05 मई 2011

मुसीबत से कहीं छुटकारा नहीं

स्वामी रामतीर्थ का 1 शेर है ।
राजी हैं उसी हाल में । जिसमें तेरी रजा है ।
यूं भी वाह वाह है । वू भी वाह वाह है ।
लेकिन अपने राम को तो ऐसा लगता है ।
यूं भी गड़बड़ी है । और वू भी गड़बड़ी है ।
यूं भी झंझटें हैं । और व भी झंझटें हैं ।
अब आपका क्या कहना ?
- मैं न तो रामतीर्थ से राजी हूं । न तुम्हारे राम से । 1 है जीवन के प्रति विधायक ( पाजिटिव ) दृष्टिकोण । 1 है जीवन के प्रति नकारात्मक ( निगेटिव ) दृष्टिकोण । जब रामतीर्थ कहते हैं - राजी हैं उसी हाल में । जिसमें तेरी रजा है । तो उन्होंने जीवन को 1 विधायक दृष्टि से देखा । कांटे नहीं गिने । फूल गिने । रातें नहीं गिनी । दिन गिने । अगर रामतीर्थ से तुम पूछो । तो वे कहेंगे - 2 दिनों के बीच में 1 छोटी सी रात होती है । वे फूलों की चर्चा करेंगे । वे कांटो की चर्चा न करेंगे । वे कहेंगे - क्या हुआ । अगर थोड़े बहुत कांटे भी होते हैं । फूलों की रक्षा के लिए जरूरी हैं । जीवन में जो सुखद है । उस पर उनकी नजर है । जो शुभ है । सुंदर है । असुंदर की उपेक्षा है । अशुभ के प्रति ध्यान नहीं है । और अगर प्रभु ने अशुभ भी चाहा है । तो उसमें भी कोई छिपा हुआ शुभ होगा । ऐसी उनकी धारणा है ।
यह आस्तिक की धारणा है । यह स्वीकार भाव है । जो व्यक्ति कहता है - प्रभु ! मैंने तेरे लिए परिपूर्ण रूप से ही कह दी । जिस व्यक्ति ने अपनी चैक बुक बिना कुछ आकड़े लिखे हस्ताक्षर करके प्रभु को दे दी  कि अब तू जो लिखे । वही स्वीकार है ।
राजी हैं उसी हाल में । जिसमें तेरी रजा है ।
यूं भी वाह वाह है । बू भी वाह वाह है । 
रामतीर्थ कहते हैं - जहां रख यूं भी तो भी ठीक । बू भी तो भी ठीक । स्वर्ग दे दे तो भी मस्त । नर्क दे दे तो भी मस्त । तू हमारी मस्ती न छीन सकेगा । क्योंकि हम तो तेरी रजा में राजी हो गए ।
फिर तुम कहते हो । लेकिन अपने राम को ऐसा लगता है - यूं भी गड़बड़ी है । बू भी गड़बड़ी है । यह रामतीर्थ से ठीक उल्टा दृष्टिकोण है । यह नास्तिक की दृष्टि है - नकारात्मक । तुम कांटे गिनते हो । तुम कहते हो कि हाँ दिन होता तो है । लेकिन 2 रातों के बीच में 1 छोटा सा दिन । इधर भी रात । उधर भी रात । इधर गिरे तो कुआ । उधर गिरे तो खाई । बचाव कहीं नहीं दिखता । रामतीर्थ का स्वर है राजी का । तुम्हारा स्वर है नाराजी का । तुम कहते हो - गृहस्थ हुए तो झंझटें हैं । संन्यासी हुए तो झंझटें हैं । घर में रहो तो मुसीबत है । घर के बाहर रहो तो मुसीबत है । अकेले रहो तो मुसीबत है । किसी के साथ रहो तो मुसीबत है । मुसीबत से कहीं छुटकारा नहीं । तुम अगर स्वर्ग में भी रहोगे । तो झंझट में रहोगे । स्वर्ग की भी झंझटें निश्चित होंगी । स्वर्ग में भी प्रतिस्पर्धा होगी । कौन ईश्वर के बिलकुल पास बैठा है ? कौन दूर बैठा है ? किसकी तरफ ईश्वर ने देखा । और किसकी तरफ नहीं देखा ? और राजनीति भी चलेगी ही । आदमी जहां है । राजनीति आ जाएगी ।
जब जीसस विदा होने लगे । तो उनके शिष्यों ने पूछा - अंत में इतना तो बता दें कि स्वर्ग में आप तो प्रभु के ठीक हाथ के पास बैठेंगे । हम 12 शिष्यों की क्या स्थिति होगी ? कौन कहां बैठेगा ? गुरु जीसस को सूली लगने जा रही है । और शिष्यों को राजनीति पड़ी है । कौन कहां बैठेगा ? यह भी कोई बात थी ? बेहूदा प्रश्न था । लेकिन बिलकुल मानवीय है । नंबर 2 आपसे कौन होगा रू । नंबर 3 कौन होगा ? चुने हुए कौन लोग होंगे ? परमात्मा से हमारी कितनी निकटता और कितनी दूरी होगी ? नहीं । तुम स्वर्ग में भी जाओगे । तो वहां भी कुछ गड़बड़ ही पाओगे । किसी को सुंदर अप्सरा हाथ लग जाएगी । किसी को न लगेगी । तुम वहां भी रोओगे कि जमीन पर भी चूके । यहां भी चूके । वहां भी लोग कब्जा जमाए बैठे थे । यहां भी पहले से ही साधु संत आ गए हैं । वे कब्जा जमाए बैठे हैं । तो मतलब, गरीब सब जगह मारे गए । यूं भी गड़बड़ी है । जूं भी गड़बड़ी है ।
यूं भी झंझटें हैं । और बू भी झंझटें हैं ।
यह देखने की दृष्टि है ।  तुम मुझसे पूछते हो । मेरा दृष्टिकोण क्या है ? मैं न तो आस्तिक हूं । न नास्तिक । मैं न तो हाँ की तरफ झुकता हूं । न ना की तरफ । क्योंकि मेरे लिए तो हाँ और ना 1 ही सिक्के के 2 पहलू हैं । रामतीर्थ ने जो कहा है । उसी को तुमने सिर के बल खड़ा कर दिया है । कुछ फर्क नहीं । तुमने जो कहा है । उसी को रामतीर्थ ने पैर के बल खड़ा कर दिया । कुछ फर्क नहीं । तुम समझते हो । तुम्हारी दोनों बातों में बड़ा विरोध है । मैं नहीं समझता । अब जरा गौर से देखने की कोशिश करो । राजी हैं उसी हाल में । जिसमें तेरी रजा है ।
इसमें ही नाराजगी तो शुरू हो गई । जब तुम किसी से कहते हो कि मैं राजी हूं । तो मतलब क्या ? कहीं न कहीं नाराजी होगी । नहीं तो कहा क्यों ? कहने की बात कहां थी ? कि नहीं । आप जो करेंगे । वही मेरी प्रसन्नता है । लेकिन साफ है कि वही आपकी प्रसन्नता है नहीं । स्वीकार कर लेंगे । भगवान जो करेगा । वही ठीक है । और किया भी क्या जा सकता है ? 1 असहाय अवस्था है । लेकिन गौर से देखना । जब तुम कहते हो कि नहीं । मैं बिलकुल राजी हूं । तुम जितने आग्रह पूर्वक कहते हो कि मैं बिलकुल राजी हूं । उतनी ही खबर देते हो कि भीतर राजी तो नहीं हो । भीतर कहीं कांटा तो है । मैं न तो आस्तिक हूं । न नास्तिक । मैं न तो कहता हूं कि राजी हूं । न मैं कहता हूं । नाराजी हूं । क्योंकि मेरी घोषणा यही है कि हम उससे पृथक ही नहीं हैं । नाराज और राजी होने का उपाय नहीं । नाराज और राजी तो हम उससे होते हैं । जिससे हम भिन्न हों । यही अष्टावक्र की महागीता का संदेश है ।
तुम ही वही हो । अब नाराज किससे होना । और राजी किससे होना ? दोनों में द्वंद्व है । वह जो कहता है । मैं तेरी रजा से राजी हूं । वह भी कहता है । तू मुझसे अलग । मैं तुमसे अलग । और जब तक तुम अलग हो । तब तक तुम राजी हो कैसे सकते हो ? भेद रहेगा । वह जो कहता है - मैं राजी नहीं हूं । वह भी इतना ही कह रहा है कि मेरी मर्जी और है । तेरी मर्जी और है । मेल नहीं खाती । 1 झुक गया है । 1 कहता है ठीक । मैं तेरी मर्जी को ओढ़े लेता हूं । लेकिन जब तक तुम हो । तब तक तुम्हारी मर्जी भी रहेगी । तुम दूसरे की ओढ़ भी लो । इससे कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला । जो महासत्य है । वह कुछ और है । महासत्य तो यह है कि उसके अलावा हम हैं ही नहीं । हम ही हैं । हमारी मर्जी ही उसकी मर्जी है । उसकी मर्जी ही हमारी मर्जी है । यह तुम्हारे चाहने न चाहने की बात नहीं है । तुम राजी होओ कि नाराजी होओ । इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता । तुम्हारी राजी और नाराजगी दोनों बात की खबर देती हैं कि तुमने अभी भी जीवन के अद्वैत को नहीं देखा । तुम जीवन के द्वैत में अभी भी उलझे हो । तुम अपने को अलग । परमात्मा को अलग मान रहे हो । यहां उपाय ही नहीं है किसको हाँ कहो । किसको ना कहो ? पर
1 सूफी फकीर परमात्मा से प्रार्थना करता था रोज । 40 वर्षों तक, कि - प्रभु तेरी मर्जी पूरी हो । तू जो चाहे । वही हो । 40  वें वर्ष, कहते हैं । प्रभु ने उसे दर्शन दिया । और कहा - बहुत हो गया । 40 साल से तू 1 ही बकवास लगाए है कि जो तेरी मर्जी हो । वही पूरी हो । 1 दफा कह दिया । बात खत्म हो गई थी । अब यह 40 साल से इसी बात को दोहराए जा रहा है । जरूर तू नाराज है । जरूर तू शिकायत कर रहा है बड़े सज्जनोचित ढंग से । बड़े शिष्टाचारपूर्वक । लेकिन तू रोज मुझे याद दिला देता है कि ध्यान रखना । राजी तो मैं नहीं हूं । अब ठीक है । मजबूरी है । तुम्हारे हाथ में ताकत है । और मैं तो निर्बल । अच्छा, तो राजी हूं । जो मर्जी । जो मर्जी - विवशता से उठ रहा है । जबर्दस्ती झुकाए जा रहे हैं । जैसे कोई जबर्दस्ती तुम्हारी गर्दन झुका दे । और तुम कुछ भी न कर पाओ । तो तुम कहो - ठीक जो मर्जी । लेकिन तुमने परमात्मा को अन्य तो मान ही लिया । परमात्मा अनन्य है । वही है । हम नहीं हैं । या हम ही हैं । वह नहीं है । 2 नहीं हैं । 1 बात पक्की है । मैं और तू ऐसे 2 नहीं हैं । या तो मैं ही हूं । अगर ज्ञान की भाषा बोलनी हो । अगर भक्त की भाषा बोलनी हो । तो तू ही है । मगर 1 बात पक्की है कि 1 ही है । तो फिर क्या सार है ? क्या अर्थ है - हां कहो कि ना कहो । किससे कह रहे हो ? अपने से ही कह रहे हो ।
1 झेन फकीर । बोकोजू रोज सुबह उठता । तो जोर से कहता - बोकोजू । और फिर खुद ही बोलता - जी हाँ कहिए । क्या आज्ञा है ? फिर कहता है कि - देखो ध्यान रखना । बुद्ध के नियमों का कोई उल्लंघन न हो । वह कहता - जी हजूर ! ध्यान रखेंगे ।  कोई भूल चूक न हो । स्मरण पूर्वक जीना । दिन फिर हो गया । वह कहता - बिलकुल खयाल रखेंगे । उसके 1 शिष्य ने सुना कि - यह क्या पागलपन है । यह किससे कह रहा है ? बोकोजू इसी का नाम है । सुबह उठकर रोज रोज यह कहता है - बोकोजू । और फिर कहता है - जी हाँ कहिए । क्या कहना है ? उस शिष्य ने कहा कि - महाराज ! इसका राज मुझे समझा दें । बोकोजू हंसने लगा । उसने कहा - यही सत्य है । यहां 2 कहां ?  यहां हम ही आज्ञा देने वाले हैं । हम ही आज्ञा मानने वाले हैं । यहां हमीं स्रष्टा हैं । और हमीं सृष्टि । हमीं हैं प्रश्न । और हमीं हैं उत्तर । यहां दूसरा नहीं है । इसलिए तुम इसको मजाक मत समझना - बोकोजू ने कहा । यह जीवन का यथार्थ है । तुम मुझसे पूछते हो । मेरा क्या उत्तर है ? मैं यही कहूंगा । 1 है । 2 नहीं हैं । अद्वय है । इसलिए तुम नकारात्मक के भी पार उठो । और विधायक के भी पार उठो । तभी अध्यात्म शुरू होता है । फर्क को समझ लेना । नकारात्मक यानी नास्तिक । अकारात्मक यानी आस्तिक । और नकार और अकार दोनों के जो पार है । वह आध्यात्मिक । अध्यात्म आस्तिकता से बड़ी ऊंची बात है । आस्तिकता तो वहीं चलती है । जहां नास्तिकता चलती है । उन दोनों की भूमि भिन्न नहीं है । 1 'ना' कहता है । 1 'हाँ’ कहता है । लेकिन दोनों मानते हैं कि परमात्मा को हाँ और ना कहा जा सकता है । हमसे भिन्न है । अध्यात्म कहता है । परमात्मा तुमसे भिन्न नहीं । तुम ही हो । अब क्या हाँ और ना ? जो है - है ।
राजी हूं । नाराजी हूं । यह बात ही मत उठाओ । इसमें तो अज्ञान आ गया । तुम मुझसे पूछते हो । मैं क्या कहूं ? मैं कहूंगा । जो है - है । कांटा है । तो कांटा है । फूल है । तो फूल है । न तो मैं नाराज हूं । न मैं राजी हूं । जो है - है । उससे अन्यथा नहीं हो सकता । अन्यथा करने की कोई चाह भी नहीं है । जैसा है । उसमें ही जी लेना । अष्टावक्र ने कहा - यथा प्राप्त । जो है । उसमें ही जी लेना । उसको सहज भाव से जी लेना । ना नुच न करना । शोरगुल न मचाना । आस्तिकता नास्तिकता को बीच में न लाना । यही परम अध्यात्म है ।
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