03 अप्रैल 2012

दुनिया चार सौ बीस है

मुल्ला नसरुद्दीन के बेटे ने उससे पूछा - पापा ! मेरे मास्टर कहते हैं कि दुनिया गोल है । लेकिन मुझे तो चपटी दिखाई पडती है । और डब्बू जी का लडका कहता है कि न तो गोल है । न चपटी । जमीन चौकोर है । पापा ! आप तो बडे विचारक हैं । आप क्या कहते हैं ?
मुल्ला नसरुद्दीन ने आंखे बन्द की । और विचारक बनने का ढोंग करने लगा । कुछ देर यूँ ही बैठा ही रहा । हांलाकि उसके समझ में कुछ नहीं आया । सब बातें सिर से घूमती रहीं कि आज कौन सी फ़िल्म देखने जाऊं । क्या करुं । क्या न करूं । बेटे ने कहा - पापा ! बहुत देर हो गयी । अब तक आप पता नही लगा पाये कि दुनिया गोल है । चपटी या फ़िर चौकोर ? मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा - बेटा ! न तो दुनिया गोल है । न चपटी । न चौकोर । दुनिया चार सौ बीस है ।
**************
एक आदमी ने गाँव के नेताजी को किसी बात पर सच्ची बात कह दी । कह दिया कि - उल्लू के पठ्ठे हो । अब नेताजी को उल्लू का पठ्ठा कहो । तो नेताजी कुछ ऐसे ही नहीं छोड देगें । उन्होनें अदालत मे मुकदमा मानहानि का चलाया । मुल्ला नसरुद्दीन नेताजी के पास ही खडा था । तो उसको गवाही में लिया । जिसने गाली दी थी नेताजी को । उसने मजिस्ट्रेट को कहा कि - होटल में कम से कम पचास लोग, जरुर मैंने उल्लू का पठ्ठा शब्द का उपयोग किया है । लेकिन मैंने किसी का नाम नहीं लिया । नेताजी कैसे सिद्ध कर सकते हैं कि मैंने इन्ही को उल्लू का पठ्ठा कहा है ?
नेताजी ने कहा - सिद्ध कर सकता हूँ । मेरे पास गवाह हैं । मुल्ला को खडा किया गया । मजिस्ट्रेट ने पूछा कि मुल्ला, तुम गवाही देते हो कि इस आदमी ने नेताजी को इंगित करके उल्लू का पठ्ठा कहा है ? मजिस्ट्रेट ने कहा - तुम कैसे इतने निश्वित हो सकते हो ? वहाँ तो पचास लोग मौजूद थे । इसने किसी का नाम तो लिया नहीं । नसरुद्दीन ने कहा - नाम लिया हो कि न लिया हो । पचास मौजूद हों कि पांच सौ मौजूद हों । मगर वहां उल्लू का पठ्ठा केवल एक था । वह नेता जी ही थे । मैं अपने बेटे की कसम खाकर कहता हूँ कि वहां कोई और दूसरा था ही नहीं । यह कहता भी तो किसको ?
********
एक गाँव मे एक धर्मगुरु आये । मुल्ला नसरुद्दीन भी सुनने गया । धर्मगुरु का उपदेश था कि दूसरों के जीवन मे व्यवधान डालना हिंसा है । प्रवचन के बाद मुल्ला मंच पर पहुँचा । बोला - मैं आपको एक बढिया लतीफ़ा सुनाता हूँ । जरा गौर से सुनिये । लतीफ़ा चार खंडों में है ।
पहला खण्ड - एक सरदार जी साइकिल पर अपनी बीबी को बैठाकर कहीं जा रहे थे । रास्ते में गढ्ढा आया । बीबी चिल्लायी - जरा बचकर चलाना । सरदार जी ने साइकिल रोकी । और उतर कर बीबी को एक झापड मार कर कहा - साइकिल मैं चला रहा हूँ कि तू ?
धर्मगुरु बोले - सही बात है । किसी के काम मे अडंगा नही डालना चाहिये ।
मुल्ला ने आगे कहा - जरा सुनिये दूसरा खंड । सरदार जी घर आये । बीबी चाय बनाने बैठी । गुस्से में तो थी ही । स्टोव मे खूब हवा भरने लगी । सरदार जी बोले - देखो ! कहीं टंकी फ़ट न जाये । बीबी ने सरदार जी की दाढी पकड कर सरदार जी को एक चांटा लगाया । बोली - चाय मैं बना रही हूँ कि तुम ?
धर्मगुरु बोले - वाह वाह ! क्या चुटकुला है । किसी के काम में बीच में बोलना ही नहीं चाहिये ।
मुल्ला ने कहना आगे जारी रखा । कहा - सुनिये ! अब सुनिये चौथा खंड… एक बार एक सरदार जी…।
धर्मगुरु ने बीच मे टोका - अरे भाई ! पहले तीसरा सुनाओ । दूसरे के बाद यह चौथा खंड कहां से आ गया ? नसरुद्दीन ने आव न देखा ताव, भर ताकत एक घूंसा धर्मगुरु की पीठ पर लगाया । और बोला - चुटकला मैं सुना रहा हूँ कि तुम ?
****************
नसरुद्दीन का बेटा फ़जलू स्कूल से चार नये शब्द सीख आया - दारु, हुक्का, रंडी और उल्लू का पठ्ठा । वह बारबार इनके अर्थ पूछे । इस डर से कहीं बेटा बिगड न जाय । नसरुद्दीन ने दारु का अर्थ चाय, हुक्का का अर्थ काफ़ी, रंडी का अर्थ भिंडी की सब्जी, और उल्लू का पठ्ठा यानी मेहमान बतला दिया । दूसरे ही दिन एक विचित्र घटना घटी । जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी । फ़जलू बाहर बरामदे में बैठा था । तभी नसरुद्दीन का कोई परिचित उससे मिलने आया । फ़जलू ने कहा - आओ उल्लू के पठ्ठे ! कुर्सी पर बैठो । मित्र तो यह सुनकर हैरान हो गया । बोला - तुम्हारे पापा कहां गये हैं ? फ़जलू ने कहा - पापा ! अरे वह बाजार गये हैं रंडी खरीदने । आजकल उन्हें रंडी बहुत भाती है । वे आते ही होगें ।
फ़जलू ने अपने नये शब्द भंडार का उपयोग करने का अच्छा अवसर देखकर कहा - आप हुक्का पीना पंसद करेगें या दारु लेकर आऊँ ? वह मित्र तो यह सुनकर हक्का बक्का रह गया । घबराते हुये बोला - फ़जलू ! कैसी उल्टी सीधी बातें कर रहे हो ? तुम्हारी मम्मी कहाँ हैं ? उन्ही को बुला लाओ । तब तक पापा भी आते होगें ।
फ़जलू ने दरवाजे के भीतर झांक कर आवाज लगाई - मम्मी एक उल्लू का पठ्ठा आया है । मैने हुक्का पूछा । दारु की पूछी । तो कुछ नहीं बोला । कहता है कि उल्टी सीधी बातें मत करो । जब तक पापा रंडी वगैरह नहीं लाते । तब तक तुम्हारी मम्मी को ही बुला दो । ओशो
एक टिप्पणी भेजें

Follow by Email