27 अप्रैल 2012

कुछ रास्ता बतायें ? मेरी बहन की सहायता करें

मृत्यु का बड़ा भय है । क्या इससे छूटने का कोई उपाय है ?
- मृत्यु तो उसी दिन हो गई । जिस दिन तुम जन्मे । अब छूटने का कोई उपाय नहीं । जिस दिन पैदा हुए । उसी दिन मरना शुरू हो गए । अब 1 कदम उठा लिया । अब दूसरा तो उठाना ही पड़ेगा । जैसे कि प्रत्यंचा से तीर निकल गया । तो अब लौटाने का क्या उपाय है ? जन्म हो गया । तो अब मौत से बचने का कोई उपाय नहीं । जिस दिन तुम्हारी यह बात समझ में आ जाएगी कि - मौत तो होनी ही है । सुनिश्चित होनी है । और सब अनिश्चित है । मौत ही निश्चित है । उसी दिन भय समाप्त हो जाएगा । जो होना ही है । उसका क्या भय ? जो होकर ही रहनी है । उसका क्या भय ? जिसको टाला ही नहीं जा सकता । उसका क्या भय ? जिसको अन्यथा किया ही नहीं जा सकता । उसका क्या भय ?
आशंका है तुम्हें । जिस दुर्घटना की ।
घट चुकी है वह । पहले ही भीतर ।
केवल आएगा तैरकर । गत आगत की सतह पर ।
हो चुका है पहले ही काम । मर गए तुम उसी दिन । जिस दिन तुम जन्मे । जिस दिन तुमने सांस ली । उसी दिन सांस छूटने का उपाय हो गया । अब सांस किसी भी दिन छूटेगी । तुम सदा न रह सकोगे । इसलिए इस भय को समझने की कोशिश करो । बचने की आशा मत करो । बचने को तो कोई नहीं बच पाया । कितने लोगों ने कितने उपाय किए बचने के । तुम पूछते हो - मृत्यु का बड़ा भय है । क्या इससे छूटने का कोई उपाय है ? छूटने का उपाय करते रहोगे । भय बढ़ता जाएगा । तुम छूटने का उपाय करोगे । मौत रोज करीब आ रही है । क्योंकि बुढ़ापा रोज करीब आ रहा है । तुम जितने ही उपाय करोगे । उतने ही घबड़ाते जाओगे । मुझसे तुमने पूछा है । अगर मेरी बात समझ सको । तो मैं तुमसे कहूंगा - मौत को स्वीकार कर लो । छूटने की बात ही छोड़ो । जो होना है । होना है । उसे तुम स्वीकार कर लो । उसे तुम इतने अंतरतम से स्वीकार लो कि उसके प्रति विरोध न रह जाए । वहीं भय समाप्त हो जाएगा । मृत्यु से तो नहीं छूटा जा सकता । लेकिन मृत्यु के भय से छुटकारा हो सकता है । मृत्यु तो होगी । लेकिन भय आवश्यक नहीं है । भय तुमने पैदा किया है । वृक्ष तो भयभीत नहीं हैं । मौत उनकी भी होगी । क्योंकि उनके पास सोच  विचार की बुद्धि नहीं है । पशु तो चिंता में नहीं बैठे हैं । उदास नहीं बैठे हैं कि - मौत हो जाएगी । मौत उनकी भी होगी । मौत तो स्वाभाविक है । वृक्ष, पशु, पक्षी, आदमी । सभी मरेंगे । लेकिन सिर्फ आदमी भयभीत है । क्योंकि आदमी सोचता कि किसी तरह बचने का उपाय हो जाए । कोई रास्ता निकल आए । तुम जब तक बचना चाहोगे । तब तक भयभीत रहोगे । तुम्हारे बचने की आकांक्षा से ही भय पैदा हो रहा है । स्वीकार कर लो । मौत है । होनी है । तो जब होनी है । हो जाएगी । और हर्जा क्या है ? जन्म के पहले तुम नहीं थे । कोई तकलीफ थी ? कभी इस तरह सोचो । जन्म के पहले तो तुम नहीं थे । कोई तकलीफ थी ? मौत के बाद तुम फिर नहीं हो जाओगे । जो जन्म के पहले हालत थी । वही मौत के बाद हालत हो जाएगी । जब तक तुमने पहली सांस न ली थी । तब तक का तुम्हें कुछ याद है ? कोई परेशानी है ? कोई झंझट ? ऐसे ही जब आखिरी सांस छूट जाएगी । उसके बाद भी क्या झंझट ? क्या परेशानी ? सुकरात मरता था । किसी ने पूछा कि - घबड़ा नहीं रहे आप ? सुकरात ने कहा - घबड़ाना क्या है ? या तो जैसा आस्तिक कहते हैं । आत्मा अमर है । तो घबड़ाने की कोई जरूरत ही नहीं । आत्मा अमर है । तो क्या घबड़ाना । या जैसा कि नास्तिक कहते हैं कि - आत्मा मर जाती है । तो भी बात खतम हो गई । जब खतम ही हो गए । तो घबड़ाना किसका ? घबड़ाएगा कौन ? बचे ही नहीं । तो न रहा बांस । न बजेगी बांसुरी । तो सुकरात ने कहा - दोनों हालत में । दोनों में से कोई ठीक होगा । और तो कोई उपाय नहीं है । या तो आस्तिक ठीक । या नास्तिक ठीक । आस्तिक ठीक । तो अमर हैं । बात खतम हुई । चिंता क्या करनी ? नास्तिक ठीक । तो बात खतम ही हो जानी है । चिंता किसको करनी है । किसकी करनी है ? सुकरात ने कहा - इसलिए हम निश्चिंत हैं । जो भी होगा । ठीक है । तुम बचने की कोशिश न करो । मौत तो होगी । लेकिन तुमसे मैं कहना चाहता हूं । मौत तुम्हारी नहीं होगी । तुम्हारा जन्म ही नहीं हुआ । तो तुम्हारी मौत कैसे होगी ? शरीर का जन्म हुआ है । शरीर की मौत होगी । तुम्हारा चैतन्य अजन्मा है । और अमृतधर्मा है । शरीर तो रोज मर रहा है । शरीर की तो प्रक्रिया मृत्यु है । इस शरीर के पार 1 चैतन्य की दशा है । मगर उसका तुम्हें कुछ पता नहीं । तुम वही हो । और तुम्हें उसका पता नहीं । तुम्हें आत्म स्मरण नहीं । यह मत पूछो कि - मौत के लिए हम क्या करें ? इतना ही पूछो कि हमारे भीतर शरीर के पार जो है । उसे जानने के लिए क्या करें ? मृत्यु से बचने की मत पूछो । ध्यान में जागने की पूछो । अगर तुम्हें इतना पता चल जाए कि - मैं भीतर चैतन्य हूं । तो फिर शरीर ठीक है । तुम्हारा आवास है । घर को अपना होना मत समझ लो । और जैसे ही तुम्हें यह बात समझ में आनी शुरू हो जाएगी । तुम्हारे भीतर अपूर्व क्रांति घटित होगी ।
नर ! बन नारायण । स्वर ! बन रामायण ।

और तब तुम अचानक पाओगे । तुम्हारे भीतर जो तुमने नर की तरह जाना था । वह नारायण है । और जो तुमने स्वर की तरह जाना था । वह रामायण है । ओशो
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नमस्ते ! राजीव जी ! आज से 7 वर्ष पूर्व मेरे .........? का .....? राजस्थान हाईवे पर एक्सीडेंट हो गया था । वो मोटर साइकिल से थे । उनके सर में गहरी चोट लगी थी । इसके अलावा हाथों में सारा माँस निकल गया । एक हाथ में तो दो मुख्य नसों के अलावा सभी नसें ख़तम हो गयी थी । ...... हॉस्पिटल जयपुर में 6 माह admit  रहे । उनके सर के 2 ऑपरेशन । जबड़े के  2 -3 आपरेशन । हाथो के ऑपरेशन । व प्लास्टिक सर्जरी । 1 - 2 दूसरे ऑपरेशन भी हुए । आज भी उनकी दवाईयाँ चल रही हैं । जिस जिसने जो जो बताया । वो सब किया । काफी डॉक्टरों को दिखाया । राजस्थान में काफी देवताओं के । माताजियों के । तंत्र मंत्र करने वालो के गये । वो बोलते हैं कि - ये करवाया गया था ( तंत्र मंत्र से )  । इतना सब होने के बाद भी । आज जीजाजी ना तो खड़े हो पाते हैं । ना उठ पाते हैं । बोलने की कोशिश करते हैं । लेकिन समझ में नहीं आता । याददाश्त पूरी है । लेट्रिन पेशाब के लिए भी नहीं बोलते । बिस्तर ख़राब कर देते हैं । सभी काम दीदी ही करती हैं । जैसे कि - खाना खिलाना । गन्दगी साफ़ करना । उनको नहलाना । थोडा घुमाना आदि । आर्थिक रूप से बर्बाद हो चुके हैं । घर में और कोई आदमी नहीं है l  घर में दुकान है । वो दीदी की सास व दीदी मिल कर संभालती है । वो भी अब काफी कम चलती है । कोर्ट केस ( दुर्घटना बीमा वाला ) उसका कुछ पैसा मिला था । उसका आधा अभी ब्लाक है । कोर्ट में उस पर भी रोक लगी हुई है । उसे जीने की चाह नहीं है । लेकिन बालकों के लिए जी रही है ।   वो बहुत दुखी रहती है । बालकों के भविष्य का पता नहीं ।  अब दीदी  भी बीमार रहने लगी है । मानसिक टेंशन रहती है ।  कुछ रास्ता बतायें ? मेरी बहन की सहायता करें । एक पाठक  ।
विशेष - हमारे पाठक के अनुरोध पर परिचय  नहीं दिया गया है । ये कोई सज्जन इंसान हैं । जिन्होंने एक दुखी महिला को बहन मानते हुये दीदी सम्बोधन से पत्र लिखा है । वास्तव में ये इनकी सगी बहन नहीं हैं ।  एक परिचित भर हैं ।
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उत्तर यहीं प्रकाशित होगा ।
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