20 अप्रैल 2012

क्षण ! शाश्वत क्षण में छिपा है । और अणु में विराट । अणु को जो अणु मानकर छोड़ दे । वह विराट को ही खो देते हैं । क्षुद्र में ही खोदने से परम की उपलब्धि होती है । जीवन का प्रत्येक क्षण महत्वपूर्ण है । और किसी भी क्षण का मूल्य किसी दूसरे क्षण न ज्यादा है । न कम है । आनंद को पाने के लिए किसी अवसर की प्रतीक्षा करना व्यर्थ है । जो जानते हैं । वे प्रत्येक क्षण को ही आनंद बना लेते हैं । और जो अवसर की प्रतीक्षा करते हैं । वे जीवन के अवसर को खो देते हैं । जीवन की कृतार्थता इकट्ठी और राशिभूत नहीं मिलती है । एक साधु के निर्वाण पर उसके शिष्यों से पूछा गया था कि दिवंगत सदगुरु अपने जीवन में सबसे बड़ी महत्वपूर्ण बात कौन सी मानते थे ? उन्होंने उत्तर में कहा - वही जिसमें किसी क्षण वे संलग्न होते थे ।
बूंद बूंद से सागर बनता है । और क्षण क्षण से जीवन । बूंद को जो पहचान ले । वह सागर को जान लेता है । और क्षण को जो पा ले । वह जीवन पा लेता है - ओशो ।
लेकिन कल तो कभी आता नहीं । जब भी आता है । आज ही आता है । कल भी आज ही आएगा - ओशो ।
तेरे इश्क की खुशबू में खोया खोया सा रहता हूँ ।
मुझे सब लोग छेड़ते रहते हैं कि मे सोया सोया सा रहता हूँ ।

ज्ञानी हमेशा चुप और शांत होता है । वह पूछने पर या जरुररत पर ही बोलता है । वह ज्ञानी के साथ ज्ञानी होता । और मूर्ख के साथ मूर्ख हो जाता है । बच्चों के साथ बच्चा हो जाता है । जवान के साथ जवान होता है । वह किसी भी रंग में अपने को रंग देता है । वही ज्ञानी और योगी है ।
जब वो शरीर में थे । तब भी लोग चूक गए थे । और अब भी चूक रहे हैं । आगे भी बुद्ध होंगे । और चूकेंगे । ये संसार का शाश्वत नियम है ।
हाजिर की हुज्जत गये की तलाशी - इसी को कहा है ।
जो होश पूर्वक जीता है । उसे किसी गुरु की जरुरत नहीं पड़ती है । 
ख़याल रहे । इस पूरी प्रथ्वी के इतिहास में जितने गुरु अपनी जिन्दगी 
में बुद्ध ने बनाये । और किसी ने नहीं बनाये । कोई गुरु पार नहीं लगा पाया । अंत में खुद का ही होश काम आया । इसीलिए तो बुद्ध ने खुद जानकर कहा - कोई तुम्हे कुछ नहीं दे सकता । मैं भी नहीं - अप्पो दिप्पो भव । एस धमो सनन्तनो । सत्य ही सनातन है । सत्य ही शाश्वत है ।

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