29 सितंबर 2012

जन गण मन या अंग्रेज जार्ज पंचम की आरती


‘’ वन्दे मातरम ’’ बंकिम चंद्र चटर्जी ने लिखा था । उन्होने इस गीत को लिखा । लिखने के बाद 7 साल लगे । जब यह गीत लोगो के सामने आया । क्योंकि उन्होने जब इस गीत को लिखा । उसके बाद उन्होने 1 उपन्यास लिखा । जिसका नाम था ‘’ आनद मठ ’’ उसमे इस गीत को डाला । वो उपन्यास छपने मे 7 साल लगे । 1882 आनद मठ उपनास का हिस्सा बना - वन्दे मातरम । और उसके बाद जब लोगों ने इसको पढ़ा । तो इसका अर्थ पता चला कि - वन्दे मातरम क्या है ? आनद मठ उपन्यास बंकिम चंद्र चटर्जी ने लिखा था । अंग्रेजी सरकार के विरोध में । और उन राजा महाराजाओं के विरोध में । जो किसी भी संप्रदाय के हों । लेकिन अंग्रेजी सरकार को सहयोग करते थे । फिर उसमें उन्होंने बगावत की भूमिका लिखी कि - अब बगावत होनी चाहिये । विरोध होना चाहि्ये । ताकि इस अंग्रेजी 

सत्ता को हम पलट सकें । और इस तरह वन्दे मातरम को सार्वजनिक गान बनना चाहिये । ये उन्होंने घोषित किया ।
उनकी 1 बेटी हुआ करती थी । जिसका अपने पिता बंकिम चंद्र चटर्जी जी से इस बात पर बहुत मतभेद था । उनकी बेटी कहती थी - आपने यह वन्दे मातरम लिखा है । उसके ये शब्द बहुत क्लिष्ट हैं कि बोलने और सुनने वाले की ही समझ में नहीं आयेंगे । इसलिये गीत को आप इतना सरल बनाईये कि - बोलने और सुनने वाले की समझ में आ सकें ।
तब बंकिम चंद्र चटर्जी ने कहा - देखो । आज तुमको यह क्लिष्ट लग रहा हो । लेकिन मेरी बात याद रखना । 1 

दिन ये गीत हर नौजवान के होंठों पर होगा । और हर क्रांतिवीर की प्रेरणा बनेगा । और हम सब जानते हैं । इस घोषणा के 12 साल बाद बंकिम चंद्र चटर्जी का स्वर्गवास हो गया । बाद में उनकी बेटी और परिवार ने आंनद मठ पुस्तक जिसमें ये गीत था । उसका बड़े पैमाने पर प्रचार किया ।
वो पुस्तक पहले बंगला में बनी । बाद में उसका अनुवाद - कन्नड । मराठी । तेलगु । हिन्दी आदि बहुत
भाषा में छपा । उस पुस्तक ने क्रांतिकारियों में बहुत जोश भरने का काम किया । उस पुस्तक में क्या था कि - इस पूरी अंग्रेजी व्यवस्था का विरोध करे । क्योंकि यह विदेशी है । उसमें ऐसी बहुत सी जानकारियां थी । जिसको पढ़ कर लोग बहुत उबलते थे । और वो लोगों में जोश भरने का काम करती

थी । अंग्रेजी सरकार ने इस पुस्तक पर पाबंदी लगाई । कई बार इसको जलाया गया । लेकिन इसकी कोई न कोई 1 मूल प्रति बच ही जाती । और आगे बढ़ती रहती ।
1905 में अंग्रेज़ो की सरकार ने बंगाल का बंटवारा कर दिया । 1 अंग्रेज़ अधिकारी था । उसका नाम था - कर्ज़न ! उसने बंगाल को 2 हिस्सो मे बाँट दिया । 1 - पूर्वी बंगाल । 2 - पश्चिमी बंगाल । पूर्वी बंगाल था - मुसलमानो के लिये । पश्चिमी बगाल था - हिन्दुओं के लिए । हिन्दू और मूसलमान के आधार पर यह पहला बंटवारा था ।
तो भारत के कई लोग जो जानते थे कि - आगे क्या हो सकता है ? उन्होंने इस बंटवारे का विरोध किया । और बंग भंग के विरोध में 1 आंदोलन शुरू हुआ । और इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे ( लाला लाजपतराय ) जो उत्तर भारत में थे ( विपिन चंद्र पाल ) जो बंगाल और पूर्व भारत का नेतत्व करते थे । और लोक मान्य बाल गंगाधर तिलक । जो पश्चिम भारत के बड़े नेता थे । इस तीनों नेताओं ने अंग्रेज़ों के बंगाल विभाजन का विरोध शुरू किया । इस आंदोलन का 1 हिस्सा था ( अंग्रेज़ो भारत छोड़ो )
( अंग्रेजी सरकार का असहयोग ) करो । ( अंग्रेजी कपड़े मत पहनो ) ( अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार करो )  और दूसरा हिस्सा था - पोजटिव.. कि - भारत में स्वदेशी का निर्माण करो । स्वदेशी पथ पर आगे बढ़ो ।
लोकमान्य तिलक ने अपने शब्दों में इसको स्वदेशी आंदोलन कहा । अंग्रेजी सरकार इसको बंग भंग विरोधी

आंदोलन कहती रही । लोकमान्य तिलक कहते थे - यह हमारा स्वदेशी आंदोलन है । और उस आंदोलन की ताकत इतनी बड़ी थी कि - यह तीनों नेता अंग्रेज़ो के खिलाफ जो बोल देते । उसे पूरे भारत के लोग अपना लेते । जैसे उन्होंने आर के ऐलान किया - अंग्रेजी कपड़े पहनना बंद करो । करोंड़ों भारत वासियों ने अंग्रेजी कपड़े पहनना बंद कर दिया । उधर उस समय भले हिंदुस्तानी कपड़ा मिलें । मोटा मिले । पतला मिले । वही पहनना है । फिर उन्होंने कहा - अंग्रेजी व्लेड का इस्तेमाल करना बन्द करो । तो भारत के हजारों नाईयों ने अंग्रेजी ब्लेड से दाड़ी बनाना बंद कर दिया । और इस तरह उस्तरा भारत में वापिस आया । फिर लोक मान्य तिलक ने कहा - अंग्रेजी चीनी खाना बंद करो । क्योंकि चीनी उस वक्त इंगलैंड से बन कर आती थी । भारत में गुड बनता था । तो हजारों लाखों हलवाइयों ने गुड डाल कर मिठाई बनाना शुरू कर दिया । फिर उन्होंने अपील लिया - अंग्रेजी कपड़े और अंग्रेजी साबुन से अपने घरों को मुक्त करो । तो हजारों लाखों धोबियों ने अंग्रेजी साबुन से कपड़े धोना मुक्त कर दिया । फिर उन्होंने पंडितों से कहा - तुम शादी करवाओ अगर । तो उन लोगों की मत करवाओ । जो अंग्रेजी वस्त्र पहनते हों । तो पंडितो ने सूट पेंट पहने टाई पहनने वालों का बहिष्कार कर दिया ।

इतने व्यापक स्तर पर ये आंदोलन फैला कि 5-6 साल में अंग्रेजी सरकार घबरा गयी । क्योंकि उनका माल बिकना बंद हो गया । ईस्ट इंडिया कंपनी का धंधा चौपट हो गया । तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने अंग्रेज़ सरकार पर दबाव डाला कि - हमारा तो धंधा ही चौपट हो गया । भारत में । हमारे पास कोई उपाय नहीं है । आप इन भारतवासियों की मांग को मंजूर करो । मांग क्या थी कि - यह जो बंटवारा किया है । बंगाल का हिन्दू मुस्लिम के आधार पर । इसको वापिस लो । हमें बंगाल के विभाजन संप्रदाय के आधार पर नहीं चाहिये ।
और आप जानते हैं । अंग्रेजी सरकार को झुकना पड़ा । और 1911 मे divison of bangal act वापिस लिया गया । इतनी बड़ी होती है । बहिष्कार की ताकत ।
तो लोक मान्य तिलक को समझ आ गया । अगर अंग्रेज़ो को झुकाना है । तो बहिष्कार ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है । यह 6 साल जो आंदोलन चला । इस आंदोलन का मूल मंत्र था - वन्दे मातरम । जितने क्रांतिकारी थे । लोक मान्य बाल गंगाधर तिलक । लाला लाजपत राय । विपिन चंद्र पाल के साथ । उनकी संख्या 1 करोड़ 20 लाख से ज्यादा थी । वो हर कार्यकृम में वन्दे मातरम

गाते थे । कार्यकृम की शुरूआत में - वन्दे मातरम । कार्यकृम की समाप्ति पर - वन्दे मातरम ।
उसके बाद क्या हुआ ? अंग्रेज़ अपने आपको बंगाल से असुरक्षित महसूस करने लगे । क्योंकि बंगाल इस आंदोलन का मुख्य केंद्र था । 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था । 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजों के खिलाफ बंग भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुये । तो अंग्रेजों ने अपने आपको बचाने के लिये कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गये । और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया । पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुये थे । तो अंग्रेजों ने अपने इंगलैंड के राजा को भारत आमंत्रित किया । ताकि लोग शांत हो जायें । 
इंगलैंड का राजा जार्ज पंचम 1911 में भारत में आया । रवींद्र नाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि - तुम्हें 1 गीत जार्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही 

होगा । उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था । उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे । उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिवीजन के निदेशक Director रहे । उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था । और खुद रवीन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी । अंग्रेजों के लिये ।
रवीद्रनाथ टैगोर ने मन से । या बेमन से । जो गीत लिखा । उसके बोल हैं - जन गण मन अधिनायक जय । हे भारत भाग्य विधाता । इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जार्ज पंचम का गुणगान है । जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि - ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजों की खुशामद में लिखा गया था ।

इस राष्ट्र गान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है  - भारत के नागरिक । भारत की जनता । अपने मन से । आपको ( जार्ज पंचम को ) भारत का भाग्य विधाता समझती है । और मानती है । हे अधिनायक Super hero तुम्हीं भारत के भाग्य विधाता हो । तुम्हारी जय हो । जय हो । जय हो । तुम्हारे भारत आने से सभी
प्रान्त - पंजाब । सिंध । गुजरात । मराठा मतलब महाराष्ट्र । द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत । उत्कल मतलब उड़ीसा बंगाल आदि । और जितनी भी नदियां । जैसे - यमुना और गंगा । ये सभी हर्षित हैं । खुश हैं । प्रसन्न हैं । तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते हैं । और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते हैं । तुम्हारी ही हम गाथा गाते हैं । हे भारत के भाग्य विधाता ( सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो । जय हो । जय हो ।  में ये गीत गाया गया ।

जब वो इंगलैंड चला गया । तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया । जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना । तो वह बोला कि - इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंगलैंड में भी किसी ने नहीं की । वह बहुत खुश हुआ । उसने आदेश दिया कि - जिसने भी ये गीत उसके ( जार्ज पंचम के ) लिये लिखा है । उसे इंगलैंड बुलाया जाये । रवीन्द्र नाथ टैगोर इंगलैंड गये । जार्ज पंचम उस समय नोबेल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था । उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया । तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबेल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया । क्योंकि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टैगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था । टैगोर ने कहा  कि - आप मुझे नोबेल पुरस्कार देना

ही चाहते हैं । तो मैंने 1 गीतांजलि नामक रचना लिखी है । उस पर मुझे दे दो । लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो । और यही प्रचारित किया जाये क़ि - मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है । वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है । जार्ज पंचम मान गया । और रविन्द्र नाथ टैगोर को 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबेल पुरस्कार दिया गया ।
रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई - 1919 में । जब जलिया वाला कांड हुआ । और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा । और कहा क़ि - अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा । तो कब उतरेगा ? तुम अंग्रेजों के

इतने चाटुकार कैसे हो गये ? तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गये ? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गये । और बहुत जोर से डांटा कि - अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुये हो । तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नींद खुली । इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया । और नोबेल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया ।
1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा । वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था । और 1919 के बाद । उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे । रविन्द्र नाथ  टैगोर के बहनोई - सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे । और ICS ऑफिसर थे । अपने बहनोई को उन्होंने 1 पत्र लिखा

था ( ये 1919 के बाद की घटना है )  इसमें उन्होंने लिखा है कि - ये गीत " जन गण मन " अंग्रेजों के द्वारा मुझ पर दबाव डालकर लिखवाया गया है । इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है । इस गीत को नहीं गाया जाये । तो अच्छा है ।लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि - इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखायें । क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ । लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये । तो सबको बता दें ।
7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद । इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया । और सारे देश को ये कहा क़ि - ये " जन गण मन " गीत न गाया जाये 

। 1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी । लेकिन वह 2 खेमों में बट गई । जिसमे 1 खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे । और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु के समर्थक थे । मतभेद था । सरकार बनाने को लेकर । 1 दल चाहते थे कि - स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार Coalition
Government बने । जबकि दूसरे दल वाले कहते थे कि - अंग्रेजों के साथ मिलकर सरकार बनाना । तो भारत के लोगों को धोखा देना है ।
इस मतभेद के कारण ।  1 नरम दल । और 1 गरम दल.. बन गया । गर्म दल के लोग हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे । और ( यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि - गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे । वो किसी तरफ नहीं थे । लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिये आदरणीय थे । क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे ) लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजों के साथ रहते थे । नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे । और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था । तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल 

वालों ने उस समय 1 हवा उड़ा दी कि - मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिये । क्योंकि इसमें बुत परस्ती ( मूर्ति पूजा ) है । और आप जानते हैं कि - मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी हैं । उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी । जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे । उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया । क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को ( उस समय तक ) भारतीय थे । मन । कर्म । और
वचन से अंग्रेज ही थे । उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया । और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया ।

जब भारत 1947 में स्वतंत्र हो गया । तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली । संविधान सभा की बहस चली । संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे । जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित - वन्दे मातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई बस 1 सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना । और उस 1 सांसद का नाम था - पंडित जवाहर लाल नेहरु । उनका तर्क था कि - वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुँचती है । इसलिए इसे नहीं गाना चाहिये ( दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं ।  अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी ) अब इस झगडे का फैसला कौन करे ?
तो वे पहुँचे गाँधी जी के पास । गाँधी जी ने कहा कि - जन गण मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ । और तुम ( नेहरु

) वन्दे मातरम के पक्ष में नहीं हो । तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये । तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया ।
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा । झंडा ऊँचा रहे हमारा ।
लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुये । नेहरु जी का तर्क था कि - झंडा गान आर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता । और जन गण मन आर्केस्ट्रा पर बज सकता है । उस समय बात नहीं बनी । तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा । और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया ।
और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया । जबकि इसके जो बोल हैं । उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते हैं ? और दूसरा पक्ष नाराज न हो । इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्र

गीत बना दिया गया । लेकिन कभी गाया नहीं गया । नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे । जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुँचे ।
मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे । जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया । जबकि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे । जन गण मन को इसलिये तरजीह दी गयी । क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था । और वन्दे मातरम इसलिए पीछे रह गया । क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था ।
बीबीसी BBC ने 1 सर्वे किया था । उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे । उनसे पुछा कि - आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है ? तो 99% लोगों ने कहा - वन्दे मातरम । बीबीसी के इस सर्वे से 1 बात और साफ़ हुई कि - दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्दे मातरम है । कई देश हैं । जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते हैं । लेकिन वो कहते है कि - इसमें जो लय है । उससे 1 जज्बा पैदा होता है । तो ये इतिहास है - वन्दे मातरम का । और जन गण मन का । अब ये आपको तय करना है कि - आपको क्या गाना है ?
रविन्द्र नाथ टैगोर द्वारा लिखित । उनका हस्ताक्षरित । इंगलिश में अनुवादित पत्र ।
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