05 सितंबर 2013

अक्षर से धातुयें कैसे बनती हैं ?

आत्मा शाश्वत है । और एकमात्र आत्मा में ही चेतन ( चेतना या गति ) गुण है । इसी चेतना में इच्छा रूपी " वायु " के स्फ़ुरण से एक कल्पनातीत ( महा शब्द भी छोटा ही है ) कंपन ( वायव्रेशन ) पैदा होता है । इसी कंपन से ऊर्जा पैदा होती है । इसी ऊर्जा द्वारा पाँच तत्व ( प्रथ्वी । जल । वायु । अग्नि । आकाश ) और तीन गुण ( सत । रज । तम ) के संयोग से सृष्टि के तमाम पदार्थों का निर्माण होता है । ( हालांकि 32 तत्व होते हैं । पर वे मानवीय ज्ञान का विषय नहीं हैं । स्वर्ग और बृह्माण्ड के अनेकों दिव्य लोकों में इन्हीं अलौकिक तत्वों के द्वारा निर्माण होता है । इसी से दिव्य शरीर और भूमियां वहाँ की तात्विक स्थिति के अनुसार अलग अलग समय तक दीर्घकालिक होते हैं । पर अभी वह हमारा विषय नहीं है )
यधपि ये परमात्मा से अखिल सृष्टि तक का मूल सिद्धांत मैंने बताया है ।  परन्तु एक छोटी इकाई ( मनुष्य शरीर ) छोटी ऊर्जा और सीमित ( पाँच ) तत्वों के साथ ठीक यही क्रिया हरेक मनुष्य 

में भी लगभग वैसे ही होती है । फ़र्क सिर्फ़ इतना है । आत्मज्ञान को जाने बिना यह मनुष्य के लिये अज्ञात ही है । पाश्चात्य वैज्ञानिक ऊर्जा और पदार्थ तक की ही बात करते हैं । वे पाँच तत्व ( प्रथ्वी । जल । वायु । अग्नि । आकाश ) और तीन गुण के बारे में सोच तक नहीं ( सकते ) पाते । इसलिये वे प्रथ्वी सूर्य जल अग्नि तारे आदि को भी पदार्थ में ही गिनते हैं । जो किसी अज्ञात ऊर्जा में विस्फ़ोट ( बिग बैंग ) से बने । कहने का मतलब उनकी सोच ऊर्जा और पदार्थ तक ही सीमित है । इसलिये वो मूल रहस्य की तरफ़ न जाकर अंतहीन भूलभुलैया में भटककर रह जाते हैं ।
दरअसल सृष्टि , ऊर्जा और पदार्थ का रहस्य हरेक के लिये उत्सुकता का विषय है । आप निश्चित तौर पर यह जानते मानते हैं कि मनुष्य के अन्दर से निकलते स्वर ( वायु ) से ही ध्वनि रूपी स्थूल अक्षर ( रों ) अ इ क ग च फ़ आदि का निर्माण होता है । फ़िर वो दुनियां के किसी देश काल धर्म समाज का व्यक्ति क्यों न हो । जैसे - A उच्चारण ए ( अ + इ ) H एच ( अ +  इ + च )  V ( व + अ + ई ) R ( आ + र ) 1 ( अ + इ + क )  2 ( द + ओ ) 3 ( त + अ + ई + न + अ )
इसी तरह उर्दू के अलिफ़ बे पे ते ( त + अ + इ ) तथा किसी भी अन्य भाषा के लिये समझा जा सकता है ।
अतः इन अक्षरों के वगैर हमारा जीवन और जीवन व्यवहार कुछ देर भी नहीं चल पायेगा । अगर आप इन

अक्षरों के मूल रहस्य में जायेंगे । तो समस्त ऊर्जा और पदार्थ ( पद + अर्थ ) इन्हीं अक्षरों से उत्पन्न हो रहे हैं । क्योंकि चेतना में स्फ़ुरण से ही वायु और वायु से कंपन । कंपन से ऊर्जा और गति और फ़िर तत्व गुण संयोग से विभिन्न धातु पदार्थ ।
एक मनोरंजक उदाहरण के लिये हम ठोकना ठक ठक शब्द लें । इनसे क्या भाव निकलता है ? अब अक्षर से धातु कैसे बनती हैं । इसको देखें । आप ठ ठ ठ ठ ठ ठ ठ ठ ठ इस अक्षर का ठोस और स्पष्ट उच्चारण लगातार करेंगे । तो आपको ऐसा प्रतीत होगा । आप किसी ठोस लौह घन से कहीं अदृश्य में प्रहार कर रहे हों । जबकि आप क क क या प प प आदि कोई भी अन्य अक्षर लें । ऐसा अनुभव कदापि नहीं होगा । इसी ठ में जब न या कंपन ध्वनि बिन्दी ( ं ) समवेत होता है । तो इस धातु में ऊर्जा का समावेश होने लगता है । फ़िर देखें - ठं ठं ठं ठं ध्यान रहे । ठ पर बिन्दी मात्र लग जाने से यह बीज मन्त्र हो जाता है । अब हमारे पास कोई कठोर धातु या लौह धातु ठ हो गयी । इस धातु में बिन्दी ( ं ) लगाकर कंपन द्वारा ऊर्जा पैदा होने लगी । अब इससे कोई पदार्थ बनाने हेतु हमें संकल्प ( यानी किस इच्छा से हम इसको उत्पन्न कर रहे हैं ) मन से ही तो करते हैं । मन यानी माना हुआ या कल्पना ) और मन्त्र यानी मन + त्र ( तीन गुण ) और पाँच तत्व यदि बाहर हैं । तो हमारे अन्दर भी हैं । तो ठ

की अक्षर धातु । न का कंपन । इच्छा ( मन ) तीन गुण ( सत ( सार ) रज ( क्रिया ) तम ( क्षीणता या नाशक भाव पदार्थ ) ये सब मिलकर इच्छित पदार्थ का सृजन करते हैं । अब एक विशेष बात यह है कि मैं ये सिर्फ़ स्थूल प्रकृति की ही बात कर रहा हूँ । वरना ठ भी आधा यानी आधार हीन है । ठ में जब अ जुङता है । तभी ये पूर्ण होता है । फ़िर आंतरिक ( या सूक्ष्म ) प्रकृति के अनुसार ठ अक्षर की उत्पत्ति शरीर के किस स्थानों ( चक्र ) और किस तन्त्र से गुजरकर किस और कितनी विद्युत धारा से संयोजन करती हुयी मन्त्र यानी स्थूल पदार्थ का निर्माण करती है । जो बनने की कृमशः पूर्णता के साथ ही तुरन्त ही कृमशः क्षरण की ओर भी जाने लगता है । नहीं समझें । उत्पत्ति से सृजन पूर्णता के 1  से 100 तक के आरोही ( चढते ) कृम को कृमशः निर्माण कहेंगे । और 100 से 1 तक के अवरोही ( उतरते ) कृम को हम वस्तु का क्षरण कहेंगे ।

इसी हेतु मैं आपके लिये हिन्दी वर्णमाला के सभी अक्षरों के धातु पदार्थों की सूची प्रकाशित कर रहा हूँ । इन पर थोङा गौर करने से ये अक्षर विज्ञान आपको समझ में आने लगेगा । इसका एक सरल तरीका ये भी है कि आप अ से ज्ञ तक एक एक अक्षर को ठोस और स्पष्ट उच्चारण में सैकङों बार दोहरायें । तो भी आपको बहुत कुछ समझ में आयेगा । और सबसे बङी बात आपके शरीर की धातुयें पुष्ट होंगी । हाँ सावधानी के तौर पर किसी अक्षर में न की बिन्दी जोङकर अधिक प्रयोग न करें । अन्यथा उस समय की आपकी मनःस्थिति और अन्य चीजों के संयोग से उस बीज मन्त्र द्वारा जो ऊर्जा पदार्थ आदि पैदा होंगे । वह आपको गम्भीर नुकसान भी पहुँचा सकते हैं ।
और ये हैं - अक्षर में समाहित स्थूल धातु पदार्थों का विवरण ।
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1 अ - अभाव । निषेध । अल्पता । अनुकम्पा । सम्बोधन । तिरस्कार , इनका घोतक । इन व्यंजनों के पहले ( अ ) और स्वरों के पहिले ( अन ) लगाया जाता है । विष्णु ( पुल्लिंग ) ।
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2  आ - ( अव्यक्त ) थोङा । कुछ । सीमा । व्याप्ति । अतिकृमण । स्मृति । अनुकम्पा । मेल । स्वीकार । वाक्य , इनको प्रकट करने वाला आ ( पु. ) महादेव ।
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3  इ - ( अव्यक्त ) भेद । क्रोध में कही हुयी बात । खेद - इनका घोतक । ( पु ) कामदेव ।
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4  ई - ( अव्यक्त ) दिल का टूट जाना । दर्द । क्रोध । शोक । अनुकम्पा । प्रत्यक्ष - इनका घोतक । पु ) कामदेव । ( स्त्री ) लक्ष्मी ।  
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5  उ - ( अव्यक्त ) अनुकम्पा । पद पूर्ण । सवाल । दूर से पुकारना - इनका घोतक । ( पु ) महादेव , बृह्मा ।
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6  ऊ - ( अव्य ) सम्बोधन । वाक्य का प्रारम्भ । दया । भिक्षा । ( पु ) शिव , चन्द्र ।
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7  ऋ - ( अव्य ) सम्बोधन । निन्दा । वाक्य । परिहास । ( स्त्री ) देव - माता ।
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8  ऋ - ( अव्यक्त ) बचाना । डरना । निन्दा ( नपुंसक लिंग ) छाती । ( स्त्री ) दैत्यों और देवताओं की माता , स्मृति , गति ( पु ) भैरव । दैत्य ।
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9  लृ ( अव्य ) देवताओं और दैत्यों की माता । प्रथिवी । पर्वत ।
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10  लृ् ( अव्य ) देवताओं की माता । देवताओं की भार्या । ( पु ) महादेव । विष्णु । ( स्त्री ) दैत्यों की माता ।
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11 ए - ( अव्य ) याद करना । बुलाना । घृणा करना । कृपा करना ( पु ) विष्णु )
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12  ऐ ( अव्य ) सम्बोधन । स्मरण । बुलाना । ( पु ) शिव )
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13 ओ ( अव्य ) सम्बोधन । स्मरण । दया । बुलाना । ( पु ) बृह्मा )
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14 औ ( अव्य ) बुलाना । निर्णय । विरोध । ( पु ) सर्पों का राजा । अनन्त । आवाज । ( स्त्री ) प्रथिवी । 
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15 अं ( अ + न मिला हुआ है )
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16 अः ( अ + ह मिला हुआ है ) 
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1 क - ( पु ) बृह्मा । विष्णु । सूर्य । अग्नि । वायु । कामदेव । राजा । पक्षी । यम । मयूर । मेघ । समय । धन । शब्द । प्रकाश । ( न ) सुख । जल । शिर ।
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2 ख - ( पु ) सूर्य । ( न ) शरीर । मेघ । स्वर्ग । इन्द्रिय । खेत । नगर । शून्य । बिन्दु । आकाश । सुख । कर्म । ज्ञान ।  
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3  ग - ( न ) गीत । ( पु ) गणेश । गवैया । ( त्रि ) जाने वाला ।
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4 घ - ( पु ) घण्टा । घर्धर शब्द ।  
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5 ङ -  ( पु ) विषय । विषय की इच्छा । भैरव ।
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6  च - ( अव्य ) एक की प्रधानता से दूसरे को साथ कहना । मिले हुओं का सम्बन्ध । एक दूसरे की अपेक्षा के बिना बहुतों का एक काम में सम्बन्ध । पाद - पूरण । ( पु ) कछुआ । चन्द्र । चोर । शिव । ( न ) दुर्जन । 
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7 छ - ( पु ) आच्छादन । काटना । घर । टुकङा । एक संख्या । ( त्रि ) निर्मल । चंचल ।
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8 ज - ( पु ) मृत्युंजय । विष्णु । शिव । जन्म । पिता । विष । मुक्ति । तेज । पिशाच । वेग । 
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9  झ - ( पु ) वर्षा मिली हुयी तेज आँधी । बृहस्पति । दैत्यराज । ध्वनि । तेज हवा ।
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10  ञ ( पु ) गाना । घुरघुराना । बैल । शुक्र का नाम । बेईमान ।  
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11 ट ( न ) नारियल का खोपङा । ( पु ) धनुष की डोरी की सी आवाज । नाटा । चौथाई भाग । ( स्त्री ) प्रथ्वी । शपथ ।
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12 ठ - ( पु ) महादेव । चन्द्रमण्डल । मण्डल । महाध्वनि । शून्य । प्रतिमा । देवता । इन्द्रिय ग्राह्य वस्तु ।   
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13  ड - ( पु ) शब्द । एक तरह का ढोल । समुद्री आग । भय । शिव । ( स्त्री ) डाकिनी । डोरी में लटकाकर ले जाने वाली बास्कट ।
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14  ढ - ( पु ) ध्वनि । नाद । सांप । कुत्ता । कुत्ते की पूँछ । बङा ढोल । 
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15   ण - ( पु ) ज्ञान । निश्चय । गहना । गुणहीन । प्याऊ । शिव । दान । निषेध । धर्म । आत्मा ।
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16  त - ( न. स्त्री ) पुण्य । तैरना । ( पु ) अमृत । पूँछ । चोर । गोद । शठ ।  रत्न । वृक्ष । 
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17 थ - ( न ) रक्षण । मंगल । भय । पर्वत । भक्षण । एक रोग । भय का चिह्न ।  
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18  द - ( न ) भार्या । ( पु ) दाता । पर्वत । दान । दांत । ( न. स्त्री ) खण्डन । ( स्त्री ) रक्षा करना । पवित्र करना । परिताप ।  
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19  ध - ( पुल्लिंग ) धम । बृह्मा । कुबेर । ( न ) धन ।
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20  न - ( अव्यक्त ) निषेध । अभाव । ( पु ) गणेश । युद्ध । बन्धन । दान । प्रशंसा । ( स्त्री ) नाभि ( त्रि ) पतला ।  
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21 प - ( पु ) रक्षक । वायु । पत्ता । पीना । अण्डा ।
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22 फ - ( नपुंसक लिंग ) रूखा वचन । फ़ुफ़कार । ( पु ) अंधङ । जम्हाई । निष्फ़ल भाषण । यज्ञ साधन । स्फ़ुट । फ़ल लाभ ।  
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23 ब - ( पु ) इशारा । वरुण । घङा । समुद्र । योनि । जल । बुनना । ( स्त्री ) गमन ।
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24  भ - ( न ) नक्षत्र । ग्रह । राशि । ( पु ) शुक्राचार्य । भ्रमर । पर्वत । भ्रांति । 
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25 म - ( पु ) बृह्मा । शिव । विष्णु । यम । समय । विष । जादू । चन्द्रमा । ( मा ) ( स्त्री ) लक्ष्मी । माता । दीप्ति । पैमाना । मृत्यु । स्त्री की कमर । ( न ) भाग्य । जल ।
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26 य - ( पु. ) यश । योग । सवारी । संयम । यम । जौ । त्याग । प्रकाश । 
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27  र - ( पु. ) अग्नि । कामाग्नि । जलना । ताप । ( त्रि ) प्रखर ।
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28 ल - ( पु ) इन्द्र । कांटछांट । ( ल ) ( स्त्री ) देना । लेना । ( ली ) आलिंगन करना । गलाना । 
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29 व - ( पु ) वायु । वरुण । कल्याण । समुद्र । व्याघ्र । वस्त्र । तसल्ली । राहु । सलाह ।
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30 श - ( पु. ) महादेव । शस्त्र । ( न ) मंगल । 
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31  ष - ( पु. ) केश । मनुष्य । सम्पूर्ण । श्रेष्ठ । ( त्रि ) समझदार ।
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32  स - ( पु. ) विष्णु । ईश्वर । सर्प । पक्षी । वह ( मनुष्य ) । ( स्त्री ) लक्ष्मी । वह ( स्त्री. ) । ( न ) ज्ञान । घेरा । रास्ता ।  
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33  ह - ( पु ) शिव । जल । ध्यान । कल्याण । स्वर्ग । मौत । रुधिर । युद्ध । घोङा । गर्व । वैध । भय । रोमांच । विष्णु । कारण । ( स्त्री ) छोङना । संगम । बांसुरी का शब्द । ( न ) ईश्वर । हर्ष । बुलाना । अस्त्र । रत्न । ( त्रि ) हँसने वाला । पागल । मत्त ।
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34  क्ष - (  क + ष को मिलाकर बनता है । )
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35   त्र - (  त + र को मिलाकर बनता है । )
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36 ज्ञ - (  ज + ञ को मिलाकर बनता है )
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