23 जून 2016

परमात्मा से मिलाने का धंधा

एक संन्यासी सारी दुनिया की यात्रा करके भारत वापस लौटा । एक छोटी सी रियासत में मेहमान हुआ ।
उस रियासत के राजा ने जाकर संन्यासी को कहा - स्वामी, एक प्रश्न 20 वर्षो से निरंतर पूछ रहा हूँ । कोई उत्तर नहीं मिलता । क्या आप मुझे उत्तर देंगे ?
स्वामी ने कहा - निश्चित दूंगा ।
संन्यासी ने राजा से कहा - नहीं, आज तुम खाली नहीं लौटोगे । पूछो ।
उस राजा ने कहा - मैं ईश्वर से मिलना चाहता हूँ । ईश्वर को समझाने की कोशिश मत करना । मैं सीधा मिलना चाहता हूँ ।
संन्यासी ने कहा - अभी मिलना चाहते हैं कि थोड़ी देर ठहर कर ?
राजा ने कहा - माफ़ करिए, शायद आप समझे नहीं । मैं परमात्मा की बात कर रहा हूँ । आप यह तो नहीं समझे कि किसी ईश्वर नाम वाले आदमी की बात कर रहा हूँ । जो आप कहते हैं कि अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हो ?
संन्यासी ने कहा - महानुभाव, भूलने की कोई गुंजाइश नहीं है । मैं तो 24 घंटे परमात्मा से मिलाने का धंधा ही करता हूँ । अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हैं । सीधा जवाब दें ।
20 साल से मिलने को उत्सुक हो और आज वक्त आ गया तो मिल लो ।
राजा ने हिम्मत की, उसने कहा - अच्छा मैं अभी मिलना चाहता हूँ । मिला दीजिए ।
संन्यासी ने कहा - कृपा करो, इस कागज पर अपना नाम पता लिख दो । ताकि मैं भगवान के पास पहुँचा दूँ कि आप कौन हैं ।
राजा ने लिखा - अपना नाम, अपना महल, अपना परिचय, अपनी उपाधियां और उसे दीं ।
संन्यासी बोला - महाशय, ये सब बातें मुझे झूठ और असत्य मालूम होती हैं । जो आपने कागज पर लिखीं ।...मित्र, अगर तुम्हारा नाम बदल दें । तो क्या तुम बदल जाओगे ? तुम्हारी चेतना, तुम्हारी सत्ता, तुम्हारा व्यक्तित्व दूसरा हो जाएगा ?

राजा ने कहा - नहीं, नाम के बदलने से मैं क्यों बदलूंगा ? नाम नाम है, मैं मैं हूँ ।
संन्यासी ने कहा - तो एक बात तय हो गई कि नाम तुम्हारा परिचय नहीं है । क्योंकि तुम उसके बदलने से बदलते नहीं । आज तुम राजा हो । कल गांव के भिखारी हो जाओ । तो बदल जाओगे ?
राजा ने कहा - नहीं, राज्य चला जाएगा । भिखारी हो जाऊँगा । लेकिन मैं क्यों बदल जाऊंगा ?
मैं तो जो हूँ हूँ । राजा होकर जो हूँ । भिखारी होकर भी वही होऊंगा ।
न होगा मकान, न होगा राज्य, न होगी धन संपति, लेकिन मैं ? मैं तो वही रहूंगा जो मैं हूँ ।
संन्यासी ने कहा - तय हो गई दूसरी बात कि राज्य तुम्हारा परिचय नहीं है । क्योंकि राज्य छिन जाए । तो भी तुम बदलते नहीं । तुम्हारी उम्र कितनी है ?
उसने कहा - 40 वर्ष ।
संन्यासी ने कहा - तो 50 वर्ष के होकर तुम दूसरे हो जाओगे ? 20 वर्ष या जब बच्चे थे । तब दूसरे थे ?
राजा ने कहा - नहीं । उम्र बदलती है । शरीर बदलता है लेकिन मैं ? मैं तो जो बचपन में था । जो मेरे भीतर था । वह आज भी है ।
संन्यासी ने कहा - फिर उम्र भी तुम्हारा परिचय न रहा । शरीर भी तुम्हारा परिचय न रहा ।
फिर तुम कौन हो ? उसे लिख दो । तो पहुँचा दूँ भगवान के पास । नहीं तो मैं भी झूठा बनूंगा तुम्हारे साथ ।..यह कोई भी परिचय तुम्हारा नहीं है ।
राजा बोला - तब तो बड़ी कठिनाई हो गई । उसे तो मैं भी नहीं जानता फिर ! जो मैं हूँ । उसे तो मैं नहीं जानता ! इन्हीं को मैं जानता हूँ मेरा होना ।
संन्यासी ने कहा - फिर बड़ी कठिनाई हो गई । क्योंकि जिसका मैं परिचय भी न दे सकूं । बता भी न सकूं कि कौन मिलना चाहता है । तो भगवान भी क्या कहेंगे कि किसको मिलना चाहता है ?
तो जाओ पहले इसको खोज लो कि तुम कौन हो ? और मैं तुमसे कहे देता हूं कि जिस दिन तुम यह जान लोगे कि तुम कौन हो ? उस दिन तुम आओगे नहीं भगवान को खोजने ।
क्योंकि खुद को जानने में वह भी जान लिया जाता है । जो परमात्मा है ।
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