22 सितंबर 2012

ये बात कुछ हजम नहीं हुई


राजीव जी ! जहाँ तक मुझे याद है । आपने एक लेख में मेरे बारे में लिखा था कि - आपकी तो दीक्षा हुई ही नहीं । और आपने ये भी लिखा था कि - आप तो शिष्य हो ही नहीं । शायद आपको याद आ गया होगा । और आप बार बार मुझे अपने मंडल का भी बताते हो - अपने लेखों में । हालांकि मैंने दीक्षा आपसे नहीं । आपके गुरूदेव से ली थी । फिर आप किस आधार पर ? ये कहते हो कि - मैं शिष्य हूँ । नही । या मेरी दीक्षा नहीं हुई । और अगर कहते हो । तो महाराज ! मुझे तो फिर कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं । क्योंकि आपने ही बहुत कुछ कह दिया । अगर मेरी बात आपको बुरी लगे । तो प्लीज माफ कर देना जी ।
राजीव जी ! कुछ महापुरूषों की वाणियाँ बागड़ी में पे्श हैं -
1 फकीरी के जोवै घर दूर । जीवत मरणो पड़ै जरूर । 
यानी फकीरी का घर दूर है । क्या देखता है । जिंदा मरना पङता है । और तू तो बन कर बैठा है । मैं हूँ । जहाँ 

पर मैं है । वहाँ पर तू नही है । मैं यानी अहंकार । तू यानी परमात्मा । एक म्यान में दो तलवारें नही आ सकती । 
2 दमङा गो लोभी । बाता सूं राजी कोनी होवै । 
यानी जिसको कुछ रूपयों की जरूरत है । वो बातों से कैसै खुश हो जाये ? उसके तो कोई पाँच दस जेब में डाले । तब संतुष्ट हो ।
3 कोई विधार्थी दसवीं क्लास में दाखिला लेने के लिये किसी स्कूल में गया । तो गुरूजी ने उसे क्लास में
बैठाया । और सलेट पर ( क ) लिख कर दिया । लो कर लो बात । ये भी कोई बात हुई । वो मैट्रिक का विधार्थी है । और उसको ( क ) सिखाया जा रहा है । हा हा हा । ई बात कुछ हजम नहीं हुई । फिर उसी विधार्थी को

कहा जाता है कि - तुम ( क ) सीखने के लायक नहीं हो । माशा अल्लाह ! ये तो हद हो गयी ।
राजीव जी ! आप किसी अशोक भाई से मेरी तुलना कर रहे हैं । क्योंकि वो शायद मुझसे ज्यादा पढा लिखा है । और शब्दों को माला मे पिरोकर लिखना उसे बखुबी आता है । और वो मुझे आता नहीं है । आप किसी एक सवाल के जवाब से तो मुझे संतुष्ट कीजिये । मेरी - इच्छा । अभिलाषा । कामना । चाहत क्या है ? आपके ब्लाग पर लिखी हुई बातें ही । हरे मालिक तेरी शरण । सोहन गोधरा । टिब्बी । हनुमान गढ । राजस्थान ।
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जैसा कि एक आम मानवीय स्वभाव होता है । या बैज्ञानिक दृष्टिकोण से कहें । तो उसके सोचने विचारने की क्षमता सीमित होती है । तब वह प्रत्येक चीज व्यक्ति व्यक्तित्व का आंकलन अपने अनुसार ही करता है । इसलिये मुझे ( ऐसा पता होने से )

कुछ भी अस्वाभाविक नहीं लगता । ऐसे में जो लोग (  और शिष्य ) हमसे सूचना सम्पर्क के स्तर पर निरंतर जुङे होते हैं । उन्हें इस तरह की कोई परेशानी महसूस नहीं होती । क्योंकि एक तरह से वो UPDATE होते रहते हैं । और उन्हें पता होता है । ऐसा  है । तो क्यों ? वैसा है । तो क्यों ? लेकिन परिस्थितियों वश जो लोग इस धारा से अलग हो जाते हैं । उनमें तरह तरह की आशंकाओं अङचनों का जन्म हो जाना स्वाभाविक है । इसी के एक और पहलू में । जिनकी सोच विकसित है । और दुनियावी अनुभवों से परिपक्व है । वे धीर गम्भीर व्यक्तियों की तरह पिछले व्यवहार के आधार पर निर्णय कर लेते हैं कि - कुछ खास नहीं । सामयिक व्यस्तता से व्यवस्था सामान्य से भी गङबङा ही जाती है ।
कुछ कुछ ऐसा ही है । उपरोक्त के अनुसार ही 12 july 2012 से मेरी व्यस्तता हद से ज्यादा ही हो गयी है ।

जो हमारे सहयोगी शिष्य और निरंतर सम्पर्क में रहे शिष्यों को पता है । इसलिये ब्लाग पर प्रश्नों के उत्तर या लेखों का भी सही कृम में प्रकाशन नहीं हो पा रहा । इसके भी अतिरिक्त मैं कह चुका हूँ । बल्कि सिद्ध कर चुका हूँ कि - 1 सतनाम ( अद्वैत ) और कुण्डलिनी  ( द्वैत ) के अलावा सभी भक्ति " भाव पूजा " मात्र ही है । इसका बहुत थोङा सा ही लाभ होता है । सर्वोच्च भक्ति अद्वैत ज्ञान की नाम भक्ति ही है । 2 कबीर की वाणी से कोई भी वाणी ऊपर जाना तो दूर । उसकी टक्कर भी नहीं ले सकती । कबीर वाणी के बाद सभी संतों की वाणियां ऐसी हैं । जैसे चाय बनाने के बाद । छन्नी में बचे हुये चाय पत्ती अदरक का  पुनः इस्तेमाल करते हुये चाय बनायी जाये । और उसमें हल्का फ़ुल्का रंग स्वाद आ जाये । 

एकदम धोबन । इससे अधिक कोई वाणी दमदार हो । तो मुझे बतायें । और ध्यान रहे । ये धोबन भी कबीर के बचे खाली निष्प्रयोज्य पात्र के धोने से ही आया है । वरना उस मूल के बिना " इतना " भी रंग रस न आता । 3 जब तक कबीर वाणी " अनुराग सागर " नहीं पढोगे । तब तक असलियत कभी पता नहीं चलेगी । 4 सबसे मुख्य बात । इतनी सभी जानकारी समझ में बैठ जाने के बाद भी । जब तक समय के सदगुरु की शरण नहीं मिल जाती । तब तक कोई ( खास ) फ़ायदा नहीं हुआ । 5 इसके बाद शिष्यता का निर्माण ..सार सार को गहि रहे । थोथा देय उङाय । आरम्भ हो जाता है । यह एक लम्बी प्रक्रिया है । जो शिष्य की पात्रता के अनुसार कुछ जन्म तक चलती है ।
मेरे प्रचार का मुख्य उद्देश्य इन्हीं बिन्दुओं को बिलकुल 100% तक किसी भी जिज्ञासु को समझाना भर है । जो लगभग पूरा हो चुका है ।

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आपकी तो दीक्षा हुई ही नहीं - दीक्षा का मतलब देखना दिखाना या अंतर में प्रविष्ट होना है । दीक्षा के लिये वास्तव में सिद्ध स्थान की बहुत बङी आवश्यकता होती है । किसी भी घर आदि

स्थान में की गयी दीक्षा में ( किसी किसी ) दीक्षित होने वाले व्यक्ति को स्थानीय वासना तरंगे प्रभावित करती हैं । क्योंकि अभी उसके अन्दर भी यही सब होता है । अतः वे अतिरिक्त तरंगे और उससे जुङ जाती हैं । किसी भी सन्त की तपःस्थली पर सात्विक तरंगों का जोर होता है । अतः वासना तरंगे नष्ट हो जाती हैं । अतः ऐसे  स्थान पर पूर्ण दीक्षा होती है । आज से 8 महीने पहले तक हमारे पास ऐसी व्यवस्था नहीं थी । अतः मैं पहले ही स्पष्ट कह देता था कि - आप ( अगर पूर्ण दीक्षा न हो पाये तो ) नामदान 

लेकर घर पर अभ्यास करें । और अभ्यास में निपुण हो जायें । बाद में आश्रम शुरू होते ही कोई 7-8 दिन का समय निकाल कर आना । तब ध्यान में प्रविष्ट करा दी जायेगी । और इसमें पूर्व में किये सुमरन से बहुत लाभ होगा । प्रभु कृपा से आज ऐसा हो  रहा है । इसीलिये मैंने लिखा था कि - आपकी तो ( सही से ) दीक्षा हुई ही नहीं ।
और आपने ये भी लिखा था कि आप तो शिष्य हो ही नहीं । और आप बार बार मुझे अपने मंडल का भी बताते हो - शिष्यता का मतलब ? सिर्फ़ स्कूल में नाम लिखाना भर नहीं होता । स्कूल भी जाना होता है । पाठय पुस्तकें ( आध्यात्म चिंतन मनन अध्ययन ) पढना भी होता है । स्कूल की फ़ीस भी भरनी होती है । जिसको यहाँ तन मन धन से गुरु की सेवा करना कहा गया है । समर्पण की शिक्षा दी गयी है । हमारे तमाम शिष्य दूर दूर से आते हैं । कई बार आ चुके हैं । आप कितनी बार आये ? आपने शिष्यता के स्तर पर क्या किया ? सन्त 

मत में कभी - शिष्य कैसा होता है ? अध्ययन करें । धर्मदास ने कबीर के लिये सब कुछ लुटा दिया । और अन्त में सिर्फ़ 1 सुराही और हाथ का पंखा लिये उनके सामने पहुँचे । कबीर  ने कहा - आईये आधे शिष्य ।  धर्मदास ने हैरानी से पूछा - अभी भी आधा कैसे ?  कबीर बोले - अभी भी तेरा मन इस सुराही पंखे में अटका हुआ है । सच्चे शिष्यों की कहानी पढोगे । तो थर थर कांप जाओगे । क्योंकि यदि वही ज्ञान । वही गुरु । वही प्राप्ति चाहते हो । तो शिष्य भी वही बनना होगा ।
जहाँ तक मंडल का बताने का सवाल है । ऐसा हमारे यहाँ से नामदान होने के कारण हैं । ये कोई दुनियांदारी वाली बातें नहीं हैं कि - ये नहीं । तो वो

सही । सत्ता के नियम अनुसार सच्चा नाम अपना काम करता है । यदि उपदेशी शिष्य इस जन्म में नहीं पढ पाता । तो अगले जन्म उसे यह पढाई पूरी करनी होगी । क्योंकि इस ज्ञान की शुरूआत हमारे यहाँ से हुयी । पंजीकरण हमारे यहाँ है । इसलिये राजी से कु राजी से मंडल के नियम अनुसार चलना होगा । मंडल केवल तभी बदल सकता है । जब नियम अनुसार इससे बङे मंडल में पंजीकरण हो जाये । और मुझे अच्छी तरह मालूम है । इस समय हमारे मंडल से बङा मंडल पूरे विश्व में कोई नहीं है । अतः अगले जन्म में भी अभी के अधूरे साधक हमारे ही साधुओं द्वारा आगे बढाये जायेंगे । इसलिये मैं कहता हूँ - हमारे मंदल के शिष्य ।
हालांकि मैंने दीक्षा आपसे नहीं । आपके गुरूदेव से ली थी - मैं जहाँ भी ऐसा लिखता हूँ । कुछ इस तरह से लिखता हूँ - हमारे ( मंडल के ) शिष्य...अतः इससे कहीं साबित नहीं होता कि - मैं आप लोगों को अपना शिष्य कहता हूँ । फ़िर भी अपने आपसे पूछो - इस अदभुत ज्ञान तक तुम्हें कौन लाया ? तुम्हारी जिज्ञासा सन्तुष्टि किससे हुयी ? सदगुरु से तुम्हें किसने मिलाया । अब भी तुम मार्गदर्शन किससे पाते हो ? क्या तुम मुझे कोई फ़ीस देते हो ? या मैं तुम्हारा कर्जदार हूँ ? या तुम मुझे कुछ देकर भूल गये हो  ? या तुम्हारा कोई अहसान है मुझ पर ? कभी तुमने सोचा कि - यदि श्री महाराज जी तुम्हारे गुरु हैं । फ़िर शुरू से लेकर अब तक तुम मेरे पास क्या कर रहे हो ? यहाँ लेख पढते । बात समझ में आयी । तो महाराज जी से मिलते । याद है । मुझसे कितनी लम्बी टयूशन पढ चुके हो तुम लोग । पढ रहे हो । कभी सोचा । मुझसे तुम्हारा क्या लेना देना है ? किस आधार पर तुम मुझसे सबाल जबाब करते हो ? किस आधार पर प्रश्न पूछने का हक रखते हो ? अपने गिरहबान में झांक कर देखो ।
फिर आप किस आधार पर ? ये कहते हो कि - मैं शिष्य हूँ । नही । या मेरी दीक्षा नहीं हुई - मुझे उम्मीद है । अब हर बात का उत्तर मिल गया होगा । 


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क्यों हैं - गणेश चतुर्थी का चन्द्रमा दोषी ?
वैसे कहानी बहुत बङी और उलझी हुयी भी है । पर  इसका मुख्य कारण जानते हैं । द्वापर युग में सत्रजित

नाम के राजा के पास एक मणि थी । इससे दिन जैसा प्रकाश होता था । किसी अवसर पर श्रीकृष्ण ने उससे ये मणि माँगी । लेकिन राजा ने मना कर दिया । बाद में राजा का भाई मणि लेकर शिकार खेलने गया । जहाँ शेर ने उसे खा लिया । क्योंकि श्रीकृष्ण ने मणि माँगी थी । अतः राजा ने अपनी औरत को बात बतायी कि - श्रीकृष्ण ने मणि के लिये उसके भाई को मार डाला । औरत से औरतों आदि में बात फ़ैलती हुयी श्रीकृष्ण तक पहुँची । इसलिये उन्होंने सोचा - ये तो उन पर कलंक लग गया । ये कलंक इसी गणेश ( तीज ) चतुर्थी के समय लगा था । और क्योंकि श्रीकृष्ण चन्द्रवंशी भी थे 

। इसलिये धर्म परम्परा आदि अनुसार इस तिथि के चन्द्रमा को दोष पूर्ण मान लिया गया । क्योंकि ये घटनाकृम रात का था । बीच में अन्य घटनाकृमों के बाद ये मणि जाम्बवान ( त्रेता युग वाले ) के हाथ लग गयी । श्रीकृष्ण अपना कलंक छुङाने हेतु इसकी खोजबीन करते हुये जाम्बवान के पास पहुँचे । जहाँ जाम्बवान से  28 दिन उनका घनघोर युद्ध हुआ । और बाद में जाम्बवान ने उनको मणि सौंप दी । तथा जाम्बवान की पुत्री जाम्बवंती से श्रीकृष्ण का विवाह हुआ । फ़िर ये मणि श्रीकृष्ण ने लाकर राजा सत्रजित को दे दी । और कलंक छुङाया । इस मणि की आधुनिक अस्पष्ट खोजों में इसे अभी का विश्व प्रसिद्ध " कोहिनूर " हीरा भी माना जाता  है । जो कभी भारत के पास था । और आज ब्रिटेन के पास है । इस मणि की खासियत 

( द्वापर से अब तक ) ये रही कि - जिसके पास ये रही । उसका सुख चैन इसने छीन लिया । कोहिनूर की भी यही कहानी है । इसलिये और भी शोधकर्ता विश्वास करते हैं । 
श्रीकृष्ण चन्दवंशी थे । उनके चित्र में पूर्ण चन्द्रमा उनके पूर्ण होने का प्रतीक है । शंकर के भाल पर अर्ध चन्द्र आधा ( योगत्व ) होने का प्रतीक है ।
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