22 अप्रैल 2012

सदा संत मतवाला

नई सुबह । नया सूरज । नयी धूप । नये फूल । सोकर उठा हूं । सब नया नया है । जगत में कुछ भी पुराना नहीं है ।
कई सौ वर्ष पहले यूनान में हेराक्लतु ने कहा था - एक ही नदी में दो बार उतरना असंभव है । सब नया है । पर मनुष्य पुराना पड़ जाता है । मनुष्य नये में जीता ही नहीं । इसलिए पुराना पड़ जाता है । मनुष्य जीता है - स्मृति में । अतीत में । मृत में । यह जीना ही है । जीवन नहीं है । यह अर्ध मृत्यु है । और इस अर्ध मृत्यु को ही हम जीवन मानकर समाप्त हो जाते हैं । जीवन न अतीत में है । न भविष्य में है । जीवन तो नित्य वर्तमान में है । वह जीवन योग से मिलता है । क्योंकि योग चिर नवीन में जगा देता है । योग चिर वर्तमान में जगा देता है । उसमें जागना है - जो है । जो था - वह भी नहीं है । जो होगा - वह भी नहीं है । और जो है - वह प्रकट तब होता है । जब मानव चित्त स्मृति और कल्पना के भार से मुक्त होता है । स्मृति मृत का संकलन है । उसमें जीवन को नहीं पाया जा सकता है । और कल्पना भी स्मृति की ही पुत्री है । वह उसकी ही प्रतिध्वनि और प्रक्षेप है । वह सब ज्ञात में भटकना है । उससे जो अज्ञात है । उसके द्वार नहीं खुलते हैं ।
ज्ञात को जाने दो । ताकि अज्ञात प्रकट हो सके । मृत को जाने दो । ताकि जीवित प्रकट हो सके । योग का सार सूत्र यही है - संसार दर्पण है ।
आणा नाचे ताणा नाचे । नाचे सुत पुराणा ।
बाहर खडी तेरी नाचे जुलाही । अन्दर कोई ना आणा ।
हस्ती चढ़ कर ताणा तणीया । ऊंट चडया निर्वाणा ।
घुडले चढ़ कर बणबा लाग्या । वीर छावनी छावा ।
उरद मूंग मत खाए जुलाही । तेरा लड़का होगा काला ।
एक दमड़ी का चावल मंगा ले । सदा संत मतवाला ।
माता अपनी पुत्री ने खा गई । बेटा ने खा गयो बाप ।
कहत कबीर सुणो भाई साधो । रतियन लाग्यो पाप ।
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