27 अगस्त 2012

जोरबा टू बुद्धा - ओशो


ओशो को मत को लेकर लोगों के मन में अलग अलग धारणा बनी हुई  है । ओशो ने अपनी विचारधारा को नाम दिया था - जोरबा टू बुद्धा । जोरबा का अर्थ होता है । एक भोग विलास में पूरी तरह से डूबा हुआ व्यक्ति । और बुद्धा का अर्थ निर्वाण पाया हुआ । परन्तु लोगों ने जोरबा का चरित्र का याद रख लिया । और बुद्धा को सब भूल गए । नौबत यहाँ तक आ गयी । अगर आप ओशो आश्रम जायेंगे । तो सबसे पहले आपको HIV test करवाना पड़ेगा । यदि आपका HIV negative है । तो आपको ओशो आश्रम में प्रवेश मिल सकता है । लोग अधिकतर ओशो के विचार सामने रख देते हैं । .. आपकी नज़र में ओशो क्या हैं ? चन्द्रमोहन जैन ।
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मुझे नहीं लगता कि मैं सीमित शब्दों में ओशो या किसी भी आत्म ज्ञानी के बारे में कोई बात पूर्ण रूप से कह सकता हूँ । सब धरती कागद करूँ । लेखनी सब वनराय । सात समुद्र की मसि करूँ । गुरु गुन लिखा ना जाय । काम मिलावे राम कूं ।  जे कोई जाणै राखि । कबीर बिचारा क्या कहै ।  जाकि सुखदेव बोले साख ।
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किसी कारण वश यहाँ तक लिखने के बाद अभी आगे लिख नहीं पाया था कि दीपक जी का सार्थक उद्देश्य पूर्ण सुझाव युक्त मेल प्राप्त हुआ । वास्तव में दीपक ने बेहद समझदारी की बात लिखी । पुस्तकीय आधार पर बहस के बजाय जिज्ञासुओं को सार सार पता चले । तो 

उसके बहुत लाभ हो सकते हैं । बाकी पुस्तकों से तो पुस्तकालय भरे हुये हैं । और उनमें मत भिन्नता विभिन्नता के इतने उदाहरण हैं कि पूरे मानव जीवन में निष्कर्ष निकाल पाना ( कि अंतिम सच क्या है ? ) कठिन ही है । जो कि आम आदमी के बस की बात भी नहीं होती । इसीलिये शोधकर्ताओं बैज्ञानिकों के नवीनतम शोध से संसार विभिन्न क्षेत्रों में विकास मार्ग पर गतिशील हुआ है । अतः वाकई में दीपक की भावना की गहराई समझी जाये । तो वह बहुत ऊँची बात है । इसलिये आज इसी आधार पर बात करूँगा ।
वास्तव में जब भी मैं आपका कोई मेल ( शंका ) पढ रहा होता हूँ । उसी समय वह विषय साथ के साथ मेरे सामने पूर्ण स्पष्ट हो जाता है । जैसे आप किसी भी चीज के बारे में ठोस और पूर्ण जानकारी रखते हैं । तो उसके किसी भी बिन्दु पर जिक्र होते ही आपको वह सब कुछ प्रत्यक्ष हो उठता है । जैसे अनुभवी डाक्टर नब्ज देखते ही रोग समझ जाता है । कोई अनुभवी मैकेनिक किसी यंत्र की खराबी समझ जाता है । ठीक ऐसा ही मेरे साथ होता है । और इसके ( लोगों की अलौकिक समस्या पर आधारित ) कुछ उदाहरण भी लेख रूप में सामने आ चुके हैं ।
देखिये । जैसा कि मैं कहता रहा हूँ कि आम लोगों की नजर में यह - चमत्कार । पहुँचा हुआ ।  सिद्ध ( जिनकी ध्वनि या भाव अर्थ ही सच्चाई से अलग हो गया है ) आदि आदि ज्ञान या व्यक्ति कहा जाता है । पर मुझे इन शब्दों से ही नफ़रत है । मैं इसको - भक्ति बिज्ञान । अलौकिक बिज्ञान ।

आध्यात्म बिज्ञान जैसे नामों से पुकारना पसन्द करता हूँ । तब यह आम व्यक्ति का हो जाता है । जो भी यह अध्ययन करेगा । वह इस बिज्ञान से जुङे असंख्य लाभ उठायेगा ।
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अब जैसे कि चन्द्रमोहन जी ने प्रश्न किया - आपकी नज़र में ओशो क्या हैं ? यहाँ मेरे सामने थोङी सी उलझन हो गयी । दीपक के भाव अनुसार कोई उलझन नहीं । पर इस भाव में ( मेरे लिये ) कुछ थी । क्योंकि मेरे पास 2 नजर हैं ।  एक बाहय सच को देखने वाली - 2 eye । एक आंतरिक सच को देखने वाली 3rd eye ..तब चलिये । दोनों का ही इस्तेमाल करते हैं । आप ध्यान दें । तो ओशो के अनुयायी भृमित से हैं । वे सिक्खों की तरह सिर्फ़ - 1 ओंकार ॐ सतनाम.. का गीत गा रहे हैं । जबकि ॐकार कोई सतनाम नहीं है । सिर्फ़ बीज मंत्र है । क्योंकि इसी से शरीर बना है । अतः अधिकतर कुण्डलिनी तंत्र मंत्र योग आदि में आवश्यकता अनुसार इसका प्रयोग होता है । जैसा कि ओशो धारा वाले सहज योग या राज योग के नाम से अपना ज्ञान प्रचारित करते हैं । उसमें ॐ का कोई महत्व ही नहीं । 
धार्मिक चैनल पर आने वाले ओशो के 3-3 सदगुरु ? ( त्रिवरि ) किताबें देख देख कर प्रवचन करते हैं ।
अब सवाल ये है कि - ओशो अपने जीवन में कोई अच्छा शिष्य क्यों नहीं बना पाये । जो उनकी विरासत को

संभाल सकता । ओशो के ( अभी के ) समस्त ध्यान शिविर स्कूलों की प्रयोगशाला के समान हैं । जिनमें किताबों की थ्यौरी के आधार पर ध्यान अभ्यास किये जाते हैं । शरीर गुरु जो अंतर गुरु से मिलाता है । वह असली विषय ? ही उनके पास नहीं है । वास्तव में ओशो पूर्ण गुरु थे । पर सतगुरु हरगिज नहीं । उन्होंने जहाँ तक की बात की । वह पूर्ण और स्पष्ट थी । कोई बनाबटी पन नहीं । लेकिन कहीं कुछ ऐसा था कि वे अपने किसी भी शिष्य को उस सच तक भी ? नहीं जोङ पाये । जहाँ कम से कम वे खुद थे । ऐसा क्यों ? ये दरअसल बहुत गूढ विषय है । इसमें गुरु का प्रकार । उसकी ज्ञान परम्परा । अनुशासन । और सबसे बङी बात सत्ता से अधिकार मिलना । ये मूल चीजें ओशो के पास नहीं थी । यदि आप देखें । तो वे अपने व्याख्यानों में इनकी जरूरत ही नहीं समझते । क्योंकि उनके पास थी ही नहीं । दूसरे जो मैंने स्पष्ट 

देखा । ओशो किसी भी ध्यानी - नानक । ईसा । महावीर । कबीर । बुद्ध । मुहम्मद । यहाँ तक कि जे. कृष्णामूर्ति ( जो मेरे हिसाब से पूरा पागल था ) आदि आदि को एक ही भाव में तौल देते हैं । ये बिलकुल हास्यास्पद है । इनमें ईसा और मुहम्मद सिर्फ़ पैगम्बर थे । उनके पास सिर्फ़ उतनी ही ताकत थी । जो उस समय कार्य हेतु उन्हें दी गयी । बाकी इनका (  टिके न रहने के कारण ) अपने जीवन काल में ही पतन हो गया । अतः जो भी ऊल जुलूल बातें इनके बारे में प्रचलित हैं । वे निराधार ही हैं । बुद्ध के अपेक्षा महावीर का क्रिया योग बहुत धीरे धीरे वाला था । और एकदम बोरिंग । कबीर ने प्रत्येक स्थिति की सहज योग अनुसार बात की । लेकिन अंतिम सत्य वह भी नहीं है । पर कबीर ने इसको स्पष्ट कर दिया है ।

विशेष - समयाभाव से आज लेख पूरा नहीं हुआ । पूरा लेख पढने के बाद ही कोई राय बनायें । अभी बहुत कुछ अस्पष्ट है ।
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