03 जून 2012

राजीव तो 10 साल पहले ही मर गया

यधपि अभी बहुत से आधे अधूरे लेखों को पूरा करना है । कई प्रश्नों के उत्तर भी देने हैं । तथापि आध्यात्म या किसी भी 1 विषय पर काम करने से एकरसता सी आ जाती है । इसलिये कुछ परिवर्तन हेतु आज मैं आपको योग के आंतरिक तकनीकी रहस्यों पर कुछ गूढ बातें बताता हूँ । जो आपके जीव मूल के अहम भाव के अज्ञान वश उच्च ज्ञान प्राप्ति में बहुत बङी रुकावट होती हैं । इतनी बङी कि आप दीक्षा लेने के बाद और सालों नाम जप के बाद भी वो लाभ नहीं उठा सकते । जो इस कमी को दूर कर लेने पर बहुत शीघ्र ही उठाने लगेंगे । ध्यान रहे । ये बात दीक्षा वाले शिष्यों । दीक्षा भाव रखने वाले प्रेमियों । तथा एकदम नये पुराने सामान्य पाठकों पर भी लागू होती है ।
कोई 10 साल पहले मैं इस ( अपने ) अद्वैत मंडल ( नि:अक्षर ज्ञान ) का सदगुरु श्री शिवानन्द जी महाराज का पहला शिष्य था । इस मंडल की पूर्ण शिष्य परम्परा मुझसे ही शुरू हुयी है । कोई 1 साल बाद ही नियम अनुसार श्री महाराज जी ने मुझे प्रथम मानस पुत्र ( हालांकि सभी शिष्य गुरु के मानस पुत्र होते हैं । पर जिसको उत्तराधिकारी के तौर पर पुत्रवत माना जाता है । वो पुत्र ही होता है । बाकी शिष्य श्रेणी में ही आते हैं ) और मंडल का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया । यहाँ विशेष ध्यान रहे । बाद में दीक्षित होने वाले शिष्य कितनी भी मेहनत जप तप समर्पण कुछ भी करें । इस 1 के समान या इसका स्थान प्राप्त नहीं कर सकते । क्योंकि ऐसा होने पर सदगुरु का वचन झूठा हो जायेगा । और ये असंभव बात है । यहाँ एक दूसरे महत्वपूर्ण बिन्दु पर भी ध्यान दें । मेरे मंडल में शिष्य परम्परा में कोई भी अभी ऐसा नहीं है । जो - प्रति क्षण । 24 घण्टे । पूरे सप्ताह । 12 महीने । जीवन भर । और जीवन के बाद हमेशा के लिये - सनातन । इसी भक्ति में लगा रहता हो । अब दूसरा कोई भी काम उसे बचा ही न हो । तब जाहिर है । जब मैं ही आपको पूरा ज्ञान पूरे तरीके बताता हूँ । तो मुझमें और आप में ( साधकों के विभिन्न स्तर अनुसार ) एक निश्चित ज्ञान दूरी हमेशा बनी रहेगी । आप जब तक 10% तप वृद्धि कठिनता से करोगे । मेरी सरलता से न्यूनतम 40% तप वृद्धि अपने आप हो जायेगी । क्योंकि आप असमंजस स्थिति में योग करते हो । मैं निश्चित स्थिति में भक्ति ( योग और भक्ति का भारी अंतर समझें ) करता हूँ । 1 और भी महत्वपूर्ण बिन्दु है । जो मुझमें और आपमें बहुत बङा अंतर हमेशा ही रखेगा । विभिन्न तरह से जीवों को चेताने । उन्हें सदगुरु से मिलाने । उनके नव आत्मिक जन्म आदि तमाम परमार्थी कार्य ऐसे हैं । जिनसे परमात्म निकटता स्वतः बिना प्रयास बढती ही जाती है । यानी सरल शब्दों में उस ( निमित्त आत्मा ) का प्रकाश प्रभाव बढता ही जाता है । अब इसमें से सिर्फ़ 1 ही बिन्दु जीवों को चेताना यानी सच्ची हँस ( या परम हँस ) दीक्षा दिलाना ही मान लो । कोई साधक पूरी तरह से मुझसे प्रतिस्पर्धा के तौर पर ही हठपूर्वक ऐसा करने लगे । तो भी वह गणित अनुसार भी बराबरी नहीं कर सकता । क्योंकि इसमें चेन सिस्टम का नियम कार्य करता है । मेरे चेताये जीव अपने अपने स्तर अनुसार दूसरों को चेता रहे हैं । अगर आप मेरे मंडल से किसी भी माध्यम से जुङे ( दीक्षा युक्त ) हैं । तो वह चेन मेरी ही होगी । जाहिर है । उसमें पुण्य़ % कमीशन के रूप में मुझे मिलेगा । अब आप सोचिये । जब मैं पहला शिष्य हूँ । तो आप किसी भी तरीके से इस रिकार्ड को नहीं तोङ सकते ।
यहाँ एक बात थोङी अलग हो जाती है । कुछ जीव जिनकी संयोगवश श्री महाराज जी से भेंट हो गयी । या खुद या मेरे बजाय अन्य किसी निमित्त द्वारा चेते । वो मेरी प्रत्यक्ष चेन का उस तरह से हिस्सा नहीं होते । जैसे मेरे द्वारा बनी शिष्य श्रंखला के हँस जीव । पर जाहिर है । सदगुरु मंडल के कभी 2 उत्तराधिकारी नहीं होते । और उनकी केस फ़ाइलें किसी न किसी रूप में मेरे पास ही आयेंगी । इसलिये आप कैसे भी घुमा फ़िराकर गणित लगा लो । किसी भी साधक का सूचकांक मुझसे ऊपर कभी नहीं जाने वाला ।
एक और महत्वपूर्ण बात - जब भी कोई नयी दीक्षा होती है । नियम अनुसार उसकी जमानत होती है । क्योंकि वह अभी तक काल माया का कैदी था । और नियम अनुसार ( सजा से ) मुक्त होने से पूर्व उस पर ( पाप कर्म अनुसार ) मुकद्दमा चलेगा कि - वो क्यों अमी रस ( हँस आत्मा का अमृत भोजन ) छोङकर विष्ठा ( जीव रूपी काग का वासना भोजन ) में रस लेने लगा । सार सार को गहने वाले ( ज्ञान युक्त ) हँस से ( अज्ञान की ) कांव कांव करने वाला कौवा कैसे बन गया ? अब जैसे आपकी मेरे द्वारा दीक्षा हुयी । तो आपका जमानती मैं हुआ । आपके पाप पुण्य़ का पूरा जिम्मा मेरा हो जाता है । आप अच्छा करते हो । तो शाबाशी मुझे भी मिलेगी । मूढता दिखाते हो । तो मार भी मेरे हिस्से में आती है । सदगुरु का सीधा सम्पर्क निर्मल और उच्चता प्राप्त शिष्यों से ही होता है । सभी से नहीं । आप ( साधारण शिष्यों ) को जो सनातन ऊर्जा ( स्थिति अनुसार ) या दिव्यता लाभ प्राप्त होता है । वह ऐसे ही ज्ञान निमित्त शिष्य से रूपांतरित होकर आता है ।
अब जाहिर है । जब तक आप मुक्त ( चाहे 10 जन्म लग जायें ) या किसी स्थिति उपाधि ( पूर्ण योग भक्ति में विभिन्न कारणों से असफ़ल होने वाले हँस ) को प्राप्त नहीं हो जाते । तब तक आप अपने जमानती निमित्त के अधीन रहो्गे । जब मनुष्यों के साधारण अदालती मुकद्दमों में यह नियम कङाई से लागू होता है । तब परमात्मा का नियम तो हर मामले में बहुत सख्त है । उसमें कोई ढिलाई कभी भी क्षमा नहीं होती ।
आपके अज्ञान रूपी अहम को गिराने और पूर्ण भाव युक्त सही समर्पण का रास्ता दिखाने हेतु इस गूढ अध्याय को मैंने आज बताया ।
अब आईये । आपकी उस अज्ञानता पर बात करते हैं । जिसको दूर करने की प्रेरणा से और आपके ठोस लाभ की आंकाक्षा से ये लेख लिखा है । और वो बात है - सम्बोधनों में छिपा रहस्य । एक सच्चा साधु सन्त सिर्फ़ साधु सन्त ही होता है । वह किसी का भी भाई भतीजा चाचा फ़ूफ़ा मामा मौसा कुछ भी नहीं होता । यहाँ तक कि अपने स्वजनों का भी । रक्त सम्बन्धों का भी । क्योंकि सच्ची आत्म ज्ञान की दीक्षा होने पर उसका नया आत्मिक जन्म हो जाता है । और आत्म जगत में सांसारिक सम्बन्ध हैं ही नहीं । वहाँ हँस । परम हँस या अन्य उपाधियाँ हैं । आप पूर्ण हँस साधक को आराम से कबीर कह सकते हैं - काया में जो रमता वीर । कहते उसका नाम कबीर । यानी वह जीवात्मा - जो काया में रमण करते चेतन वीर को सही अर्थों में आंतरिक रूपेण यथार्थ तात्विक तौर पर जान गया । वह कबीर ही है । जिसको आत्मा का यथार्थ बोध होने लगा । वह फ़िर बुद्ध ही है । जो इस वीर की वीरता (  पूर्ण से बहुत कम पर साधारण से बहुत ज्यादा ) को महा स्तर पर जान गया । वह महावीर ही है । और वह प्रिय अप्रिय भी नहीं होता । वह कोई राजीव भी नहीं होता । वह कुलश्रेष्ठ भी नहीं होता ।
दरअसल जैसे ही आप किन्हीं भी शब्दों का प्रयोग करते हैं । तो व्याकरण नियम अनुसार अक्षरों की धातुयें सक्रिय हो जाती है । और वे शब्द रचना के अनुसार आपको पदार्थ फ़ल देती है । उदाहरण के लिये आपने मान लीजिये - प्रिय राजीव भाई कहा । अब आपने तो अपनी समझ से बहुत अच्छा और प्रेम युक्त भाव कहा । पर पदार्थ का नियम और निश्चित रासायनिक क्रिया आपको असली चीज से बहुत दूर ले गये । क्योंकि न तो मैं प्रिय ( सम ) हूँ । न ही राजीव हूँ । न ही कुलश्रेष्ठ हूँ । और न ही भाई हूँ । और न ही आपका गुरु भाई ( क्योंकि तब मैं आपके ही समान हुआ ) ही हूँ । अन्य दूसरे दीक्षित अवश्य ही आपके गुरु भाई हैं । पर मैं नहीं । क्योंकि कभी भी सदगुरु के 2 मानस पुत्र नहीं होते । जब 2 पुत्र ही नहीं होते । तब मैं आपका भाई कहाँ से हो गया ? मेरा भाई होने के लिये आपको मानस पुत्र होना होगा । जो कि असंभव है ।
और समझें । यदि आप प्रिय कहते हैं । तो बात प्रियता तक ही सीमित ही रह गयी । प्रिय होना सांसारिक श्रेणी वस्तु पदार्थ है । शाश्वत प्रेम यहाँ दूर दूर तक नहीं है । यदि आप राजीव कहते हैं । तो फ़िर राजीव के ( भूतकालीन गुण अवगुण ) समस्त कर्म आपको प्रभावित करेंगे । अन्य सांसारिक सम्बन्धों पर प्रकाश डालने के दृष्टिगत अगला लेख विस्तार से लिखूँगा ।
अब बङी मुश्किल हो गयी आपके लिये । फ़िर आखिर क्या सम्बोधन दें । आईये । इस प्रश्न को हल करते हैं ।
आप मेरे विचारों वर्णित आत्म ज्ञान से प्रभावित झंकृत होकर मेरे सम्पर्की हुये । जाहिर है । अभी मेरे गुरु को आपने दूर दूर तक नहीं जाना । गौर से समझिये । अभी गुरु नहीं । उनके शिष्य का ज्ञान ही आपको प्रभावित कर गया ।
इसलिये सबसे पहले गुरु से शुरू करते हैं । सभी धार्मिक ग्रन्थों और आत्म ज्ञान की पोथियों में गुरु को प्रणाम करने का सर्वश्रेष्ठ तरीका साष्टांग दण्डवत प्रणाम बताया गया है । इसमें जमीन पर पेट के बल लेटकर दोनों हाथ सिर के ऊपर एकदम सीधे अभिवादन स्थि्ति में जुङे हुये होते हैं । इसका बहुत बङा रहस्य है । जमीन का स्पर्श होते ही ऐसे साधक शिष्य के बहुत से पाप ( उस समय के प्रणाम भाव के % अनुसार ) प्रथ्वी  देवी नियम अनुसार तुरन्त उसी समय गृहण कर लेती है । जो तामसिक वृतियों ( नीच जीवात्मायें - प्रेत या मृत्यु कन्या का परिवार आदि जैसे ) के भोजन के काम आता है । जिससे वे पुष्ट होते हैं । चलिये ऐसा करने में आपका जीव जनित अहम आङे आ रहा है । तो फ़िर मस्तक को गुरु के चरण कमलों में बिलकुल कुछ क्षणों तक टिकाये रखा जाता है । इससे गुरु की चरण धूल से आप में शुद्ध निर्मलता आती है । और बाद में खुद ही आपका साष्टांग दण्डवत प्रणाम का भाव बन जाता है । अद्वैत के गुरु सदगुरु तो बहुत ही अलग बात हैं । द्वैत धर्म क्षेत्र में भी गुरु के चरण वंदन का ही जिक्र हर जगह मिलेगा । सीधी सी बात है । गुरु को प्रणाम करने का कोई अन्य तरीका ही नहीं है । फ़ोन पत्र आदि में भी चरण वंदन या चरण वंदना ही कहा लिखा जाता है । सदगुरु को सम्बोधन रूप में सिर्फ़ महाराज जी ही कहा जाता है । पत्र आदि लिखते समय सदगुरु श्री महाराज जी लिखते हैं । महाराज ( महा राज ( रहस्य ) के ज्ञाता ) जी ( अधिकार प्राप्त ) इस सम्बोधन के लाभ - ऐसा कहने से आप आसानी से समझ सकते हैं । आप उस आत्मा से भाव से निवेदित हैं । जो महा रहस्य को जानने वाले और उसके सत्ता द्वारा नियुक्त अधिकारी हैं । जाहिर है । बीच का मनों टनों कचरा आपने एक भाव पूर्ण सम्बोधन से ही खत्म कर दिया । जबकि कुछ खर्च नहीं हुआ । वहाँ भी शब्द हैं । यहाँ भी शब्द हैं । हरेक का आदर करना तो हर सभ्यता संस्क्रुति सिखाती है । फ़िर ये तो गुरु सदगुरु के लिये बात है ।
यदि आप गुरु जी कहते हैं । तो शब्द धातु नियम अनुसार स्तर % एकदम बहुत ही कम हो जाता है । गु - अंधकार ( से ) रू - प्रकाश ( की ओर ले जाने के ) जी ( नियुक्त अधिकारी पुरुष ) । जाहिर है । इस सम्बोधन की शब्द धातुयें आपको ज्ञान से अधिक नहीं बढने देंगी । क्योंकि ( आपके अन्दर का ) पदार्थ आपकी शब्द धातुओं के भाव % पर ही बनेगा ।
गुरु या सदगुरु के सम्बोधन के बाद मंडल के अन्य महात्माओं या आपके समान स्तर वाले गुरु भाईयों या साधकों के सम्बोधन की बात करते हैं । यहाँ आपस में एक दूसरे को  - जय गुरुदेव की या जय जय श्री गुरुदेव महाराज.. बोला जाता है । इसका भी रहस्य जानिये । यहाँ साधक एक दूसरे को सांसारिक भाव से प्रणाम न कर गुरु को ही प्रणाम करते हैं । क्योंकि गुरु को प्रणाम करने से समस्त का प्रणाम हो जाता है । क्योंकि ज्ञान से परे तो कुछ है ही नहीं । गुरु का अर्थ बता ही चुका । देव का सही अर्थ - देने वाला है । यानी अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान रूपी प्रकाश को देने वाले  की जय । ध्यान रहे गुरु के अलावा किसी ( अन्य महात्मा के भी ) के साथ कभी जी न लागायें । क्योंकि वो नियुक्त अधिकारी पुरुष नहीं है । अगर कोई दूसरा सच्चा सन्त आदि है भी । तो भी कोई फ़र्क नहीं । क्योंकि उसे भी आप जय गुरुदेव की महाराज कहोगे । तो बहुत ऊँचा या पूर्ण सन्त होने पर भी इसी प्रणाम में उसका उचित प्रणाम हो गया । क्योंकि अद्वैत स्थिति में 2 नहीं होते । आपने अपने गुरु की जय बोली । उसी में उसकी जय हो गयी । अब आप सोच रहे होंगे । शिष्यों साधकों का आपस में एक दूसरे को महाराज कहने की क्या तुक है ? तो जय गुरुदेव की कहने में गुरु की जय हो गयी । और आप उस महा - राज के पथिक यात्री हैं । यहाँ शब्द धातु अनुसार कुल रहस्य यही है । बार बार आपका ध्यान भाव पूर्ण आदर से शाश्वतता की ओर जाये । और शब्द धातुयें यथाशीघ्र आपकी पात्रता कृमशः विकसित करते हुये आपको पदार्थ ( पद  - अर्थ ) दिलायें । इसलिये जी रहित महाराज कहना बनता है । भाव बार बार याद करना ही है । अब बताईये । ऐसा करने में किसका फ़ायदा है । आपका या मेरा ?
अब बात मेरी ( जैसी स्थिति की ) - मैं न गुरु हूँ । न गुरु जी हूँ । जबकि सदगुरु तक की तमाम स्थितियों में मैं कार्य करता हूँ । दरअसल मैं एक प्रशिक्षु ( ट्रेनी ) हूँ । और नियमानुसार incharge की हैसियत से कार्य करता हूँ । इसलिये किसी हद तक स्थूल अर्थों में गुरु कहा जा सकता है । ( गुरु ) जी इसलिये नहीं कि मैं अभी सत्ता द्वारा नियुक्त नहीं हूँ । और समझें । मैं हँस परमहँस साधकों को गुरु सदगुरु स्तर के आंतरिक सहयोग करता हूँ । पर incharge के रूप में शक्ति लेकर । सही अर्थों में मुझे नियुक्ति या अधिकार प्राप्त नहीं है । ये गुरुत्व पूर्ण पात्रता आ जाने पर आंतरिक रूप से ही मिलता है । इस क्षेत्र और इससे ऊपर की बातें सामान्य रूप से खोलने की नहीं हैं । अतः इसको यही रोकते हैं ।
क्यों नहीं मिली अभी तक गुरु सदगुरु की अधिकार स्थिति ? इस विशय पर पूरा लेख अगले समय में ।
अब आपके सामने समस्या उत्पन्न हो गयी होगी कि - आखिर मुझसे किस रूप में सम्बोधन करें ? सबसे सरल और श्रेष्ठ वही है - जय गुरुदेव की ! महाराज । यहाँ एक और रहस्य बता दूँ । ऊपर बताये अनुसार - मैं आपको कभी महाराज न कहकर आपका सांसारिक नाम ही लूँगा । क्योंकि भले ही प्रशिक्षु रूप में मैं आपके गुरु रूप में कार्य करता हूँ । इसलिये मैं आपको महाराज कहूँगा । तो आपकी हानि ही होगी । नाम लेने का कारण है । मैं आपकी तमाम जीव ( ता ) सांसारिकता कृमशः नष्ट करूँगा । जीव को मारूँगा । अजीव को निरंतर जिलाऊँगा ।
फ़िर भी इस सम्बोधन में आपका अहम आङे आता हो । तो तमाम अन्य विकल्प है । श्रद्धेय । आत्मीय । माननीय । सम्मानीय आदि के बाद - महात्मा जी । ज्ञानी जी । साधु जी । सन्त जी । हँस जी । परमहँस जी । ये सब निसंकोच कह सकते हैं । ध्यान रहे । मैं ( या ऐसा अन्य कोई ) जो हूँ । सो ही रहूँगा । आपके सम्बोधनों से भावों से ऊपर नीचे होने वाला नहीं । पर शब्दों की जितनी उत्कृष्ट धातु का निर्माण आप भाव से कर लेते हैं । वह उतनी ही टिकाऊ और आपके लिये ही लाभदायक होगी ।
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