08 सितंबर 2013

भूले से भी ऐसी साधना नहीं करूँगा

Rajeev ji, apako mera sadar pranam 
maine apaka thoda sa blog pada hai kuch ajeeb sa laga sach batau to mera dimag kam he nahi kar raha tha jo ekdam vichitra kahaniya padane ko mili hai.
Guruji mai apako ek sawal puchana chahata hu ki, hume moksha prapti ke liye kya karana chahiye.
Our dusara sawal ye apsara sadhna, yakshaini sadhna aaj ke yug me sach me siddh hoti hay kya our siddh hone se koi hume pap lagata hay kya.     nitin yedake. Jai Gurudev Ji ki,
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उत्तर - मोक्ष (मोह-क्षय) से भाव ये है कि जिन अज्ञान रूपी जंजीरों के बन्धन में तुम सिर्फ़ मोहवश जकङे हुये हो ज्ञान द्वारा उनसे छुटकारा हो जाना । क्योंकि वास्तव में तुम स्व प्रकाशित स्वयं आनन्द स्वरूप स्वयं चेतन आत्मा हो । सिर्फ़ अज्ञानवश वासनाओं से मोहित होकर खुद को बन्धन में बाँध बैठे हो ।
तुम्हारी शाश्वत पहचान शाश्वत स्थिति को देखते हुये ये जीव रूपी स्थिति भारी दुर्गति ही है । इसलिये मोक्ष तुम्हारा अपना स्वभाव है और बन्धन तुम्हारी दुर्बलता ।
मोक्ष का अर्थ मुक्त है (मुक्ति नहीं) तब सवाल है कि तुम किस बन्धन में बँधे हो ?
उत्तर है - अज्ञान के । 
और इस अज्ञान का एक अजीब रूप है कि तुम्हें खुद पता नहीं होता कि तुम क्या हो और क्या हो गये ।
दुनियाँ में फ़ँसकर वीरान हो रहा है । 
खुद को भूलकर हैरान हो रहा है । 

जैसे कोई व्यक्ति (वासनाओं से) पागल होकर अपनी पहचान भूल गया हो । जैसे कोई व्यक्ति (वासनाओं के) नशे में अपना घर भूल गया हो । जैसे कोई व्यक्ति दीन हीन होकर धक्के खाता हुआ भटक रहा हो । यह तुम अभी हो गये हो । जबकि मजे की बात ये है कि यह सब स्वपनवत है । इसमें सच्चाई कुछ भी नहीं ।
अब जैसे कोई प्रश्न खङा हो गया । उसका उत्तर तुम्हें नहीं आ रहा तब शिक्षक इसका हल सुझाता है । फ़िर आगे गुरु इसका निदान करता है और कुछ सूत्र देता है । इससे कुछ स्थिति स्पष्ट होती है । तब आगे सदगुरु से मिलना होता है और वह सत्य सूत्र और फ़िर शाश्वत सूत्र देता है और सबसे कठिन प्रश्न हमेशा के लिये हल हो जाता है ।
मोक्ष ज्ञान इसी तरह से यात्रा करता है । यदि किसी मनुष्य पर कृपा है, उसका ह्रदय साफ़ है, परमात्मा से उसका भाव है तो यह सभी चीजें कभी कभी एक ही स्थान पर मिल जाती हैं ।
मोक्ष प्राप्ति हेतु सबसे आवश्यक और निकटतम सूत्र (स्व प्रश्न) है कि - मैं कौन हूँ who am i और ये सब रहस्यमय सा नजर आने वाला संसार क्या है । क्या कोई अदृश्य इसका नियन्ता है । कौन है वो सर्वशक्तिमान जिसके आदेश नियम पर ये अदभुत सृष्टि चल रही है ? 
इस तरह अज्ञात रूप में परमात्मा को और खुद को खोजने लगते हैं । जो वास्तविकता के धरातल पर वास्तव में 1 ही है और अज्ञान के धरातल पर 2 हो गये हैं या प्रतीत होते हैं । तब ऐसे भाव से आप मोक्ष के एकदम करीब पहुँच जाते हैं ।
प्रभु के नियम अनुसार ये कार्य देहधारी समय के सदगुरु के द्वारा सम्भव होता है । जब आध्यात्मिक अध्ययन चिंतन मनन के बाद स्वाभाविक सच्चे सन्तों के सानिध्य में पहुँच जाते हैं । तब यह कार्य बेहद आसान हो जाता है फ़िर क्रियात्मक ज्ञान हेतु आपको सदगुरु से नाम उपदेश (हँसदीक्षा) लेना होता है और उस नाम का जप अभ्यास करना होता है । इसमें बहुत सा सत्यबोध होता है यानी आपका आधा मोक्ष हो जाता है ।
हँस ज्ञान पूरा कर लेने पर परमहँस दीक्षा होती है और परमात्म क्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं । कृमशः पुनः अभ्यास करते हुये आप अन्त में मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं । इससे सम्बन्धित बारीक जानकारियों के लिये ब्लाग में कई लेख हैं जिन्हें पढ़कर आप जानकारी प्राप्त कर सकते हैं ।    
उत्तर - 2 अप्सरा, यक्षिणी साधनायें सभी युग सभी काल में सम्भव है पर उस तरह नहीं । जिस तरह किताबों में या इंटरनेट पर बताया जाता है । 
उस तरह भी नहीं कि आप कोई छोटा मोटा कोर्स सीखने की तरह इनको सीख लो । ये मन्त्र विज्ञान के अंतर्गत खास आता है । इसके लिये नितान्त एकान्तवास, शुद्धता, बृह्मचर्य, गुप्त स्थान और कठिन नियम संयम से गुजरना होता है । फ़िर भी भाग्यवशात साधक की किसी त्रुटि से साधना असफ़ल भी हो सकती है । विपरीत परिणाम वाली भी हो सकती है । क्योंकि साधना के समय अधिकांश कुछ दैवीय विघ्न या नीच वृतियों के विघ्न आ जाते हैं । जिनका साधक को कोई पूर्व अनुमान नहीं होता न ही उसके पास कोई ऐसी शक्ति होती है । जिसके दम पर वो न घबराये । तब साधक प्रकट हुयी नीच वृतियों के आगे हाथ वगैरह जोङकर माफ़ कर देने या छोङ देने को गिङगिङाता है । लेकिन अक्सर ये वृतियां (तामसिक भाव की जीवात्मायें, जो सूक्ष्म शरीर में डाकिनी शाकिनी जैसे गण बन चुकी होती हैं और जिनका मनुष्य के समान जीवित अस्तित्व नहीं होता) उसे छोङती नहीं हैं । अतः इनके लिये पहले से खास तैयारी कोई योग शक्ति कवच आदि जैसी सिद्धि की औपचारिकताओं को ग्रहण कर आत्मसात करना होता है ।
ऐसे अलौकिक अवसरों के लिये मानसिकता तैयार करनी होती है । इसलिये कुल मिलाकर ये सक्षम गुरु की देख रेख के बिना सम्भव नहीं होता और अक्सर बेहद खतरनाक ही होता है । जिसमें कुछ मिलना मिलाना तो दूर खुद के जान बचाने के लाले पङ जाते हैं । कभी कभी कुटिल अदृश्य वृतियां ऐसे साधकों को वश में करके उनका जीवन सार (शरीर का सार रस) चूसने लगती हैं और फ़िर साधक किसी भी तरह उनसे पीछा छुङाकर सामान्य होना चाहता है । जो कि अक्सर हो नहीं पाता  और कृमशः कठिन मृत्यु को प्राप्त होता है ।
अतः किसी भी साधना का चयन बङी सावधानी से समर्थ गुरु के सानिंध्य में ही करना चाहिये । इसके लिये आपको दुनियांदारी से लगभग कटकर योगी का जीवन जीना होता है । योगबल संचय करना होता है, गुरु सेवा करनी होती है । तब किसी सिद्धि आदि की बात आती है । 
यदि ऐसी कोई साधना बिगङ जाती है तो पहले तो कोई सक्षम साधु उस साधक के भारी अनुरोध के बाद भी उसमें दखल नहीं देता और यदि देता भी है तो उस साधक को दण्ड स्वरूप ऐसे कठिन परिश्रम और ताङना आदि से गुजारता है कि उसे कम से कम सात जन्म याद रहे - भूलकर भी मनमानी साधना नहीं करूँगा ।
अतः मेरी सभी को यही सलाह है कि आप सबसे सरल सहज परमात्मा की भक्ति ही करें । वह हमें सभी कुछ देती है -
सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिमि हरि शरण न एक हू बाधा । 
भक्ति स्वतन्त्र सकल सुख खानी । बिनु सतसंग न पावहि प्रानी । 
सकल पदारथ हैं जग माहीं । कर्महीन नर पावत नाहीं ।
निज अनुभव तोसें कहूँ खगेसा । बिनु हरि भजन न मिटे कलेशा ।

फ़िर भी यदि यक्षिणी अप्सरा साधना करना चाहते हैं तो पूर्ण जानकारी तैयारी और सक्षम गुरु के सानिध्य में ही करें ।  
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