02 सितंबर 2013

जो है नाम वाला उसके ही सब नाम हैं

शायद आपने इस छोटी सी मगर बेहद महत्वपूर्ण बात पर कभी गौर नहीं किया होगा कि इस अखिल सृष्टि में किसी भी वस्तु, जीवधारी या शक्ति महाशक्ति के पास अपना एक मुक्त नाम तक नहीं होता । फ़िर अस्तित्व की तो बात ही दूर है । जितने भी नामकरण इस सृष्टि में हैं । वे उस अस्तित्व की किसी न किसी गुण या क्रिया का ही बोध कराते हैं । आप हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आदि आदि कोई भी नाम ले लें । इस नियम से बाहर नहीं जा सकता । उदाहरण के लिये राकेश राका + ईश से बना है । जो पूर्णिमा की रात्रि ( राका ) के स्वामी ( ईश ) चन्द्रमा के लिये प्रयुक्त होता है । अशोक शब्द यानी शोक रहित अस्तित्व । शोकों से भरी हुयी सीता ठहराई गयी अशोकों में । बङी रहस्यमय पंक्ति है ये । इसी तरह रजनी रात के लिये । और रात अंधेरे के लिये । और अंधेरा प्रकाश रहित स्थिति के लिये कहा जाता है । देखा आपने मूल अपना कुछ है ही नहीं । इस तरह आप किसी भी शब्द के अर्थ में जायें । तो वह किसी गुण या क्रिया को ही दर्शाता होगा । जैसे बहु प्रचलित भगवान शब्द को ही ले लें । भग योनि ( प्रकृति ) को कहते हैं । और वान का अर्थ उसके होने से होता है । जैसे धनवान बलवान गाङीवान आदि । तो किसी भी योनि विशेष का द्योतक होने पर उसे उसका भगवान कहा जाता है । जैसे विष्णु भगवान का अर्थ खोजेंगे । तो देवयोनि में होना निकलेगा । अब बहुत से लोग इसको पचा नहीं पाते । और भगवान का मतलब उनके लिये कोई अजूबा या अफ़लातून ही होता है । वरना भक्त भगवान , सन्त भगवान , राम भगवान आदि का अर्थ यही है कि वह अस्तित्व किसी गुण विशेष आधारित योनि ( प्रकृति ) से जुङा है । ईश्वर शब्द का मतलब मैं बता ही चुका हूँ । 

कोई भी भाषा हो । धर्म हो । देश हो । काल हो । व्यक्ति हो । आपको उसकी स्वतंत्र सत्ता को दर्शाता हुआ कोई शब्द ( नाम ) नहीं मिलेगा । चाहे आप कितना ही जोर लगा लें । वस्तुओं पर देखें । दूरदर्शन ( दूरस्थ को दिखाने का यंत्र ) कम्प्यूटर यानी संगणक मतलब विभिन्न तरीकों की गणना करने वाला । गृह ( घर ) या गृह-ण मतलब वस्तु ( ओं ) विशेष को रखने व्यवहार करने का स्थान । अतः किसी भी वस्तु या क्रिया के मूल शब्द और उनका सही अर्थ पता न होने से भले ही आप किसी शब्द पर स्पष्ट निष्कर्ष न निकाल पायें । पर जब आप उसका शोधन करेंगे । तो यही सत्य सामने आयेगा कि वह किसी गुण को ही दर्शाता है । जैसे बृह्मा शब्द । बृह्म ( सृष्टि ) का कर्ता पुरुष - बृह्मा । अब कोई एक खास ऐसा नहीं कह सकता कि वह ही बृह्मा है । जो भी सृष्टि कर रहा है । वह बृह्मा ही है । जो पालन कर रहा है । वह विष्णु है । और जो संहारक है । वह शंकर है । अब इन गुण आधारित संज्ञाओं से आपको किसी व्यक्ति ( या अस्तित्व ) विशेष का भृम हो सकता है । क्योंकि स्थूल ज्ञान में आपको यह एक नाम जैसे लगते हैं । खुद नाम शब्द किसी भी गुण या स्थिति को ही दर्शाता है । पर जब आप इनका विच्छेदन करेंगे । तो ये प्रकृति के अलग अलग तत्वों को ही दर्शायेगा । क्योंकि जब आप इनकी तह में जायेंगे । तो विष्णु सत ( जीव सार या ऊर्जा ) बृह्मा ( रज या दोनों गुण सत और तम के मिश्रण से क्रियाशीलता । क्योंकि रज का अर्थ ही चेतन और जङ का संयोग है । र - चेतन । ज - जङ ) इसी तरह शंकर तम ( अंधकार या विनाशक स्थिति ) अब यही अखिल सृष्टि में हो रहा है । आप ऊर्जा लेते ( या उत्पन्न करते ) हैं । उससे क्रिया करते हैं । और क्रिया के बाद उस

पदार्थ और ऊर्जा का क्षय उसे नष्ट ( तम ) कर देता है । आप तीन गुणों से यही तो खेल खेल रहे हैं । बस इनके अधिपति पुरुषों के स्तर में स्थिति अनुसार शक्ति सीमा और काल का अन्तर हो जाता है ।
श्री महाराज जी कहते हैं - जो बना है । वह निश्चित बिगङेगा । जिसका जन्म हुआ है । उसकी मृत्यु भी निश्चित होगी ।
तब आप इस बात पर गौर करें । सबसे पहले आत्मा में जो भाव पैदा हुआ । वो अहम यानी मैं का था - कोहम ? अब वह था तो पहले से ही । पर उसने सोचा - मैं कौन हूँ ? अब जब वो खुद ही से पूछ रहा है । और दूसरा कोई है नहीं । तो मतलब क्या हुआ । खुद उसे पता नहीं है । और दूसरा कोई बताने वाला है नहीं । और जब खुद के ही बारे में पता नहीं था । फ़िर नाम भी क्या होता ? क्योंकि नाम या तो वह स्वयं रख लेता । या कोई दूसरा रखता । इसलिये सन्त मत में आत्मज्ञान की तरफ़ बढते हुये एक स्थिति " अनामी " पुरुष की आती है । ये बङी ही ऊँची और दुर्लभ स्थिति है ।
अब थोङा अलग हटकर बात करते हैं । आत्मा में सबसे पहले जो क्रिया हुयी थी । वह ( स्वतः ) संकुचन यानी हल्के से सिकुङने की । जैसे फ़ूले हुये गुब्बारे को हल्का सा दबाकर छोङ दिया जाये । और सर्वप्रथम जो शब्द ( वास्तव में ध्वनि ) उत्पन्न हुआ । वो " हुँ " था । और हूँ शब्द होने का द्योतक है । सदा और शाश्वत । गहराई से सोचें । तो आप ( अन्य भाव या जीव ) इसके लिये " है " शब्द का प्रयोग करेंगे । जो किसी दूसरे का द्योतक है । पर हूँ शब्द दूसरे का द्योतक नहीं है । अतः
आप अगर इस शब्द ( या भाव ) पर गौर करें । तो सृष्टि में इसके समान दूसरा शब्द नहीं है । इस शब्द की और

भी सूक्ष्मता में जायें । तो इसमें ह ( होना ) और ऊपर की ओर कंपन.. बिन्दु ( बिन्दी ) न (  निषेध ) और ऊ ( प्रश्न ) ये तीन शामिल है । ध्यान रहे । इस तीन का सम्पूर्ण विवरण तो बहुत बङा है । मैंने सिर्फ़ मुख्य भाव लिखा है । हूँ शब्द की रहस्यमय संरचना पर ध्यान देगें । तो ह ( मध्य अचल आत्मा ) ऊ ( नीचे प्रश्न । अर्थात कोई भी प्रश्न निम्न स्थिति में ही उत्पन्न होगा ) और न ( कंपन ध्वनि यानी गति हमेशा ऊपर की ओर ही होगी ) आप गौर करें तो आज भी यही नियम तो है । अब इसमें ( इच्छा रूप ) वायु भी उत्पन्न हुयी थी । जिसका जिक्र करने से बात बहुत बङी हो जायेगी । अब आप गौर करे । तो इसी शब्द यानी कंपन से धरती आकाश ( आदि बृह्माण्डों ) का निर्माण हुआ । शब्द ई धरती शब्द अकाशा । शब्द ई शब्द हुआ प्रकाशा । और ह अचल आत्मा है ही । और ऊ से नीचे प्रश्नात्मक मायावी सृष्टि बनी । क्योंकि सृष्टि में जीव के लिये रहस्य या प्रश्न न हो । उसी क्षण सृष्टि खत्म हो जाती है । क्योंकि अज्ञान का ही दूसरा नाम सृष्टि है ।
अगर आपने कभी मन्त्र शास्त्र का अध्ययन किया हो । तो बीज मंत्रों में लं टं ठं हं खं घं ह्यीं क्लीं ॐ आदि अक्षर धातुओं में इसी कम्पन ं द्वारा इच्छित धातु के साथ ऊर्जा को उत्पन्न कर संयोग कराया जाता है । और जिस पदार्थ के लिये हमने ये क्रिया की थी । वह पदार्थ तैयार हो जाता है । भले ही फ़िर वह स्वादिष्ट भोजन हो । या सोना चाँदी हीरे मोती क्यों न हों ।
तो आप सृष्टि या खुद अपने अस्तित्व के रहस्य खोजते खोजते सबसे अन्त में जहाँ पहुँचेंगे । वहाँ ये " हूँ " ही शेष रह जायेगा । और इसी के ठीक पूर्व परमात्मा है । अब गौर से देखें । ये क्या कह रहे हैं -
ह हा हा हू हू हू हो हो हो हे हे हे ऊ ऊ ऊँ ऊँ ओ ओ ओ आं आं
अब अगर सिर घूमने न लगा हो । तो इसको पढें ।
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान । 2-45
वेदों में 3 गुणों का वखान है । तुम इन तीनों 3 गुणों का त्याग करो । हे अर्जुन ! द्वन्द्वता और भेदों से मुक्त हो । सत में खुद को स्थिर करो । लाभ और रक्षा की चिंता छोड़ो । और खुद में स्थित हो ।
ये अर्थ किसी अन्य टीकाकार ने किया है । और ऐसे ही अर्थों से हिन्दू धर्म का बेङागर्क हुआ है । ये कह रहा है ।

त्रैगुण्यविषया वेदा - वेदों में 3 गुणों का वखान है ।
और मैं कह रहा हूँ कि - वेदों का विषय ( सिर्फ़ ) तीन गुण ( आधारित सृष्टि ही ) हैं । ( भाव और स्थिति में कितना अन्तर है ? ) अर्जुन तुम इन तीन गुणों से रहित होकर निर्द्वन्द बिना किसी द्वन्द के हमेशा सत्य में स्थित रहो । बिना किसी योग वियोग के । आत्म स्थिति में ।
- हालांकि मैंने स्थिति शब्द का गलत प्रयोग किया है । क्योंकि आत्मा की ( या में ) कोई स्थिति नहीं है । फ़िर भी भक्ति ज्ञान के साधारण जिज्ञासुओं को ऐसे ही शब्दों से समझने में आसानी होती है । श्लोक के अन्त में आत्मवान शब्द का प्रयोग हुआ है । जिसका अर्थ है - आत्मा होना । ( जीव भाव से पूर्ण रहित होकर । )
अब देखिये । पूरे विश्व में जाने कितने धुरंधर ज्ञानियों द्वारा " गीता देवी " की शान में कसीदे पढे जाते हैं । और कबीर तुलसीदास को अनपढ समझा जाता है । पर देखिये । इन्हीं तुलसीदास ने ये बात कितनी सरलता से कही है ।
कहिय तात सो परम विरागी । तृन सम सिद्ध तीन गुन त्यागी ।
- ( तुच्छ ) तिनके के समान सिद्धि ( कोई भी स्थिति ) और तीन गुणों से रहित ( पुरुष ) ही विरागी ( समस्त रागों से परे ) हुआ " परम " है । यानी परमात्मा या आत्मा ।
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम । आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम । 7-18
यह सब ही उदार हैं । लेकिन मेरे मत में ज्ञानी तो मेरा अपना आत्म ही है । क्योंकि - मेरी भक्ति भाव से युक्त और मुझमें ही स्थित रहकर वह सबसे उत्तम गति मुझे प्राप्त करता है ।
अब अगर अब भी नहीं समझे । तो फ़िर कभी समझ पाओगे । इसमें संदेह ही है ।
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एक मच्छर परेशान बैठा था । दूसरे ने पूछा - क्या हुआ ?
पहला बोला - यार गजब हो रहा है । चूहेदानी में चूहा । साबुनदानी में साबुन । मगर मच्छरदानी में आदमी सो रहा है ।
साभार masoom shaan फ़ेसबुक पेज से 
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आप सभी के अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर  प्रणाम ।
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