18 अगस्त 2012

वे नहीं जानते कि मृत्यु के बाद क्या होता है ?

निम्नलिखित विवरण किसी व्यक्ति या संस्था या धर्म से उसके प्रति द्वेष/अपमान आदि भावना से न होकर सिर्फ़ सामूहिक रूप से प्रसारित हुये तथ्यों के आधार पर समग्र समाज के चिन्तन हेतु है । जोकि किसी भी सार्वजनिक संस्था या सार्वजनिक व्यक्तित्व को जानने हेतु एक तरह का ‘नागरिक-सामाजिक अधिकार’ है ।
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अब बात निकली ही है तो एक बार फिर से आध्यात्मिक यात्रा के आरंभिक कारणों का वर्णन याद आ जाता है जो कि इस प्रकार से है । बात 1983 की है जब मेरी माताजी राधास्वामी पंथ के चरण सिंह जी से दीक्षित होकर तीन दिनों के बाद घर पर लौटी थी । हम चार भाई बहन इस बीच घर पर ही थे एवं पडोसियों ने हमारी देखरेख की ।
तब मेरी उत्सुकता जो इस बीच काफी तीवृ हो गयी थी कि - आखिर किसलिये मम्मी हम सबको यहाँ छोड़ गयी ?
जब वे लौटीं तो चरण सिंह जी की कुछ तस्वीरें लायी (यहाँ ‘जी’ लगाने का उद्देश्य केवल बड़ी आयु के लिए मान देना है न कि गुरु होने की वजह से) मुझे अभी तक याद है कि तब मैंने पूछा था कि - ये सरदार जी कौन हैं ? 
तो वो बोली कि - गुरुजी ! 
और मेरा अगला सवाल कि - गुरुजी कौन होते हैं । नामदान क्या होता है । अगर वहाँ न जाते तो क्या होता । अब इन तस्वीरों की क्या आप रोज पूजा करोगे आदि आदि ?
फिर हर रविवार को माँ के साथ नजदीक के एक पार्क में जाकर टेप रिकार्डर पर सतसंग सुनना । इसी बीज के अंकुरण के साथ बड़े होते होते गुरु की आवश्यकता को जाना । इनकी ढेरों किताबों को पढ़ पढ़ कर जाना कि - काल और माया भी कोई चीज है ।
14 वर्ष तक आते आते रोज धूप जलाकर सुखमनी साहेब का पाठ पढना मेरा एक नियम बन गया । फिर उसमें नाम की महिमा, साधू की महिमा, गुरु की महिमा, बृह्म, पारबृह्म, दुःख और उनके कारण पढ़ते पढ़ते स्वयं ही स्पष्ट होते गए (यकीन मानिये स्वयं ही) क्योंकि ये सधुक्कड़ी भाषा उस आयु में स्पष्ट होना मुश्किल है । 
तब ह्रदय में ऐसी तड़प उठी उस नाम के लिये कि - शायद कोई सच्चा प्रेमी भी अपनी प्रेमिका के लिए न तङपे । एक अजीब सी व्याकुलता हमेशा छाई रहती और वो भी उस अज्ञात के लिए, जिसे मैं जानता भी न था ।
माँ से पूछता तो वो कहती कि - राधास्वामी विवाहित को ही नाम देते हैं ।
अजीब चलन है भाई  ! आग अब लगी है और उसी में मरा जा रहा हूँ और ये कहते हैं कि - शादी के बाद !
खैर कुछ कारण बने और मैं 14 वर्ष की ही आयु में राधास्वामी पंथ की ही एक शाखा ‘मानव केंद्र चंडीगढ़’ जो कि ठाकर सिंह जी द्वारा संचालित है की देलही ब्रांच से दीक्षित हुआ ।
5-6 साल तक बिना नागा कम ज्यादा अभ्यास करता रहा पर तब तक केवल मन ही कुछ समय के लिए स्थिर हो पाता था, बाकी कुछ नहीं ।
जीवन के ज्वार भाटा के बीच 25 की आयु का हो गया । कम या ज्यादा परन्तु भजन का नियम बना रहा । उपलब्धि केवल 5 नामों ? का सोते जागते उठते बैठते स्वयं ही मन में भजन होने लगा । परन्तु कोई प्रकाश या ध्वनि अनुभव नहीं हुई । 
कुछ परिस्थितियों वश एक बार घर से भागकर 40 दिन के लिए आश्रम में जाना पड़ा । वहाँ कुछ प्रकाश दिखा परन्तु मेरे सवालों का जवाब नहीं मिल पाता था ।
राधास्वामी पंथ में हर एक चीज की बड़ी सावधानी रखनी पड़ती है कि - यदि अंतर में गुरु दिखें तो ये करो वो न करो । उसकी आँखों में न देखो वो काल है । सारी नाम की कमाई ले जायेगा (अरे यहाँ तक पहुंचते पहुँचते नानी मर गयी और ये एक मिनट में ले जायेगा) अब कुछ दिख रहा है तो उसे आगे जारी रखूँ या नहीं ? कहीं ये काल तो नहीं है भाई ? पर जवाब कौन दे ।
कहते हैं चिट्ठी लिख दो । ठीक है भाई चिट्ठी लिख देता हूँ ।
जवाब अगर एक सप्ताह तक भी आता है तब तक क्या करूं ?
बड़ी दुविधा थी भाई ! नेट पर ढूँढना शुरू किया (समय कोई 2003-4) तो राधास्वामी पंथ के चिट्ठे देख देख कर मेरी जो हालत हुई, बयान करना नामुमकिन है भाई ! 
अगर किसी व्यक्ति को पता लगे कि - जिसे वो माई बाप कहता है । वो उसका माई बाप न होकर उसका जानी दुश्मन है तो कैसा लगेगा ? शायद उससे भी बुरा लगा था, क्या थी वो सच्चाई ? देखिये ।
राधास्वामी व्यास का रहस्यमय इतिहास
जैमल सिंह और सावन सिंह, संतमत में ये दोनों बड़े ही रहस्यमय पात्र रहे हैं ।
इस पंथ का आरंभिक इतिहास रहा है कि इनके लाखों की संख्या में अनुयायी रहे हैं । पश्चिम ने इस पंथ में ऐसे अशांत वर्ष कभी न देखे थे ।
लगभग 1918 में सावन सिंह ने आगरा से अलग होकर व्यास में अपने आपको गुरु घोषित कर दिया । यह लेख दर्शाता है कि ब्यास की गुरु परम्परा कल्पना मिश्रित हो सकती है । जिसने 4 गुरुओं को बिना किसी वजह के ही खारिज कर दिया था ।
देखिये - क्यों जैमल सिंह को गुरु बनने की अधिकारिक तौर पर सजा दी गयी और उन्हें पंथ से अपनी मृत्यु के तीन दिन पहले ही बहिष्कृत किया गया ।
जैमल सिंह को सालिग्राम और मिश्रा के सतसंग से उठाकर क्यों भगा दिया गया । 
जैमल सिंह की दीक्षा किसने की ?
राधास्वामी किताबों में दर्ज वे पत्र किसने लिखे  जो यह दर्शाते थे कि ये पत्र जैमल सिंह ने लिखे हैं । जुलियन जोनसन द्वारा डेरे में लिखित एक किताब - Who killed Path of the Masters  
जगत बहादुर सिंह की बीबी ने ब्यास के एक बुर्ज से कूदकर आत्महत्या करने की कोशिश क्यों की । जिसमें उसका पुत्र कामयाब भी हो गया ।
किसने जेल जाने के खतरे पर भी चरण सिंह के लिए विदेशी सामान की तस्करी की ।
क्या आप जानते हैं कि - शिवदयाल/स्वामी जी राधास्वामी पंथ के संस्थापक नहीं थे ।
फकीर चंद जी के अनुसार (जिनको सावन सिंह ने राधास्वामी गुरु पद के लिए समर्थन दिया और उनकी शिक्षाओं में फेरबदल की आज्ञा दी) आधुनिक राधास्वामी गुरुओं में कोई ‘आध्यात्मिक शक्ति’ नहीं है ।
ध्यान में उनका कोई विकिरित रूप प्रकट नहीं होता ।
शिष्य की मृत्यु पर भी कोई गुरु नहीं आता ।
शिष्यों के कर्मों का भार नहीं लेते ।
यहाँ तक कि - ये भी नहीं जानते कि मृत्यु के बाद क्या होता है ? 
क्या आप जानते हैं कि - राधास्वामी पंथ की दीक्षा पद्धति योगानन्द समूह से बिलकुल मेल खाती है और ये कुंडलिनी योग है ।
कृपाल सिंह के उत्तराधिकार के बारे में खोजिये । क्या कृपाल में सावन का उत्तराधिकारी होने के बारे में झूठ बोला ?
क्या आप जानते हैं कि - दर्शन सिंह (कृपाल का पुत्र) भीड़ के सामने खड़ा हो गया और घोषणा करने लगा कि वह कृपाल का उत्तराधिकारी नहीं है ।
सावन सिंह की मृत्यु के बाद उनकी पंजीकृत वसीयत में कृपाल सिंह को क्या मामूली सा काम सौंपा गया उसे पढिये ?
क्या आप जानते हैं कि सभी राधास्वामी गुरु करोड़पति हैं ?
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निःअक्षर (पाँच नामों से परे)
पंचनामा-5 नाम
(5 शब्द धुनि-5 मुद्रायें-5 ब्रह्म)
शब्द-शक्ति-उनमुनी मुद्रा-आकाश 
शब्द-रंरकार-खेचरी मुद्रा-दसवां द्वार
शब्द-सोऽहंग-अगोचरी मुद्रा-भंवर गुफा 
शब्द-ॐकार-भूचरी मुद्रा-त्रिकुटी
शब्द-निरंजन-चांचरी मुद्रा-नैन 
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Jaimal and Sawan Singh, The Great Secrets of Radhasoami Beas.
The early history of a religion with several million members from all groups. The West has never seen the turbulent early years before. Around 1918 Sawan Singh broke away as an Agra group leader at Beas, for Agra Gurus and declared himself a Master.
This article shows the Beas lineage may be a mythical concoction which eliminated 4 Sat Gurus out of necessity.
See why Jaimal was officially chastised for posing as a guru and being excommunicated just 3 days before he died.
Why was Jaimal thrown out of the satsangs of Salig Ram and Misra ?
Who actually wrote the letters attributed to Jaimal in Beas books ?
‘Who killed Path of the Masters’ author Julian Johnson at the Dera ?
Why did Jagat's wife attempt suicide off a tower at Beas and his son actually succeed ?
Read the first hand account of a rep whom smuggled goods into India for Charan at the risk of going to jail. Did you know Swami Ji was not the founder of Radhasoami Faith ?
According to Faqir Chand, whom Sawan endorsed as an RS master and gave permission to change the teachings, modern day Radhasoami gurus have no power, do not project their radiant forms, do not come for the disciple at death, do not take the disciple’s karma and do not even know what happens after death.
Did you know RS initiation is almost identical to Yogananda’s group and it is kundalini yoga ? 
A look at the Kirpal succession. Did Kirpal lie about being Sawan's successor ? Did you know Darshan stood before a crowd and proclaimed he was not the successor to Kirpal ? 
Read Sawan's registered wills and find out what ordinary seva job he allocated to Kirpal at the Dera after his death.
Did you know most Radhaswami Gurus are multi millionaires ?
यह सब जानकारी यहाँ से ली गयी है - दोनों लिंक्स पर क्लिक करें ।
http://www.angelfire.com/band/radhasoamisantmath/
http://www.sikhiwiki.org/index.php/Radhasoami_Beas_Secret_History
अक्टूबर 1877 में स्वामी जी की मृत्यु से 9 माह पूर्व जैमल सिंह ये दावा करने लगे कि स्वामी जी ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से यह आज्ञा दी कि वे पंजाब में जाकर संतमत का प्रचार करें व सिखाएं ।
जैमल आर्मी का एक सिपाही था और उस समय वार्षिक अवकाश पर था । इस बात का कोई साक्ष्य नहीं है कि स्वामी जी ने उन्हें ऐसा कहा या इस तरह की कोई आज्ञा दी कि वे जीवों को चेतायें ।
इस बात का भी कोई साक्षी नहीं है कि स्वामी जी जैमल सिंह को जानते भी थे या नहीं, या कभी उन्हें रूबरू देखा हो ।
जैमल यह दावा करते हैं कि - 1980 में राधाजी (स्वामी जी कि पत्नी) ने उन्हें एक पगड़ी और आसन (ध्यान के लिए बैठने वाला) दिए । इस बात का भी कोई सबूत नहीं है । इस बात के कोई भी दस्तावेज नहीं हैं कि स्वामी जी ने इस प्रकार कि कोई वार्तिक या लिखित आज्ञा दी थी । 
स्वामी जी के परिवार ने भी कभी इस बात की पुष्टि नहीं की कि स्वामी जी ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से प्रवचन देने कि आज्ञा दी थी । इस प्रकार का कहीं भी कोई भी दस्तावेज या पुष्टिकरण नहीं है । जैमल का कोई समकालीन मान्य व्यक्ति भी इस बात की पुष्टि नहीं करता या किसी ने जैमल को स्वामी जी के सतसंग में भी कभी नहीं देखा ।
हम यह भी नहीं जानते कि जैमल की दीक्षा स्वामी जी के जीवनकाल में कभी हुई । स्वामी जी के जैमल के साथ कोई फोटोग्राफ भी नहीं हैं और जैमल के केवल 3 फोटो ही अस्तित्व में हैं ।
शायद जैमल के रहस्यमय इतिहास की वजह से ब्यास के लोग कभी उनके फोटो नहीं दिखाते ।
आश्चर्यजनक ढंग से चौंकाने वाली वास्तविकता कि स्वामी जी ने जैमल को कभी कोई पत्र ही नहीं लिखा जिसका कि जैमल हमेशा ही जिक्र करता रहता था ।
ध्यान दीजिये कि स्वामी जी के सतसंग में डाक विभाग के उच्च अधिकारी भारी संख्या में उपस्थित रहते थे (स्वामी जी के दोनों भाई, चाचाजी और ब्रिन्दाबन, सुदर्शन (चाचाजी का पुत्र) और सालिग्राम अदि) यह बात उल्लेखनीय है कि जैमल ने स्वामी जी से कोई भी पत्र प्राप्त नहीं किया है । वह समूह तो पत्र ही लिखने के लिए प्रसिद्ध था । 
अगर जैमल स्वामी जी को अपना गुरु मानता था तो उसने स्वामी जी को फ़ौज में रहते हुए कोई पत्र क्यों नहीं लिखा ।
21 वर्षों के दौरान जैमल पैदल सेना का प्यादा था और उसी दौरान स्वामी जी जिन्दा थे । तब वह कुछ समय के लिए आगरा सतसंग में आ सकता था ।
कृपाल यह दावा करते हैं कि जैमल ने अपने पूरे जीवनकाल में 3 दफा सतसंग में आये । कहाँ तक उचित है ?
कृमश..जारी (लेख - अशोक कुमार दिल्ली द्वारा)
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