06 जून 2016

बीज मन्त्रों से उपचार

बीज मन्त्रों से अनेकानेक रोगों का सफल निदान होता है । आवश्यकता केवल रोग अनुसार प्रभावशाली मन्त्र चुनने और उसका शुद्ध उच्चारण करने की है । बीज के अर्थ से अधिक आवश्यक उसका शुद्ध उच्चारण ही है । 
जब एक निश्चित लय और ताल से मंत्र का सतत जप चलता है तो उससे नाड़ियों में स्पंदन होता है । उस स्पंदन के घर्षण से विस्फोट होता है और ऊर्जा उत्पन्न होती है । जो षटचक्रों को चैतन्य करती है । इस समस्त प्रक्रिया के समुचित अभ्यास से शरीर में प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होते और शरीर की आवश्यकता अनुरूप शरीर का पोषण करने में सहायक हार्मोन्स आदि का सामंजस्य बना रहता है और तदनुसार शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढती है ।
पौराणिक, वेद, शाबर आदि मन्त्रों में बीज मन्त्र सर्वाधिक प्रभावशाली सिद्ध होते हैं । उठते बैठते, सोते जागते उस मंत्र का सतत शुद्ध उच्चारण करते रहें । आपको चमत्कारिक रूप से अपने अन्दर फ़र्क दिखाई देने लगेगा । 
यह ध्यान रखें कि बीज मन्त्रों में उसकी शक्ति का सार उसके अर्थ में नहीं बल्कि उसके विशुद्ध उच्चारण को एक निश्चित लय और ताल से करने में है ।
बीज मन्त्र में सर्वाधिक महत्व उसके बिंदु में है और यह ज्ञान केवल वैदिक व्याकरण के सघन ज्ञान द्वारा ही संभव है । स्वयं देखें कि एक बिंदु के तीन अलग अलग उच्चारण हैं ।
गंगा शब्द ( ang - अं ) ‘ड’ प्रधान है । गंदा शब्द ‘न’ प्रधान है । और गंभीर शब्द ‘म’ प्रधान है । अर्थात इनमें क्रमशः ड, न, और ‘म’ का उच्चारण हो रहा है । 
बीज मन्त्र के शुद्ध उच्चारण में सस्वर पाठ भेद के उदात्त तथा अनुदात्त अन्तर को स्पष्ट किये बिना शुद्ध जाप असंभव है और इस अशुद्धि के कारण ही मंत्र का प्रभाव नहीं होता । इसलिये किसी बौद्धिक व्यक्ति से अपने अनुकूल मन्त्र को समझ परख कर उसका विशुद्ध उच्चारण अवश्य जान लें ।
अपने अनुकूल चुना गया बीज मंत्र जप अपनी सुविधा और समयानुसार किया जा सकता है । इसका उद्देश्य केवल शुद्ध उच्चारण,  एक निश्चित ताल और लय से नाड़ियों में स्पंदन करके स्फोट उत्पन्न करना है ।
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कां - पेट सम्बन्धी कोई भी विकार और विशेष रूप से आंतों की सूजन में लाभकारी ।
गुं - मलाशय और मूत्र सम्बन्धी रोगों में उपयोगी ।
शं - वाणी दोष, स्वप्न दोष, महिलाओं में गर्भाशय सम्बन्धी विकार और हर्निया आदि रोगों में उपयोगी ।
घं - कामवासना को नियंत्रित करने वाला और मारण, मोहन, उच्चाटन आदि के दुष्प्रभाव के कारण जनित रोग विकार को शांत करने में सहायक ।
ढं - मानसिक शांति देने में सहायक । अभिचारिक कृत्यों जैसे मारण, मोहन, स्तम्भन आदि प्रयोगों से उत्पन्न हुए विकारों में उपयोगी ।
पं - फेफड़ों के रोग जैसे टीवी, अस्थमा, श्वास आदि रोग के लिए ।
बं - शुगर, वमन, कफ विकार, जोड़ों के दर्द आदि में सहायक ।
यं - बच्चों के चंचल मन को एकाग्र करने में अत्यंत सहायक ।
रं - उदर विकार, शरीर में पित्त जनित रोग, ज्वर आदि में उपयोगी ।
लं - महिलाओं के अनियमित मासिक धर्म, उनके गुप्त रोग तथा विशेष रूप से आलस्य को दूर करने में उपयोगी ।
मं - महिलाओं के स्तन सम्बन्धी विकारों में सहायक ।
धं - तनाव से मुक्ति के लिए, मानसिक संत्रास दूर करने में उपयोगी ।
ऐं - वातनाशक, रक्तचाप, रक्त में कोलेस्ट्रोल, मूर्छा आदि असाध्य रोगों में सहायक ।
द्वां - कान के समस्त रोगों में सहायक ।
ह्रीं - कफ विकार जनित रोगों में सहायक ।
ऐं - पित्तजनित रोगों में उपयोगी ।
वं - वातजनित रोगों में उपयोगी ।
शुं - आँतों के विकार तथा पेट सम्बन्धी अनेक रोगों में सहायक ।
हुं - प्रबल एंटीबायोटिक है । गाल ब्लैडर, अपच, लिकोरिया आदि रोगों में उपयोगी ।
अं - पथरी, बच्चों के कमजोर मसाने, पेट की जलन, मानसिक शान्ति आदि में सहायक इस बीज का सतत जाप करने से शरीर में शक्ति का संचार होता है ।
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बीज मन्त्रों का चयन खुद न करें । किसी योग्य जानकार की मदद लें । कैसे, कब, कहाँ, क्या करना है ? पूर्ण जानकारी और निर्देशन के बाद, शुद्ध उच्चारण होने पर ही प्रयोग करें । कोई भी शब्द भिन्न प्रकार से उपयोग करने पर भिन्न प्रभाव देती है । अतः सावधानी रखें । 

ओम मोटवानी की वाल से

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

Pranam rajeev bhaiya
Bahut dino se aapne pralay pe koi lekh nahi likha.
Vivek

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