17 अगस्त 2012

मेरी कोई विचारधारा नहीं है - चन्द्रमोहन


उमेश जी ! जो आपने लिखा । उससे मैं पूरी तरह सहमत हुँ । परन्तु यह बात आप पर भी लागू होती है । जो हमारी विचार धारा के विरुद्ध कोई व्यक्ति बोलता है । तो हम विचलित हो जाते हैं । आप मेरी बात से सहमत नहीं हुए । और आपने ज़ल्दी से यहाँ कमेन्ट कर दिया । और यह कोई आपने नयी बात नहीं लिखी है । शायद यह बात हर व्यक्ति जानता है । परन्तु अगर कोई दूध को दूध न कहकर उसे शराब कहे । तो आप उसे क्या कहेंगे ? मतलब कि जो मैं बात कर रहा हुँ । वो सच है ? या आप जो बात कर रहे । वो सच है ? तभी यह बहस का विषय बन गयी है । परन्तु पहले यह जान लें कि - हम बहस किस बात पर कर रहे हैं ? मैंने सिर्फ इतना लिखा कि - जो ओशो ने राधा स्वामी मत पर बोला । वो गलत है । देखिये । मैं पहले ही कह चूका हुँ कि मेरा राधा स्वामी मत से कोई लेना देना नहीं है । और न ही ओशो 

के मत से । हाँ यह जरुर हैं कि मैं 1987 से दोनों ही मतों को भली भांति जानता हूँ । मतलब कि कई बार राधा स्वामी डेरा और ओशो आश्रम पूना visit कर चूका हुँ । और भी बहुत सारे गुरुओं के आश्रम में जा चूका । आप यह कह सकते हैं । मेरी आधी जिन्दगी बस यूँ ही भटकने में गुजर गयी है । और मेरी कोई विचारधारा नहीं है कि मैं राधा स्वामी मत के पक्ष में हुँ । बस जो 5 question लिखे थे । आप उसका मुझे कोई proof दे दीजिये । मतलब कि राधा स्वामी मत में किसी किताब में लिखा । और या कोई ऑडियो हो ।
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आज थोङा बिजी अधिक हो गया । वरना इसी विषय पर स्पष्ट करना चाहता था । वास्तव में - मेरा उमेश अशोक या चन्द्रमोहन जी का आपस में कोई वैचारिक विरोध भी नहीं है । दरअसल ये 5 question राधा स्वामी की किसी किताब में नहीं लिखे ( अशोक के अनुसार ) बल्कि राधास्वामी मत की किताबों को पढकर किसी 

अंग्रेज के मन में उत्पन्न हुये थे । जिसका नाम भी इसी लिंक के नीचे आता है । उसने उन्हें ओशो से पूछा । और ओशो ने उन 5 question को लक्ष्य कर उत्तर दिया । न कि चरन सिंह को लक्ष्य करके । लेकिन चन्द्रमोहन जी ! मैं आपसे ( जबकि आप राधास्वामी और उसकी पुस्तकों के बारें में भलीभांति जानते हैं ) जानना ( ध्यान  दें । व्यंगात्मक अन्दाज में पूछना नहीं ) चाहूँगा कि - राधास्वामी वाले अपनी सभी किताबों में जगह जगह निर्वाणी ( जो वाणी से न बोला जाये )  और धुनात्मक नाम की बात करते हैं । जबकि उनका दीक्षा पंचनामा वाणी से जपा जाता है । क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है ? मैं फ़िर से स्पष्ट कर दूँ । कोई भी वाणी से आपको 1 भी अक्षर का मंत्र बोलने ( जपने ) को कहता है । वह आत्म ज्ञान  या परमात्मा या कबीर वाला ज्ञान नहीं है । बल्कि वह काल ज्ञान है । और एक दृष्टि से तो वह कोई ज्ञान ही नहीं है । तब ओशो की यह बात ठीक लगती है - उनका पूरा मत ही काल्पनिक है । इस पर अशोक भी अपनी बात आज ही रखेगा । आप में से कोई भी इस बारे में जानकारी रखता हो । वह बता सकता है । कमेंट पर माडरेशन नहीं हैं । इसलिये आपके कमेंट पर दूसरों की प्रतिक्रिया तुरन्त उपलब्ध होगी । साहेब ।
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