11 सितंबर 2012

सदाफ़ल देव या सदा फ़ल रहित देव


राजीव जी नमस्कार ! और साथ ही आपको धन्यवाद । आपके कई लेख पढे । कुछ सीखने को मिला । विहंगम योग के बारे में बतायें । और सदगुरु सदाफ़ल देव जी के बारे में भी बतायें । विहंगम योग में भी सतनाम की बात करते हैं । और ध्यान के लिये गीता के अध्याय 6 के श्लोक 13 की क्रिया को बताते हैं । जिसमें नाक के तिकोने पर ध्यान लगाने को बताते हैं । और कोई नाम नहीं देते । गुरु सदाफ़ल देव जी की फ़ोटो की पूजा करके फ़ोटो को सामने रखकर ध्यान लगायें । सतगुरु की कृपा से " सतनाम " अपने आप लख जायेगा ? और ध्यान से पहले 11 बार गायत्री मंत्र का जाप भी करना है ? गुरु की आज्ञा है । और कबीर साहब को सनातन गुरु बताते हैं । जो साधना के दौरान गुरु सदाफ़ल देव को मिले थे । स्वर वेद और कबीर साहिब की अनुराग सागर या बीजक उनके ग्रन्थ हैं । ये ध्यान आत्मा के लिये है । अगर कोई दैहिक और सांसारिक परेशानी आर्थिक तंगी आदि के लिये हवन आश्रम से दीक्षित qualified से कराने या खुद करने के लिये बताया जाता है । और वो भी परम पुरुष की ही बात करते हैं । जो सत्य और असत्य से परे है । और सदगुरु सदाफ़ल देव जी को dhara adhra ( रोमन से हिन्दी करते समय समझ नहीं आया ये शब्द ) के पार बताते हैं । जो परम पुरुष तक जा सकते हैं । कृपया इसके बारे में detail से बतायें । धन्यवाद ।  जोरबा टू बुद्धा - ओशो..लेख  पर

एक टिप्पणी । नाम नहीं लिखा ।
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वैसे किसी की आलोचना करना मेरा ध्येय नहीं । पर सत्य शोधन हेतु जैसे आप लोग किसी अज्ञात प्रेरणा से ऐसा अवसर मेरे सामने उपस्थित कर देते हो । और वह बात कबीर से जुङी हो । तो फ़िर मेरे लिये झूठ को बरदाश्त करना बहुत कठिन ही नहीं । बल्कि बेकाबू ( असंभव ही ) हो जाता है । अतः इन सदाफ़ल जैसों को उचित है कि कम से कम मेरे रहते हुये कबीर का नाम लेने से बचें । और इनसे भी बढकर मूर्खता मैं उस जनता की मानता हूँ । जो कबीर के नाम पर तमाम घटिया बातों को आसानी से हजम कर लेती है । और ये " ठग " अपना झूठा कारोबार चलाते हैं ।
कहाँ कबीर का सर्वोच्च ज्ञान । और कहाँ गीता का अध्याय 6 का श्लोक 13 ? कहाँ कबीर का निर्वाणी ( जो वाणी से न जपा जाये ) महामंत्र ( या नाम ) और कहाँ - बेचारी गायत्री का 11 बार गायत्री मंत्र का जाप ? कहाँ कबीर और कहाँ ये कोई - बेचारा सदाफ़ल ( या सदा फ़ल रहित ) कहाँ कबीर का परम शक्ति नाम सुमरन । और कहाँ ये चिरकुटों का हवन ? दूर दूर तक कोई समानता नहीं ।
कबीर का घर शिखर पर जहाँ सिलबिली गैल । पिपीलिका रपटे जहाँ तू लादे है वैल ।

कबीर का घर सर्वोच्च चोटी पर है । जहाँ ( योग भक्ति में ) फ़िसलन भरा मार्ग भी है । चीटीं भी वहाँ चलते हुये रपटती है । फ़िर सर्वजीत तू तो पूरा वैल लादे हुये है । फ़िर तू कबीर के घर तक कैसे पहुँच सकता है ?

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विहंगम योग क्या है - योग मार्ग या उसके तरीके या उसकी गतियों को 4 पशु पक्षी कीट आदि योनियों के माध्यम से समझाया गया है । क्योंकि मनुष्य की गतियाँ बहुत कुछ उसके विकास और स्तर के अनुसार ऐसी ही होती हैं । ये 4 प्रकार जीव की आगे की गतियों और प्राप्ति संभावनाओं को भी बखूबी रेखांकित करते हैं । देखिये ये 4 प्रकार क्या हैं ?
1 पिपीलिका मार्ग - पिपीलिका यानी चीटीं । चीटीं इच्छित फ़ल की प्राप्ति हेतु बारबार प्रयत्न करती है । और लगभग लक्ष्य पर पहुँचकर गिर भी जाती है । सफ़लता बहुत ही मुश्किल से मिलती है । जाहिर है । ये पिपीलिका योग मार्ग बहुत कठिन और श्रम साध्य है ।
2 मीन मार्ग -  मीन यानी मछली । ये ऊँचाई पर जाने हेतु पानी की लहरों पर आश्रित है । लहर जितना उठायेगी । उतना ही उठेगी । और लहर के साथ ही फ़िर नीचे आ जायेगी । ये मार्ग भी अनिश्चित और काफ़ी उठापटक वाला है । पर चीटीं की तुलना में ये सरल और अधिक

श्रमयुक्त नहीं है ।
3 मकर मार्ग - मकर कहते हैं - मकङी को । मकङी बेहद मेहनत से जाला बनाती है । जाला नष्ट हो जाता है । फ़िर बनाती है । इसी तरह श्रम करते हुये योग फ़ल प्राप्ति में बनने बिगङने का सिलसिला लगातार जारी रहता है । ये पहले दोनों मार्गों से ऊँचा और अधिक प्राप्ति वाला है । पर ये भी अंततः अनिश्चित है ।
4 विहंगम मार्ग - विहंगम कहते हैं - पक्षी को । पक्षी अपने इच्छित फ़ल को प्राप्त करने हेतु किसी भी स्थान किसी भी स्थिति से उङता है । और सीधा फ़ल पर जाता है । यही मार्ग सर्वश्रेष्ठ है । कोई अङचन नहीं । कोई रुकावट नहीं । और सीधा सीधा फ़ल की प्राप्ति ।
5 गुरुओं में भृंगी गुरु ( ध्वनात्मक शब्द की टंकार से ज्ञान कराने वाला ) सर्वश्रेष्ठ होता है ।
सतगुरु की कृपा से " सतनाम " अपने आप लख जायेगा - आप सोचिये । ये कबीर की बात कहता है । और अनुराग सागर बीजक को अपना ग्रन्थ बताता है । खुद अनुराग सागर के अनुसार हर युग में कबीर अलग अलग नाम से प्रकट हुये । यदि " नाक के तिकोने " पर ध्यान लगाने से " सतनाम " लख ( प्रकट हो )  जाता । तो ये एक सिद्ध फ़ार्मूला बन जाता । और आज ( कई युगों पहले से ही ) हर जगह सतनाम की ज्ञान धारा ही प्रवाहित होती । सतनाम प्रकाश फ़ैला होता । पर ऐसा कहीं है ? क्या इससे ( सदाफ़ल से ) पहले कोई गुरु ही नहीं हुआ ? या हुये । तब उन सबके फ़ोटो और

नाक की नोक पर ध्यान करने से इंसान को आत्मज्ञान हो जाता । फ़िर इस सदाफ़ल की भी क्या आवश्यकता थी ?
या कबीर ने अपनी वाणी में इस तरह के ध्यान के बारे में कुछ कहा है ? या बेचारी गायत्री के बारे में कुछ कहा है । अनुराग सागर में काल पुरुष एण्ड फ़ैमिली के आपसी शाप देने में । गायत्री को कलियुग में गाय के रूप में देह धरना बताया  गया है । जो मल खायेगी । और कई ( 1 गाय के ) सांड उसके पति होंगे । इससे 

स्पष्ट है । ऐसी गायत्री ? का कबीर से क्या लेना देना । और जब बृह्मा पत्नी गायत्री से ही कोई लेना देना नहीं । तो फ़िर गायत्री मंत्र किस मतलब के ? खुद अपूज्य बृह्मा मंझले भाई विष्णु के डोनेशन और अस्थायी नियुक्ति पर पूजा में हिस्सा पाता है । तब उसकी पत्नी गायत्री की क्या हैसियत होगी ? आसानी से समझा जा सकता है । इसलिये गायत्री को कबीर के साथ जोङना महा मूर्खता है ।
कबीर ने स्पष्ट रूप से समय के सदगुरु से ज्ञान लेने और तन मन धन से गुरु सेवा दर्शन आदि की बात कही है - यह तन विष की बेलरी गुरु अमृत की खान । शीश दिये जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान ।
बाकी मैं अपने स्तर से यह बात कहता हूँ कि - सदाफ़ल को कोई कबीर नहीं मिले थे । हाँ TV सीरियल वाला कबीर मिला होगा । सदाफ़ल का किसी प्रकार का कोई  गुरु अधिकार नहीं है । वह परम्परागत कबीर पंथ या द्वैत पूजा पाठ के वेशधारी साधुओं से अधिक नहीं । जो - हम तो डूबे ही सनम । तुम्हें भी ले डूबेंगे । तर्ज पर ( अ ) ज्ञान फ़ैलाते हैं ।
विशेष - निर्वाणी नाम और असली सतनाम भक्ति पर इन ब्लाग्स में बहुत कुछ लिखा जा चुका है ।
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