21 सितंबर 2013

प्रथ्वी से शादी करने की ख्वाहिश

आदि शंकराचार्य के प्रसिद्ध विवरण के अनुसार वे अपनी माँ के अकेले ही पुत्र थे । और उनके पिता जीवित नहीं थे ( हालांकि मैं इस बिन्दु पर पूर्णतयाः स्पष्ट नहीं हूँ ) फ़िर एक घटना के अनुसार तालाब में मगरमच्छ ने उनका पैर पकङ लिया । माँ द्वारा उससे छुङाने का आग्रह करने पर शंकराचार्य ने उनसे वचन लिया कि वे उनके सन्यास में बाधा नहीं बनेंगी । यानी घर त्यागने से रोकेंगी नहीं । तब माँ ने भी वचन लिया कि भले ही शंकराचार्य जीवन भर उनके पास न आयें । पर मृत्यु समय अवश्य आयें । शंकराचार्य ने वचन दिया । कालान्तर में शंकराचार्य ने सन्यास योग वेदान्त आदि पर अध्ययन प्रयोग आदि किये । जिनमें काशी के मंडन मिश्र से उनका शास्त्रार्थ बहु प्रसिद्ध ही है । इसमें काम ( वासना ) कला विषयक प्रश्नों पर आचार्य को मंडन मिश्र की पत्नी के समक्ष हार माननी पङी । क्योंकि शास्त्रार्थ के नियम अनुसार कोई भी व्यक्ति किसी विषय पर अधिकारिक तौर पर उत्तर देने का तभी अधिकारी है । जब वह

उस विषय में खुद के प्रयोगात्मक अनुभव रखता हो । न कि सुने पढे हुये । अतः शंकराचार्य ने सन्यासी होने की विवशता बताते हुये इस विषय से अपरिचित होने का कारण बताया । और कुछ समय लेकर उसी समय मृत्यु को प्राप्त हुये एक राजा के शरीर में योग ज्ञान " परकाया प्रवेश " द्वारा  स्थिति हो गये । और राजा की रानियों से संयोग कर कामकला के विभिन्न पहलुओं का प्रयोग किया । और अधिकारिक व्यक्ति होने के बाद मंडन मिश्र की पत्नी को हराया । तभी उन्हें जगदगुरु की उपाधि दी गयी । इसके बाद कहते हैं कि जब उनकी माँ का निधन हुआ । तो शंकराचार्य के मुँह ( जीभ पर ) में दूध आया । इससे शंकराचार्य को अपनी माँ के निधन का अहसास हो गया । और वे अपने शिष्यों को जमीन मार्ग से आने को कहकर स्वयं आकाश मार्ग से द्रुति गति से माँ के पास पहुँचे । आपके विचार से क्या ये मनगढन्त ही है । या पूर्णतया सच है । या आंशिक सच है ।
- आध्यात्म वैज्ञानिकों के अनुसार अलल पक्षी एक ऐसा पक्षी है । जो कभी जमीन पर नहीं रहता । यहाँ तक कि पैर भी नहीं रखता । लगभग कोयल जैसे दिखने वाले इस पक्षी की मादा अपना अंडा भी आकाश में बहुत ऊँचाई से उङते हुये देती है । फ़िर ये अंडा तेजी से जमीन पर गिरने लगता है । ये अविश्वसनीय सा है । मगर जमीन पर आते आते आने से बहुत पहले ही वह अण्डा परिपक्व होकर फ़ूट जाता है । और हैरतअंगेज तरीके से जमीन पर आने से पूर्व ही इसमें निकला शिशु पक्षी वापस आकाश की ओर उङ जाता है । जहाँ उसका वास्तविक घर है ।

और अपने माँ बाप से जा मिलता है । दरअसल ये वास्तविक मगर तुलनात्मक उदाहरण उन साधकों के लिये हैं । जो प्रथ्वी से सिर्फ़ उतना ही वास्ता रखते हैं । जितना आवश्यक है । और अपना काम पूरा होते ही वे फ़िर से अपने असली घर और असली पिता के पास उङ जाते हैं । क्या आप इस अनोखी मगर सत्य कथा से सहमत हैं ।
- चलिये पक्षियों की ही बात चल गयी है । तो अलल पक्षी तो अपवाद स्वरूप ही किसी ने देखा होगा । लेकिन आज मैं आपको एक ऐसे पक्षी के बारे में बताता हूँ । जिसको " हारिल पक्षी " के नाम से जाना जाता है । और आपको ये आम देखने को मिल जायेगा । हमारे चिन्ताहरण आश्रम के पास तो ये बहुतायत में हैं । एक प्रसिद्ध प्राचीन कथा के अनुसार प्रियवृत नाम का एक राजा हुआ था । वह ( गो रूप ) प्रथ्वी ( देवी ) की सुन्दरता पर आसक्त होकर उनसे विवाह का प्रस्ताव कर बैठा । प्रथ्वी देवी ने मन ही मन उसका उपहास सा करते हुये विवाह की स्वीकृति दे दी । और अपने स्थूल भू मंडल की विधिवत सात भांवर डालने की शर्त रखी । या कहा । इसको स्वीकार करते हुये प्रियवृत भांवरें डालने लगे । और चौथी पाँचवी भांवर में ही वृद्धावस्था को प्राप्त होकर निढाल से गिर पढे । और हार मानकर उन्होंने प्रथ्वी को माँ मान लिया । और ( संभवत ) प्रथ्वी के शापवश हारिल पक्षी रूप हो गये । प्रसिद्ध पुस्तकों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार ये हारिल पक्षी आज भी जमीन पर पैर नहीं रखता । और इस हेतु जमीन पर उतरने से पूर्व अपने पंजों में एक लकङी दबाये रहता है ।  क्या आप इस अदभुत कथा से सहमत हैं ?
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