14 अगस्त 2012

गुरु करे सो होय


राजीव जी ! आप बिना सोचे समझे किसी के बारे में लिख देते हैं । आपका काम तो बस अब कापी पेस्ट करना हो गया है । ये सारे question राधास्वामी मत में कहीं भी नहीं लिखे । मतलब राधा स्वामी मत में ऐसा कुछ भी नहीं कहा जाता । ओशो और राधास्वामी एक ही विचारधारा है । बस समझने की जरूरत है - चन्द्रमोहन जैन । 
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हमारे शिष्य अशोक ( पूर्व में राधास्वामी और बहुत से अन्य से जुङे रहे ) ने रामपाल और राधास्वामी मत के नाम दीक्षा पर एक स्व अनुभव का लेख भेजा था । जिस पर हमारे 1 पाठक उमेश जी ने टिप्पणी द्वारा ओशो के लिंक और राधास्वामी के 5 नाम पर ओशो के क्या विचार ? का अंश भेजा था । उसको पढकर पूर्व में राधास्वामी से कई साल जुङे रहे हमारे दूसरे शिष्य निर्मल बंसल ने इन 5 नाम के बारे में ओशो के विचार ? पर गहरी दिलचस्पी दिखाई । और सुझाव दिया कि हिन्दी पाठकों के लिये अशोक द्वारा इसे हिन्दी में translate करा के प्रकाशित किया जाये । क्योंकि ओशो का वह मैटर ( मूल ) कुछ कठिन अंग्रेजी का था । ये लेख उन्हीं 2 प्रश्नों का उत्तर था । शेष 3 प्रश्नों पर ओशो के विचार भी अशोक शीघ्र  उपलब्ध करायेंगे । और साथ ही साथ प्रमाण के लिये आपको इस साइट के लिंक भी दिये जायेंगे । ये था । आपकी शंका का उत्तर । बाकी मेरा अध्ययन यह कहता है । ओशो और राधास्वामी की विचारधारा में दूर दूर तक कोई समानता नहीं है । कृपया आप पुनः ठीक से देखें । मैंने पहले भी कहा है । मैं अपनी कोई विचारधारा किसी पर नहीं थोपता । यह आत्म ज्ञान का चर्चा मंच है । आप किसी भी बात का खण्डन मण्डन करने को पूर्ण स्वतंत्र हैं । लेकिन आप यदि ओशो और राधास्वामी के बारे में अपने भाव अनुसार 1-2 उदाहरण भेजते । तो सभी को समझने में आसानी होती । सच क्या है ?
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हमारे शिष्य संजय बनारसी ने किन्हीं मधु परमहँस की " आत्म बोध " नामक pdf पुस्तिका मुझे भेजी । वह इसको पढकर विचलित हो गये थे । इसमें " सोहं " को सच्चा नाम नहीं बताया गया है । किताब की अन्य बहुत सी बातें भी भृम में डालने वाली थी । मुझे काल पुरुष और उसके काल दूतों का ये चोर सिपाही खेल खेलने ( उन्हें खिलाने ) में बङा मजा आता है । अगर आप इस किताब को खुले दिमाग से पढेंगे । तो ये सबसे पहले मधु पर ही ? लगा देगी । ध्यान रहे । मधु साहिब के उपनाम से सिर्फ़ कबीर की बात कहते हैं । रामपाल vs मधु इन दोनों की कील - परमेश्वर @ कबीर ( रामपाल ) और साहिब @ कबीर ( मधु ) उर्फ़ के द्वारा कबीर पर अटकी हुयी है । जबकि मेरे विचार ( अनुभूत ) में परमेश्वर और परमात्मा भी एक भाव स्थिति है । असली आत्मा है । सार तत्व है । बस इससे ज्यादा बोलने पर बखेङा शुरू हो जाता है । आईये देखें । मधु क्या कहते हैं । ( - ) के आगे मेरे विचार हैं ।
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तीसरा तिल ( आज्ञा चक्र ) या शरीर के किसी भी भाग में ध्यान रोकने से आत्म ज्ञान कभी नहीं हो सकता ।
- लेकिन ऐसा कहा किसने है कि यहाँ ध्यान रोकने से आत्म ज्ञान हो जाता है ? योग ( द्वैत ) और आत्म ज्ञान दोनों का तरीका एकदम अलग है । भले ही उनके बहुत से ( आंतरिक ) अनुभव समान ( साधक के संस्कार अनुसार ) होते हैं । ध्यान कोई एक ही जगह ठहर जाने वाली क्रिया भी नहीं है । निरंकार ररंकार और पंचनामा से भी आत्म ज्ञान नहीं हो सकता । आत्म ज्ञान के लिये निज स्वरूप का दर्शन या खुद ( आत्मा ) की अंतिम स्थिति तक जाना होता है । न कि किसी कबीर । परमात्मा या परमेश्वर तक । इसके दो तरीके हैं । जिनमें 1 बहुत सरल है । जो हम प्रयोग करते हैं । और दूसरा (  साधक की स्थिति % अनुसार )  कठिन या बहुत कठिन हो सकता है । मैं स्पष्ट कर दूँ । अच्छे अभ्यास हेतु हम दोनों का प्रयोग करते हैं । ताकि एक मजबूत साधक का निर्माण हो । बाकी साधक के ऊपर भी बहुत कुछ निर्भर होता है । 
संसार के जितने भी धर्म मत मतांतर हैं । सब कमाई योग साधना की बात कर रहे हैं । सब तीन लोक की बात कर रहे हैं । पर साहिब ( कबीर ) की शिक्षा सहज मार्ग की ओर चक्कर काट रही है ।
- सब 3 लोक की बात कर रहे हैं । फ़िर मधु शायद 4th लोक की बात कर रहे हैं । पर एक अटल सत्य ये भी है कि कहीं कोई लोक है ही नहीं । मधु लगता है । किसी कुँये में बैठकर दुनियाँ देख रहे हैं । मधु से बहुत पहले । और ये वो सभी से बहुत पहले सनातन आत्म ज्ञान की बात हमेशा होती रही । यह बात अलग है कि उसके सही जानकार और मार्गदर्शक उतने नहीं हुये । और जो हुये । वो आज ( मीडिया ) की तरह प्रसिद्ध नहीं हो पाते थे ।  वैसे भी आत्म ज्ञान बङे भाग्य से मिलता है । वैसे ( मधु ) आपके इन साहिब उर्फ़ कबीर की शिक्षा क्या नाम कमाई की बात नहीं कहती । जरा पढें - कर का मनका डार दे मन का मनका फ़ेर । स्वांसा खाली जात है तीन लोक का मोल । निरंजन तेरे घट में माला फ़िरे दिन रात । ऊपर जावे नीचे आवे स्वांस स्वांस चढ जात । संसारी नर जानत नाहीं वृथा उमर गंवात । गौर करिये मधु ! ये सभी बात सोहं सोहं की ही है । बाकी कबीर वाणी में ( सहज ) योग साधना भी पूरे विस्तार से है । और आपकी इसी किताब और अन्य किताबों में भी है । और सहज मार्ग की बात भी है । इसलिये हर माल 10  रुपये के हिसाब में बात न करें । जैसा ग्राहक वैसी वस्तु का नियम अधिक होता है ।
जैसे हवा में हेलीकाप्टर उङता है । जेट भी उङता है । यान भी उङते हैं । पार पाइण्डर भी उङता है । ऐसे ही आंतरिक साधना भी अनेक सूत्रों से की जाती है । वहाँ भी विविध गति से चलने वाले शरीर हैं । पर जैसे हेलीकाप्टर वहाँ तक नहीं जा सकता । जैसे पार पाइंडर जा सकता है । उसकी गति में भी बङा अंतर है । कोई हेलीकाप्टर । कोई हवाई जहाज किसी ग्रह का सफ़र तय नहीं कर सकता । ऐसे ही सगुण निर्गुण भक्तियों और किसी भी प्रकार के योग से भवसागर को पार नहीं किया जा सकता । सदगुरु का नाम रूपी जहाज ही आत्मा को तीन लोक से परे अमर लोक ले जाने की क्षमता रखता है ।
- वैसे  मधु आपका  ( प्रश्न भाव और उसकी उच्च बखानता के आधार पर ) ये भवसागर है कहाँ ? तीन लोक कहाँ हैं । और ये अमरलोक कहाँ हैं ? ( विस्तार के भय से अभी संक्षिप्त में । इसलिये बाद में )
शरीर के किसी भी स्थान पर ध्यान रोकना एक छल है । माया है । पाँच मुद्राओं के पाँचों नाम इसी काया में हैं । सोहं भी इसी में हैं । इसलिये साहिब ने विदेह नाम की बात की । सोहं को सच्चा नाम नहीं कहा । 
- आपके ये साहिब आपको अपने प्रचारक के रूप में देखते होंगे । तो निसंदेह उन्हें रोना आता होगा । कैसे कैसे लोग कबीर ज्ञान में " भानमती का कुनबा " जोङ रहे हैं । वैसे ( पाठकों से ) मधु ने कहीं " विदेह नाम " की चर्चा की हो । तो कृपया मुझे बतायें ( भेजें ) फ़िर मैं बताऊँगा - बोल मेरी मछली कितना पानी ? इतना या इतना ?
जो जन होय जौहरी शब्द लेयु बिलगाय । सोहं सोहं जप मुआ मिथ्या जन्म गंवाय ।
सोहं सोहं जपे बङे ज्ञानी । निःअक्षर की खबर न जानी ।
शरीर के किसी भी हिस्से में ध्यान रोकने से आध्यात्मिक शक्तियाँ नहीं जगती । इससे तो शरीर की दिव्य शक्तियों की ताकत ही जगी । शरीर की कोई भी ताकत जगी । तो निरंजन की ताकत जगी । निरंजन की ताकत को जगाकर निरंजन की सीमा से पार नहीं हुआ जा सकता । इसलिये कबीर किसी भी स्थान पर ध्यान रोकने को मना कर रहे हैं ।
- इस बात से मैं बिलकुल सहमत हूँ । कोई व्यंग्य नहीं । पर मधु जी ! कबीर तो संसार में ही रुकने से मना कर रहे हैं । और मैं तो ब्लाग पर कब से चिल्ला रहा हूँ - रहना नहीं देश विराना है । मुझे अपने घर जाना है । फ़िर आप किस कारण से संसार में टिके हुये हैं ।
कबीर धुनों पर ध्यान रोकना नहीं बोल रहे । धुनें हमारे स्नायुमंडल की झंकार हैं । आवाज दो तत्व के टकराये बिना नहीं हो सकती । जहाँ द्वैत आ गया । वहाँ आवाज आ गयी । वहाँ माया है । अतः ये अंतिम सत्य नहीं है ।
- बिलकुल सही । अंतिम सत्य तो खुद होना या आत्मा ही है । बाकी ( आंतरिक ) गीत संगीत से थोङा मनोरंजन अगर साधक शिष्य कर लें । तो इसमें क्या बुरा है । लगता है । आप बहुत नीरस स्वभाव के हैं । फ़िर ठीक ही है । आपने शादी नहीं की ।
सभी कह रहे हैं - तुम्हें कुछ करना है । कोई कमाई करने को कह रहा है । कोई साधना करने को कह रहा है । कोई दान पुण्य करने को कह रहा है । कोई यज्ञ करने को कह रहा है । कोई तीर्थ करने को कह रहा है । पर कबीर की सच्ची भक्ति कह रही है - तुम्हें कुछ नहीं करना है । जो करना है । वो सदगुरु ने करना है ।
यहीं पर सब समीकरण बदल जाते हैं । क्योंकि अपने जोर से अपनी कमाई से कोई भी जीव इस भवसागर से पार नहीं हो सकता । 
- बिलकुल सही बात । लेकिन कबीर के बाद यदि आप भी ऐसा कह रहे हैं । तो फ़िर आपको इसमें ये और जोङना चाहिये - डांट वरी पीपुल..मैं हूँ ना ।
सात दीप नव खण्ड में गुरु से बङा न कोय । कर्ता करे ना कर सके गुरु करे  सो होय ।
यदि आपका गुरु गृहस्थ है । तो उससे कभी भी अपनी आत्मा के कल्याण की उम्मीद मत रखना । वो नहीं कर पायेगा ।
- वैसे मेरी यही समझ में नहीं आया । आपने शादी क्यों नहीं की ? आपके साहिब तो शादीशुदा थे । वैसे लोग अगर शादी नहीं करते । तो आपके लिये शिष्य कहाँ से आते । फ़िर आप भी कहाँ से आते ? ( नीचे और भी देखें । )
मुझे आपको नाम के बाद ज्ञान नहीं देना । दे चुका हूँ । कुछ नहीं देना है । फ़िर सतसंग क्या है ? यह तो केवल आपको सतर्क करने के लिये है । यह नहीं करना है । वो नहीं करना । अब आपके अन्दर स्व संवेद उत्पन्न हो चुका है । केवल समझा रहा हूँ कि कहाँ कहाँ और किस किससे बचना ।
- ये कुछ कुछ वैसा ही है - चैन से सोना है । तो जाग जाईये । बाकी आप ( पाठक ) लोग समझदार ही हैं ।
जब भी आप मुझसे मिलेंगे । आपको एक ताकत मिलेगी । आपको काम कर पाने की  ताकत मिलेगी । इसलिये जल्दी जल्दी आपके बीच में आ रहा हूँ ।
- तन की शक्ति मन की शक्ति - बोर्नबिटा । मेरी सभी मम्मियों को सलाह है । वो अपने पतियों बच्चों को महंगा बोर्नबिटा प्रोटीन x रीवाइटल खिलाना छोङकर मधु से मिलें । ये मुफ़्त है ना ।
सदगुरु का दर्शन इसलिये महत्वपूर्ण है । क्योंकि इससे हमें आध्यात्मिक किरणें मिलती हैं । जो उनकी वाणी दृष्टि और चरण स्पर्श द्वारा हमें प्राप्त होती हैं । 
- मधु की इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ । अगर कोई सच्चे सन्त की शरण में है । तो उसे ऐसे अनुभव होते ही हैं ।
जो गुरु गृहस्थ ( जकङा हुआ ) में रहकर अपने को सन्त कह रहा है । वो आपसे धोखा कर रहा है । वो कभी भी सन्त नहीं हो सकता । एक सन्त चाहकर भी विषय नहीं कर सकता है । जो विषय आनन्द ले रहा है । वो माया में फ़ँसा है । उसे सच्चे आनन्द का स्वाद अभी नहीं मिला है । फ़िर जो परमात्मा में मिल जाता है । वो उसी का रूप हो जाता है । उसके लिये सव बच्चे हो जाते हैं । इसलिये बाप अपनी बेटी से शादी नहीं कर सकता । उससे विषय नहीं कर सकता ।
- पहले तो मधु गृहस्थ और विरक्त का ही सही मतलब नहीं जानते । गृहस्थ कहीं जकङे हुये को कहते हैं । और विरक्त जो जकङा हुआ नहीं है । गृह ( गिरह यानी गाँठ ) में स्थ ( स्थित या बनी हुयी स्थिति ) को असली मायनों में गृहस्थ कहते हैं । इसलिये पत्नी बच्चों और घर से जुङा हुआ ही गृहस्थ नहीं है । बल्कि किसी भी भाव वासना से बँधा हुआ गृहस्थ है । वास्तविकता ये है कि एक शादीशुदा घरेलू इंसान अपने दिमाग में घूमती औरत को उससे संभोग द्वारा निकाल कर मुक्त हो जाता है । और उसे फ़िर उसमें सिर्फ़ शारीरिक जरूरत से ज्यादा रस नहीं आता । जबकि जंगलों में बैठे ऐसे साधु सन्यासियों के दिमाग में ( मधु के हिसाब से जो गृहस्थ नहीं हैं ) औरत पूरे आकर्षण से छायी रहती है । वे काल्पनिक संभोग का रस लेते हैं । आप देखें । शास्त्र पुराणों में अपवाद को छोङकर सभी उच्च स्तरीय योगी सन्त मधु के हिसाब वाले ? गृहस्थ ही थे । रङुआ एक भी नहीं । मधु क्योंकि मुख्यतः कबीर की ही बात करते हैं । तो सबसे पहली बात यही है कि - कबीर क्या गृहस्थ नहीं थे ? लोई के बारे में आपको मालूम ही होगा । आगे देखें । ये सभी प्रसिद्ध ज्ञानी गृहस्थ थे कि नहीं ? कबीर । रैदास । नानक । रामकृष्ण । बुद्ध । राम ( सन आफ़ दशरथ ) श्रीकृष्ण । अनिरुद्ध । हँस । शंकर ( देवता ) मुहम्मद ।
अन्त में - वास्तव में इन सभी बिन्दुओं पर विस्तार से लिखना चाहता था । पर इसके लिये काफ़ी समय और मुख्यतः फ़ुरसत की आवश्यकता है । दूसरे थोङे संकेत के बाद आपके चिंतन के लिये भी छोङ देता हूँ । साहेब ।
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