25 सितंबर 2012

जग चला चली का खेला

सुबह चार बजे न जाने कैसे दो क्षणों को उसकी आँख लग गई । तभी उसने सपना देखा । गुडिया उसका दरवाज़ा खटखटा रही है । जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला । गुडिया उससे लिपटकर बोली - लो ! अब हमेशा तुम्हारे पास ही रहने आ गई । रजनीश बिस्तर पर चौंक कर उठ बैठा । घड़ी देखी । सुबह के चार बजे थे । वह उठते ही सीधा गुडिया के घर की ओर चल दिया । नानी समझी नदी नहाने जा रहा है । डा0 शर्मा के घर से रोने की आवाज़ें आ रही थीं । गुडिया ने सचमुच चार बजे ही प्राण छोड़े थे । फिर वह गुड़िया का दाह संस्कार होने पर ही दोपहर 2 बजे घर लौटा । नानी को सब कुछ मालूम हो गया था । वह राजा को छाती से लगाकर काफी देर तक उसके बाल सहलाती रही । रजनीश ने धीमे धीमे कल रात गुड़िया की बातें, सुबह का सपना, सब कुछ अपनी नानी को बताया । नानी ने रेडियो खोल रक्खा था । और नूरजहाँ का गीत गूँज रहा था -
वो जो हममें तुममें करार था । तुम्हें याद हो कि न याद हो ।
वो कभी जो तुमसे प्यार था । तुम्हें याद हो कि न याद हो ।
रजनीश को यह गाना बहुत अच्छा लगा । नानी से आग्रह करके उसी शाम इसी रिकार्ड को सुनने के लिये ग्रामोफोन ख़रीदा । ग्रामोफ़ोन पर बार बार इसी रिकार्ड को सुनते हुये नानी ने टोका - राजा !यह रिकार्ड सुनते हुये तुझे अपनी गुड़िया की याद आ रही है । और मुझे तेरे नाना की । राजा एक साँस भरकर बोला - नानी तू बहुत हिम्मत वाली थी । नाना के मरते वक़्त भी तू रोई नहीं थी । पर कल शाम गुड़िया की बातें सुनकर मेरी आँखे नम हो गई थीं ।
नानी बोली - प्रेम करना तो ईश्वर से मिलना है । सही मानों में प्रेम ही परमात्मा है । प्रेम के लिये अपने को खोना होता है । जो प्रेम में हार ख़ुशी से स्वीकार कर लेता है । वही जीत जाता है ।
राजा बोला - शशि कहती थी कि वह फिर जन्म लेकर मिलेगी मुझसे । ओशो ।
कोई चला गया कोई जावे । कोई गठड़ी बांध सिधावे । 
कोई खड़ा तैयार अकेला । जग चला चली का खेला ।
अति हठ कर, मत मर बावरे । हठ से बात ना होये ।
ज्यों ज्यों भीजे कामरी । त्यों त्यों भारी होये ।
भूल भी ठीक की तरफ ले जाने का मार्ग है । इसलिए भूल करने से डरना नहीं चाहिये । नहीं तो कोई आदमी ठीक तक कभी पहुँचता नहीं । भूल करने से जो डरता है । वह भूल में ही रह जाता है । खूब दिल खोलकर भूल करनी चाहिये । एक ही बात ध्यान रखनी चहिये कि एक ही भूल दुबारा न हो । ओशो 
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