30 अप्रैल 2012

राजीव जी ! आपको तो कोई याद ही नहीं करता

राजीव जी ! आपके श्रीराम शर्मा विवेकानन्द कबीर labels के दोनों  blogs पढे । मुझे तो इतनी बात पर सहमति है कि साधक की आस्था ही पदार्थों में जीवन्त प्राण रूपी करिश्मा पैदा करती है । रैदास कबीर रामकृष्ण जी ने अपनी साधना तपश्चर्या व कृतित्व से देश काल दिशा को हिला दिया । फ़िर गायत्री की उपासना से विश्वामित्र जी ने बृह्म ऋषित्व को प्राप्त किया । स्वामी दयानन्द जी ने पाखण्ड को समाप्त किया । गायत्री की साधना से वशिष्ठ जी राजकुल गुरु बन कर राम लक्ष्मण को बला अतिबला विध्या सिखायी । जिससे सीता स्वयवर में परुशराम जी का प्रखर कोप शान्त किया । सीताजी को वरन करने में सैकङों राजाओं को पीछे हटना पङा । रावण को ओज तेज वर्चस्व से जीता । ये सब त्रिपदा गायत्री की फ़लश्रुति है । आचार्य जी ने 24 yrs गायत्री पुरश्चरण करके आर्ष साहित्य का भास्य किया । देश की आजादी में दुर्धर संघर्ष किया । अध्यात्म व बिज्ञान को समन्वित किया । जिससे भारत के राष्ट्रपति शंकरदयाल जी ने अपनी पुस्तक देशमणि में  18 देश रत्नों में उनका उल्लेख किया । राजीव जी ! आपको तो कहीं याद करते नहीं देखा । नुक्ताचीनी करना सरल है । अपनी  personality से देश का लोक नेतृत्व करना कठिन है - राजीव दादा ।
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राजीव जी ! मेरे गुरु को तो आप छींटाकशी करोगे । क्योंकि आपको गुण ग्राहकता पसन्द नहीं । बल्कि छिद्रान्वेषण में माहिर हो । रही बात तोतापुरी जी की । मैंने जो कहा । वही आप कह रहे हो कि - वे वेदान्त गुरु रामकृष्ण जी के थे । प. श्रीराम जी के बारे में तो मेरे कहने से नहीं । बल्कि GOVT OF INDIA आज नारी उत्थान की बात व  PROGRAME चलाती है । वो उन्होंने 1939 से अखण्ड ज्योति में 21st century - नारी शताब्दी " घोषित ही नहीं किया । बल्कि नारी उत्थान के सूत्र व कार्यकृम भारत में चलाने शुरू किये । पायलट बाबा की पुस्तक - हिमालय  कह रहा है । में आचार्य श्रीराम जी के बारे में पढ लेना कि - वे क्या थे ? ज्ञान फ़ैलाना ही पुस्तक बेचना मान रहे हो । ये आपकी समझ । बाकी आज आस्था संकट तो सद विचारों के फ़ैलाव से ही दूर होगा । जिसमें doctors lawyers  judges engineers  professor level के लाखों प्रबुद्ध लोग समय दान दे रहे हैं । वे सब पागल हैं क्या ? आप ही एक समझदार हो । जो गायत्री को अर्थात सदबुद्धि से परहेज व अंग्रेजों की तरह देव संस्कृति से नफ़रत करते हो । आपको तो chhikago में जन्म लेना था । जो भारत की संस्कृति को भी ओछी मानते हो । आपकी  बौद्धिकता तो परले दर्जे की हो गयी । जिसे हम भारतीय नहीं समझ पायेंगे ।
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सबसे पहले तो आप शास्त्रों का झूठा झंझट छोङकर अगर
गायत्री का वास्तविक परिचय जानना चाहें । तो कवीर वाणी अनुराग सागर पढें । या फ़िर मेरे ब्लाग में ही लेख देखें । ये सही है कि श्रीराम शर्मा को गायत्री तक का पूर्ण ज्ञान था । वो भी आंतरिक स्तर पर । पर वह परमात्म ज्ञान या आत्म ज्ञान नहीं है । गायत्री.. आध्या ( काल निरंजन की पत्नी ) द्वारा उत्पन्न की गयी थी । ये बृह्मा की पत्नी हुयी । इसको आध्या ने शाप दिया है । बाकी आपने राम वशिष्ठ आदि का जो उदाहरण दिया । वह लगभग सफ़ेद झूठ है । पर उसको साबित करने में मुझे बहुत कुछ समझाना होगा । जो सम्भव नहीं है ।
अब आपके राष्ट्रपति शंकरदयाल जी के बिन्दु पर बात करते हैं । वर्तमान राष्ट्रपति प्रतिभा ( जी ) पाटिल बृह्मकुमारी को मानती हैं । अभी शायद आपको न मालूम हो । मशहूर हालीवुड एक्ट्रेस जूलिया राबर्टस सिर्फ़
बाबा नीम करोरी के फ़ोटो से इतना प्रभावित हुयी कि उसने हिन्दू धर्म अपना लिया । और भारत मेंं एक घर लेना चाहती है । चाहती क्या है । लेगी । अभी निर्मल बाबा के बारे में बात खुलने पर सैकङों पुलिस वकील आदि के ऐसे लोग सामने आये । जो दस बन्द आदा करते थे । सबके बाद भी । आज भी आशाराम को मानने वाले उच्च लोग भी बङी तादाद में हैं । ताजा ताजा बाबा रामदेव का मामला देखें । % कम हो गया । पर मानने वाले आज भी हैं । ओशो को देखें । उन्हें भगवान मानने वाले अभी भी लाखों में हैं । फ़्राड वाला साईं बाबा । जो अभी अभी मरा । इसके बाबजूद अभी भी उसके मानने वाले बहुत बङी संख्या में होंगे । अमिताभ बच्चन को देखें । सपरिवार घर से 15 km पैदल बिना चप्पल विनायक मन्दिर के दर्शन और 51 लाख का चैक चढाना । एकता कपूर को देखें । उसके बाथरूम में भी शायद गणपत की मूर्ति रखी हो । इस भेङ जनता में तमाम लोग तो ऐसे हैं । जो भागवत कथा वाचकों को गुरु मान लेते हैं । उन्हें गुरु शब्द का मतलब ही नहीं पता ? इसके अलावा सैकङों ऐसे जाने अनजाने बाबा हैं । जिनसे हजारों की संख्या में लोग जुङे हैं ।
लेकिन ? इन सबकी कहानी 1 ही है । अज्ञान । धर्मभीरुता । इसलिये सबसे बङा उदाहरण मैंने अमिताभ बच्चन । एकता कपूर और जूलिया राबर्ट का दिया । जब इनके स्तर के मनुष्य धर्म के मामले में एकदम अज्ञानी हो सकते हैं । तो फ़िर बाकी के बारे में क्या कहा जाये ? इसलिये कोई राष्ट्रपति । कोई प्रधानमन्त्री । कोई ऐसा अन्य । आवश्यक नहीं कि - धर्म के मामले में भी उच्चता को प्राप्त हो ।
चलिये । आपकी बात पर ही आते हैं । श्रीराम शर्मा ने 1939 से अखण्ड ज्योति में 21st century - नारी शताब्दी " घोषित ही नहीं किया । बल्कि नारी उत्थान के सूत्र व कार्यकृम भारत में चलाने शुरू किये ।.. मुझे बताईये । क्या उत्थान हुआ नारी का ? या इसी उत्थान ? की बात करते थे श्रीराम शर्मा ? सच तो ये है । नारी और नर छोङो । आज मनुष्य मात्र बेहद पतन की दशा में है । अगर आप गौर करें । तो आज के तुलनात्मक 1939 में नारी और मनुष्य की स्थिति आज से बहुत अच्छी थी । और जीवन बेहद सुखी था । निरोगता थी । श्रीराम को ये दिखाई नहीं दिया । श्रीराम शर्मा की शुरूआत दीवालों पर - हम बदलेगें । युग बदलेगा । नारे पोतने के साथ शुरू हुयी थी । आज कितना समय हो गया । न हम बदले । न युग बदला ।  सच तो ये है । उस समय गायत्री परिवार की जैसी हवा चली । उसके तुलना में आज 10% भी बात नहीं रही । मुझे मालूम है । अपनी शुरूआत में श्रीराम शर्मा मथुरा से अखण्ड ज्योति मासिक पत्रिका छापते थे । उनका पुराना वाला छापाखाना भी था । उन्होंने अपनी पत्नी से सभी जेवर लिये । और हरिद्वार के खादर में बेहद सस्ती भूमि खरीदी । बहुत छोटे स्तर पर शान्तिकुंज की स्थापना की । जो इतना
अधिक इसीलिये और फ़ैला कि - वह ( हरिद्वार ) साधुओं का मार्केट है । वरना शर्मा जी बहुत समय मथुरा भी रहे । अब आपको एक और बात । बिलकुल सच्ची बताऊँ । आँवलखेङा और आसपास के कई लोगों से मेरा मिलना होता है । मैंने कहा - आप लोग श्रीराम शर्मा को मानते होंगे । उन्होंने कहा - नहीं । लोकल में उनका प्रभाव बहुत मामूली है । जङ समाधि वाले पायलट बाबा और श्रीराम शर्मा आपस में स्टाफ़ के आदमी हैं । ये दोनों द्वैत ज्ञान वाले हैं ।
लेकिन छोङिये । ये सब बातें । आपने आपत्ति शुरू की । मेरे द्वारा काली को राक्षसी कहने पर । मैंने तर्क दिया । जाने कब से जिस देवी के मन्दिर में पूजा में नर बलि पशु बलि का चलन है । वह किस एंगल से दयालु देवी कही जा सकती है ? अगर उसकी पूजा में कोई दम है । तो क्यों नहीं इन भटके लोगों को रास्ता दिखाती ? पर आपको इस सटीक मानवीय बात का कोई जबाब नहीं सूझा ।
फ़िर आपने श्रीराम शर्मा को - कबीर । रामदास । रामकृष्ण के बाद का चौथा जन्म बताया । उस पर दिये गये मेरे तर्कों पर आप ध्यान न देकर दूसरी ही बात कहने लगे । जबकि बात आपने ही शुरू की । आपने ही श्रीराम और कबीर में कोई फ़र्क ही न समझा ? फ़िर मैंने और भी तर्क के रूप में कई झूठ बताये । उन पर आप मौन क्यों रहे ? चलिये । अब सबसे बङी बात । आपके गुरु ने 3200 पुस्तकें लिखी । ध्यान की तकनीकी आंतरिकता पर लिखे गये मेरे लेखों जैसा कोई 1 ही लेख दिखा दो । मैंने अभी अभी चैलेंज किया । मनोबैज्ञानिक धरातल पर लिखी मेरी कहानी " कामवासना " जैसी 1 भी नयी या पहले ( कभी की किसी की ) की कहानी दिखाओ । मैं ये भी कहता हूँ । किसी में ताकत हो । तो लिख कर दिखायें । ओमियो तारा का MATTER मुझे कहीं और दिखाओ ।
अब रही बात इस बात की - राजीव जी ! आपको तो कहीं याद करते नहीं देखा ?
ये आप अपनी बुद्धि से कह रहे हैं । मुझे विश्व भर में इतने लोग याद करते हैं कि उस तरह ? सलमान खान को भी याद नहीं करते होंगे । अद्वैत के लगभग 8 साल मुझे आसपास के ही लोग घेरे रहे । हमारे मण्डल से बहुत लोग जुङे । अचानक 2 साल से कुछ अधिक हुये । मैंने ब्लाग बनाया । तब यहाँ से बहुत लोग जुङे । सच ये है कि विधिवत अभी भी हमारा आश्रम शुरू नहीं हुआ । इस तरह औरों की तुलना में बहुत लोग हमसे जुङे हुये हैं । 
बाकी समाचारों के लिये बस थोङा ही इंतजार और करें । और तब तक ये महत्वपूर्ण ज्ञान पढिये । अगर इसे समझ गये । तो इसमें बहुत बङा रहस्य लिखा है । रामचरित मानस उत्तर काण्ड से ।
नर सहस्र महँ सुनहु पुरारी । कोउ एक होई धर्म ब्रतधारी  ।   
धर्मसील कोटिक महँ कोई । बिषय बिमुख बिराग रत होई ।
हे त्रिपुरारि ! सुनिये । हजारों मनुष्यों में कोई 1 धर्म के वृत का धारण करने वाला होता है । और करोड़ों धर्मात्माओं में कोई 1 विषय से विमुख ( विषयों का त्यागी ) और वैराग परायण होता है ।
कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई । सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई ।
ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ । जीवन मुक्त सकृत जग सोऊ ।
श्रुति कहती है कि - करोड़ों विरक्तों में कोई 1 ही सम्यक ( यथार्थ ) ज्ञान को प्राप्त करता है । और करोड़ों ज्ञानियों में कोई 1 ही जीवन मुक्त होता है । जगत में कोई विरला ही ऐसा ( जीवन मुक्त ) होगा ।
तिन्ह सहस्र महु सब सुख खानी । दुर्लभ बृह्म लीन बिग्यानी ।
धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी । जीवन मुक्त ब्रह्म पर प्रानी ।
हजारों जीवन मुक्तों में भी । सब सुखों की खान । बृह्म में लीन विज्ञान वान पुरुष और भी दुर्लभ है । धर्मात्मा । वैराग्यवान । ज्ञानी । जीवन मुक्त और बृह्मलीन ।
सब ते सो दुर्लभ सुर राया । राम भगति रत गत मद माया ।
सो हरि भगति काग किमि पाई । बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई ।
इन सबमें हे महादेव ! वह प्राणी अत्यंत दुर्लभ है । जो मद और माया से रहित होकर राम की भक्ति के परायण हो । हे विश्वनाथ ! ऐसी दुर्लभ हरि भक्ति को कौआ कैसे पा गया । मुझे समझा कर कहिये ।
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