05 सितंबर 2012

चार्वाक बकबास क्यों ? 2


चार्वाक सिद्धांतों के लिए बौद्ध पिटकों तक में " लोकायत " शब्द का प्रयोग किया जाता है । जिसका मतलब - दर्शन की वह प्रणाली है । जो इस लोक में विश्वास करती है । और स्वर्ग नरक अथवा मुक्ति की अवधारणा में विश्वास नहीं रखती ।
- क्या पागलपन है । अब ये दर्शन कहाँ हुआ ? कोई आँख वाला कहे - ये सामने सुन्दर संसार है । स्त्री पुरुष हैं । पेङ पौधे घर मकान है । ये मेरा " दर्शन " है ? अरे मूर्ख ! वह तो सबको ही दिख रहा है । सब उसे बरत भी रहे हैं । फ़िर काहे का दर्शन ? मानो । तो भी है । न मानो । तो भी रहेगा । इसमें नया क्या है ? लेकिन स्वर्ग नरक मुक्ति की अवधारणा नयी जिज्ञासायें तो पैदा करती हैं । एक अनोखी खोज । खुद को जानने की खोज । यदि ये सत्य निकला । तो बहुत कुछ हासिल होगा कि नहीं ? बिज्ञान की माला जपने वाले चार्वाको । प्रमाण और प्रमेय के गीत गाने वाले चार्वाको । क्या तुम्हें मालूम नहीं । आदिवासी युग से जब भी बैज्ञानिक आविष्कार हुये । शुरू में उनकी उपेक्षा और मजाक ही बनाया गया । और फ़िर इसी बेशर्म जनता ने उन आविष्कारों को हाथों हाथ लिया । अरे तुम तो इतने ज्यादा मूर्ख हो कि ( ताजा उदाहरण ) बाबा रामदेव ने पंतजलि योग चौपतिया ( चार पन्नों की किताब ) को सिर्फ़ पढकर सुनाया कि - अनुलोम विलोम से नाङी शोधन आदि लाभ होते हैं । और तुमने उसका भी मजाक बनाया । और अब सवेरे ही बैठकर नाक से फ़ुसकारें छोङने लगे । यदि योग की यह सिद्ध और मामूली क्रिया असीमित लाभ वाली है । तो ध्यान रहे । इसी पतंजलि योगी ने - धारणा । ध्यान । समाधि की भी बात की है कि - समाधि ज्ञान से आत्मा को जाना जा सकता है । और पहले अनेकों ने जाना है । उनके समृद्ध ग्रन्थ इसके प्रमाण हैं ।
लोकायतों का विरोध इसलिए था कि ये वैदिक प्राधिकार और ब्राह्मणों के खिलाफ था । लेकिन जैन और बौद्ध धर्म भी इनके खिलाफ थे । परन्तु जो व्यवहार । जो घृणा चार्वाकों के प्रति थी । वह उनके लिए नहीं । आखिर क्यूं ? 
- ये ठीक वैसा ही है । जैसा संसद में बहुरूपिये नेता करते हैं । इसके खिलाफ़ । उसके खिलाफ़ । वैदिक नेतागीरी । ब्राह्मण नेता । जैन नेता । बौद्ध नेता । खिलाफ़ होने का क्या मतलब है ? आप अच्छा काम करिये । ठोस परिणाम दिखाईये । आपकी पार्टी को बिना माँगे वोट मिलेगा । आप अगले चुनाव में खङा होना भी नहीं चाहेंगे । लोग आपके पैरों पङ जायेंगे । विवश कर देंगे । कृपया आप ही खङे हों । आप अच्छे इंसान हैं । ये खिलाफ़ियत के बजाय सलाहियत का राज करना सीखिये । तब आप किसी देश के नहीं । जनता के दिलों के राजा होंगे । यही बात लोकायतों की थी । इनकी कोई गिनती नहीं थी । इन्हें कोई पूछता नहीं था । अतः इन्होंने निंदा और खिलाफ़ियत का फ़ार्मूला पकङा । जैसा भी हो । इनके तुलनात्मक जैन धर्म और बौद्ध धर्म आज मजबूत स्थिति में है । पर लोकायत आपने कहीं सुना है ? शायद आपने लोकायत या चार्वाक शब्द भी न सुना हो । कैसे सुनते ? जब उनके पास कोई ज्ञान आधार ही न था । आप किसी का झोंपङा तभी छुङा सकते हो । जब उसे अच्छा मकान दिला सको । झोंपङा छुङाने पर उतारू हो गये । और पास पल्ले कोई दूसरी व्यवस्था भी नहीं । फ़िर बेचारा कहाँ जाता । इसलिये  चार्वाक का मतलब सिर्फ़ बकबास बनकर ही रह गया । जैन और बौद्ध कुछ तो दे रहे थे । इसलिये ऐसे मूर्खों से घृणा करना स्वाभाविक ही था ।
3 - वे आत्मा जैसी किसी चीज के होने से इनकार करते हैं । सर्व दर्शन संग्रह में उद्धत एक श्लोक में कहा गया है कि - न स्वर्ग है । न नरक । न परलोक में जाने वाली कोई आत्मा । वर्ण और आश्रम की बातें बकवास हैं । जो बुद्धि और बल से हीं हैं । वही यज्ञ हवन आदि में विश्वास करते हैं । यदि यज्ञ में बलि दिया गया पशु स्वर्ग जाता है । तो लोग अपने पिता की बलि क्यूं नहीं चढाते ?  
- आईये आज आपको बताता हूँ । असली यज्ञ और हवन क्या है ? यज्ञ ( य ज्ञ - य = यह शरीर में स्थित स्वांस । ज्ञ = जानना ) हवन ( हवि - यज्ञ हेतु सामग्री या भोजन ) आप शायद न जानते हों । यज्ञ में 5 प्रकार की अग्नियाँ वैदिक मंत्रों द्वारा प्रज्वलित की जाती हैं । बाहय यज्ञ आपको असली आंतरिक यज्ञ से मिलाने के लिये है । आपके पेट में नाभि से 5 प्रकार की अग्नियाँ ( पंचाग्नि ) स्वतः जलती हैं । इसमें स्वांस रूपी प्राण वायु का होम ( स्वाहा ) किया जाता है । जो भी सात्विक भोजन आप खाते हो । वह इसी हवन कुण्ड ( पेट ) में आपकी भोजन नलिका द्वारा जाता है । यही दृव्य आहुति है । आप पशुवत जीवन से अलग । यदि इस यज्ञ हबन को जानकर ( खुद अपनी पशुता की ) इस पशु की ? बलि दे देते हो । तो निश्चय ही यह पशु ? स्वर्ग ( स्व वर्ग - अपनी जानकारी और प्राप्ति का जो वर्ग वह बनायेगा ) जायेगा । यहीं देख लीजिये । एक जीवन को गधे के समान पिटता हुआ ढो रहा है । और दूसरा यहीं 720 हूरों और मदिरा की नहरों में स्नान कर रहा है । ये स्वर्ग के आनन्द का अधिकारी पशुवत जीवन से ज्ञान युक्त जीबन की ओर स्वयं आया ।
अगर चार्वाकों ने ऐसा कोई तीर मार लिया होता । जिससे कोई बहुत बङा बिज्ञान सिद्ध हो गया होता । और - आत्मा । स्वर्ग । नरक । मोक्ष आदि सिद्धांतों को कङी टक्कर कङी चुनौती मिल रही होती । तो निश्चय ही उनकी बात ध्यान देने योग्य थी । कुछ नहीं तो वे आध्यात्म ( बिज्ञान ) दर्शन के स्थापित सिद्धांतों समृद्ध इतिहास पर ही कोई युक्ति पूर्ण टीका टिप्पणी करते । तो भी कोई बात थी । वे सिर्फ़ हठी थे । हम अंधे हैं । तो इसका मतलब सभी अंधे हैं । हम कैसे मान लें कि - प्रकाश जैसा भी कुछ होता है ? हाँ ऐसे लोग अपने जीवनकाल में ही मान जाते हैं । कब ? अंतिम समय । जब डरावने यमदूत ( मृत्यु से कुछ पूर्व ही ) दिखने लगते हैं । मगर अफ़सोस ! फ़िर बचाव का कोई उपाय नहीं होता । हालांकि ये सभी मामला विस्त्रत वर्णन की माँग करता है । फ़िर भी आप जान गये होंगे कि ( ज्ञान ) यज्ञ में किस पशु (  तुम्हारी ही पशुता ) की बलि दी जाती है । और कैसे एक पशु ? स्वर्ग जाता है । यज्ञ और हवन क्या है ?
4 - नैराश्य वैराग्य का खंडन । यानि वे इस बात से इंकार करते हैं कि - चूंकि सुखों के साथ दुःख जुड़े होते हैं । इसलिए हमें सुखों का त्याग करना चाहिए । इसके लिए वे तर्क देते हैं कि - हम अच्छे धान को इसीलिए फेंक नहीं देते कि वह भूसी से लिपटा होता है । इस तरह सन्यास जैसी चीजों को वे मूर्खता कहते हैं । जीवन का चरम उद्देश्य सुखवाद है । 
- ये नैराश्य वैराग्य क्या होता है ? ये सन्यास क्या होता है ? मुसलमानों की समस्त धर्म आस्था इसी ( लालच ) बात पर आधारित है कि - कुरआन अनुसार चलने पर बाद में स्वर्ग और 72 हूरें प्रति जन्नतनशीं को दी जायेंगी । अगर - नारि मरी घर सम्पत्ति नाशी । फ़िर मूङ मुङाय भया सन्यासी । तो ऐसे निराश सन्यासी जंगलों में नहीं । आज घर घर में हैं । व्याग्रा पावर भी शरीर की ग्राह्य क्षमता कमजोर हो जाने से अब करेंट नहीं देती । बीबी करबटें बदलती हैं । बन्दा कहता है - नहीं नहीं । अब मैं बृह्मचारी हूँ । बहुत हुआ । ये सब माया है ? 
माया है । या अब तेरे बश की ही बात नहीं रही । सैलफ़ुके । अब वैरागी खुद ही हो जायेगा । सांसारिक ऐश विलास नहीं जुटा पाये । ग्रहस्थी नहीं पाली गयी । तो वैरागी होने की घोषणा कर दी । और महान हो गये । किस धर्मशास्त्र ने नैराश्य वैराग्य का समर्थन किया है ? योगेश्वर श्रीकृष्ण निराश वैरागी थे ? सुन्दर पत्नियाँ । वो भी प्रतिदिन 1 के हिसाब से । कोई गङबङा जाये । तो 1 हमेशा अतिरिक्त । हर तरह की सुख सम्पदा । वशिष्ठ । विश्वामित्र । जनक । दशरथ । भरत । याज्ञवल्क्य आदि आदि ये वैरागी थे क्या ? अब तुमने वास्तविक साधुओं के बजाय सिर्फ़ भिखारियों को ही आज तक देखा । जाना ।  फ़िर तुम ऐसा ही सोचोगे । और फ़िर तो भगवान भी तुम्हारा भला नहीं कर सकता ।
वास्तव में वैराग का अर्थ । तब बहुत सी चीजों से सिमट ( सीमित व्यवहार । जितना आवश्यक हो ) जाना है । जब तुम किसी खास लक्ष्य के प्रति प्रत्यनशील हो । तो ये वैराग तो तुम्हें जीवन में अनेकों बार करना होता है । चाहे तुम साधु बनो । या न बनो ।
वह कौन सा सार्वजनिक विकास है । जिसकी नींव आम आदमी के दुखों पर बनती है ?
- आम किसलिये होता है ? दबा दबाकर चूसे जाने के लिये ना । फ़िर क्या तुम्हारी नानी कहकर मर गयी कि - बेटा आम आदमी ही बने रहना । खास मत बनना । अतः सवाल यही है कि - आम आदमी की परिभाषा क्या है ? कौन डंडे मार रहा है । आम आदमी को । ये संसार हरेक के लिये अवसरों का खजाना है । उन्नति के इतने विकल्प हैं यहाँ कि गिनती मुश्किल है । और ऐसा नहीं कि वे सिर्फ़ अमीरों के लिये हैं । घोर गरीबी से आये लोगों ने यहाँ आसमान की बुलंदियों को चूमा है । अतः असमानता का प्रलाप सिर्फ़ असफ़ल लोगों का है । सफ़लता के अनेक रास्ते सरपट दौङने के लिये खुले हैं । फ़िर भी तुम भिखारी बने रहना चाहते हो । तो लोग कुत्ते की तरह दुतकारेंगे ही । और गलतफ़हमी में न रहें । खुद तुम्हारें परिवारी जन मित्रों रिश्तेदारों में तुम्हारी वैल्यू 1 कुत्ते से अधिक नहीं होगी ।  फ़िर बाहर के लोगों को दोष दो । तो तुमसे बङा मूर्ख और कोई नहीं ।
और उसके बाद धर्माचार्यों की जमात थी । जो आत्मा । परमात्मा और मोक्ष का प्रपंच फैलाकर यज्ञ । हवन । बलि जैसे ढकोसलों के सहारे अपना धंधा चलाती थी । और सामंतों तथा राजाओं के इस अनैतिक शासन और लूटपाट को जायज़ ठहराती थी । इन्हीं के साथ आम जन को दुखों से मुक्ति के साधन के रूप में सन्यास की शिक्षा देते थे । संसार झूठा है । मृत्यु के बाद स्वर्ग है । धनी गरीब सब ईश्वर के बनाये हैं । संसार माया है । जैसी निराशावादी शिक्षा तथा लोक परलोक की बातों से जनता को भरमाये रखते थे । 
- चलिये एक प्रयोग करते हैं । सिर्फ़ 4 साल के 1 बिलकुल सीधे साधे नासमझ बालक को 1 मिठाई का पीस खाने को दो । और दोबारा उसे कंडे ( उपले ) का टुकङा खाने को दो । अब बताईये । वह मासूम बच्चा भी जानता है । क्या खाने योग्य है । और क्या नहीं ? आप घर में सब्जी लाते हैं । छोटे छोटे बच्चे भी अमरूद सेब केला आदि स्वयं उठाकर खाने लगते हैं । पर किसी बच्चे को मिर्च आलू अदरक लहसुन जैसी चीजें उठाकर खाते देखा कभी आपने । बताईये । आपने उन्हें कोई कोर्स कराया था कि - बेटा ये खाते हैं । ये नहीं खाते हैं । वह स्व अनुभव से सब सीखा । जब छोटे छोटे बच्चे इतने समझदार हैं कि वे सही गलत में फ़र्क जानते हैं । तो वयस्क लोगों को कैसे भरमाया जा सकता है । जाहिर है । धर्माचार्यों की बात उन्हें समझ में आती है । उसमें जीवन सार नजर आता है । दुनियाँ में शराब वैश्यावृति जुआ जैसे तमाम अनैतिक सिद्ध कार्य सदा से होते रहे । क्यों नहीं सभी लोग फ़ँस जाते । इससे सिद्ध होता है । व्यक्ति उसी जगह जुङता है । जहाँ उसे कोई आकर्षण और लाभ नजर आता है । और वह सीखने की प्रक्रिया से गुजरना है । यदि हरेक चीज । अनुभव । भाव । पूर्व ही सिद्ध हो जायेगा । तो दुनियाँ मशीनी नहीं हो जायेगी । अगर वे प्रपंच फ़ैलाते हैं । तो आप ज्ञान और सत्य फ़ैलाईये । किसी ने रोका है । सच्चाई मिट नहीं सकती झूठे उसूलों से । खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज के फ़ूलों से । अगर तुम्हारे फ़ूल असली है । तो कोई वजह नहीं कि उनकी महक संसार में न फ़ैले । हीरा मुख से ना कहे । लाख टका मेरा मोल । 
अतः मेरे ख्याल में ये चार्वाकों का असफ़ल लोगों का कोई ऐसा वर्ग था । जिनकी खुद की दुकान नहीं चल पा रही थी । और वे दूसरे के ग्राहक काट कर अपना व्यापार बढाना चाहते थे । जैसे मुसलमान और ईसाई धर्म परिवर्तन  द्वारा दोगली नस्ल तैयार करते हैंं ।
इसके अलावा व्यापारी वर्ग था । जो सस्ती मजदूरी पर कारीगरों का शोषण करते थे । और सूद खोरी करते थे । इनके अलावा एक बड़ा वर्ग था । आम जनता का । जो दिन रात श्रम करता था । युद्धों में गाजर मूली की तरह काट दिया जाता था । दास दासियों की तरह बाज़ार में बिकता था ।
- देखिये । जिस समय की यह ( चार्वाकी ) बात है । वह काफ़ी पहले का समय था । हो सकता है । उस समय गरीबी का % अधिक हो । और रोजगार के साधन इतने न हों । अतः उसे कुछ देर छोङिये । और सोचिये । आज के सभ्य और विकसित समाज में इनमें से कौन सी चीज नहीं है ? अगर मजदूरों की बहुतायत है । और सस्ते रेट पर मजदूर उपलब्ध है । तो फ़िर कोई पागल ही होगा । जो महंगे मजदूर तलाशेगा । नहीं भाई  ! मैं जेंटलमैन हूँ । मजदूर शोषण नहीं करूँगा । और जो सूद पर पैसा उठायेगा । वो ब्याज क्यों नहीं लेगा ? गरीबों के लिये तिजोरी लुटा दी जाये क्या ? यदि ऐसा ही धर्म कानून हो । फ़िर कोई क्यों आर्थिक उन्नति की चाहेगा । भारत में भिखारी गलियों से लेकर संसद तक में पहले ही मौजूद हैं । आज रिक्शे वाला आपको लाद कर दूसरी जगह ले जाता है । कपङे बर्तन झाङू पोंछा वाली बाईयाँ आपके घर काम करती हैं । बहुत प्रकार के मजदूरी ( दास दासी ) कार्य भूटान से लेकर अमेरिका तक में करने वाले मजदूर हैं । तो बात वही है । तव दास दासी खरीदे जाते थे । आज उनकी सेवायें खरीदी जाती हैं । निश्चय ही इसमें कोई जबरदस्ती नहीं की जाती । आप सेवायें बेचते हैं । तो लोग खरीदते हैं । अगर आप किसी दुर्दशा को पहुँचे । तो दूसरों से अधिक आप उसके जिम्मेदार हैं ।
और चातुर्वर्ण्य व्यवस्था की निचली पायदानों पर रहकर ब्राह्मणों द्वारा निर्धारित समस्त छुआछूतों और अत्याचारों को झेलता था । जब हमारे दार्शनिक गूढ़ और आम जनता के लिए पूरी तरह से अबूझ हवाई बातें बना रहे थे । तो लोकायतों ने इस पाखण्ड के खिलाफ आवाज बुलंद की ।
- छुआछूत क्या है ? वे ऊँची जाति हैं । तुम नीची जाति हो । फ़िर तुम भी अपना अलग धार्मिक संविधान क्यों नहीं बना लेते । अरे इस पंडित को न छूना । पाप लगेगा । अशुद्ध हो जाओगे । इस ब्राह्मण ठाकुर बनिये को देखना भी नहीं । ये भृष्ट हैं । ये हमारा मंदिर है । इसमें उच्च जातियों का प्रवेश निषिद्ध है । अगर वो अपने घमंड में पागल हैं । तुम अपने घमंड में हो जाओ । कौन रोकता है ?
आदि शंकराचार्य को असली अक्ल एक दलित ने ही सिखायी । मुस्लिम जुलाहे कबीर को तमाम हिन्दू राजा दंडवत करते थे । फ़िर सामान्य की बात ही क्या ?  रैदास चमार के मीरा जैसी शिष्या और तमाम उच्च जाति लोग पैर छूते थे । मायावती का सचिव एक ब्राह्मण था । पर तुम्हें खुद मजा है । अपने को नीचा सिद्ध करने का । तुम जन्म के बजाय स्वभाव से अधिक नीच हो । हो बढई । लिखते हो शर्मा । हो दलित । लिखते हो - गौतम । पाराशर । ऐसा लिखने से क्या हो जाते हो ? तुम क्यों जाते हो । उनके मंदिरों में । क्यों उन्हें छूने की कोशिश करते हो । क्या तुम्हारे द्वारा बनवाये मंदिर में बैठा भगवान भी चमार होगा । क्या तुम्हारे शरीर में बैठी आत्मा भी भंगी हो सकती है ? जब वह 1 ही है । तो फ़िर तुम भंगी चमार कैसे हो सकते हो ? हाँ तुम्हारे कर्म भंगी चमार वाले जरूर हो सकते हैं । तो उसके लिये मत घबराओ । तमाम ब्राह्मण भी भंगी चमार का काम करने को मजबूर हैं । हो जाते हैं । ऐसा कौन व्यक्ति है । जो रोज सुबह अपने चूतङ नहीं धोता ? तब बताईये । भंगी कौन नहीं है । इसलिये तुम जो भी हो । कर्म से हो । धर्म से तो तुम इंसान ही हो ।
ब्राह्मणवाद और पुरोहितवाद ? की तीवृ निंदा से ही संतोष नहीं कर लिया ।
- बताईये । ऐसा कौन है । जिसकी निंदा नहीं की जा सकती ? राम की निंदा एक धोबी करता है । दशरथ की निंदा उनका पुत्र लक्ष्मण ही करता है कि - वे कैकयी के रूप सौंदर्य में पागल और सठियाये बूढे हैं । गरीब हमेशा अमीरों की निंदा करते हैं । अमीर भी गरीबों की निंदा करते हैं । लेकिन इससे क्या तंत्र सुधर जाता है । आपकी स्थिति में कोई सुधार आ जाता है । दरअसल सही मायनों में निंदा एक असफ़ल आदमी की भङास ही है । आप ब्राह्मणवाद पुरोहितवाद का शिकार ही क्यों होते हो । आप जिस स्थिति में हो । वहीं से उन्नति की सीङियाँ बनाना ( चढना ) शुरू कर दो । आपके नाम से भी एक वाद बन जायेगा । ब्राह्मण वाद की निंदा करके चार्वाकवाद खङा हो जाता । फ़िर वह भी आपका शोषण ही करता । क्योंकि शोषित होना आपका नियति बन चुका है । आप भोजन की जगह मल कभी नहीं खाते । लेकिन क्या सही है । क्या गलत ? ये जानने के लिये दूसरों का मुँह ताकने की आपको आदत सी पङ चुकी है । क्योंकि आपने अपनी अक्ल चन्द लोगों के हाथ गिरवी रखी हुयी है ।
इन्हीं कारणों से लोकायत एक समय सामाजिक जीवन में जबरदस्त ताक़त बन गये थे । आधुनिक नजरिये से देखने पर सीधे साधे और त्रुटि पूर्ण लगने वाले इस दर्शन ने अपने युग में रूढ़िवादी विचार धाराओं के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद की । और अंधविश्वासों । कर्मकांडों । तथा रोज ब रोज की जिंदगी में देवताओं के हस्तक्षेप व पुनर्जन्म जैसी चीजों का पुरज़ोर विरोध किया ।
-  देखिये । मैं स्पष्ट कहूँगा । मैंने हर चीज का इस नजरिये से ? कभी अध्ययन नहीं किया । और आप लोग कहीं से भी प्रश्न उठाकर मेरे पास ले आते हो । दूसरे मुर्दा इतिहास में खोजबीन की मेरी ज्यादा प्रवृति भी नहीं ।  सिवाय बैज्ञानिक और लाभदायक तथ्यों के । इसलिये उस समय ( जिस समय की ये बात है ) क्या था ? ये माथापच्ची मेरे बस की बात नहीं । आप अभी की बात देखिये । भारत गुलाम था । मोहनदास गाँधी जवाहर लाल आदि लोगों के लिये भगवान थे । जबकि उसकी कोई वजह नहीं थी । आज तमाम लोगों ने इनमें भी दोष निकाल कर सिद्ध कर दिये । कबीर के समय भी अनैतिक और भ्रामक पूजा पाठ का बोलबाला था । तब कबीर भगवान बन गये । कुछ समय पहले ही दलितों की एकमात्र पार्टी बसपा की मायावती को देवी तक कहा जाने लगा । अमिताभ बच्चन रजनीकांत ( सचिन तेंदुलकर ) को दक्षिण में भगवान ( जैसा ) माना जाता है । खुद गाँधी का जन्म ही अंग्रेज के तिरस्कार से हुआ । इसलिये इस खास " एक समय " कोई जबरदस्त ताकत बन जाता है । तो उसके पीछे वे वजह होती हैं । जो एक तरह से आतंक और दमन की अति स्थिति में बनती है । बाकी वह बुरा समय खत्म होते ही स्थिति फ़िर सामान्य हो जाती है । क्या आज आपको अंग्रेज दुश्मन लगते हैं ? आज वही मायावती तमाम दलितों के लिये ही खलनायिका है ।
सबसे बङी सोचने की बात है । अंधविश्वासों । कर्मकांडों । और पुनर्जन्म मानने को आपको कौन विवश करता है । था ? और किस स्तर तक । वो बकता है । बकता रहे । आप मस्त रहो । यदि नहीं मानना । मुझे नहीं लगता कि किसी भी युग में ऐसी राजाज्ञा लागू हुयी हो कि - यह सब मानना अनिर्वाय है ।
फ़िर देखा जाये । तो जैसे गोविन्द सिंह ने ( ग्रन्थ साहब को ही गुरु बताकर ) सिखों के उद्धार के तमाम सरल रास्ते बन्द कर दिये । वैसे ही ये लोकायत कालदूतों के समान एक सशक्त बिज्ञान को झूठा बताकर सबके आत्म उत्थान की संभावना ही खत्म कर रहे थे ।  फ़िर से सोचिये । पुनर्जन्म होता है । ये संभावना उससे कहीं बहुत अधिक आशा प्रद है कि - पुनर्जन्म होता ही नहीं । तब तमाम खोजों की संभावना तो जगती है । और पुनर्जन्म मानते ही । ईश्वर को मानते ही । अंधविश्वास से ( शुरू हुआ ) विश्वास का सफ़र आरम्भ हो जाता है । और खोज किसी न किसी मुकाम तक पहुँचती ही है । सभी बैज्ञानिक आविष्कार पहले मान कर ही आगे बढे हैं कि -  ऐसा हो सकता है ? पहले से कहाँ सिद्ध था कि - ऐसा हो ही जायेगा ? और फ़िर हुआ । ना ।
और इस रूप में जनता को सिखाया कि अपनी बेड़ियाँ तोड़ने के लिए उसे खुद ही कोशिश करनी होगी ।
- एक सच्चा साधु था । एक व्यक्ति उसके पास अक्सर आता । और कहता - महाराज ! आत्म ज्ञान जानने की बहुत इच्छा है । पर घर परिवार संसार ने इस तरह पकङा जकङा हुआ है कि छोङते ही नहीं । कोई समय ही नहीं देते । फ़िर कैसे आत्मा का उद्धार हो ?
साधु कुछ न बोला । अगले दिन जब वो साधु के पास गया । तो साधु एक पेङ की पिंडी को दोनों बाहों से आगोश में भरे हुये था । 1 घंटा । 2 घंटा । 3 घंटा । वो वैसा ही रहा । व्यक्ति हैरान - महाराज ये क्या हरकत करते हो ? पेङ को छोङकर यहाँ क्यों नहीं आते ।  ऐसा वह बारबार कहता । और हर बार साधु बङी दीनता से जबाब देता  - क्या करूँ भाई ! इस पेङ ने मुझे बुरी तरह से पकङ लिया है । छोङ नहीं रहा । व्यक्ति और भी हैरान - क्या बात करते हो । पेङ भी किसी को पकङ सकता है ? आप खुद पेङ को पकङे हुये हो । सफ़ेद  झूठ बोलते हो । पेङ को नाहक दोष दे रहे हो । साफ़ तो दिख रहा है ।
-  तब तुझे भी किसी ने नहीं पकङा हुआ है । साधु झटके से पेङ से अलग होकर बोला - गौर कर । उल्टा तूने ही सबको पकङा हुआ है । और उन्हें दोष देता है । सत्य के तल पर यहाँ सभी अलग अलग ही हैं । तो कोई बेङियाँ है हीं नहीं । जो भी हैं । झूठी हैं । और खुद तुमने अपने आप पहनी हुयी हैं । और जो बेङियाँ तुमने खुद पहनी हैं । उन्हें और कोई तोङ भी नहीं सकता । सिवाय तुम्हारे ।
http://jantakapaksh.blogspot.in/2012/09/blog-post.html ( इस लेख के स्रोत के लिये क्लिक करें )

मार्क्सवाद या चूतियावाद ? जल्द आ रहा है ।
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