02 मई 2011

अहंकार का आखिरी खेल

अष्टावक्र ने जानने की इच्छा को भी अन्य इच्छाओं जैसी बताया हैं । जबकि अन्य ज्ञानी मुमुक्षा की बहुत महिमा बताते हैं । कृपा पूर्वक इस पर प्रकाश डालें ।
- मुमुक्षा का पहले तो अर्थ समझ लें । मुमुक्षा तुम्हारी सारी आकांक्षाओं का संगृहीत होकर परमात्मा की ओर उन्‍मुख हो जाना है । जैसे छोटी छोटी आकांक्षाओं की नदियां हैं । छोटे छोटे झरने हैं । छोटी छोटी सरिताए हैं । नाले हैं । ये सब गिरकर गंगा बन जाती है । और गंगा सागर की तरफ दौड़ पड़ती है । तुम धन पाना चाहते हो । तुम पद पाना चाहते हो । तुम सुंदर होना चाहते । स्वस्थ होना चाहते । प्रतिष्ठित होना चाहते । ऐसी हजार हजार आकांक्षाएं हैं । जब सारी आकांक्षाएं 1 ही आकांक्षा में निमज्जित हो जाती हैं । और तुम कहते - मैं प्रभु को जानना चाहता । तो गंगा बनी । सब झरने, सब छोटे मोटे नाले इस महानद में गिरे । गंगा चली सागर की तरफ ।
लेकिन अंततः तो गंगा को भी मिट जाना पड़ेगा । नहीं तो सागर से मिल न पाएगी । 1 घड़ी तो आएगी सागर से मिलने के क्षण में । जब गंगा को अपने को भी मिटा देना होगा । नहीं तो गंगा का होना ही बाधा हो जाएगा । अगर गंगा सागर के तट पर खड़े होकर कहे कि मैं इतने दूर से आई । इतनी मुमुक्षा । इतनी ईश्वर मिलन की आस को लेकर । मैं मिटने को नहीं आई हूं । मैं तो ईश्वर को पाने आई हूं । तो चूक हो गई । तो गंगा खड़ी रह जाएगी किनारे पर । और चूक जाएगी सागर से । अंततः तो गंगा को भी सागर में गिर जाना है । और खो जाना है ।
पहले छोटी मोटी इच्छाएं मुमुक्षा की महा अभीप्सा में गिर जाती हैं । फिर मुमुक्षा की आकांक्षा भी अंततः लीन हो जानी चाहिए । इसलिए परम ज्ञानी तो यही कहेंगे कि मुमुक्षा भी बाधा है । यह जानने की इच्छा भी बाधा है । यह मोक्ष की इच्छा भी बाधा है ।
मुमुक्षा यानी मोक्ष की इच्छा । मैं मुक्त होना चाहता हूं । कोई धनी होना चाहता है । कोई शक्तिशाली होना चाहता है । कोई अमर होना चाहता है । कोई मुक्त होना चाहता है । लेकिन चाह मौजूद है । निश्चित ही मोक्ष की चाह सभी चाहो से ऊपर है । लेकिन है तो चाह ही । खूब सुंदर चाह है । लेकिन है तो चाह ही । खूब सजी संवरी चाह है । दुल्हन जैसी नई नई । लेकिन है तो चाह ही । और चाह बंधन है ।
जब तक मैं कुछ चाहता हूं । तब तक संघर्ष जारी रहेगा । क्योंकि मेरी चाह सर्व के विपरीत चलेगी । चाह का मतलब ही यह है । जो होना चाहिए । वह नहीं है । और जो है । वह नहीं होना चाहिए । चाह का अर्थ ही इतना है । चाह में असंतोष है । चाह असंतोष की अग्नि में ही पैदा होती है । और मोक्ष तो तभी घटता है । जब हम कहते हैं । जो है - है । और यही हो सकता है । तत्‍क्षण विश्राम आ गया । जो नहीं है । उसकी मांग नहीं । जो है । उसका आनंद । संतोष आ गया । परितोष आ गया । तुष्ट हुए । अष्टावक्र कहते हैं - बार बार आत्मा मिलती । बार बार तुष्टि मिलती । मुहुर्मुहु: ! फिर फिर । जैसे जैसे संतोष घना होता है । फिर और बड़ी शांति बरसती है । और संतोष घना होता है । और बड़ा आनंद बरसता है । और शांति गहन होती है । और परमात्मा उतरता है - मुहुर्मुहु: ! फिर फिर । बार बार । पुन: पुन: । और कोई अंत नहीं इस यात्रा का । तो मुमुक्षा परमात्मा के द्वार तक तो ले जाती है । लेकिन फिर द्वार पर अटका लेती है । अंतत: मुमुक्षा को भी छोड़ देना होगा । अंततः सब चाह छोड़ देनी होगी । उसमें मुमुक्षा की चाह भी सम्मिलित है । अगर मुक्त होना है । तो मुक्ति की आकांक्षा भी छोड़ देनी होगी ।
लेकिन जल्दी मत करना । पहले तो गंगा बनाओ । पहले तो और सब आकांक्षाओं को मुक्ति की आकांक्षा में समाविष्ट कर दो । 1 ही आकांक्षा प्रज्वलित रह जाए । मन हजार तरफ दौड़ रहा है । वह 1 ही तरफ दौड़ने लगे । मन में अभी खंड खंड हैं । न मालूम कितनी मांगें हैं ? 1 ही मांग रह जाए । 1 ही मांग रह जाएगी । तो तुम एकजुट हो जाओगे । तुम्हारे भीतर 1 योग फलित होगा । तुम्हारे खंड समाप्त हो जाएंगे । तुम अखंड बनोगे । फिर जब तुम पूरे अखंड हो जाओ । तो अब तुम नैवेद्य बन गए । अब तुम जाकर परमात्मा के चरणों में अपनी अखंडता को समर्पित कर देना । अब तुम कहना - अब कुछ भी नहीं चाहिए । अब यह सब चाह । यह जानने की । मोक्ष की । तुझे खोजने की । यह भी तेरे चरणों में रख देते हैं । गंगा उसी क्षण सागर में सरक जाती है । उसी क्षण सागर हो जाती है ।
झलक होश की है अभी बेखुदी में । बड़ी खामियां हैं मेरी बंदगी में ।
झलक होश की है अभी बेखुदी में । बड़ी खामियां हैं मेरी बंदगी में ।
अगर तुम्हें इतना भी होश रह गया कि मैं बेहोश हूं । तो अभी बंदगी पूरी नहीं हुई । अभी प्रार्थना पूरी नहीं हुई । तुम अगर राह पर मदमाते, मस्त होकर चलने लगे । लेकिन इतना खयाल रहा कि देखो कितना मस्त हूं । तो मस्ती अभी पूरी नहीं । मस्ती तो तभी पूरी होती है । जब मस्ती का भी खयाल नहीं रह जाता । मोक्ष तो तभी पूरा होता है । जब मोक्ष की भी आकांक्षा नहीं रह जाती ।
झलक होश की है अभी बेखुदी में । बड़ी खामियां हैं मेरी बंदगी में ।
कैसे कहूं कि खत्म हुई मंजिले फनी ।
इतनी खबर तो है कि मुझे कुछ खबर नहीं ।
अगर इतनी भी खबर रह गई भीतर कि मुझे कुछ खबर नहीं । तो काफी है बंधन । काफी अड़चन । काफी अवरोध ।
और ध्यान रखना । बड़े बड़े अवरोध तो आदमी आसानी से पार कर जाता है । छोटे अवरोध असली अड़चन देते हैं । धन पाना है । यह आकांक्षा तो बड़ी क्षुद्र है । इसको हम मोक्ष पाने की आकांक्षा में समाविष्ट कर दे सकते हैं । बड़ी आकांक्षा इसकी जगह रख देते हैं । मोक्ष पाने की आकांक्षा । सब विकृत । सब कुरूप । धीरे धीरे सुंदर हो जाता है । मोक्ष की धारणा ही सौंदर्य की धारणा है । सब प्रसाद पूर्ण हो जाता है । तब तो पता भी नहीं चलता कि - कोई दुख है । कोई पीड़ा है । फिर तो इतनी छोटी बाधा रह जाती है - पारदर्शी । दिखाई भी नहीं पड़ती । अगर ईंट पत्थर की दीवाल चारों तरफ हो । तो दिखाई पड़ती है । कांच की दीवाल । शुद्ध काच की दीवाल । स्फटिक मणियों से बनी है । कुछ बाधा
नहीं मालूम पड़ती । आरपार दिखाई पड़ता है । दीवाल का पता ही नहीं चलता । लेकिन दीवाल अभी है । अगर निकलने की कोशिश की । तो सिर टकराएगा । मुमुक्षा कांच की दीवाल है । दिखाई भी नहीं पड़ती । संसारी की तो वासनाएं बड़ी क्षुद्र हैं । स्थूल हैं । पत्थरों जैसी हैं । संन्यासी की आकांक्षा बड़ी सूक्ष्म है । बड़ी पारदर्शी है । और बड़ी सुंदर है । अटका ले सकती है । अगर तुम्हें इतनी भी याद रह गई कि मुक्त होना है । तो तुम अभी मुक्त नहीं हुए । और मुक्त होना है । यह वासना अगर मन में बनी है । तो तुम मुक्त हो भी न सकोगे । क्योंकि मुक्त होने का कुल इतना ही अर्थ होता है कि अब कोई चाह न रही । मगर यह तो 1 चाह बची । और इस चाह में तो सभी बच गया । इसलिए अष्टावक्र ने बड़ी क्रांतिकारी बात कही । काम, अर्थ से तो मुक्त होना ही । धर्म से भी मुक्त होना । ऐसा कोई सूत्र किसी ग्रंथ में नहीं है । अर्थ और काम से मुक्त होने को सबने कहा है । धर्म से भी मुक्त होने को किसी ने नहीं कहा है । अष्टावक्र उस संबंध में बिलकुल मौलिक और अनूठे हैं । वे कहते हैं - धर्म से भी मुक्त होना है । नहीं तो धर्म ही बाधा बन जाएगा । अंततः तो सभी चाह गिर जानी चाहिए ।
कैसे कहूं कि खत्म हुई मंजिले फनी ।
मंजिले फनी का अर्थ होता है शून्य हो जाना ।
कैसे कहूं कि खत्म हुई मंजिले फनी ।
कैसे कहूं कि मैं शून्य हो गया ?
इतनी खबर तो है कि मुझे कुछ खबर नहीं ।
इतनी बाधा तो अभी बनी है ।
इतनी खबर तो है कि मुझे कुछ खबर नहीं ।
मगर इतना काफी है । इतनी दीवाल पर्याप्त है । इतनी दीवाल चुका देगी । हिमगिरि लांघ चला आया मैं । लघु कंकर अवरोध बन गया ।
क्षण का साहस केवल संशय । अगर मूल में जीवित है भय ।
जलनिधि तैर चला आया मैं । उथला तट प्रतिरोध बन गया ।
साध्य विमुक्त स्वयं से होना । द्वंद्व विगत क्या पाना खोना ।
हुआ समन्वय सबसे लेकिन । निज से वही विरोध बन गया ।
सूक्ष्म ग्रंथि में यह रेशम मन । सुलझाने में उलझा चेतन ।
क्रिया अहं से इतनी दूषित । शोधन ही प्रतिशोध बन गया ।
हिमगिरि लांघ चला आया मैं । लघु कंकर अवरोध बन गया ।
बड़े पहाड़ आदमी पार कर लेता है । छोटा सा कंकर अटका लेता है । हाथी आसानी से निकल जाता है । पूंछ ही मुश्किल से निकलती है । पूंछ ही अटक जाती है ।
जलनिधि तैर चला आया मैं । उथला तट प्रतिरोध बन गया
बहुत लोग हैं । जो सागर तो तैर जाते हैं । फिर किनारे से उलझ जाते हैं । महावीर के जीवन में बड़ा मीठा उल्लेख है । महावीर का प्रधान शिष्य था - गौतम गणधर । वह वर्षों महावीर के साथ रहा । लेकिन मुक्त न हो सका । वह सबसे ज्यादा प्रखर बुद्धि व्यक्ति था महावीर के शिष्यों में । उसकी बेचैनी बहुत थी । वह बहुत मुक्त होना चाहता था । उसकी आकांक्षा में कोई कमी न थी । और वह सोचता था - अब और क्या करूं ? सब दाव पर लगा दिया । सब जीवन आहुति बना दिया । अब मोक्ष क्यों नहीं हो रहा है ? लेकिन यह बात उसकी समझ में नहीं आती थी कि यही बात बाधा बन रही है । यह जो आग्रह है । यह जो आकांक्षा है कि मोक्ष क्यों नहीं हो रहा ? यही बेचैनी यही तनाव खड़ा कर रही है । यह मोक्ष की आकांक्षा भी अहंकार जन्य है । यह अहंकार का आखिरी खेल है । अब वह मोक्ष के नाम पर खेल रहा है । महावीर की मृत्यु हुई । तो उस दिन गौतम बाहर गया था । कहीं पास के गांव में उपदेश करने गया था । लौटता था तो राहगीरों ने कहा कि - तुम्हें पता नहीं । महावीर तो छोड़ भी चुके देह ? तो वह वहीं रोने लगा । रोते रोते उसने इतना पूछा राहगीरों से कि - मेरे लिए कोई अंतिम संदेश छोड़ा है ? क्योंकि वह निकटतम शिष्य था । और महावीर की उसने अथक सेवा की थी । और सब दाव पर लगाया था । फिर भी कुछ अड़चन थी कि समझ में नहीं आता था । क्यों अटका है ? तो उन्होंने कहा - हम तो समझ नहीं पाए कि उपदेश का क्या अर्थ है । क्या संदेश का अर्थ है ? उन्होंने छोड़ा जरूर है । वचन हमें याद है । हम वह कह देते हैं । हमें अर्थ मालूम नहीं । अर्थ तुम हमसे पूछना भी मत । तुम जानो । और वे जानें । इतना ही उन्होंने कहा कि - हे गौतम, तू पूरी नदी तो तैर गया । अब किनारे पर क्यों रुक गया है ? और कहते हैं । यह सुनते ही गौतम ज्ञान को उपलब्ध हो गया । यह सुनते ही मोक्ष घट गया ।
हिमगिरि लांघ चला आया मैं । लघु कंकर अवरोध बन गया । 
जलनिधि तैर चला आया मैं । उथला तट प्रतिरोध बन गया ।
आदमी पूरा सागर तैर जाता है । फिर सोचता है । अब तो किनारा आ गया । अब किनारे को पकड़ कर रुक जाता है । किनारे को भी छोड़ना पड़े । सब छोड़ना पड़े । छोड़ना भी छोड़ना पड़े । तभी तुम बचोगे अपने शुद्धतम रूप में - निरंजन । तभी तुम्हारा मोक्ष प्रगट होता है ।
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