10 अगस्त 2012

अनलिमिटेड टाइम गारंटी वारंटी


Dear Rajiv Ji. I have read your several blogs along with this. I want to know the name of your guru Shivanand Paramhans' guru, and his panth, from where your guru has taken  diksha/ name. How long and where he did tapasya etc., and who gave paramhansa's title to him on what he  achieved special. And who  appointed him as guru and what capacity, Please tell me in detail. Now a days a trend is running to become a guru and preaching without any spiritual power and knowledge to extract money from innocent persons deceivingly, spoils time and money of them. Unfortunately I have  read on your blog that your guru shivanand ji, some time ago 

worked as hair dresser and pulling cycleriksha to earn his family livelihood. Please tell about him, as  such a person buy a small thing after asking about its  brand, company,warranty etc and bring a pet after ensuring his breed etc., why do not know about guru, that will be worshiped. thank you
regards - n.k. godwal
हिन्दी अनुवाद अशोक  द्वारा - प्रिय राजीव जी ! मैंने आपका ये वाला और बाकी के ब्लाग्स भी पढ़े हैं । मैं यह जानना चाहता हूँ कि आपके गुरु शिवानन्द परमहंस का नाम , पंथ और उन्होंने कहाँ से दीक्षा ली ? उन्होंने कितने समय तक तपस्या की । उन्हें परमहंस की उपाधि किस ख़ास प्राप्ति के बाद मिली । उन्हें गुरु किसने नियुक्त किया । और किस क्षमता पर । कृपया विस्तार से बतायें । आजकल तो बिना अध्यात्मिक शक्ति के गुरु बनने का सतसंग करने का रिवाज सा चल गया है । और इसे भोले भाले लोगों से पैसा बटोरने का जरिया बना लिया गया है । जिससे उनका समय और पैसा दोनों ही बर्बाद होते हैं  । दुर्भाग्य से मैंने आपके ब्लॉग पर पढ़ा कि - आपके गुरु शिवानन्द जी आजीविका के लिए कुछ समय पहले तक नाई का कार्य करते थे । और रिक्शा भी चलाया करते थे । कृपया उनके बारे में बतायें । क्योंकि यदि कोई छोटी सी भी वस्तु खरीदनी होती है । तो हम उसका ब्रांड कंपनी और उसकी वारंटी आदि जाने बिना नहीं खरीदते । और यदि कोई पालतू पशु भी खरीदते हैं । तो उसकी नस्ल जानने के बाद ही । तो फिर गुरु के बारे में क्यों न जाना जाय ? जिसकी पूजा की जाएगी । धन्यवाद ।
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मेरे विचार से नन्द किशोर जी का यह बहुत अच्छा प्रश्न है । यदि ऐसे ही प्रश्नों के बाद हम किसी भी व्यक्ति के बारे में कुछ तय करें । तो कम से कम भारत से 90% कूङा कचरा आफ़ गुरूज तुरन्त समाप्त हो जाये । उदाहरण के लिये बहु प्रसिद्ध रामदेव जैसे सिर्फ़ मामूली योग शिक्षक के लिये - पूज्य । स्वामी जी । योगाचार्य ? योग गुरु जैसे शब्द बिना जाने ही जोङ देते हैं । उसी के जुङवाँ भाई बालकृष्ण को भी आयुर्वेदाचार्य फ़लानाचार्य ढिकानाचार्य जैसे नाम बिना जाने समझे दे देते हैं । हम ART OF LIVING सिखाने वाले से कभी नहीं पूछते - भाई ! पहले अपने ही बाल बाल कटाना संवारना सीख ले । पहले आदमियों जैसी मर्दानी आवाज तो निकाल । ये औरतों जैसा मेकअप करके आप हमें किस तरह की " जीने की कला " सिखा रहे हो । हम इन फ़ुल्ली फ़ालतू भागवताचार्यों से कभी नहीं पूछते - भाई ! आप वाकई भक्ति भावना से उपदेश कर रहे हो । या फ़िल्मी मेकअप फ़िल्मी सेट जैसे माहौल में कोई फ़िल्मी शूटिंग कर रहे हो । हम सेक्सी राधे माँ से कभी नहीं पूछते - आप भक्तिन कम भक्तन का रोल करने वाली सेक्सी हीरोइन अधिक लग रही हो । वैसे आपने मुझसे भी कभी नहीं पूछा - राजीब बाबा ! आपका धार्मिक ब्लाग है । फ़िर इसमें सेक्सी और ग्लैमरस फ़ोटो क्यों लगाते हो ? नहीं नहीं । याद आया । मुझसे तो पूछा था । और मैंने बताया भी था । पर पूर्ण रहस्य समय आने पर ही बताऊँगा । या फ़िर किस्तों में ।
हमने कभी भी 200 वर्ष ( लगभग ) से भी चल रहे आध्यात्मिक संस्थानों से यह नहीं पूछा कि - आप भगवान के दर्शन आदि का दावा तो करते हो । पर इसकी गारंटी वारंटी क्या है । क्या आपके पुराने और सीनियर छात्रों में से कुछ ऐसे हैं । जो हमारी शंकाओं के स्तर पर ही ( प्रमाण हेतु ) हमें संतुष्ट करा सके ।  या प्रक्टीकल करा सकें । जैसा कि प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान अपने योग्य और ( विभिन्न जगह पर ) पद नियुक्त छात्रों का पूरा ब्यौरा उपलब्ध कराकर अन्य को प्रेरित करते हैं ।
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वैसे आपने जो भी पूछा है । ये सभी विवरण मेरे ब्लाग्स में ( जैसा कि आपने कहा । आपने सभी को पढा है । ) प्रसंग वश अनेक जगह पर आया है । पर शायद उस तरह से नहीं । जैसे आप जानना चाहते हैं । चलिये आज इसी पर बात करते हैं ।

आपके गुरु शिवानन्द परमहंस का नाम , पंथ और उन्होंने कहाँ से दीक्षा ली - भयंकर रूप से बिगङे हुये हठ योग की भीषण त्रास झेलता हुआ मरणांतक जिस स्थिति में मेरा श्री महाराज जी के सानिध्य में आना हुआ । और 6 महीने से मृत्यु से जूझते हये उन्होंने जैसे मुझे महज आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठाकर ठीक कर दिया । सच कह रहा हूँ । तबसे लेकर आज ( अभी ) तक मेरे सामने वो क्षण ही नहीं आया । जिसमें मैं उनके नाम ( माता पिता द्वारा दिया ) काम । धाम । गाम ( village ) आदि के बारे में सोच पाता । मैं उनके वास्तविक ( आंतरिक ) प्रकाश स्वरूप को ही ( कृमशः जानने का  % ) अब तक मंत्रमुग्ध सा देखता रहा । लेकिन 10 साल की अवधि में कुछ अन्य बाह्य लोगों द्वारा चर्चा में मुझे उनके बारे में कुछ पता चला । लगभग 20 वर्ष की ही अवस्था में घरवाले और आसपास के लोग श्री महाराज जी से बाबाजी कहने लगे । अभी जब से मैं उनके सम्पर्क में हूँ । सभी उन्हें महाराज जी ही कहते हैं । फ़िर भी ( मगर मेरे लिये अभी भी अस्पष्ट ) किशोरावस्था तक उन्हें श्याम सिंह कहते थे ।
अगर आत्मज्ञान सच्चा है । ध्यान साधना सच्ची है । तो नाम ( शिवानद ) अंतर में स्वयं प्रकट होता है । ये एक निश्चित स्थिति में उस जगह ? पहुँच जाने पर ( ऊँचाई प्राप्त होने पर ) ठीक उसी तरह गैवी आवाज में दिया जाता है । जैसी मनुष्य एक दूसरे को पुकारता है । यहाँ कई आवरण से छूटते हैं । और सिर्फ़ ये नाम सुनाई देता है । दरअसल ये एक निश्चित स्थिति के स्थायित्व को प्राप्त होना है । या कहना चाहिय्रे । साधु का अंतर नामकरण है ।  बाद में ( इस स्थिति से ) और ऊपर उठ जाने से इस नाम से भी कोई मतलब नहीं रहता । परन्तु जगत व्यवहार हेतु ये नाम परमात्म सत्ता ही देती है ।  द्वैत में निरंजन सत्ता देती है । परन्तु तभी जब वह ज्ञान भी द्वैत के क्रियात्मक अंदाज में किया गया हो । बाकी आजकल के तोते एक दूसरे का रख देते हैं । आज इस प्रश्न का उत्तर मैं इसीलिये दे पा रहा हूँ कि मैं इस स्थिति से गुजर चुका ।  और मेरा नामकरण हुआ था - मुक्तानन्द । परन्तु मैंने शुरू से ही तय कर लिया था कि मैं साधु के रूप में ज्ञान व्यवहार नहीं करूँगा । बल्कि एक आम आदमी के रूप में ही बताऊँगा कि - आत्म ज्ञान हेतु इन सबकी बहुत आवश्यकता नहीं ।
पंथ - वास्तव में आत्मज्ञान या परमात्म भक्ति में कभी पंथ नहीं होता । बल्कि  इसको सन्त मत कहते हैं । अद्वैत मिशन । निःअक्षर ज्ञान ।  मुक्तमण्डल । परमानन्द जैसे नामों के द्वारा इस ज्ञान का व्यवहार किया जाता है । चिंताहरण मुक्त मंडल परमानन्द शोध संस्थान के नाम से हमारी संस्था  ( अभी रजिस्टर्ड नहीं ) कार्य करेगी । चिंताहरण इसलिये कि इस आश्रम के ( late ) संस्थापक ने यह नाम रखा था । अतः उसे खत्म नहीं किया गया ।
कहाँ से दीक्षा - मुझे बाद में पता चला कि जैसे कबीर ने रामानन्द से दीक्षा लेकर उल्टे उनका और उनके शिष्यों का मार्गदर्शन किया । वैसे ही श्री महाराज जी की बात है । महाराज जी के मुख से मैंने आज तक उनके गुरु के बारे में या उनका कोई चित्र या किसी आध्यात्मिक पर्व पर कोई गुरु पूजन करते नहीं देखा । लेकिन वे एक बृह्मचारी जी के नाम का कभी कभी प्रसंगवश ( मगर गुरु रूप नहीं । सहयोग रूप में ) करते हैं । इसलिये जो थोङी बहुत परम्परा मानी जा सकती है ।  वह कृमशः तोतापुरी > ( 2 प्रसिद्ध शिष्य ) अद्वैतानन्द । रामकृष्ण परमहंस > ( प्रसिद्ध शिष्य - अद्वैतानन्द के ) स्वरूपानन्द ( नंगली सम्राट के नाम से प्रसिद्ध । नंगली मेरठ के पास है ) स्वरूपानन्द के कई प्रसिद्ध शिष्य हुये । जिनमें हँस महाराज  ( सतपाल के पिता ) अनिरुद्ध आदि बहुत से हुये । मुझे अब भी नहीं पता । बृह्मचारी इन्हीं से जुङे थे । या कोई रहस्य और था । पर उनका मेलजोल इसी मंडल से था । हाँ एक बात 100% साफ़ है । हमारा ज्ञान पूर्णत कबीर (  कबीर पंथ वाला नहीं । वह अलग है ) वाला या परमात्मा का निःअक्षर या सार शब्द ज्ञान है ।            
उन्होंने कितने समय तक तपस्या की - 9-10 साल की आयु से ही श्री महाराज जी अचानक घर से भाग निकलते हैं । उन्होंने प्रसंगवश कई बार बताया - उन्हें खुद नहीं पता था कि वे ऐसा क्यों करते हैं । लगता है । कुछ खो गया है । जिसकी तलाश सी रहती थी । कई बार वे 30 किमी तक आगे चले गये । और फ़िर किसी जान पहचान वाले द्वारा घर पहुँचाये गये । लगभग किशोरावस्था में ही उनकी शादी कर दी गयी । महाराज जी बताते हैं - तब कुछ समय के लिये माया प्रबल हो गयी । उन्हें बहुत धन और सुविधा साधन जुटाने की तीवृ इच्छा  हुयी । कुछ समय बाद उन्होंने गन्ना धान आदि के कार्य से सम्बन्धित कोई कारखाना जैसा लगाया । ये काम अभी ठीक से शुरू ही हुआ था कि उन्हें स्वतः ही तीवृ अलौकिक आवेश होने लगे । उन्होंने बताया - हाथ में पकङा पेन छूटने लगता । और डायरी छूट कर गिर जाती । अगर वेग को रोकने की कोशिश करते । तो ऐसा लगता । गिर ही पङेंगे । कुछ ही दिनों में उन्हें भान हो गया । वह यह सब नहीं कर पायेंगे । वो काम भाईयों के हवाले  छोङ दिया । अगले कुछ ही दिनों में ऐसा हुआ कि - कहीं जाते हुये साइकिल या बाइक पर पीछे बैठे हुये दैवीय वेग प्रबल हो उठता । और वे वाहन रोकने को कहकर वहीं किसी एकान्त जगह में लेटकर स्वतः ध्यान की गहराईयों में चले जाते । कुछ और दिनों बाद । उन्हें जैसे सत्य बोध होने लगा । और वे एकान्त जंगल या नहर आदि के किनारे निकल जाते । और दिन दिन भर बेसुध से पङे रहते । परिवार वाले भी जैसे समझ गये । उनके भाई खोजते खोजते उन्हें कपङे में बंधी रोटी देने जाते । और ध्यानमग्न देखकर ( बिना बोले ) पास रखकर चले आते । 20-22 की आयु तक आते आते उनसे लगभग घर छूट ही गया । कभी कभार आने लगे । फ़िर बाद में लगभग पूरा ही छूट गया । किन्हीं खास अवसरों पर ही घर के अन्दर जाते । जिस पर ऐसा ज्ञान उतरता है । जाहिर है । उसके सांसारिक कर्तव्यों की जिम्मेदारी परमात्म सत्ता स्वयं देखती है । अतः श्री महाराज जी के सभी घरेलू कार्य किसी माध्यम द्वारा आसानी से होते रहे । और उनकी तपस्या निर्विघ्न जारी रही । उनकी अलग रहनी और आचरण से न सिर्फ़ घरवाले बल्कि बाहर वाले भी उन्हें सन्त मानने लगे । और किसी प्रकार का कोई विरोध नहीं हुआ । इन घटनाकृमों पर गौर करने से पता चलता है कि वे बचपन से ही तपस्यारत थे । और निरंतर रहे । अन्दाज से बता रहा हूँ । 35-45 आयु का उनका जीवनकाल बेहद रहस्यमय सा था । जिसके बारे में ठीक ठीक शायद उनके सिवाय कोई नहीं जानता । खुद मेरे घरवालों और परिचितों को आज तक नहीं पता कि मैं किस तरह की साधनायें किया करता था । और अहंकारी हठी हठयोगी था । मेरी स्थिति बिगङने के बाद भी उन्हें कुछ खास पता नहीं लगा । जन सामान्य को भक्ति में प्रेरित करने हेतु श्री महाराज जी ने ही मुझे अपने अनुभवों के बारे में लिखने को कहा । वरना शायद किसी को कभी पता न चलता ।
उन्हें परमहंस की उपाधि किस ख़ास प्राप्ति के बाद मिली । उन्हें गुरु किसने नियुक्त किया । और किस क्षमता पर - हँस ( दीक्षा वाला ) साधक जब बृह्माण्ड की चोटी से ऊपर जाने लगता है । और उसकी स्थूल शरीर से बाहर निकलने की स्थिति बनने लगती है । तब ( सिर्फ़ ) सतगुरु द्वारा हँस साधक की परमहँस दीक्षा की जाती है । यदि अब तक का गुरु सिर्फ़ हँस क्षमता वाला है । तो परमात्म सत्ता उस समय के सदगुरु के पास नाटकीय ढंग से ऐसे शिष्य को पहुँचा देती है । संयोगवश उस समय ऐसा कोई प्रसिद्ध या जाना हुआ शरीरी गुरु नहीं है । तब कहीं गुप्त स्थान में सदगुरु सत्ता सिर्फ़ इसी कार्य हेतु कुछ समय के लिये प्रकट हो जाती है । हँस को पूर्ण कर चुका साधक मामूली नहीं होता । वह भगवान पदवी के समतुल्य हो जाता है । उसे अनेकानेक दिव्य सम्पर्कों का अच्छा अभ्यास होता है । अतः ऐसे ज्ञान स्वरूप का प्रकट होना उसके लिये कोई आश्चर्य नहीं होता । ये गुप्त सदगुरु ही परमहँस दीक्षा करते हैं । तब वह गुप्त रूप से इस दुर्लभ गूढ साधना को करता रहता है । ऐसे कई प्रसिद्ध सन्त हुये हैं । जिनके गुरु अज्ञात रहे । इसकी यही वजह होती है । परमहँस ज्ञान का सही अभ्यास होते ही परमात्मा साफ़ साफ़ नजर आने लगता है - जब हँसा परमहँस हो जावे । पारबृह्म परमात्मा साफ़ साफ़ दिखलावे ।
उन्हें गुरु किसने नियुक्त किया - वास्तव में किसी अध्ययन की तरह इसमें भी एक निश्चित मुकाम हासिल हो जाने के बाद परमात्म सत्ता ( द्वैत ज्ञान में काल सत्ता ) आंतरिक रूप से गुरु की उपाधि देती है । सार शब्द में लीन हो जाने के बाद स्वतः सदगुरु स्थिति बन जाती हैं - वो ही जाने जाहि देहु जनाई । जानत तुम्हें तुम्ही हो जाई । ये बात दरअसल कम शब्दों में नहीं समझायी जा सकती । सार ये कि द्वैत हो या अद्वैत । असली ज्ञान में सभी काम क्रियात्मक रूप से आंतरिकता में घटित होते हैं । न कि बाह्य रूप से ढोल बजाकर । जबकि सांसारिक नकली गुरुओं सदगुरुओं की भेङचाल में ये कार्य गद्दी परम्परा के रूप में ( किसी अन्य संस्था के समान ही ) किसी अपने या योग्य व्यक्ति को सौंपा जाता है । लेकिन वास्तव में इनके लिये गुरु शब्द के बजाय मैंनेजर या चेयरमेन शब्द अधिक ठीक है ।
दुर्भाग्य से मैंने आपके ब्लॉग पर पढ़ा कि - आपके गुरु शिवानन्द जी आजीविका के लिए कुछ समय पहले तक नाई का कार्य करते थे । और रिक्शा भी चलाया करते थे - वो लेख लगता है । आपने गौर से नहीं पढा । जिन 2 idiots के ये विचार हैं । उन्होंने  दरअसल ये अपना खुद का खानदानी काम बताया है । श्री महाराज जी ने आज तक अपनी दाढी का एक बाल नहीं काटा । और उन्हें साइकिल चलाना भी नहीं आता । अभी एक छोटे गाँव के बराबर लगभग 65 सदस्यों के इस भरे पूरे सयंक्त परिवार के पास खेती और आजीविका के अन्य साधन हैं । महाराज जी का सिर्फ़ 3 बच्चों का परिवार खेती की आय और दुधारू पशुओं से चलता है । अभी महाराज जी ने उधर बिलकुल ध्यान देना बन्द कर दिया है । वरना उनके सिंघाङों के ताल से ही बहुत आमदनी हो जाती थी । जो उस परिवार के लिये पर्याप्त थी । बाकी कोई भी समझ सकता है । गाँव में रहने पर खेती और दुधारू पशु जीवन निर्वाह के लिये बहुत होते हैं । बाकी बच्चों की देख रेख की बात । मैंने बताया ही है कि सिर्फ़ इन्हीं के संयुक्त घरों का ( सभी मिले हुये ) एक छोटा  गांव सा बसा हुआ है । और ये एक शक्तिशाली परिवार के रूप में जाना जाता है । लेकिन महाराज जी इन सब बातों से बहुत दूर हो चुके हैं ।
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9 साल पहले जब राजीव दीक्षित ने कहा कि - ये विदेशी कंपनी nestle maggi में सूअर के माँस का रस मिलाती है । तो लोगों ने उन पर बहुत बकवास की । इस आदमी का दिमाग खराब है । ये कोई देहाती है । और पता नहीं क्या क्या बोला । आज वही nestle कंपनी खुद मानती है कि - वह अपनी चाकलेट kitkat में बछड़े के मांस का रस मिलाती है ! तो क्या दूसरी चीजों मे नहीं मिलाती होगी ?
मानसिक गुलामी की जंजीरों में जकड़े लोग ऐसी बातों पर तब तक विश्वास नहीं करेंगे । जब तक आमिर खान 4 करोड़ रुपये लेकर सत्यमेव जयते में नहीं बोलेगा । मेरा भारत महान । जय हिन्द । I love my INDIA
http://www.youtube.com/watch?v=uru3hk35S-A ( क्लिक करें )
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