13 अप्रैल 2012

सरगे जाओ चाहे नरके जाओ मोहि रुपैया देउ

तब राजीव जी ! आप ही बताओ । आज कलयुग में वो 12 पंथ और 4 वंश कौन से हैं ? जिनसे बच कर जीव सही गुरु का वरण करे । व मुक्ति पाये । लेख - काल पुरुष का अपने दूतों को चाल समझाना..पर इन्हीं की टिप्पणी ।
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जाका गुरु है गिरही ।  गिरही चेला होय । कीच  कीच के धोवते ।  दाग न छूटे कोय ।
गुरु मिला तब जानिये ।  मिटे मोह तन ताप । हरष शोष व्यापे नहीं ।  तब गुरु आपे आप ।
बंधे को बंधा मिला ।  छूटे कौन उपाय । कर सेवा निरबन्ध की । पल में लेय छुड़ाय ।
गुरु कीजिए जानि के ।  पानी पीजै छानि । बिना विचारे गुरु करे ।  परे चौरासी खानि ।
जो गुरु ते भृम न मिटे ।  भ्रान्ति न जिसका जाय । सो गुरु झूठा जानिये ।  त्यागत देर न लाय ।

कबीर बेड़ा सार का ।  ऊपर लादा सार । पापी का पापी गुरु ।   यो बूडा संसार ।
गु अंधियारा जानिये । रु कहिये परकाश । मिटि अज्ञाने ज्ञान दे । गुरु नाम है तास ।
गुरुवा तो घर घर फिरे । दीक्षा हमरी लेउ । के बूडो के ऊबरो । टका परदानी देउ ।
गुरुवा तो सस्ता भया ।  कौड़ी अर्थ पचास । अपने तन की सुधि नहीं ।    शिष्य करन की आस ।
गुरुआ तो घर घर फ़िरें । कण्ठी माला लेय । सरगे जाओ चाहे नरके जाओ । मोहि रुपैया देउ ।
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शुरू शुरू के कुछ 8-10 माह में 4 बजे उठ कर नहा धोकर ( सर्दी या गर्मी  ) सुमरन करता था ।

- कमाल है । कुछ कुछ हैरानी सी भी हुयी । एक हमारे साधक हैं । जिनको घर पर ही आसानी से अनुभव होने लगे । और जिनको आश्रम के कठिन नियमों जैसी पाबन्दी भी नहीं है । और फ़िर भी उनकी किन्तु परन्तु लेकिन वेकिन नहीं गयी । अक्सर कहते हैं - साधना के लिये उचित समय नहीं मिलता । हमारी बिजी लाइफ़ में कहाँ संभव हो पाता है । ठीक तरह से नियम अनुसार सुमरन करें । वे समझते हैं कि - सुमरन करके हम पर अहसान करते हैं । तब मैं कहता हूँ - भाङ में जाओ । GO TO HELL
आश्रम में हर 4 घंटे बाद 2 घंटे के लिए हम 4 लडकों को सुमरन ( मन से ) करना होता था । क्योंकि लडकों की संख्या समय को विभाजित करके 4 पर 2 घंटे सुमरन तय हुआ था ।
- वैसे एक हिसाब से यह सब ठीक है । अनुशासन । नियमित अभ्यास । यदि जिन्दगी में ढल जाये । तो स्वास्थय । चरित्र । आत्म उत्थान में बेहद सहायक होता है । लेकिन इसमें थोङा फ़र्क है । अक्सर आश्रम वाले ये सब दिखावे के लिये अधिक करते हैं । एक तरह से प्रचार के लिये । वहाँ आने जाने ठहरने वाले लोगों को दिखाने के लिये । इसलिये सारा मामला असली भक्ति का न होकर बनाबटी व्यवसायिक ही हो जाता है । क्या आपको पता है

? वृंदावन में भारत के अनेक स्थानों से आयी बूढी विधवा तलाकशुदा अनाथ बेसहारा औरतें सिर्फ़ 40 रु. रोज ( जब मैंने सुना था तब । करीब 5 साल पहले ) पर - हरे कृष्णा..कन्हैया आदि सुमरन ऊँचे स्वर में ( खास कर दिखावे के लिये ) करती है । अगर आप उनको सुमरन करता देखें । तो आपको लगेगा । ये किसी की मृत्यु पर विलाप कर रही हैं । ऐसे झुँझला कर हरे कृष्णा ..कन्हैया से बोर होती हुयी सी उसे रोती कोसती हैं । क्या लाभ ? ऐसी मूर्खता का ।
अभी तो कुछ समय बाकी है । 2 बजने में । तो वो बोला - अभी नहाना भी तो है ।
- मुझे फ़िर आश्चर्य है । आपकी लगन पर । काश भारत के मूर्ख लोग आपसे कुछ सबक लेते । जो सिर्फ़ 2000 में

भागवत कथा करा कर या हरिद्वार में गंगा नहा कर तरने के ख्वाव देखते हैं ।
नेट पर मुझे राधा स्वामी पंथ के गुरुओं की अंदरूनी कलह के बारे में पता चला । तो मैं भटक गया ।
- गद्दी परम्परा से बने गुरु गुरु नहीं होते । बल्कि उस बिजनेस को आगे बढाने वाले संचालक मैंनेजर होते हैं । एक धंधेबाज आम इंसान । क्योंकि उन्हें मुफ़्त की खाने को मिलती हैं । तो धन और अपनी प्रतिष्ठा बढाने के लिये वे ऐसा ही करते हैं । अज्ञानियों में कलह होना स्वाभाविक है । और भारत की भेङ जनता उनकी मनोकामना पूर्ण करने में अच्छा योगदान करती हैं ।
कई गुरु जो उसी समय साक्षात्कार का दावा करते थे । से मिला ।

- हाँ ! लेकिन ये साक्षात्कार की सही परिभाषा । सही अर्थ । सही मतलब नहीं बताते । या कहिये । खुद भी कहाँ जानते हैं ? विदेश में जाकर बस गया । भारत के एक प्रसिद्ध गुरु घराने का गुरु । सिर्फ़ आँखों के पीछे दिखने वाले दूधिया प्रकाश को ही साक्षात्कार कह कर पब्लिक को मूर्ख बना रहा है । आप मुझसे दीक्षा मत लो । मैं बिना गुरु बने ही आपको बता रहा हूँ । अपनी दोनों आँखों को उँगलियों से कुछ देर थोङा ताकत से दबायें रहें । आपको दूधिया प्रकाश नजर आने लगेगा । ये पाखण्डी आदमी सिर्फ़ इतनी ही बात से करोंङो में खेल रहा है । ये सभी भाई पूरा परिवार ही पब्लिक को खासा मूर्ख बना रहे हैं । बात वही हैं । भारत के इंसान.. सारी भेङें नहीं जानते । आत्म

ज्ञान की वंश परम्परा आज तक नहीं हुयी । न भविष्य में कभी होगी । भगवान किसी एक को ठेका नहीं दे देता । जाओ राज्य करो । ऐश करो । साक्षात्कार के नाम पर तरह तरह की बातें बताने वाले ज्यादातर शेखचिल्ली जैसी ऐसी ही कहानियाँ सुना रहे हैं ।
करोंदा । हरियाणा में कोई रामपाल जी महाराज हैं ? जो खुद को कबीर साहब का उत्तराधिकारी कहते है ?? व दावा करते है कि - इस समय धरती पर केवल उन्हीं के पास कबीर जी का असली ज्ञान है ?
- रामपाल ठीक कहता है । वो उत्तराधिकारी है । लेकिन कबीर ने जो बताया कि - उनके पंथ में कैसे काल दूत घुस आयेंगे । और लोगों को भृमित करेंगे । वो उन्हीं में से एक उत्तराधिकारी है । जो संयोगवश आप टिप्पणी में पूछ चुके । पर आपने शायद ध्यान नहीं 


दिया । कबीर ने अनुराग सागर में काल दूत का हुलिया भी बताया है । एक बार मिलान करे । खुद पता चल जायेगा । अगर उसमें ताकत है । तो मुझसे बात करे । मैं उसे बताऊँगा । कबीर ने क्या कहा । क्या नहीं कहा ?
पर वो टीवी पर एक रिकॉर्डिंग के द्वारा था । क्या ये मुमकिन है कि - कोई टीवी द्वारा ज्ञान दे ? 
- मुमकिन है । मगर सिर्फ़ पाखण्डियों के लिये । वे कुछ भी कर सकते हैं ।
और असल में उनके मंत्र में वे काल के मंत्र भी थे ??? जिनका वो सतसंग में विरोध करते हैं ?????
- वो जिसकी नौकरी करता है । उसी की तो बजायेगा । निर्वाणी मंत्र में 1 भी अक्षर नहीं है । ये स्वांस में ध्वनि रूप है । भले ही इसको ढाई अक्षर का ( है तो मगर ध्वनि रूप ) कबीर आदि ने बताया है

। पर ये ध्वनि रूप है । इसमें 1 भी अक्षर वाणी से नहीं बोलना होता । इसलिये इसे अजपा और निर्वाणी मंत्र कहा गया है । इसके अलावा वाणी से जाप करने को कोई गुरु 1 भी अक्षर का ह्यी क्लीं ॐ लं नं आदि जैसे बीज मंत्र भी देता है । निश्चय ही वो काल पुरुष का चमचा है । लेकिन ध्यान रहे । वो भी ( ऐसा हरेक गुरु ) अपने आपको सतगुरु ही कहता है । सतगुरु ?
कृपया बताये कि - अब क्या मार्ग है मेरे लिए ? कहीं ऐसा न हो कि मेरे मरने पर ये सारे गुरु आपस में लड़ मरे कि ये मेरा शिष्य है ? या फिर कोई आये ही न ? या फिर गधा घोडा बनना पड़े  ? 
- ये आयेंगे । तो तब । जब खुद इनका कोई ठिकाना होगा ? इनकी कुत्ता घसीटी तो खुद ही हो रही होगी । हो चुकी होगी । तब लङेंगे मरेंगे क्या । इसलिये आपने सही कहा । वे कहाँ से आ सकते हैं ? दरअसल गद्दी परम्परा के नकली गुरु पब्लिक को लम्बे समय से बेबकूफ़ बना रहे हैं । मरने के बाद गुरु क्या लेने आयेगा । जब वो जीते जी ही मुक्त कर देता है - जीयत मुक्त सो मुक्ता भाई । मर के मुक्ति किसने पायी ? किसने देखा  । क्या हुआ ? लौट कर किसने बताया । क्या हुआ ? मुक्ति जीते जी ही हो जाती है । शास्त्र का वचन देखें - फ़िर वह जीते जी बृह्म होकर बृह्म में ही विचरण करता है । इसको कहते हैं - असली मुक्ति ।

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