10 सितंबर 2013

मरौ मरण है मीठा

नहीं; जे जानति ते कहति नहिं, कहत ते जानति नाहिं । इसलिये जो कहता हो कि मैं तुम्हें ईश्वर जना दूंगा । सावधान हो जाना । तुम्हें धोखा दिया जायेगा । तुम्हें शब्द पकड़ा दिये जायेंगे । जो कहता हो कि मैंने जान लिया है उसे । उसका दावा घातक सिद्ध होगा । उसे जाना नहीं जाता । जो उसे जानता है । वही हो जाता है । जो उसे जानता है उसमें । और जो जाना जाता है उसमें । भेद नहीं रह जाता । वहां ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय । ऐसे खंड नहीं होते । वहां ज्ञाता ज्ञेय में लीन हो जाता है । वहा ज्ञेय ज्ञाता में लीन हो जाता है । इसलिये उसे अगम्य कहते हैं । उसकी फिर थाह नहीं मिलती । थाह लेने वाला ही खो गया ।
हेरत हेरत हे सखी, रहा कबीर हिराइ ।
बसती न सुन्यं सुन्यं न बसती अगम अगोचर ऐसा ।
गगन सिषर महि बालक बोले ताका नांव धरहुगे कैसा ।
और जब कोई इस अगम्य को झेलने को राजी हो जाए । जब कोई इस अगम्य में उतरने का साहस जुटा लेता है । वही साहस का नाम है ।
मरौ वे जोगी मरौ । मरौ मरण है मीठा ।
तिस मरणी मरौ । जिस मरणी गोरख मरि दीठा ।
मिट जाओ । मर जाओ । तो दिखाई पड़े । तो मिलन हो । खो जाओ । तो खोज पूरी हो जाये । तो उसके भीतर मस्तिष्क की एक नयी अभिव्यंजना होती है । ओशो
एक टिप्पणी भेजें

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Follow by Email