19 अप्रैल 2012

सुमरन कर ले मेरे मना तेरी बीते उमर हरि नाम बिना

अब आगे - मैंने अक्सर ही ये बात कही है । योग और परमात्मा को आपने हौवा बना दिया है । बहुत दूर की बात बना दिया है । जबकि यही आपकी असली बात है । अपनी चीज भी है । वास्तविक स्वस्थ = स्व + स्थ । इसी को कहा जाता है । योग के पारिभाषिक शब्द में खास इसको स्वरूप दर्शन कहा जाता है । स्वरूप = स्व + रूप । आपके अपने ही रूप ( या  रूपों ) का दर्शन होना । तब योग स्थिति में जो कुछ भी आप देखते हैं । वह आपका अतीत भविष्य और वर्तमान ही होता है ।
जी हाँ ! SCIENCE के तरीके से आप MATTER की आंतरिक क्रियाओं को समझने लगते हैं । फ़िर योग बहुत सरल हो जाता है । और साधारण मनुष्य से लेकर बहुत छोटे बच्चे और पशु पक्षी भी किसी न किसी स्तर किसी % पर योग करते हैं । कैसे ? मैं आपको समझाता हूँ ।
चलिये । आँखें बन्द कर लीजिये । अब बाहर का दिखाई देना बन्द हो गया । लेकिन आँखों के ठीक सामने एक परदा अब भी है । और वो आपको स्पष्ट 


दिख रहा है । लेकिन इससे बात कुछ ज्यादा समझ में नहीं आयेगी । तब आप यूँ समझें । बहुत गहरी नींद और सामान्य - आधी नींद और आधा जागरण । इनमें क्या अन्तर है ?
बहुत गहरी नींद । जिसमें आपको कोई होश हवास नहीं रहता । आपकी स्वतः होने वाली मगर अपरिचित योग की श्रेष्ठ तुरियातीत अवस्था है । जबकि स्वपन वत स्थिति आपकी विकल्प योग अवस्था है । वास्तव में इस शरीर में किसी भी अवस्था में आप योग मय ही हैं । योग से वियोग होते ही उसी क्षण शरीर की मृत्यु हो जायेगी । लेकिन बात इतनी ही है । वह आपकी जानकारी में नहीं है । इसलिये आप उसके अधिकारी नियंत्रण कर्ता आदि नहीं हैं । एक उदाहरण देता हूँ । एक डाक्टर वकील पुलिस वाले को उनसे सम्बन्धित कोई समस्या आ जाती है । तो वो समस्या का कारण निदान सब जानते हैं । इसलिये समस्या उनके लिये कोई परेशानी पैदा नहीं करती । पर आम आदमी की रातों की नींद दिन का चैन उङा सकती है । क्योंकि वह उसका अधिकारी नहीं है ।  जबकि उपरोक्त पदासीन लोगों के रोज के खेल । दिनचर्या । इंगलिश में - routine .
तब एक बात सोचिये । स्वपन में भी सब कुछ इसी संसार जैसा ही है । तुम भी । और संसार भी । बस वो आपके लिये स्पष्ट नहीं है कि - ये सब क्यों हैं । क्या है ?
कल के लेख - राजीव की रहस्यमय दुनियाँ ..में मैंने जो भी वर्णन किये । वह सभी नीचे लोकों के ही हैं । मैं बता चुका हूँ । प्रथ्वी गुदा से थोङा ऊपर और लिंग योनि से थोङा नीचे यानी गुदा और लिंग योनि के बीच स्थित है । अतः कल वर्णित लोक यहीं मुश्किल से एकाध इंच के पास ही हैं ।
अगर आपने शास्त्रों को कभी गौर से पढा हो । तो उसमें आता है । विराट पुरुष के रोम रोम में अनेकों खण्ड बृह्माण्ड स्थित हैं । रोम रोम समझते हैं आप ? शरीर के अनगिनत छिद्र । जिनमें रोम यानी बाल निकलते हैं । और मनुष्य शरीर और विराट पुरुष की रचना same हैं । तब आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं । इसलिये समझिये । अभी आप नाभि तक भी  नहीं आये । लिंग या योनि स्थान तक भी नहीं आये । क्योंकि यहाँ बृह्मा का लोक है । लेकिन ऊपर चलने से पहले आपको एक बार नीचे के लोकों के बारे में और बता दूँ । जहाँ आप बेल्ट बाँधते हैं । उससे नीचे दोनों ही पैरों में अँधेरे लोक । नीचे लोक । और सजायाफ़्ता जीवात्माओं के लिये लोक है । लगभग घुटने तक । इनमें (  सजा पाये ) निवासियों की संख्या बहुत कम होती हैं । और ये आकार में भी तुलनात्मक बहुत छोटे होते हैं । इनमें SEX आदि भी नहीं है । वनस्पतियाँ भी नहीं हैं । जैसे कोढी आदि होने की सजा पाये लोक में कोढी जीव निश्चित समय तक नियम अनुसार  फ़्री स्टायल घूमते

रहते हैं । ऐसी ही अन्य सजायें । घुटने से नीचे जल सृष्टि या जलीय लोक आरम्भ होने लगते हैं । और पैर के पंजे और उँगलियों पर तो अथाह जलराशि है ही । ध्यान रहे । ये अखिल सृष्टि जल में निर्मित स्थापित है । और तमाम बृह्माण्ड और उनके ग्रह लोक आदि इसमें गेंदों की तरह तैर रहे हैं । हालांकि आपको सूर्य जैसे तारे के बारे में सोचकर ये बात हजम नहीं होगी । अटपटी भी लगेगी । पर उस बिज्ञान को समझना आसान नहीं है । और समझा देने से आप इसके बैज्ञानिक बनने वाले भी नहीं । लेकिन एक उदाहरण देना ठीक है । हिरण्याक्ष ने प्रथ्वी को पाताल में छुपा दिया था । और बराह अवतार इसको अपनी थूथनी पर रख कर वापस जल के ऊपर लाया था । जाहिर है । इससे प्रथ्वी के तुलनात्मक अथाह जलराशि की सहज कल्पना की जा सकती है । जिसमें एक छोटी गेंद के समान प्रथ्वी कहीं खो सी गयी थी ।
योग में विभिन्नता क्रिया के अन्तर से लगती है । पर वास्तव में जब योग होना आरम्भ होता है । तब वो  क्रिया

एक ही हो जाती है । फ़िर चाहे योग - भाव पूजा । तंत्र से । या मंत्र से । या कुण्डलिनी । या हंस ज्ञान । या आत्म भाव में किया जाये । मूल क्रिया 1 ही होगी । क्योंकि दूसरी है ही नहीं ।
चलिये । सबसे पहले घरेलू पूजा की बात करें । आपने पूजा आरती वगैरह की । सुगन्धित धूप बत्ती आदि से आपका मन शान्त हो गया । मानसिक उपद्रव कुछ देर को शान्त हो गये । आप भी शान्ति महसूस करने लगे । अब आप मौन ही तो हैं । सिर्फ़ भाव में । कोई मंत्र नहीं । कोई आरती नहीं । कोई कुछ भी नहीं । बस एक शान्ति सी । स्वस्थ = स्व + स्थ । तंत्र मंत्र भाव पूजा के तुलनात्मक थोङा बैज्ञानिक हो जाता है । लेकिन उसकी भी स्थूल बाह्य क्रियायें पूर्ण होते ही बाद की स्थिति वही होगी । मौन अज्ञात में घटित होता इच्छित पदार्थ । अब 


क्योंकि यह तरीके और तकनीक से किया गया है । इसलिये प्राप्ति और अनुभव का % भाव पूजा के तुलनात्मक काफ़ी अधिक हो जाता है । कुण्डलिनी जैसा महायोग साधारण लोगों के नसीब में नहीं होता । दरअसल नीचे की पढाई किसी भी रूप में आपको पूरी करनी ही होगी । तभी आप यहाँ तक आ पायेंगे । इसलिये कुण्डलिनी के आवेश विलक्षण होते हैं । कुण्डलिनी साधना की A B C D ही दिव्यता से शुरू होती है । यदि किसी के अन्दर ये योग सक्रिय है । तो फ़िर वो सामान्य पुरुष स्त्री नहीं । बल्कि देवत्व श्रेणी का छात्र है । बस उसको इसको पढना और उत्तीर्ण करना है । लेकिन कुण्डलिनी के आवेश में भी किसी सिद्ध मंत्र या बीज मंत्र या तत्व मंत्र के स्थूल जप के बाद सूक्ष्म जप स्वतः होने लगता है । और फ़िर साधक उसी धारा में स्थित हुआ सिर्फ़ जानता है । देखता है । उसे करना कुछ नहीं होता । बस अनुभव इसके अलग स्तर के  होंगे । और आपके वांछित क्षेत्र के होंगे । इसलिये महत्वपूर्ण शब्द MATTER का बिज्ञान ठीक से समझें । फ़िर समझना आसान होगा । कुण्डलिनी के बेहद शान्त और अति हाहाकारी भी अनुभवों

के इतने प्रकार होते हैं कि - उन सभी का वर्णन असंभव सा ही है । आप योग के स्तर के अनुसार शरीर से भी निकल सकते हैं । स्वयं के ही दो या चार शरीरों में भी हो सकते हैं । किसी भी स्थान पर पल भर में पहुँच सकते हैं । किसी को बुला सकते हैं । अतीत में जा सकते हैं । भविष्य का निर्मित हो चुका चित्र अपनी क्षमता अनुसार देख सकते हैं । उचित होने पर किसी क्रिया को बदल सकते हैं । रोक भी सकते हैं । नयी क्रिया भी कर सकते हैं । यहाँ तक कि अनुचित कार्य भी कर सकते हैं । ये आपको मुक्त प्रयोग की छूट देता है ।
लेकिन ध्यान रहे । अगर आप मुक्त रूप से प्रयोग करते हैं । तो उस परिणाम का पूरा उत्तरदायित्व आपका ही  होगा । उस प्रयोग के सभी MATTER का निचोङ निकाल कर आपको सजा या पुरस्कार प्राप्त होगा । आप कार्य कर सकते हैं । पर उसका परिणाम हमेशा सत्ता और उसके कानून के अनुसार ही होगा । ये एक बङी वजह है । जिससे देवता बनने गये लोग राक्षस बन जाते हैं । और राक्षसी प्रवृति की चाह रख कर जुङे देवत्व को प्राप्त हो जाते हैं । जबकि अधीन भाव से कार्य करने वाले गलती हो जाने पर परिणाम के जिम्मेदार नहीं होते । उनसे गलती हो जाने पर प्रकृति देवी का बिज्ञान विभाग उस गलत हो गये MATTER को सही कर देता है । क्योंकि आप जानते ही हो । पढाई और प्रयोग में गलतियाँ सफ़लतायें असफ़लतायें निश्चित ही होती हैं ।
कुण्डलिनी का जागरण या ध्यान अवस्था । आपको सीधा ऊँचे आकाश में उठाता है । आसमानी नीला तारों से झिलमिलाता शान्त स्वच्छ मनमोहक खुला अंतरिक्ष । आपको 


महसूस होगा । एक पूर्ण शुद्धता purity. जैसे आपने पहली बार महसूस की हो । स्वच्छ वातावरण में ली गयी सांस कैसी होती है ? इससे पहले आप कभी नहीं जान पायेंगे । आपके फ़ेफ़ङे सीना दिलोदिमाग एक अनोखी ताजगी और स्फ़ूर्ति का अनुभव करते हुये भर उठेंगे । ध्यान टूटने के बाद भी ये प्रभाव बहुत समय तक रहेगा । आपका दिल यही करेगा । किसी चिङिया की तरह पंख फ़ैलाकर आकाश में उङ जाऊँ ।
जी हाँ ! आपको अन्दर से ये भाव स्थिर स्थित हो चुका होगा । आप आराम से ऐसा कर सकते हैं । हो सकता है । एक बार की यात्रा में ही आपको दुनियाँ फ़ीकी रसहीन घिनौनी और बेरंग लगने लगे । तीनों बन्द लगाय के अनहद सुनो टंकोर । सहजो सुन्न समधि में नहिं सांझ नहिं भोर । नाम खुमारी नानका चढी रहे दिन रात । फ़िर ये नशा उतरने वाला नहीं ।
परमहँस ज्ञान की बात गोपनीय और बेहद उच्च स्थिति वालों के लिये होती है । अतः उसका जिक्र नहीं करूँगा । 


जब हँसा परमहँस हो जाये । पारबृह्म परमात्मा साफ़ साफ़ दिखलाये । समझ गये ।
कुण्डलिनी के बाद हँस ज्ञान ध्यान की बात करते हैं । जहाँ परमहँस ध्यान साधना बेहद कठिन है । ऐसी तैसी मार देता है । वहीं हँस सबसे सरल योग ध्यान है । घरेलू भाव पूजा से भी सरल । तंत्र मंत्र कुण्डलिनी तो इसके देखे बहुत कठिन हैं । लेकिन हँस ज्ञान जो घरेलू स्तर का गृहस्थ टायप इंसान नामदान लेकर करता है । वो वास्तव में उनका नाम जप कमाई या असली पूजा है । जो उनके खाते में जमा होती रहती है । अभी ये ध्यान या साधना नहीं है । सच्ची हँस दीक्षा का सबसे बङा लाभ 84 लाख योनियों की जेल से मुक्ति । अगला मनुष्य जन्म निश्चित । और समृद्ध और भक्ति ज्ञान युक्त अगले जन्म की गारंटी । आपको इसी

जन्म में हो जाती है । लेकिन कुछ गलतियाँ होने पर इसके side effect काफ़ी भयंकर हैं । क्योंकि हँस ज्ञान सीधा सीधा बिजली है । कायदे से उपयोग किया । तो सुख ही सुख । वरना मौत । और फ़िर अनन्त कल्पों का रौरव नरक । और महा रौरव नरक । क्यों ? मूढता । मनमुखता । गुरुद्रोह । जलन । ईर्ष्या । छल । कपट आदि भावों से ये ध्यान करने पर वैसा ही  MATTER तैयार हो जाता है । कबिरा हरि के रूठते गुरु के शरने जायें । कह कबीर गुरु रूठते हरि नहीं होत सहाय । किसी भी शक्ति की । किसी लोकपाल की ताकत नहीं । इस जीव को पनाह दे । तब इसे महा रौरव नरक में फ़ेंक दिया जाता है । वहाँ से अनन्त समय के बाद ये पहले जङ जीव वृक्ष पहाङ । फ़िर नीच योनियाँ । फ़िर नीच मनुष्य । फ़िर उच्च मनुष्य । फ़िर राक्षस । फ़िर यक्ष गंधर्व देव आदि योनियों को पार करके । फ़िर 84 । फ़िर मनुष्य । तब इसका शुद्धिकरण होकर  यदि भक्ति में प्रवृत हुआ । तब मोक्ष का अवसर बनता है ।
आपको परमात्मा की भक्ति के इस परिणाम पर आश्चर्य हो रहा होगा । तब कबीर आदि आत्म ज्ञानी सन्तों को पढें । शास्त्रों को पढें । कोई पुलिस कमाण्डों का अध्ययन प्रशिक्षण ले चुका इंसान यदि अपनी भावना से आतंकवादी बने । या मानवता के विरुद्ध कार्य करें । तो उसकी उपलब्धियाँ भी उसे दण्डनीय बना देती हैं । अतः मैंने कहा । कुल MATTER से क्या बन रहा है ? इसे ठीक से समझें ।
हँस योग में कुछ नहीं करना । गुरु आपकी स्वांसों में गूँजते नाम को जागृत करके बृ्ह्माण्डी लाक नामदान के समय ही खोल देते हैं । आपको सांसो के आवागमन को पूर्ण एकाग्रता से आँखें बन्द कर देखते रहना । सुनते रहना है । यदि सही क्रिया सीख गये । तो दस मिनट में आप इस दुनियाँ से उस दुनियाँ में पहुँच जाते हैं । यह दीक्षा अखिल सृष्टि का परमिट लायसेंस होता है । आप कहीं भी जाईये । आपको पूरा सम्मान और मान्यता दी जाती है । आज इतना ही । फ़िर मिलते हैं । TA,TA
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