23 सितंबर 2013

योगाग्नि के मूलभूत मुख्य सिद्धांत और रहस्य

हमारे एक नियमित पाठक और शुभचिन्तक को योगाग्नि के बारे में जिज्ञासा हुयी है । और मैंने सदैव ही कहा है । यदि वह शब्द हिन्दी या संस्कृत का है । तो बहुत अधिक अर्थ स्वयं ही स्पष्ट कर देता है । जैसे यह शब्द योग और अग्नि से संयुक्त होकर बना है । योग का सीधा मतलब जोङ या संग्रह से है । और अग्नि का ताप से है । तब यह शब्द इतना बताकर चुप हो जाता है कि किसी प्रकार के ताप का संग्रह । लेकिन हमने इतनी भारी भरकम धार्मिक धारणायें बना रखीं हैं कि किसी से इस शब्द का अर्थ पूछो । तो शायद सतयुग से लेकर अब तक की कथा ही बता डाले । इसीलिये हम इतना सरल सहज ज्ञान समझने से वंचित हो जाते हैं । क्योंकि हमें सरलता के बजाय जटिलता में उलझना कुछ अधिक ही अच्छा लगने लगा है ।
अतः हम योगाग्नि के बारे में बात करते हैं । अब यहाँ योग शब्द अपनी क्रिया ( जुङाव ) करके निष्क्रिय हो जायेगा । इसका कार्य सिर्फ़ इतना ही है । उदाहरण के लिये आप विद्युत के किसी प्लग का विद्युत स्रोत से योग कर दें । आगे जरूरत रह जाती है । किसी ताप विशेष की । यहीं से सृष्टि की अथाह विलक्षणता और विभिन्नता किसी साधक या योगी के सामने कृमशः उसके गुरु और स्वयं उसकी क्षमता अनुरूप प्रकट होने लगती है । फ़िर भी कहना उचित ही है कि कोई भी गिनती सदैव 1 से ही शुरू होती है । या आप किसी अपार खजाने के एकदम पास भी पहुँच जायें । तो भी उसको थोङा थोङा करके ही भर पायेंगे । आप किसी फ़लदार बाग में पहुँच जायें । तो भी क्षमता से अधिक नहीं खा सकते । अतः धीरता गम्भीरता सरलता आदि गुण किसी भी यौगिक क्रिया के आवश्यक अंग है । जो वास्तव में सच्चे सन्तों की संगत और सतसंग ( ज्ञान ) से ही समझ में आते हैं ।

बारह वर्ष रहो सन्त की टोली । आवे समझ तब हँस की बोली ।
खैर..आईये इसी बहाने आपको योगाग्नि या योगशक्ति के मूलभूत सिद्धांत और रहस्य से अवगत कराते हैं । ऊपर स्पष्ट हो चुका है - ताप । और इसको और भी प्राथमिक रूप में देखें । तो - ऊर्जा । अब यदि आध्यात्म के सूक्ष्म झमेले में पङने के बजाय सिर्फ़ ऊर्जा शब्द से ही समझें । तो अधिक आसानी रहेगी । पहले कई बार बता चुका हूँ । चेतन गुण सिर्फ़ आत्मा में ही होता है । और उसी की चेतना से मूल ऊर्जा का निर्माण होता है । जो विराट सृष्टि में स्थिति अनुसार वितरण होकर बिखरी हुयी भी है । और निरन्तर असीम स्तर पर उत्पन्न भी हो रही है । इसी मूल ऊर्जा के अनेक रूपान्तरण बन जाते हैं । जिसका सबसे प्रथम शुद्ध रूप वह आकाशीय विद्युत है । जो हमने देखी ही है । इसके बाद ये अनेकानेक स्थूल रूपों में हो ( कर विभिन्न पदार्थों में भी नियम अनुसार लय ) जाती है । लेकिन जो आकाशीय विद्युत वाली शक्ति है । यह सिर्फ़ उच्च स्तरीय आत्मज्ञानी सन्तों के पास 

ही होती है । द्वैत की सबसे बङी शक्तियों या अद्वैत की भी कुछ महाशक्तियां इससे वंचित रहती हैं । क्योंकि इसको संभालना तो दूर छूना भी कल्पना से परे ही है ।
तब कोई साधक नीचे से अपने सत रज तम तीन गुणों युक्त यंत्र शरीर से कृमशः सत गुण द्वारा सात्विक ऊर्जा को योग द्वारा ग्रहण करता हुआ संग्रह भी करता है । और उसी ऊर्जा का प्रयोग कर अंतरिक्ष में ऊपर भी उठता है ।
अब सबसे मुश्किल ये है कि हठवादिता के चलते प्रायः मनुष्य किसी भी वस्तु या क्रिया का मूलभूत नियम सिद्धांत जाने माने बिना अपनी मनमानी करता है । और किसी नतीजे पर न पहुँचता हुआ प्रायः ज्ञान या सन्तों में दोष निकालता है । या इस ज्ञान को " मिथक " जैसा नाम देता है । इसलिये आईये जाने । वर्षों तक ध्यान पर घण्टों बैठने जप तप के बाद भी क्यों मनुष्य में योग शक्ति का जागरण नहीं होता ।
लेकिन उससे पहले मैं आपको एक भौतिक जगत के उदाहरण से समझाता हूँ । मान लीजिये । आपके पास एक मोबायल फ़ोन का चार्जर है । और केवल वही यंत्र या तरीका है । जिससे निकलती 2-3 वोल्ट की ही विद्युत आप उपयोग कर सकते हैं । वह भी तब । जब वह चार्जर ( स्वस्थ शरीर ) एकदम सही स्थिति में हो । तब इस चार्जर से प्राप्त विद्युत से आप पंखा बल्ब एसी या अन्य बङे विद्युत उपकरण चला सकते हैं ? नहीं ना ।

अब मान लीजिये । आपके घर की विद्युत तार क्षमता ( कनेक्शन शब्द को समझें ) वाला विद्युत प्रवाह आपको मिले । तब उससे चक्की या कोई बङा कारखाना आदि चला सकते हैं ? नहीं ना । भौतिकवाद के काफ़ी करीब होने से आप समझ गये होंगे कि हमें जितना बङा उपकरण और जितना बङा कार्य करना है । उसी अनुसार हमें शक्तिशाली विद्युत प्रवाह और उस प्रवाह से जोङने हेतु उसी क्षमता के सम्बन्ध सूत्र की आवश्यकता होगी ।
अब अगर आपको यह बात समझ में आ गयी हो । तो फ़िर निश्चित तौर पर यह सत्य है कि मनुष्य की योग क्षमता सिर्फ़ मोबायल फ़ोन चार्जर के समान महज 2-3 वोल्ट ही है । इसीलिये योग में उच्चता प्राप्त करने के सभी प्रयास नाकाम हो जाते हैं । अब आईये । शरीर विज्ञान द्वारा इसका वैज्ञानिक कारण जानें । हमारे शरीर में प्रमुख चेतना प्रवाह सिर्फ़ हमारी स्वांस ही है । इसी डोर ( से उत्पन्न धङकन ) से प्राण वायु को चेतना मिलती है । फ़िर और भी यांत्रिक विधि नियमों द्वारा शरीर में ताप ( विभिन्न अग्नियां ) आदि अन्य चीजें बनती हैं ।
तो हमारी ये स्वांस दरअसल मष्तिष्क द्वारा एक जटिल प्रक्रिया से बहुत ही सूक्ष्म छिद्र द्वारा इतनी सीमित ( शक्ति या करेंट ) क्षमता के साथ आती है कि हम बस मनुष्य स्तर का ही जीवन आसानी से निर्वाह कर सकें । और अपने स्तर पर हम कभी इस क्षमता को बङा नहीं सकते । क्योंकि प्रथम तो हम जानते नहीं । दूसरे हमारे 

पास वह साधन ( बङी क्षमता के तार आदि ) भी नहीं । तीसरे हमें ज्ञात भी नहीं कि इससे बङा शक्ति स्रोत कहाँ और कैसे है ? अच्छा अचानक भी नहीं हो सकता । क्योंकि बाकायदा भौंहों से नीचे के शरीर भाग ( मान लो । भौंह से ऊपर का सभी शिरोभाग ) जिसे पिण्ड कहते हैं । तक ही सामान्य मनुष्य की पहुँच है । बाकी नाक की जङ से ऊपर का दिमागी हिस्सा बन्द ( लाक्ड ) है । और यहीं से वो मुख्य तार शुरू हुयी है । जो कृमशः आगे ( योग ) श्रंखला बनाती हुयी कृमबद्ध तरीके से अन्तिम छोर तक पहुँचती है । और इसी श्रंखला के बीच बीच में स्थापित विभिन्न क्षमता वाले विद्युत केन्द्रों को ही योग शक्ति कहा जाता है । आपने जहाँ तक की योग यात्रा कर उसे सिद्ध कर लिया । उतने शक्ति सम्पन्न हो गये ।
अब यदि मैं तन्त्र मन्त्र चक्र ध्यान कुण्डलिनी आदि योग विधियों से कृमशः कैसे शक्ति संग्रह कर योग क्षमता बढाई जाती है । तो वह तो अति अति विस्तार की बात हो गयी । अतः मैं सीधे हमारे यहाँ की आत्मज्ञान की हँसदीक्षा द्वारा बताता हूँ । हँसदीक्षा में आज्ञाचक्र को पूर्ण सक्रिय कर साधक को लगभग सीधे ही 2-3 वोल्ट से एकदम 11 000 वाली लाइन से जोङ दिया जाता है । लेकिन सिर्फ़ भौतिक विज्ञान से परिचित होने के कारण आपको ये बात अजीब सी लगेगी । क्योंकि फ़िर कोई भी शरीर इसको सहन नहीं कर पायेगा । बात बिलकुल सही है । इसीलिये साधक को सीधे सीधे जोङने के बजाय प्रथम किसी सक्षम माध्यम ( कोई उस स्तर का सफ़ल साधक ) के द्वारा जोङा जाता है । तब इस आंतरिकता से जुङ जाने के कारण नये साधक में आटोमेटिकली ही सत्व गुण प्रबल होने लगता है । क्योंकि सीनियर साधक अभ्यास द्वारा निरन्तर जुङा भी है । और सात्विक ऊर्जा में वृद्धि भी कर रहा है । यहाँ एक और चीज है । परमात्म सत्ता की व्यवस्था इतने सटीक ढंग से कार्यरत है कि विधिवत जुङे हुये साधक को

कब क्या कैसे आवश्यक है । वह लगभग स्वचालित ढंग से हो जाता है । यानी इसमें कोई भी त्रुटि दोष होने की कतई सम्भावना ही नहीं है । यहाँ तक कि माध्यम साधक को भी विशेष बोध नहीं हो पाता । फ़िर कालान्तर में स्वस्थ होकर जब नया साधक कुछ सक्षम होने लगता है । तब उसे परीक्षण हेतु धीरे धीरे कुछ समय के लिये स्वतन्त्र रूप से भी जोङ दिया जाता है । और फ़िर चेतना स्थिति बढने पर फ़िर उतना ही बङा माध्यम । इस तरह योगाग्नि का संचय होता है । अब प्रश्न ये है कि इस योगाग्नि का उपयोग क्या है ? यहाँ फ़िर वही सृष्टि की विलक्षणता वाला नियम सिद्धांत कार्य करता है । यानी वह योग किस तरीके से । किस भावना से । किस गुरु से । किस नियम से । किस लक्ष्य से आपने किया था । बाकी सरल अर्थों में योगाग्नि का अर्थ ( आत्मिक ) ऊर्जा और ऊर्जा के शुद्धतम रूप से ही है । इस योगाग्नि से आप अपने संस्कार भी जला सकते हैं । पाप जला सकते हैं । अज्ञान नष्ट कर सकते हैं । इसको धन आदि में परिवर्तित कर उच्च दिव्य स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं । इसको ईंधन में परिवर्तित कर आप लोक लोकान्तरों की यात्रा भी कर सकते हैं । इससे आप खुद का और अन्य का मनचाहा भला भी कर सकते हैं । सरल शब्दों में समझें । तो ये एक ऐसी शक्ति है । जिससे मनचाही स्थिति वैभव को प्राप्त हुआ जा सकता है । अगर गौर से देखें । तो आज संसार की डांवाडोल स्थिति ऊर्जा से ही तो है । अरब के तेल कुंयें और अमेरिका का उन पर आधिपत्य लालच ही तमाम वैश्विक असमता को जन्म दे रहा है कि नहीं । और योगी के पास तो शुद्ध ऊर्जा होती है । अतः यही योग आपको रावण भी बना सकता है । और राम भी । ये सभी योगी ही तो हैं ।
विशेष - मेरे विचार से मैंने इस विषय को अधिकाधिक स्पष्ट करने की कोशिश की है । फ़िर भी मेरी मानसिकता और आपकी मानसिकता में बेहद फ़र्क होने से आपको कहीं उलझन प्रतीत हो सकती है । यदि ऐसा है । तो उस बिन्दु पर स्पष्ट भाव में प्रश्न करें ।
- आप सभी के अंतर में विराजमान सर्वात्म प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।
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