08 जून 2016

मुझे मृत्यु का भय नहीं

आदिगुरु शंकराचार्य की जब अपने गुरु से प्रथम भेंट हुई । तो गुरु ने बालक शंकर से उनका परिचय पूछा । शंकर ने अपना जो परिचय दिया । वह परिचय ‘निर्वाण-षटकम’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।

मनोबुद्धि अहंकार चित्तानि नाहं, न च श्रोत्र जिव्हे न च घ्राण नेत्रे ।
न च व्योम भूमि न तेजो न वायु:, चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम । 1 ।
- मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृति नहीं हूँ । न मैं कान, जिह्वा, नाक और आंख हूँ । न मैं आकाश, भूमि, तेज और वायु ही हूँ । मैं चैतन्य रूप हूँ । आनंद हूँ । शिव हूँ..शिव हूँ ।

I am not mind, nor intellect, nor ego, nor the reflections of inner self ( chitta )
I am not the five senses.
I am beyond that, I am not the ether, nor the earth, nor the fire, nor the wind ( the five elements )
I am indeed, That eternal knowing and bliss, the auspicious ( Shivam ) love and pure consciousness.

न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायुः, न वा सप्तधातु: न वा पञ्चकोशः ।
न वाक्पाणिपादौ न च उपस्थ पायु, चिदानंदरूप: शिवोहम शिवोहम । 2 ।
- न मैं मुख्य प्राण हूँ और न ही मैं पञ्च प्राणों ( प्राण, उदान, अपान, व्यान, समान ) में कोई हूँ । न मैं सप्त धातुओं ( त्वचा, मांस, मेद, रक्त, पेशी, अस्थि, मज्जा ) में कोई हूँ और न पञ्च कोशों ( अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनंदमय ) में से कोई, न मैं वाणी, हाथ, पैर हूँ और न मैं जननेंद्रिय या गुदा हूँ । मैं चैतन्य रूप हूँ । आनंद हूँ । शिव हूँ..शिव हूँ ।

Neither can I be termed as energy ( prana ) nor five types of breath ( vayus )
nor the seven material essences, nor the five coverings ( pancha-kosha )
Neither am I the five instruments of elimination, procreation, motion, grasping, or speaking. I am indeed, That eternal knowing and bliss, the auspicious ( Shivam ) love and pure consciousness.


न मे द्वेषरागौ न मे लोभ मोहौ, मदों नैव मे नैव मात्सर्यभावः ।
न धर्मो नचार्थो न कामो न मोक्षः, चिदानंदरूप: शिवोहम शिवोहम । 3 ।
- न मुझमें राग और द्वेष हैं, न ही लोभ और मोह, न ही मुझमें मद है न ही ईर्ष्या की भावना, न मुझमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ही हैं । मैं चैतन्य रूप हूँ । आनंद हूँ । शिव हूँ..शिव हूँ ।

I have no hatred or dislike, nor affiliation or liking, nor greed, nor delusion, nor pride or haughtiness, nor feelings of envy or jealousy
I have no duty ( dharma ) nor any money, nor any desire ( kama ) nor even liberation ( moksha )
I am indeed, That eternal knowing and bliss, the auspicious ( Shivam ) love and pure consciousness

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खं, न मंत्रो न तीर्थं न वेदों न यज्ञः ।
अहम भोजनं नैव भोज्यम न भोक्ता, चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम । 4 ।
- न मैं पुण्य हूँ, न पाप, न सुख और न दुःख, न मन्त्र, न तीर्थ, न वेद और न यज्ञ, मैं न भोजन हूँ, न खाया जाने वाला हूँ और न खाने वाला हूँ । मैं चैतन्य रूप हूँ । आनंद हूँ । शिव हूँ..शिव हूँ ।

I have neither merit ( virtue ) nor demerit ( vice ) I do not commit sins or good deeds, nor have happiness or sorrow, pain or pleasure
I do not need mantras, holy places, scriptures ( Vedas ) rituals or sacrifices ( yagnas )
I am none of the triad of the observer or one who experiences, the process
of observing or experiencing, or any object being observed or experienced
I am indeed, That eternal knowing and bliss, the auspicious ( Shivam ) love and pure consciousness


न मे मृत्युशंका न मे जातिभेद:, पिता नैव मे नैव माता न जन्म ।
न बंधु: न मित्रं गुरु: नैव शिष्यं, चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम । 5 ।
- न मुझे मृत्यु का भय है । न मुझमें जाति का कोई भेद है । न मेरा कोई पिता ही है । न कोई माता ही है । न मेरा जन्म हुआ है । न मेरा कोई भाई है । न कोई मित्र, न कोई गुरु ही है और न ही कोई शिष्य, मैं चैतन्य रूप हूँ । आनंद हूँ । शिव हूँ..शिव हूँ ।

I do not have fear of death, as I do not have death
I have no separation from my true self, no doubt about my existence, nor have I discrimination on the basis of birth
I have no father or mother, nor did I have a birth
I am not the relative, nor the friend, nor the guru, nor the disciple
I am indeed, That eternal knowing and bliss, the auspicious ( Shivam ) love and pure consciousness

अहम निर्विकल्पो निराकार रूपो, विभुव्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम ।
सदा मे समत्वं न मुक्ति: न बंध:, चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम । 6 ।
- मैं समस्त संदेहों से परे, बिना किसी आकार वाला, सर्वगत, सर्वव्यापक, सभी इन्द्रियों को व्याप्त करके स्थित हूँ । मैं सदैव समता में स्थित हूँ । न मुझमें मुक्ति है और न बंधन । मैं चैतन्य रूप हूँ । आनंद हूँ । शिव हूँ..शिव हूँ ।

I am al pervasive I am without any attributes, and without any form I have neither attachment to the world, nor to liberation ( mukti )
I have no wishes for anything because I am everything, everywhere, every time, always in equilibrium
I am indeed, That eternal knowing and bliss, the auspicious (Shivam), love and pure consciousness

जगदगुरु शंकराचार्य विरचितं निर्वाण-षटकम सम्पूर्णं
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