । भाङ में गया योग ध्यान - मैंने फ़िर कहा - आज मजे से सोऊँगा । लेकिन ?
शीघ्र ही मैं गहरी नींद की अथाह कालिमा में उतर गया । अंधेरे की 1 अदभुत शान्ति । कहीं कोई दृश्य नहीं । कोई भूमि नहीं । सृष्टि की कोई रचना नहीं । आकाश की तरह सर्वत्र निराधार ( भूमि रहित ) फ़ैला स्याह अंधकार । अंतरिक्ष के ऐसे हिस्सों में गहन ठंडक और अपूर्व शान्ति होती है । पर द्वैत के बहुत प्रकार के उच्च योगी भी इन स्थानों को कम ही देख पाते हैं । इसका कारण गहन अंधकार उनके तेज का शोषण कर लेता है । और वे वहीं भटक सकते हैं । फ़िर अपनी क्षमता से उस अंधेरे अथाह काले वीरान बियावान से बाहर नहीं आ सकते । बाहर आने हेतु भरपूर ऊर्जा ( तप तेज ) चाहिये । तब कोई
सामर्थ्यवान योग पुरुष के ही भाग्यवश वहाँ जाने पर वह उनको निकालता है । जैसे डूबते हुये अनाङी तैराक को कुशल तैराक निकालता है । ओशो ने ऐसे अंतिरिक्षीय स्थानों का अपने योग व्याख्यानों में कई बार सांकेतिक वर्णन किया है । हमेशा ( अधिकांश रातों ) की तरह अपने मुर्दा ( शरीर ) को त्याग कर मैं गया । फ़िर कोई सुबह 3 बजे ? ( क्योंकि चेतन होने पर... मेरी माँ नित्य की तरह 4 बजे शौचादि उपरान्त चाय आदि पीना खटर पटर शुरू कर देती हैं । इसलिये सही समय मालूम है )
सुबह 3 बजे ! मुर्दा चेतन होते ही गोली का असर होना शुरू हुआ । ( लेकिन इसके कुछ मूल रहस्य मैं खुलासा नहीं करूँगा । ) उस समय हल्की फ़ुहार पङ रही थी । हवा के साथ खिङकी से आते ठंडे पानी के नन्हें नन्हें छींटे मुझे भिगो रहे थे । सच्ची ! क्या मजा आ रहा था । पर कोई भी तंत्र या आवेश अपना कार्य करके ही समाप्त होगा । भले ही वह 10 दिन या 10 महीने बाद क्यों न हो । मैं अपने बिस्तर पर ही था । और अपने में था । तभी 1 तेज आवेश हुआ । यहाँ 2 स्थितियाँ बनती हैं । 1 अपने को नियंत्रित कर । यदि सामर्थ्य है । तो उस आवेश को झटक देना । प्रभाव हीन या नष्ट कर देना । 2 और यदि मजा लेना हो । तो अपने को ढीला छोङ देना । और कोई कोशिश नहीं करना । और मुझे ऐसी बातों में मजा ही आता है ।
तंत्र या द्वैत के निम्न योगों में बङा मजा आता है । बच्चों के खेलों जैसा । उच्च द्वैत अद्वैत योगों में जहाँ राकेट या हनुमान की तरह सीधा मन की गति से शान्त निश्चल भाव में ऊपर अंतरिक्ष में उठते चले जाते हैं । और इच्छित भूमि पर उतर जाते हैं । जबकि निम्न योगों में बच्चों के राउण्ड झूलों । आसमानी झूलों । सी सा आदि जैसा बल पूर्वक की गयी क्रियाओं जैसा मजा आता है । सो मैंने खुद को ढीला छोङ दिया । 1 तेज तूफ़ानी झपाटा सा आया । और मैं 15 सैकिंड में लाखों योजन दूर 1 तांत्रिक भूमि पर पहुँच गया । 60 फ़ुट ( इसे T में ऊपर सिर वाली लाइन मान लें ) की मेन डाबर रोड पर T आकार में 150 फ़ुटा ( इसे T में नीचे की खङी लाइन मानें ) चमचमाती रोड तिराहा बनाती हुये निकली थी । दरअसल ये उस लोक के तांत्रिकों का सिद्ध चौक था । मैं यहाँ पहले भी आ चुका था । जगह मेरी बहुत ही परिचित थी । मैंने अक्सर यहाँ तंत्र अनुष्ठान । शब अनुष्ठान । बाधा निवारण अनुष्ठान आदि होते देखे थे । ये तिराहा बस्ती से काफ़ी अलग थलग था । और आसपास खेत और गिने चुने वृक्ष ही थे । लेकिन आज यहाँ दृश्य रूप में कोई नहीं था । सिर्फ़ मुझे भी वहाँ अदृश्य कोई 1 ही था । ऐसा भास हो रहा था । मैं युधिष्ठर के महल की तरह थल में जल की लहरों का आभास कराने वाले T तिराहे के उस विशेष सिद्ध स्थान ( T में 150 फ़ुटा रोड जहाँ से शुरू ही हुयी ) से सिर्फ़ 4 फ़ुट दूर खङा था । किसी बहुत बङे दर्पण में धूप की रजत ( चाँदी ) चमक जिस तरह हिलती डुलती प्रतिबिम्बित होती है । सङक के करीब 70 बाई 70 वर्ग फ़ुट उस सिद्ध स्थान में वैसी चमक हमेशा होती रहती है । जैसा कि मैंने पहले बताया । इन निम्न लोकों में सभ्य
आचरण और नमन विनमृता आदि बेहद घातक हो सकती है । इसलिये मैं अक्षरसः वही शब्द कहूँगा । जो मैंने वहाँ कहे । सो मैंने कहा - साले ! तेरी माँ की ...।
यहाँ हर बार मुझे 1 खास अनुभव हुआ है । आप एकदम सीधे शान्त खङे नहीं रह सकते । शरीर में हल्का हल्का कंपन हिलना सा होता ही रहेगा । और 1 हल्की कसैली गंध के साथ घूमा ( दिमाग में चक्कर सा आना ) स्वतः आने लगता है । जैसे नशे में टुन्न कोई शराबी झूम रहा हो । मैंने पहले ही बताया । यदि मैं अपने को इस्तेमाल कर रहा होता । तब स्थिति दूसरी बनती है । लेकिन मैं पूर्णतः निष्क्रिय था । कुछ ही क्षण में तेज तूफ़ा्नी थपेङों में संभलने की लाख कोशिश करते हुये इंसान की तरह मैं डगमगाने लगा । इसके बाद फ़िर 1 झपाटा सा आया । और मैं अपने बिस्तर पर अर्धचेतन अवस्था में था । आधा खुद में । आधा आवेशित । मैंने फ़िर उसे सामान्य गाली दी । उसने ? बल पूर्वक मुझे बैठा दिया । और मैं किसी शक्तिशाली प्रेत आवेश की तरह हल्का हल्का झूलने लगा । दरअसल मुझे इन तीवृ वेग युक्त क्रियाओं में खुद बङा मजा आता है । और उस समय 1 अनोखा नशा सा अलग हो जाता है । इसके कुछ क्षण बाद ही मैं फ़िर 1 तेज झपाटे के साथ इसी प्रथ्वी पर 150 किमी दूर 1 परिचित शहर में परिचित घर में सिर्फ़ 4 सैकिंड में पहुँच गया । पहुँच गया । कहना गलत है । वो ही ले गया ? कहना सही है । तब इस गोली का रहस्य मुझे समझ में आया । घर में सभी लोग सोये पङे थे । अभी मुश्किल से सुबह के 3 बजकर 35 मिनट
हुये होंगे ।
वहाँ मैं बहुत लम्बी गैलरी में दरबाजे के बाहर खङा था । और लगभग उसी तूफ़ानी थपेङों और घूमा की डगमगाती स्थिति में वह ? मुझसे किसी कोरियोग्राफ़र की भांति डांस स्टेप कराता हुआ मेरे दोनों हाथों को कभी बाँये तो कभी दाँये जबरन कराता रहा । आवेश के 2 मिनट भी 2 घण्टे के समान होते हैं । मुझे झुँझलाहट सी होने लगी । मन किया । इसके 1 जोरदार झापङ लगाऊँ - साले ! तूने मुझे समझ क्या रखा है ? भाङ में जा । ईडियट । मैं अपने में इकठ्ठा होने लगा । और अगले ही क्षण में मैं वापिस अपने बिस्तर पर था । पर जैसा कि मैंने कहा । सृष्टि का नियम 
कानून है । कोई भी चीज अपना कार्य ( प्रभाव ) करके ही समाप्त होगी । फ़िर वो आपके पेट में गयी 1 कप साधारण चाय काफ़ी ही क्यों न हो । तब प्रेत सवारी की तरह मेरा सीना दबने लगा । गला रुँध गया । और ध्वनि रहित आवाज - ओऽ..ओऽ..ओऽ निकलने लगी । ये वो क्षण थे । जब मेरा अपने ऊपर कोई नियंत्रण नहीं था । और मैं पूरी तरह उसके ? शिकंजे में था । अन्दाजन कोई 2 मिनट ही मुश्किल से यह स्थिति रही होगी । कंचे का कार्य समाप्त हो गया । मैं आवेश से बाहर आ गया । भाग जा साले - मैंने बे आवाज ही कहा । और बिलकुल सामान्य हो गया ।
अब 1 बात सोचिये । ये मेरे लिये 1 पूर्णतः महत्व हीन सामान्य अनुभव था । दरअसल योगियों में ऐसी
स्थितियाँ उनका दैहिक ( ढांचा ) उपयोग हेतु होती हैं । जो सत्ता के आदेश से उपयुक्त माध्यम द्वारा सम्पन्न कराये जाते हैं । जैसे मानवीय सत्ता में भी कार्य अनुसार योग्य पदाधिकारी व्यक्ति को कार्य सौंपा जाता है । नये साधकों को प्रयोग अभ्यास की दृष्टि से ऐसे अनुभवों से गुजारा जाता है । भूत प्रेत अन्य दैवीय आवेशों का कारण मूलतः दुष्ट नीच ग्रह नक्षत्रों का योग होना होता है । पर इस पूरी घटना का मुझसे कोई कैसा भी सम्बन्ध नहीं था । लेकिन यदि यही घटना ग्रह नक्षत्रों के चलते मेरे किसी परिचित या ब्लाग पाठक के साथ घटी होती । तो वह मुझे तुरन्त मेल या फ़ोन पर सम्पर्क कर हङबङा कर इसका रहस्य जानने की कोशिश करता । पर यदि किसी अनजान इंसान के साथ घटी होती । तो वह संस्पेंस में बहुत समय तक डूबा रहता । डरा भयभीत रहता । यदि किसी से बाँटता । तो वह उपेक्षा से कहता - अरे ! वैसे ही कोई डरावना सपना देखा होगा । कुछ खास बात नहीं । डांट वरी यार । पर वह बेचारा उस ज्ञानी को कैसे समझाये कि वह सपनों को जानता है कि - वह कैसे होते हैं ? यह वैसा नहीं था । कुछ अलग था । ये सपना था ही नहीं । कुछ और ही था । पर ये क्या था ? अब कौन बतायेगा ?
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