08 जून 2016

चोर के संस्कार

एक ब्राह्मण के घर पुत्र उत्पन्न हुआ । पुत्र उत्पन्न होने पर उसने कुण्डली बनाई और गणना करने के बाद कुछ विचार किया । फ़िर पत्नी से पूछा - क्या जन्म समय ठीक बताया था ? 
उसने कहा - समय तो ठीक बताया था । और आप भी थे ।
फिर पाराशरी, जैमिनी तथा अन्य सिद्धान्तों से गणना की तो फल निकला कि बड़ा होकर लड़का चोर होगा ।
जब इसका चोरी का संस्कार है । तो कुल में भयंकर कलंक लगेगा ।
वहाँ एक महात्मा आते थे । उनके पास जाकर रोने लगा । 
महात्मा बोले - लड़के का चोर बनना तो उसके हाथ में है । पर तू इसको चोर न होने देना । 
ब्राह्मण बोले -  भगवन ! मैंने इसके पूर्व जन्म के संस्कारों का भी अध्ययन कर लिया है । इसके कुछ संस्कार ऐसे हैं कि अनेक जन्मों से चोर बनता चला आ रहा है । इसलिये इसकी प्रवृत्ति फिर से चोरी की ओर होगी ।
महात्मा ने कहा - एक उपाय है । संस्कार बने हैं । तो बिगड़ भी सकते हैं । संस्कारों में रुकावट डाल दो । जैसे भोजन करने दो चार व्यक्ति के साथ बैठे हैं । और कुल्हड़ ( पानी पीने का पात्र ) से जूठा पानी बहकर पड़ोसी के पत्तल की तरफ बहने लगता है । तो एक लकीर खींचकर पानी की धारा दूसरी तरफ निकाल देते हैं ।
वैसे ही इसके संस्कारों का ढलान चोरी की तरफ है । यदि तुम दूसरी तरफ लकीर खींच दोगे । तो यह बच जायेगा । इसको शास्त्र का सम्यक अध्ययन कराना जरूरी है ।
लड़का बड़ा हुआ । और वह ब्राह्मण उसको अध्ययन कराने लगा । ठीक तरह से शास्त्रों का अध्ययन कराया और विशेषकर चोरी के जितने पाप लगते हैं । विस्तार से उसको ज्ञान करा दिया और शास्त्रों द्वारा ही उसके मन में निश्चय करा दिया कि चोरी करना बुरा है । 
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लड़का जब बीस वर्ष का हुआ । संस्कारवश दो चार चोर साथी भी मिल गये । फ़िर एक दिन निर्णय किया कि आज रात्रि राजा भोज के यहाँ चोरी करेंगे ।
ब्राह्मण पुत्र से कहा - तू वहाँ चोरी करना । हम बाहर सावधानी से खड़े रहेंगे ।
वह अन्दर पहुँच गया । तिजोरी खोली । बड़े बड़े हीरे पड़े हुए थे । पर ज्यों ही चोरी करने लगा । तो खयाल आया कि हीरे चुराने से अमुक नरक में जाना पड़ता है । इन्हें छोड़ दो । फिर सोने की चोरी करने लगा । तो याद आया स्वर्णस्तेय तो पञ्च महापातकों में से हैं । इसलिये इसको भी छोड़ दो । इस प्रकार चार घंटे बीत गये । चोरी कर रहा था । लेकिन समझ में नहीं आ रहा था कि वह किस वस्तु को चुराये । 
जब साढ़े तीन बजे का समय हुआ । तो भोज ब्रह्ममुहूर्त में उठकर परमेश्वर चिन्तन करते थे । अतः चोर बेचारा क्या करता । राजा को उठते देखकर वह पलंग के नीचे छिप गया ।
भोज के नित्यकर्म की सामग्री जब प्रस्तुत की जा रही थी । तो स्वभावतः एक श्लोक की रचना हो गई । श्लोक के तीन चरण बन गये ।
चेतोहरा युवतयो सुहृदोनुकूलाः । 
सद्वान्धवाः प्रणति गर्भगिरश्चभृत्याः । 
गर्जन्ति दन्ति निवहाः तरलास्तुरंगाः ।  
- मैं धन्य हूँ । मेरी रानियां बड़ी सुन्दर, आज्ञाकारिणी हैं । सब बान्धव और पुत्र अच्छे हैं । मुझे सारा सुख प्राप्त है ।
अभी तीन पंक्तियां बना पाये थे कि नहाने का पानी आ गया । चौथी पंक्ति नहीं बनी थी । अतः तीन पंक्तियों को उन्होंने खड़िया से दरवाजे पर लिख दिया । और स्नान करने चले गये । 
ब्राह्मण पुत्र ने केवल चोरी का ही शास्त्र नहीं पढ़ा था । सोचा कि श्लोक के जो तीन चरण राजा ने बनाये हैं । इन्हें पूरा कर देना चाहिये । राजा चले गये । तो उसने चौथा चरण लिख दिया ।
सम्मीलिते नयनयोर्नहि किञ्चिदस्ति । 
- जिन सब चीजों को पाकर धन्य मान रहा है । आँखें मुंदते ही यह सब कुछ नहीं रहेगा । 
लिखकर वह भागना चाहता था । पर सब लोग जग गये थे ।
राजा ने स्नान से आते ही पूछा - यह किसने लिखा ?
चारों तरफ पूछा । किसी को पता न चला । ढूंढ़ने पर एक जगह चोर छिपा मिला ।
उसको पकड़ कर पूछा - तू किसलिये आया ? 
उसने कहा - चोरी करने । 
- कब ? 
- रात्रि बारह बजे । 
- अब तो चार बजे हैं । अब तक चोरी क्यों नहीं की ?
- जिस पदार्थ को चोरी करने जाता था । उसी में पाप नजर आता था । अतः चोरी नही कर पाया ।
- श्लोक की पूर्ति तुमने की ?
- हाँ ।
उसके पिता को बुलाया तो पिता ने सारी घटना भोज को समझा दी कि इसके अन्दर चोरी के संस्कारों की प्रबलता थी । मैंने इसे शास्त्रों के अध्ययन से दृढ़ निश्चय करा दिया कि चोरी के अन्दर क्या क्या पाप हैं । संस्कारों के कारण इसकी चोरी करने की प्रवृत्ति तो हुई । लेकिन पूर्व में शास्त्र अध्ययन होने से वह हट गई । और चोरी न कर पाया । 
राजा ने प्रसन्न होकर उसे छोड़ दिया और इतना धन दिया चोरी की प्रवृत्ति ही न रहे । सुख से जीवनयापन कर सके ।
भोज  प्रबन्ध ( ग्रन्थ से ) 
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