24 सितंबर 2013

काले जादू का जन्म कैसे हुआ ?

चलिये आज आपको जादू अथवा काला जादू के जन्म के बारे में बताता हूँ । लेकिन यहाँ जादू शब्द से अर्थ आजकल के प्रचलित जादू से न होकर तन्त्र मन्त्र अथवा अलौकिक योग शक्तियों से ही है । इस घटना का सम्बन्ध उसी बात से है । जिसको लेकर आजकल मोक्ष या भागवत कथाओं का बहु प्रचलन फ़ैला हुआ है । यानी अर्जुन पुत्र अभिमन्यु पुत्र परीक्षित का कलि प्रेरित होकर ऋषि के गले में सर्प डालना । और फ़िर ऋषि पुत्र द्वारा सात दिन के अन्दर परीक्षित को खतरनाक तक्षक द्वारा डसने से मृत्यु का शाप देना । और परीक्षित द्वारा नैमिषारण्य में राजा जनक के शिष्य शुकदेव से मोक्ष उपाय कराना । यानी ये उसी सात दिन के बीच के समय की बात है । और शाप अनुसार तक्षक नाग मनुष्य रूप में उसी स्थान पर जा रहा था । जहाँ परीक्षित शुकदेव के साथ थे । 

तब अचानक उसने देखा । धनवंतरि वैद्य अपने कई शिष्यों की टोली के साथ उधर से ही जा रहे थे । जिज्ञासावश उसने यूँ ही पूछ लिया - आप लोग कहाँ जा रहे हो ? और उन्होंने जो कहा । उसे सुनकर तक्षक भौंचक्का रह गया । धनवंतरि बोले - एक शाप के अनुसार राजा परीक्षित को खतरनाक तक्षक डसने वाला है । जिससे उसकी मृत्यु हो जायेगी । और मैं उसको संजीवनी विद्या द्वारा पुनर्जीवित कर दूँगा ।
तक्षक को यह सुनकर मानों जबरदस्त हँसी आयी । पर अपने भावों को दबाकर वह उपहास से बोला - क्या आप ऐसा कर सकते हो ? क्योंकि तक्षक का विष बहुत भयंकर होता है ।
धनवंतरि ने सामान्य अन्दाज में इसको मामूली कार्य ही बताया । और कहा - मैं इसका प्रमाण यहीं तुरन्त भी दे सकता हूँ ।
तब एक हल्के विवाद के बाद तक्षक ने सामने ही खङे वट वृक्ष पर जहर फ़ेंका । तत्काल ही वह वट वृक्ष जलकर खाक हो गया । इसी घटना से बहुत से स्थानों पर ग्रामीण भाषा में वट को बरी ( जली हुयी ) कहा जाने लगा । धनवंतरि ने हल्की सी मुस्कान के साथ कुछ ही पलों में उस वृक्ष को पूर्ववत हरा भरा कर दिया । तक्षक के मानों होश उङ गये । धनवंतरि एकदम सही कह रहे थे । दरअसल एक अलौकिक विद्या के तहत धनवंतरि की दृष्टि में जहर को खत्म करने का विशेष प्रभाव था । अतः उनकी दृष्टि जहाँ जहाँ तक जाती थी । वह क्षेत्र विष रहित हो जाता था । 

इस बात को जानकर समझ कर तक्षक बेहद सोच में पङ गया । उसने धनवंतरि की भरपूर प्रशंसा की । और उनसे विदा लेकर अलग हो गया । तब मायावी तक्षक ने धनवंतरि को ही रास्ते से हटाने की एक नयी चाल खेली ( क्योंकि इस हिसाब से धनवंतरि सर्प जाति के दुश्मन समान थे ) । और घूमकर उसी रास्ते में एक सुन्दर छङी का रूप धारण कर लेट गया । जिस रास्ते से धनवंतरि को गुजरना था । धनवंतरि के शिष्यों ने जब रास्ते में एक सुन्दर बहुमूल्य छङी पङी देखी । तो उठाकर गुरु के पास ले आये । होनी शायद प्रबल थी । धनवंतरि ने उस छङी को कन्धे पर टांग लिया । यानी छङी का मुँह अब धनवंतरि के कन्धे पर था । और यही तो तक्षक चाहता था । उसी समय उसने धनवंतरि को डस लिया । धनवंतरि तुरन्त तक्षक की चाल समझ गये । पर अब देर हो चुकी थी । अपने ही कन्धे पर धनवंतरि की दृष्टि किसी भी हालत में नहीं जा सकती थी । और उनकी मौत निश्चित थी । तब उन्होंने उपचार के रूप में अपने शिष्यों से एक बढा गढ्ढा खोदकर उसमें नीम की बहुत सी पत्तेदार टहनियों के बीच खुद को दबाने को कहा । और एक महीने से पहले किसी भी हालत में न निकालने को कहा । अन्यथा फ़िर बचने का कोई चांस नहीं होगा । तथा इसी दरम्यान ढांक बजाते रहने को कहा । शिष्यों ने ऐसा ही किया । क्योंकि तक्षक उनसे मन ही मन दुश्मनी मान चुका था । अतः वह फ़िर से ब्राह्मण मनुष्य के वेश में गढ्ढे के पास ढांक बजाते धनवंतरि के शिष्यों के पास पहुँचा । और बोला - ये तुम सब क्या कर रहे हो ? 

धनवंतरि के शिष्यों ने दुखी अन्दाज में सब हादसा बताया । तब वह उनकी मति हरण करता हुआ बङे उपहास भरे अन्दाज में बोला - अरे पागलो ! कहाँ उस बूढे गुरु की बातों में पाप और समय नष्ट कर रहे हो । वो कब का सढ मर गया होगा । नहीं मानते । तो उसे निकाल कर देखो । वहाँ अब कुछ भी नहीं बचा होगा ।
शिष्य भृमित हो गये । और उन्होंने धनवंतरि को निकालना शुरू कर दिया । तक्षक चुपके से गायब हो गया । बाहर निकलने पर सब बात सुनकर धनवंतरि ने माथा पीट लिया । और शिष्यों से कहा । अब उनकी मृत्यु निश्चित है । लेकिन अपनी विद्याओं को सतत जारी रखने के उद्देश्य से उन्होंने अपने शिष्यों से कहा - अब मैं तो मरूँगा ही । ये तय है । पर तुम लोग मेरे शरीर के बहुत छोटे छोटे टुकङे करके माँस को अलग अलग हाँडी में पकाना । और प्रत्येक शिष्य उस माँस को खा लेना । इस तरह तुममें से प्रत्येक को वह ज्ञान प्राप्त हो जायेगा । जिसके लिये तुम मेरे शिष्य बने । और अबकी बार कोई कुछ भी कहे । किसी की बातों में मत आना ।
शिष्यों ने हामी भरी । और सब कुछ अजीब सा लगने के बाबजूद भी उन्होंने ऐसा ही किया । वे समुद्र तट के पास अलग अलग हांडी में गुरु का मांस पकाने लगे । तक्षक फ़िर किसी स्थानीय व्यक्ति के वेश में उनके पास पहुँचा । और हैरानी से बोला - ये तुम लोग क्या कर रहे हो ? संभवतः तक्षक मति हरण सा करता था । अतः मन्त्र मुग्ध से ही वह फ़िर से सब कुछ बताने लगे । तक्षक फ़िर ठठाकर हँसा । और बोला - तुम लोग निश्चय ही बङे पागल हो । अरे ! गुरु ने कुछ भी उल्टा सीधा बोल दिया । और तुमने मान लिया । तुम्हें मालूम नहीं कि गुरु का माँस खाकर तुम घोर नरक को प्राप्त होओगे । ऐसा कहीं होता है भला ।
शिष्य घबरा गये । और पूछा - फ़िर क्या करना चाहिये । 
तक्षक ने वह सभी हंडियां समुद्र में फ़िंकवा दी । लेकिन कहते हैं । एक काने शिष्य ने लालच और परीक्षण वश उसमें से एक टुकङा खा लिया ( कुछ लोग कहते हैं । उंगली डुबोकर चाट ली ) फ़िर वह हंडियां समुद्र में बहते हुये बंगाल के कुछ लोगों को भी प्राप्त हुयीं । और जिज्ञासावश उनमें से कुछ ने वह माँस खा लिया । और इस तरह धनवंतरि के कहे अनुसार कुछ उनके काने शिष्य और कुछ बंगाली लोगों द्वारा काला जादू अस्तित्व में आया ।
यह कथा आजकल के भागवत कथा वाचक अथवा शास्त्री भी प्रायः अपनी कथा में सुनाते हैं । क्या आप इस ऐतिहासिक अनोखी घटना से सहमत हैं ?
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आत्मज्ञानी या आत्म ज्ञान से जुङे सन्तों द्वारा मुर्दा जीवित करने के कई उदाहरण मिलते हैं । जिनमें से कुछ प्रसिद्ध उदाहरणों में कबीर नानक द्वारा भी मुर्दा जिन्दा करने का प्रसंग आता है । इनसे पूर्व एक प्रसिद्ध सन्त खिज्र साहव हुये । जो मूसा के गुरु थे । इन्होंने तो बारह वर्ष पूर्व नदी में डूब गयी पूरी बारात को ही मूसा के सामने कुछ देर के लिये जिन्दा किया था । और मूसा के ही सामने नदी में बहकर जाते एक अन्य मुर्दे को कुछ देर के लिये जीवित किया था । लेकिन कबीर और नानक द्वारा जीवित किये गये मृतक बाद में भी आयु भर जीवित बने रहे । पर यह सब तुलनात्मक इस उदाहरण के काफ़ी पुरानी बातें हैं । तोतापुरी के शिष्य रामकृष्ण परमहँस के गुरुभाई श्री अद्वैतानन्द जी ( छपरा, बिहार ) हुये हैं । अद्वैत मिशन, सार शब्द मिशन आदि से इनके स्थान स्थान पर कई शहरों में विशाल आश्रम हैं । आनन्दपुर ग्वालियर । आगरा तपोभूमि और पंजाब में भी कई स्थानों पर । इन्हीं के एक विश्व प्रसिद्ध शिष्य सन्त स्वरूपानन्द जी के नाम से हुये हैं । जो सिंध प्रान्त के टेहरी ( अब पाकिस्तान ) स्थान से थे । लेकिन उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश पंजाब आदि राज्यों में गुरु आज्ञानुसार आजीवन रहे । और लगभग 80 वर्ष पहले ही शरीर त्यागा है । 15 किमी के विशाल क्षेत्र में नंगली ( मेरठ ) तीर्थ के नाम से इनका आश्रम है । जहाँ ये अन्तिम समय तक रहे । इसी नंगली से प्रकाशित इन दोनों सन्तों के सम्पूर्ण जीवन चरित्र पर आधारित पुस्तक " स्वरूप दर्शन " में श्री स्वरूपानन्द जी द्वारा एक शिष्य के 15 वर्षीय बालक को जीवित करने का वर्णन है । जो आकस्मिक रूप से नहर में डूबकर मर गया था । जाहिर है । वह बालक या घटना के साक्षी कुछ अन्य लोग इस समय जीवित हो सकते हैं । स्वरूप दर्शन पुस्तक की एक खासियत और कई लोगों ने बतायी है कि यदि इसे पूर्ण श्रद्धा भाव से पढें । तो अंतर में जाग्रति के अलौकिक अनुभव उसी समय होने लगते हैं । भारत की इस अदभुत रहस्यमय सन्त परम्परा के दृष्टिगत क्या आपको यह सही लगता है ?
सन्तन की महिमा रघुराई । बहु विधि वेद पुरानन गाई ।
मोर वचन चाहे पङ जाये फ़ीका । सन्त वचन पत्थर की लीका ।
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