13 जून 2016

नारी तू नारायणी - किंजल द ग्रेट

फ़ेसबुक पर निम्न दो अपडेट देखकर इस साहसिक, प्रेरणास्प्रद जीवन चरित और परमार्थिक भावों से ओतप्रोत घटना को ब्लाग पर प्रकाशित किये बिना न रह सका ।  
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फैजाबाद ! गर्दिश में दो चार फुटपाथ पर सब्जी बेचकर जीवन के तल्ख दौर से गुजर रही बेवा मोना की जिन्दगी में जिलाधिकारी किंजल सिंह उजास बनकर देवदूत की तरह शामिल हुईं ।
सराय पोख्ता मस्जिद की व्यवस्था देखने के लिए अचानक सब्जी मण्डी चौक में पहुँची किंजल सिंह की नजर वृद्धा मोना की जर्जर हालत पर पड़ी । जो सब्जी बेच रही थी ।
किंजल सिंह मोना के पास पहुँची और करेले का भाव पूछा । एक किलो करेला लिया । जिसकी कीमत 50 रूपये थी । परन्तु उसके एवज में उन्होंने मोना को 1550 रूपये दिया और घर का अता-पता हालचाल पूछकर चली गयीं ।
यह वाकया सोमवार संध्याकाल करीब 7 से 8 के मध्य का है ।
जिलाधिकारी करेला खरीदकर चली गयीं और 1550 रुपये पाकर बेवा मोना सुनहरे ख्वाब बुनते हुए ककरही बाजार स्थित अपने टीनशेड के घर जा पहुँचीं । और अपनी 17 वर्षीय नातिन रीतू पुत्री रामसुरेश मूल निवासिनी कन्हई का पुरवा हांसपुर, जो अपनी नानी की देखरेख के अलावा परमहंस डिग्री कालेज अयोध्या में बीए प्रथम वर्ष में अध्ययन कर रही है को सारा वाकया बताया । खाना पकाकर पंखा झलते हुए नानी नातिन सोने की तैयारी करने लगीं ।
रात्रि के लगभग 11 बजे थे । तभी कई गाड़ियां बेवा मोना के घर के सामने आ रूकीं । इन गाड़ियों में चिकित्सकों की भी एक टीम थी । जिलाधिकारी किंजल सिंह व सरकारी अमला मोना के घर पहुँचा । वहाँ की दशा देख उनका दिल पसीज गया ।

जिलाधिकारी किंजल सिंह ने मौके पर मौजूद जिलापूर्ति अधिकारी दीपक शरण वार्ष्णेय को निर्देशित किया कि तत्काल मोना को 5 किलो अरहर की दाल, 20 किलो आटा, 50 किलो गेंहू और 40 किलो चावल उपलब्ध कराओ । जब तक राशन आ नहीं जाता, मैं यहीं रहूंगी । 
किंजल सिंह का फरमान सुन डीएफओ के तोते उड़ गये । कोटेदारों की दूकाने रात में बन्द हो चुकी थीं । डीएसओ के एक शुभचिन्तक ने सलाह दी कि कंधारी बाजार का कोटेदार राकेश गुप्ता की बहुत बड़ी राशन की दूकान है । उसी से सारे सामान मंगवा लें । डीएसओ साहब गाड़ी पर सवार होकर कोटेदार राकेश की दूकान पर पहुँचे । इतना सामान राकेश देने में जब असमर्थता जताने लगे । तो पड़ोस के कोटदार आनन्द गुप्ता को भी तलब कर लिया गया । दोनों कोटेदारों ने डीएम की मंशा के अनुरूप राशन डीएसओ की गाड़ी में भरवाया । और डीएमओ ने उसे ले जाकर मोना के हवाले कर दिया । तब तक रात्रि के 12 बज चुके थे । और डीएम साहिबा मौके पर थीं ।
डीएम किंजल सिंह की उदारता यहीं थमी नहीं । उन्होंने एसडीएम दीपा अग्रवाल को निर्देशित किया कि सुबह होते ही मोना को एक टेबल फैन, उज्जवला योजना के तहत एलपीजी सिलेंडर मय चूल्हा, तख्त, दो साड़ी और चप्पल उपलब्ध करा दिया जाय । 
एडीएम व एसडीएम ने मिलकर यह मांग मंगलवार की सुबह ही पूरा कर दिया । जाते जाते 75 वर्षीय मोना से वादा कर गयीं कि खाना पकाने का बर्तन, पानी पीने के लिए एक हैण्डपम्प और रहने के लिए आवास का निर्माण सरकारी खर्चे से कराया जायेगा ।
डीएम की इस उदारता से जहाँ बेवा मोना व नातिन रीतू फूली नहीं समा रही हैं । वहीं शहर के नुक्कड़ चौराहों के टी स्टालों पर डीएम की उदारता की चर्चाएं आम हो गयी हैं ।
लोग यहाँ तक कह रहे हैं कि काश डीएम साहिबा मेरे घर आ जातीं । तो कम से कम उज्जवला के तहत हमें भी एलपीजी सिलेंडर व चूल्हा ही मिल जाता ।
वाह ....! काश समस्त प्रशासन ऐसा ही संवेदनशील हो जाए । और हम खुलकर उनका साथ दें ।
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फ़ैज़ाबाद की डीएम किंजल सिंह और उनके परिवार की कहानी बहुत ही भावुक और दर्दनाक है । किंजल सिंह 2008 में आईएएस में चयनित हुईं थी । आज उनकी पहचान एक तेज़ तर्रार अफ़सर के रूप में होती है । उनके काम करने के तरीके से जिले में अपराध करने वालों के पसीने छूटते हैं । लेकिन उनके लिए इस मुकाम तक पहुंचना बिलकुल भी आसान नही था ।
किंजल सिंह मात्र 6 महीने की थी । जब उनके पुलिस अफ़सर पिता की हत्या पुलिस वालों ने ही कर दी थी ।
आज देश में बहुत सी महिला आईएएस हैं । लेकिन वो किंजल सिंह नहीं है । उनमें बचपन से ही हर परिस्थितियों से लड़ने की ताक़त थी । 1982 में पिता केपी सिंह की एक फ़र्ज़ी एनकाउंटर में हत्या कर दी गयी थी । तब केपी सिंह, गोंडा के डीएसपी थे । अकेली विधवा माँ विभा सिंह ने ही किंजल और बहन प्रांजल सिंह की परवरिश की । उन्हे पढ़ाया लिखाया और आइएएस बनाया । यही नही करीब 31 साल बाद आख़िर किंजल अपने पिता को इंसाफ़ दिलाने में सफल हुई । उनके पिता के हत्यारे आज सलाखों के पीछे हैं । लेकिन क्या एक विधवा माँ और दो मासूम बहनों के लिए यह आसान था ।
मुझे मत मारो, मेरी दो बेटियां हैं -
किंजल के पिता के आख़िरी शब्द थे कि ‘मुझे मत मारो मेरी छोटी बेटी है’ । वो ज़रूर उस वक़्त अपनी चिंता छोड़ कर अपनी जान से प्यारी नन्ही परी का ख्याल कर रहे होंगे । किंजल की छोटी बहन प्रांजल उस समय गर्भ में थी । शायद अगर आज वह ज़िंदा होते । तो उन्हे ज़रूर गर्व होता कि उनके घर बेटियों ने नहीं बल्कि दो शेरनियों ने जन्म लिया है ।
बचपन जहाँ बच्चों के लिए सपने संजोने का पड़ाव होता है । वहीं इतनी छोटी उम्र में ही किंजल अपनी माँ के साथ पिता के क़ातिलों को सज़ा दिलाने के लिए कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने लगी । हालाँकि उस नन्ही बच्ची को यह अंदाज़ा नही था कि आख़िर वो वहाँ क्यों आती हैं । लेकिन वक़्त ने धीरे धीरे उन्हे यह एहसास करा दिया कि उनके सिर से पिता का साया उठ चुका है ।
इंसाफ़ दिलाने के संघर्ष में जब माँ हार गयी कैंसर से जंग -
प्रारंभिक शिक्षा बनारस से पूरी करने के बाद, माँ के सपने को पूरा करने के लिए किंजल ने दिल्ली का रुख किया तथा दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला लिया । बच्ची का साहस भी ऐसा था कि छोटे से जनपद से दिल्ली जैसी नगरी में आकर पूरी दिल्ली यूनिवर्सिटी में टॉप किया । वो भी एक बार नहीं बल्कि दो बार । किंजल ने 60 कॉलेजेस को टॉप करके गोल्ड मैडल जीता ।
कहते हैं ना - वक़्त की मार सबसे बुरी होती है । जब ऐसा महसूस हो रहा था कि सब कुछ सुधरने वाला है । तो जैसे उनके जीवन में दुखो का पहाड़ टूट पड़ा । माँ को कैंसर हो गया था । एक तरफ सुबह माँ की देखरेख तथा उसके बाद कॉलेज । लेकिन किंजल कभी टूटी नहीं । परन्तु ऊपर वाला भी किंजल का इम्तहान लेने से पीछे नहीं रहा । परीक्षा से कुछ दिन पहले ही माताजी का देहांत हो गया ।
शायद ऊपर वाले को भी नहीं मालूम होगा कि ये बच्ची कितनी बहादुर है । तभी तो दिन में माँ का अंतिम संस्कार करके, शाम में हॉस्टल पहुंचकर रात में पढाई करके सुबह परीक्षा देना शायद ही किसी इंसान के बस की बात हो । पर जब परिणाम सामने आया तो करिश्मा हुआ । इस बच्ची ने यूनिवर्सिटी टॉप किया और स्वर्ण पदक जीता ।
माँ का आइएएस बनने का सपना पूरा किया बेटियों ने -
किंजल बताती हैं कि कॉलेज में जब त्योहारों के समय सारा हॉस्टल खाली हो जाता था । तो हम दोनों बहने एक दूसरे की शक्ति बनकर पढ़ने के लिए प्रेरित करती थी । फिर जो हुआ । उसका गवाह सारा देश बना । 2008 में जब परिणाम घोषित हुआ । तो संघर्ष की जीत हुई और दो सगी बहनों ने आइएएस की परीक्षा अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण कर अपनी माँ का सपना साकार किया ।
किंजल जहाँ आईएएस की मेरिट सूची में 25 वें स्थान पर रही । तो प्रांजल ने 252वें रैंक लाकर यह उपलब्धि हासिल की । पर अफ़सोस उस वक़्त उनके पास खुशियाँ बांटने के लिए कोई नही था । किंजल कहती हैं - बहुत से ऐसे लम्हे आए । जिन्हें हम अपने पिता के साथ बांटना चाहते थे । जब हम दोनों बहनों का एक साथ आईएएस में चयन हुआ । तो उस खुशी को बांटने के लिए न तो हमारे पिता थे और न ही हमारी मां ।
किंजल अपनी माँ को अपनी प्रेरणा बताती हैं । दरअसल उनके पिता केपी सिंह का जिस समय कत्ल हुआ था । उस समय उन्होने आइएएस की परीक्षा पास कर ली थी । और वे इंटरव्यू की तैयारी कर रहे थे । पर उनकी मौत के साथ उनका यह सपना अधूरा रह गया । और इसी सपने को विधवा माँ ने अपनी दोनो बेटियों में देखा । दोनो बेटियों ने खूब मेहनत की । और इस सपने को पूरा करके दिखाया ।
एक कहावत है कि - जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड..यानि देर से मिला न्याय न मिलने के बराबर है । जाहिर है हर किसी में किंजल जैसा जुझारूपन नहीं होता । और न ही उतनी सघन प्रेरणा होती है ।
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