19 सितंबर 2013

वैश्विक समाज सिर्फ़ कामवासना पर केन्द्रित

अधिकांशतः मैं यहाँ सत्यकीखोज पर आपके प्रश्नों के उत्तर देता था । पर  आज मैं कुछ प्रश्न लेकर स्वयं ही उपस्थित हुआ हूँ । क्या आपके पास इनके कोई उत्तर हैं । या आप ऐसी ही एक स्वस्थ तर्क युक्त चर्चा में भाग लेना चाहते हैं । तो ?
प्रश्न - क्या भूत प्रेत होते हैं ? यदि हाँ तो किस आधार पर । यदि नहीं । तो भी किस आधार पर ?
प्रश्न - क्या शिक्षित क्या अशिक्षित सभी लोगों में भूत प्रेतों को लेकर किस्से कहानियां विभिन्न रोचक घटनाओं के तौर पर प्रचलित हैं । इनके पीछे क्या वास्तविकता है ?
प्रश्न - इस्लाम और मुसलमान मृत्यु के बाद किसी भी तरह की जिन्दगी या मृतक का कोई भी अस्तित्व होना स्वीकार नहीं करते । फ़िर उर्दू भाषा में रूह और जिन्नात आदि शब्दों का प्रयोग किसके लिये किया जाता है । और सबसे बङा सवाल ये शब्द हैं ही क्यों ?
प्रश्न - कैथोलिक या ईसाई भी पुनर्जन्म आदि की संभावनाओं पर ठीक इस्लाम की तर्ज पर ही इंकार करते हैं । फ़िर भी ईसाई समाज में भूत प्रेत अभिषप्त घर आदि इस सबका बोलबाला है । 
प्रश्न - क्या भगवान है ? यदि है । तो क्यों और कैसे है ? और यदि नहीं है । तो क्यों और कैसे नहीं है ?
प्रश्न - मृत्यु के बाद जीवन को मानने से ज्यादा लाभ है । या न मानने से ? क्योंकि मानने से हमारी सकारात्मक सोच हमें किसी शाश्वतता या अपनी पहचान जानने की ओर अग्रसर कर सकती है । जबकि न मानने से हम संभावनाओं के सभी दरवाजे बन्द कर देते हैं । क्योंकि हम ( ऐसा कहने वाले ) निश्चिंत तो नहीं हैं कि मृत्यु के बाद जीवन है या नहीं । तब यदि हुआ । तो क्या होगा ?
प्रश्न - सृष्टि के जीव जीवन चक्र में एक जीवात्मा ( मनुष्य ) का दोबारा मनुष्य जन्म साढे 12 लाख साल तक 84 लाख योनियां भोगकर ही फ़िर से मनुष्य जन्म मिलता है । आपके विचार में क्या यह सही है ?
प्रश्न - मनुष्य मरने के बाद आखिर कहाँ जाता है । इस सम्बन्ध में चार प्रमुख धर्मों की मान्यता हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई की बतायें । विश्व की कोई और रोचक मान्यता आपको पता हो । तो अवश्य बतायें ।

प्रश्न - क्या विज्ञान ( आधारित सोच और सुख सुविधायें ) और आधुनिक समाज का जो परस्पर मिश्रित ढांचा है । वह हमें वास्तविक सुख शांति दे सकता है । यदि ये सही है । तो फ़िर इन सुविधाओं और मान्यताओं के अग्रणी देश इस मामले में सबसे दुखी क्यों हैं ? यदि वे सुखी हैं । तो उनके परिवार टूटने के क्या कारण हैं ?
प्रश्न - चार प्रमुख धर्म - हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और उनके मानने वालों में अपने अपने धर्म को श्रेष्ठ मानने की एक अंधी होङ सी लगी हुयी है । यही नहीं सिर्फ़ सिखों को छोङकर ईसाई और मुसलमान लगभग जबरन और लोभ लालच से धर्मांतरण जैसी घृणित वैश्विक गतिविधियों में पूर्ण सक्रियता से लिप्त हैं । जबकि हिन्दू और सिखों द्वारा अन्य जाति के धर्मांतरण के प्रयास नहीं देखे गये । आपके विचार से कौन सा धर्म पूर्ण और श्रेष्ठता लिये हुये है । और क्यों ?
प्रश्न - क्या हिन्दू धर्म जीवन और जीवन के बाद भी परलोक आदि जैसे विषयों पर धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, जैसे अंगों पर सम्पूर्ण और वैज्ञानिक तथ्यों सिद्धांतों और प्रयोगों के साथ विस्त्रत जानकारी से उपलब्ध है । या आपके विचार में यह सब पोंगापंथी पाखंड ही अधिक है ।
प्रश्न - क्या आपको लगता है कि कोई मनुष्य ( जीवात्मा ) भी भगवान जैसे पद को प्राप्त हो सकता है । यदि हाँ तो कैसे ? और यदि नहीं । तो ये विभिन्न साधु सन्त ऋषि महर्षि हजारों साल की तपस्या क्यों करते थे ?
प्रश्न - जैसा कि हिन्दू धर्म ग्रन्थों में वर्णित है कि विराट पुरुष के रोम रोम में अनेकानेक खण्ड बृह्माण्ड और असंख्य सृष्टियां हैं । सरल शब्दों में हमारी प्रथ्वी की तरह अनेक प्रथ्वियों पर इसी तरह का जीवन है । आपके विचार से क्या ये बात सही है ?

प्रश्न - सिर्फ़ 600 साल पूर्व कबीर से ज्ञान मिलने पर और मुगल आक्रांताओं से संगठित रूप से निबटने हेतु जैसी तात्कालिक परिस्थितियों से हिन्दू नानक साहब द्वारा सिख कौम का ( विशेष वेशभूषा आदि सहित  ) एक कबीले की तरह निर्माण हुआ । लेकिन इन परिस्थितियों से निकल जाने के बाद भी एक नये जाति धर्म का निर्माण हो गया । वास्तव में तो जिसका कोई मूल आधार ही न था । आप इस बात से कितना सहमत हैं ?
प्रश्न - क्या आप मानते हैं । गुरुग्रन्थ साहिब भी अपने आप में कोई मूल  धर्म ज्ञान नहीं है । बल्कि इधर उधर से ली गयी वाणियों का संकलन मात्र है । नानक के गुरु कबीर साहब की वाणी के आगे तुलनात्मक उसमें सभी वाणियां प्रभावहीन हैं । अतः गुरुग्रन्थ साहिब को अलग से किसी धर्म विशेष का धर्मग्रन्थ कहना उचित है ? 
प्रश्न - हिन्दू धर्म शास्त्रों सन्त वाणी और योग वेदान्त पुस्तकों के अनुसार त्रिनेत्र 3rd eye या तीसरी आँख या शिव नेत्र प्रत्येक मनुष्य के अन्दर उसकी दोनों भौंहों के ठीक मध्य में स्थित है । इन सभी शास्त्रों के अनुसार शरीर योग विज्ञान के तहत इसका कोई समर्थ ज्ञानी पुरुष मिलने पर योग साधना द्वारा ये तीसरी आँख किसी भी व्यक्ति की खुल जाती है । सामान्य रूप में इसके बन्द होने का कारण वह बृह्माण्डी ताला है । जो लगभग नाक की जङ में होता है । और इसी वजह से मनुष्य अपने पूरे मष्तिष्क का उपयोग नहीं कर पाता । और न ही अन्य रहस्य जान पाता है । आप इससे कितना सहमत हैं ?

प्रश्न - एक मनुष्य और परमात्मा के बीच में अन्तर सिर्फ़ मनुष्य द्वारा स्वयं ही खङी की गयी अहम रूपी दीवार ही है । तदुपरान्त बाद में इसमें सृष्टि से अब तक हुये करोङों जन्मों की विभिन्न इच्छाओं के मायावी आवरण से ये दीवार और भी मोटी हो जाती है । और ईश्वरीय अंश जीव अपनी वास्तविक सत्ता स्वरूप स्थिति को भूलकर मायावी संसार में भटक कर ही रह जाता है । क्या आप सन्तों की इस बात से सहमत हैं ? 
प्रश्न - प्राचीन भारतीय हिन्दू सभ्यता संस्कृति ( भारतीयता के नाम पर अभी की प्रदूषित संस्कृति नहीं ) के अनुसार एक भारतीय नारी की श्रंगारिक वस्तुयें और धातुगत या पुष्प आदि के आभूषण महज उसके सौन्दर्य वर्धन हेतु न होकर उसके पूर्ण स्वास्थय और मानसिक उन्नयन हेतु थे । जैसे सिर के बीच मांग में सिन्दूर की रेखा ( मष्तिष्क की पूर्ण सक्रियता हेतु ) आज्ञाचक्र पर रार युक्त बिन्दी ( आज्ञाचक्र को सक्रिय रखने हेतु । जिससे वैचारिक क्षमता केन्द्रित होकर निरन्तर ऊर्जावान रहे ।) खुशबू युक्त फ़ूलों के हार गजरे आदि सुगंध प्रेरित सात्विक उत्तेजना और पवित्रता में वृद्धि हेतु । इसी तरह कर्ण भुजा पद आदि में पहने जाने वाले आभूषण विभिन्न रक्त विकार शरीरी विद्युत और शरीर के अवांछित तत्वों को बाहर निकालते थे । क्या आप इस बात से सहमत हैं ? और यदि हाँ । तो क्या आप मानते हैं । हिन्दू धर्म सभ्यता संस्कृति शरीर जीवन लोक परलोक आत्मा आदि विषयों पर पूर्णतः वैज्ञानिक और सर्वश्रेष्ठ जीवन पद्धति है ?
प्रश्न - क्या आप मानते हैं कि आज का वैश्विक समाज सिर्फ़ स्वयं के शरीर के भौतिक सुख और सम्बन्धों की दृष्टि से सिर्फ़ कामवासना सम्बन्ध तक ही केन्द्रित होकर रह गया है । माता पिता भाई बहन मित्र आदि सामाजिक सम्बन्ध सिर्फ़ नाममात्र के रह गये हैं । क्या आप मानते हैं कि आज के समाज में कामवासना के अति विस्तार से अन्य बहुत सी कलाओं विद्याओं और रुचियों का तेजी से हास हुआ है ।
प्रश्न - क्या आप मानते हैं कि शरीर की तमाम बीमारियां सिर्फ़ प्राण वायु के विकारी होने और प्रथ्वी जल वायु अग्नि आकाश इन पाँच तत्वों में क्षीणता आने से होते हैं । प्राणायाम द्वारा प्राणवायु निर्मल हो जाता है । और ध्यान योग द्वारा पंच तत्व सबल हो जाते हैं । कोई एक तत्व विशेष क्षीण हो जाने पर उसे संयम ध्यान द्वारा ठीक करने का उपाय होता है । आप इस बात से कितना सहमत हैं ?

प्रश्न - यदि किसी को एक शहर से दूसरे शहर में स्थानान्तरण जैसा ही कार्य करना हो । या फ़िर बाजार से कोई महंगी वस्तु या वस्तुयें ही क्यों न लानी हों । वह पूर्ण गम्भीरता और तैयारी के साथ तन मन धन से संयुक्त हुआ उस कार्य को बेहद सावधानी से करता है । लेकिन स्वर्ग और परमात्मा का मिलना इनके तुलनात्मक लोगों को बहुत साधारण और अगम्भीर सा कार्य लगता है । उसे एक आवश्यक कार्य की तरह वे सबसे पहले करना आवश्यक भी नहीं समझते । और अपने अपने धर्म अनुसार मन्दिर चर्च गुरुद्वारे आदि जाना । और कुछ पूजा पाठ आदि करने से ही मान लेते हैं । अब उनका मोक्ष या स्वर्ग पक्का ही है । अपनी इसी  धारणा के चलते सभी मृतकों के आगे स्वर्गवासी भी लिखा जाता है । पर क्या ये वास्तव में सत्य है ? क्या ये प्राप्तियां इतनी ही आसान हैं ?  

प्रश्न - 21वीं सदी में भारत विश्व का आर्थिक सामाजिक और धार्मिक नेतृत्व करेगा । भारत ही एकमात्र विश्व का धर्मगुरु होगा । और एक लम्बे समय तक फ़िर से सम्पूर्ण विश्व का धर्म सनातन धर्म ही होगा । ये भविष्यवाणियां अनेकों भविष्य दृष्टाओं ने काफ़ी पहले से समय समय पर की हैं । वर्तमान में आज जो वैश्विक हालात हैं । सभी धर्म पैशाचिक रूप धारण कर विकृत होने की पराकाष्ठा तक पहुँच चुके हैं । अभी कुछ ही दिनों से हिन्दू जागरण और हिन्दुत्व की यकायक जो लहर चली । उसके मद्देनजर क्या ये बात आपको सत्य लगती है ?
- यदि आप एक स्वस्थ सार्थक देश समाज और स्वयं के लिये उपयोगी खुली बहस में भाग लेना चाहते हैं । तो इस समूह से अवश्य जुङिये ।
https://www.facebook.com/groups/supremebliss/164283780433826/?notif_t=group_comment
एक टिप्पणी भेजें

Follow by Email