24 अप्रैल 2012

मैं बीसवीं सदी का व्यक्ति हूँ

सवाल - आपकी नजर में विज्ञान का भविष्य क्या होगा ?
मैं बीसवीं सदी का व्यक्ति हूँ । और पूरी तरह से जीवंत हूँ । और मैं भविष्य की जरा भी चिंता नहीं करता । न ही मैं अतीत की कोई परवाह करता । मेरा सारा जोर वर्तमान पर है । क्योंकि सिर्फ वर्तमान ही का अस्तित्व है । अतीत अब रहा नहीं । भविष्य आया नहीं । दोनों ही का अस्तित्व नहीं है । वे पैगंबर पागल रहे होंगे । जो भविष्य की चिंता करते थे । वे हमेशा भविष्य की बात करते थे ।
दुनिया में दो ही तरह के पागल लोग हैं । वे जो हमेशा अतीत की बात करते हैं । और थोड़े जो भविष्य की बात करते हैं । अतीत की बात करने वाले लोग इतिहासविद, पुरातत्वविद इत्यादि होते हैं । और जो लोग भविष्य की बात करते हैं । वे पैगंबर, कल्पनाशील, कवि होते हैं । मैं दोनों ही नहीं हूँ । मेरा सारा संबंध इस क्षण से है..अभी. यहाँ ।
मैं पैगंबर नहीं हूँ । लेकिन एक बात मैं कह सकता हूँ । और इसका असल में भविष्य से कुछ लेना देना नहीं है । यह अभी यहीं घट रहा है । लोग अंधे हैं । इसलिए वे देख नहीं सकते । मैं देख सकता हूँ । यह पहले ही हकीकत बन चुका है । बड़ी से बड़ी बात जो हो रही हैं । जो बाद में समझ में आएगी । वह है - धर्म और विज्ञान का मिलन । पूर्व और पश्चिम का मिलन । भौतिकता और आध्यात्मिकता का मिलन । बाह्य और अंतस का मिलन । अंतर्मुखी और बाह्यमुखी का मिलन । लेकिन यह अभी ही हो रहा है । यह भविष्य में विकसित होगा । लेकिन मेरा संबंध वर्तमान से है । और मैं बहुत प्रसन्न हूँ कि कुछ बहुत ही महान बात होने को है । बीज अंकुरित हो चुका है । तुम इतने अतीत और भविष्य से बँधे हो कि वर्तमान में छोटे से अंकुरण को देख नहीं सकते । यहाँ, तुम्हारी आँख के नीचे । दो विपरीत ध्रुवों का मिलन हो रहा है । विज्ञान अकेला आधा है । और मानव को तृप्ति नहीं दे सकता । यह तुम्हें अधिक बेहतर शरीर दे सकता है । यह तुम्हें अच्छा स्वास्थ्य दे सकता है । लंबा जीवन दे सकता है । यह तुम्हें अधिक भौतिक सुविधाएँ दे सकता है । अधिक विलासिता । मैं इनमें से किसी के खिलाफ नहीं हूँ । मैं दुखवादी नहीं हूँ । मैं किसी भी तरह से उस तरह का मूर्ख नहीं हूँ । लेकिन यह सिर्फ बाहरी दुनिया की चीजें ही दे सकता है । जो कि अपने में सुंदर है । मैं चाहता हूँ कि सभी लोग सुंदर जीवन, आरामदायक जीवन जीएँ । अधिक विलासिता में, अधिक स्वस्थ, अधिक पोषित, अधिक शिक्षित, लेकिन सिर्फ यही सब कुछ नहीं है । यह सिर्फ जीवन की सतह भर है - केंद्र नहीं ।
धर्म केंद्र उपलब्ध करवाता है । यह तुम्हें आत्मा देता है । इसके बिना विज्ञान लाश भर है । एक सुंदर लाश । तुम लाश को रंग रोगन कर सकते हो । तुम लाश को धो सकते हो । और सुंदर कपड़े पहना सकते हो । लेकिन लाश तो लाश ही है । और याद रखो । यही बात धर्म के साथ भी लागू होती है । धर्म अकेला भी पर्याप्त नहीं है । अकेला धर्म तुम्हें भूत बना देता है । पवित्र भूत ! लेकिन यह तुम्हें भूत बना देता है । यदि धर्म भौतिक नहीं बनता है । तो आत्मा परमात्मा की बातें महज एक पलायन है । पूरब में यही हुआ है । हम आत्मा की बहुत ज्यादा बात करते हैं । और हमें जो यथार्थ चारों तरफ से घेरे है । उसे भूल ही गए हैं । हम अंतर्मुखी हो गए हैं । स्व से अत्यधिक बँधे हुए । हम वृक्षों की, पहाड़ों की, और चंद्रमा और तारों की खूबसूरती के बारे में पूरी तरह से भूल गए । पूरब में मानवता कुरूप हो गई । इसके पास केंद्र है । लेकिन परिधि नहीं । सब कुछ केंद्र पर सिकु्ड़ गया । पश्चिम के पास परिधि है । पर केंद्र नहीं । लोगों के पास सब कुछ है । लेकिन कुछ महत्वपूर्ण से चूक रहे हैं । विज्ञान और धर्म एक हो रहे हैं । ये एक हो चुके हैं । मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि वे एक होने वाले हैं । वे एक हो रहे हैं । सभी महान वैज्ञानिक - एडिंग्टन, प्लैंक, आइंस्टिन । विज्ञान जगत के उच्च क्षमता के लोग । इस बात के लिए सचेत हुए हैं कि अकेला विज्ञान काफी नहीं है । यहाँ कुछ और भी अधिक रहस्यपूर्ण है । जो वैज्ञानिक कार्य प्रणाली व संसाधनों से पकड़ नहीं सकते । कुछ भिन्न प्रयास की जरूरत होती है । ध्यान पूर्ण होश की जरूरत होती है ।
एडिंग्टन अपनी आत्मकथा में कहता है - जब मैंने अपने जीवन की शुरुआत एक वैज्ञानिक की तरह की । तो मैं सोचता था कि दुनिया चीजों से चलती है । लेकिन जैसे मैं विकसित हुआ । वैसे वैसे मैं अधिक से अधिक सचेत हुआ कि दुनिया में सिर्फ चीजें ही नहीं होती । बल्कि विचार भी होते हैं ।
यथार्थ विचार के अधिक करीब है । यथार्थ की थाह नहीं पाई जा सकती । उसे नापा नहीं जा सकता । वह कहीं अधिक अधिक रहस्यपूर्ण है । यथार्थ मात्र वस्तु नहीं । बल्कि चेतना भी है । मेरी अपनी दृष्टि यह है कि हमें जोरबा दि बुद्धा का निर्माण करना होगा । जो नया बुद्ध होगा । वह जोरबा दि ग्रीक और गौतम बुद्ध का मिलन होगा । वह सिर्फ जोरबा नहीं हो सकता । और वह सिर्फ बुद्ध भी नहीं हो सकता ।
और इसीलिए मेरा सारा प्रयास है - जोरबा और बुद्ध के बीच सेतु निर्माण किया जाए । स्वर्ग सेतु, या इंद्रधनुषी सेतु, धरती और अनंत के बीच, इस किनारे और उस किनारे के बीच । यह मेरे आसपास घट रहा है । इसे घटते हुए कहीं और तुम देख नहीं सकते ।
यहाँ सभी तरह के वैज्ञानिक हैं । यहाँ कई तरह के वैज्ञानिक हैं । यहाँ पर कवि और संगीतकार, चित्रकार हैं- सभी तरह के लोग, और ये सभी एक साथ एक महान प्रयास के लिए जुटे हैं - ध्यान के लिए । यहाँ सिर्फ एक मिलन का बिंदु है । और वह है - ध्यान । सिर्फ एक बिंदु पर वे मिलते हैं । अन्यथा सभी की अपनी वैयक्तिक यात्रा है । इस मिलन द्वारा अदभुत विस्फोट संभव है । यह यहाँ घट रहा है । जिनके पास आँखें हैं । वे यह घटते यहाँ देख सकते हैं ।
पृथ्वी पर यही एक जगह है । जहाँ दुनियां के सारे देशों के प्रतिनिधि मिलेंगे । हम यहाँ पर रूस के लोगों को चूक रहे थे । और अब मैं यह बताते प्रसन्न हूँ कि रूस से भी लोग यहाँ आ गए हैं । सभी वर्ग यहाँ मिल रहे हैं । सभी धर्म यहाँ मिल रहे हैं । यहाँ पर छोटा सा संसार है । छोटी सी दुनिया । और हम सभी यहाँ पर मानव की तरह मिल रहे हैं । कोई ईसाई नहीं है । हिंदू नहीं है । या मुसलमान नहीं है । कोई नहीं जानता कि कौन वैज्ञानिक है । कौन संगीतकार है । कौन चित्रकार है । कौन प्रसिद्ध अभिनेता है । कोई कहता भी नहीं । एक पूरे तरह का नया विज्ञान निश्चित ही आने वाला है । यह दोनों एक साथ होगा - धर्म और विज्ञान । और तब ही यह पूर्ण हो सकता है । यह अंतस और बाह्य दोनों का विज्ञान होगा । सच तो यह है कि धर्म के दिन पूरे हुए । सिर्फ विज्ञान काफी है । एक ही शब्द से काम चल जाएगा । 'विज्ञान - सुंदर शब्द है । इसका मतलब है - जानना, विवेक ।
विज्ञान को दो श्रेणियों में बाँटना है - विषयगत विज्ञान - रसायन शास्त्र, भौतिकशास्त्र, गणित, इत्यादि इत्यादि । और आत्मपरक विज्ञान । और तब धर्म और विज्ञान को बाँटने की जरूरत नहीं है । और धर्म और विज्ञान का मिलन पहली बार पूर्ण मानव का निर्माण करेगा । अन्यथा मानवता आज तक खंडित रही है । बँटी हुई । विक्षिप्त । विभाजित रही है । मैं संपूर्ण मानव के लिए हूँ । क्योंकि मेरे अनुसार संपूर्ण मानव ही पवित्र मानव हैं । ओशो
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