25 मई 2011

यह मतलब है आंखों में बसने का

बसो मेरे नैनन में नंदलाल । मीरा कहती है - मेरी आंखों में बस जाओ नंदलाल । मेरी आंखों में तुम ही रहो । मेरी आंखें तुम्हारा घर बन जाएं । जागूं तो तुम्हें देखूं । सोऊं तो तुम्हें देखूं । आंख खोलूं तो तुम्हें देखूं । रात सपना देखूं तो तुम्हारा देखूं । यह मतलब है आंखों में बसने का । तुम्हें छोडूं ही न । तुम मेरे भीतर रहने लगो । बसौ मेरे नैनन में नंदलाल । मोहनी मूरत सांवरी सूरत । ध्यान करना । भक्त की खोज सौंदर्य के माध्यम से परमात्मा की खोज है । मोहनी मूरत सांवरी सूरत । यह भी ध्यान रखना कि इस देश में हमने कृष्ण को, राम को सांवरा कहा है । कभी  कभी पश्चिम के लोगों को हैरानी होती है कि हमने सुंदरतम व्यक्तियों को सांवरा क्यों कहा है ? गोरा क्यों नहीं कहा ? कारण हैं । सांवरेपन में एक गहराई होती है । जो गोरेपन में नहीं होती । गोरापन थोड़ा सा उथला उथला होता है । गोरापन ऐसा ही होता है । जैसे कि नदी बहुत छिछली  छिछली । तो पानी सफेद मालूम पड़ता है । जब नदी गहरी हो जाती है । तो पानी नीला हो जाता है । सांवरा हो जाता है । कृष्ण सांवरे थे । ऐसा नहीं है । हमने इतना ही कहा है सांवरा कहकर कि कृष्ण के सौंदर्य में बड़ी गहराई थी । जैसे गहरी नदी में होती है । जहां जल सांवरा हो जाता है । यह सौंदर्य देह का ही सौंदर्य नहीं था । यह हमारा मतलब है । खयाल मत लेना कि कृष्ण सांवले थे । रहे हों । न रहे हों । यह बात बड़ी बात नहीं है । लेकिन सांवरा हमारा प्रतीक है इस बात का कि यह सौंदर्य शरीर का ही नहीं था । यह सौंदर्य मन का था । मन का ही नहीं था । यह सौंदर्य आत्मा का था । यह सौंदर्य इतना गहरा था । उस गहराई के कारण चेहरे पर सांवरापन था । छिछला नहीं था सौंदर्य । अनंत गहराई लिए था । 
मोहनी मूरत सांवरी सूरत, नैना बने बिसाल । ये तुम्हारी बड़ी बड़ी आंखें सदा मेरा पीछा करती रहें । ये सदा मुझे देखती रहें । मुझमें झांकती रहें । मोर मुकुट मकराकृति कुंडल । यह तुम्हारा मोर के पंखों से बना हुआ मुकुट । यह तुम्हारा सुंदर मुकुट । जिसमें सारे रंग समाएं हैं । वही प्रतीक है । मोर के पंखों से बनाया गया मुकुट प्रतीक है इस बात का कि कृष्ण में सारे रंग समाए हैं । महावीर में एक रंग है । बुद्ध में एक रंग है । राम में एक रंग है । कृष्ण में सब रंग हैं । इसलिए कृष्ण को हमने पूर्णावतार कहा है । सब रंग हैं । इस जगत की कोई चीज कृष्ण को छोड़नी नहीं पड़ी है । सभी को आत्मसात कर लिया है । कृष्ण इंद्रधनुष हैं । जिसमें प्रकाश के सभी रंग हैं । कृष्ण त्यागी नहीं हैं । कृष्ण भोगी नहीं हैं । कृष्ण ऐसे त्यागी हैं । जो भोगी हैं । कृष्ण ऐसे भोगी हैं । जो त्यागी हैं । कृष्ण हिमालय नहीं भाग गए हैं । बाजार में हैं । युद्ध के मैदान पर हैं । और फिर भी कृष्ण के हृदय में हिमालय है । वही एकांत ! वही शांति ! अपूर्व सन्नाटा ! कृष्ण अदभुत अद्वैत हैं । चुना नहीं है कृष्ण ने कुछ । सभी रंगों को स्वीकार किया है । क्योंकि सभी रंग परमात्मा के हैं । मोर मुकुट मकराकृति कुंडल । अरुण तिलक दिए भाल । यह तुम्हारा लाल तिलक ! ये तुम्हारे मछली के आकार के कुंडल ! ये तुम्हारे मोर के पंखों से बना हुआ मुकुट ! ये तुम्हारी बड़ी बड़ी आंखें ! बसो मेरे नैनन में नंदलाल । अधर सुधारस मुरली राजति । यह तुम्हारे नीचे ओंठ पर रखी हुई मुरली । इसे इससे और कोई सुंदर जगह तो बैठने को मिल भी नहीं सकती । अधर सुधारस मुरली राजति । और यह मुरली कोई साधारण नहीं है । इससे तुम जब गाते हो । तो सुधा बरसा देते हो । अमृत बहा देते हो । कृष्ण रंग हैं । राग हैं । महावीर में कोई राग नहीं है । महावीर संगीत  शून्य हैं । कृष्ण जीवन के संगीत से भरे हैं । तो महावीर में वीतरागता की स्पष्टता है । स्वभावतः क्योंकि एक ही रंग है । एक स्पष्ट दिशा है । कृष्ण में मेला है । सभी रंगों का । स्वभावतः महावीर के वक्तव्य बहुत तर्क युक्त होंगे । क्योंकि एक ही रंग हैं । दूसरे रंग की बात ही नहीं है । कृष्ण के वक्तव्य विरोधाभासी होंगे । क्योंकि सभी रंग है । अनंत रंगों का मेला है । महावीर का स्वर बिलकुल स्पष्ट है । कृष्ण के स्वर बेबूझ हैं । अटपटे हैं । अधर सुधारस मुरली राजति - कृष्ण सेतु हैं संसार में । और परमात्मा में । कृष्ण ने दोनों को जोड़ा है । इसलिए कृष्ण के संगीत में अपूर्वता है । संगीत में बांसुरी है । जो संसार की है । और संगीत है । जो परमात्मा का है । ओंठों पर बांसुरी रखी है । ओंठ तो देह के हैं । लेकिन जो स्वर आ रहे हैं । वे आत्मा से आ रहे हैं । यह अपूर्व सम्मिलन है । अधर सुधारस मुरली राजति, उर वैजंती माल । वह वैजंती माला पहने हुए हो । वैजंती माला पांच रंगों की बनती है । पांचों इंद्रियों ने जो दिया है । कृष्ण ने सभी को समाहित कर लिया है । समाविष्ट कर लिया है । कृष्ण ने आंख नहीं फोड़ीं । कान नहीं रौंदे । हाथ नहीं काटे । कृष्ण ने इंद्रियों को नष्ट नहीं किया । कृष्ण इंद्रियों की सारी संवेदनशीलता को पचा गए । कृष्ण इंद्रियों के शत्रु नहीं हैं । कृष्ण में जीवन का निषेध नहीं है । जीवन का परिपूर्ण स्वीकार है । अहोभाव से स्वीकार है । कृष्ण जैसा व्यक्ति पूरे मनुष्य  जाति के इतिहास में खोजना कठिन है । क्योंकि कहीं न कहीं । कोई न कोई चीज कम मालूम पड़ेगी ।
ईसाई कहते हैं - जीसस कभी हंसे नहीं । क्यों ? क्योंकि जीसस गंभीर हैं । कैसे हंस सकते हैं ? तो जीसस बड़े संगत हैं । कृष्ण खिलखिला कर हंस सकते हैं । और इससे उनकी गंभीरता में बाधा नहीं पड़ती । यह हंसना उनकी गंभीरता का खंडन नहीं होता । उनमें विरोध एक दूसरे को सम्हालते हैं । समृद्ध करते हैं । ध्यान रखना । दुनिया का कोई भी संत कृष्ण जैसा रस से सराबोर नहीं है । कुछ है । और बड़ी मात्रा में है । लेकिन कुछ बिलकुल नहीं है । इसलिए हिंदुओं ने ठीक ही किया कि किसी और अवतार को पूर्णावतार नहीं कहा । बुद्ध को भी पूर्णावतार नहीं कहा । राम को भी पूर्णावतार नहीं कहा । अवतार कहा । परमात्मा आंशिक रूप में उतरा है । एक ढंग से उतरा है । बुद्ध में ध्यान की तरह उतरा है कि महावीर में त्याग की तरह उतरा है । तो महावीर का जो त्याग है । वह चरम है । मगर बस त्याग है । एकांगी है व्यक्तित्व । बुद्ध का जो ध्यान है । वह चरम है । लेकिन एकांगी है । कृष्ण में संतुलन है । तराजू के सब पलड़े एक तल पर आ गए हैं । कृष्ण में कुछ कमी नहीं है । निश्चित ही खतरा भी है । क्योंकि कुछ कमी न होने की वजह से सब कुछ है । तुम जो चाहो । चुन लो । इसलिए कृष्ण के भक्तों ने जो चाहा चुन लिया । किसी ने एक बात चुन ली । किसी ने दूसरी बात चुन ली । किसी ने गीता चुन ली । तो वह भागवत नहीं पढ़ता । क्योंकि भागवत में मुश्किल हो जाती है उसे । उसे कृष्ण गीता के जंचते हैं । किसी ने भागवत चुन ली । तो गीता की बहुत फिकर नहीं करता ।
सूरदास कृष्ण के बचपन के गीत गाते हैं । तुमने पढ़ा न कि सूरदास की कहानी है - एक सुंदर स्त्री को देखकर उन्होंने अपनी आंखें फोड़ लीं । ऐसे सूरदास कृष्ण के भक्त हैं । यह करना नहीं चाहिए । कृष्ण का भक्त और ऐसा करे । तो फिर राम के भक्त को तो फांसी लगा लेनी पड़ेगी । फिर तो जीना ही मुश्किल हो जाएगा । यह बात ठीक नहीं है । लेकिन उन्होंने चुन लिया है । अब यह बात कहां जमती है कृष्ण के साथ ? जो कि नदी के तट पर नहाती हुई स्त्रियों के कपड़े लेकर वृक्ष पर बैठ जा सकता है । उसके साथ यह सूरदास की दोस्ती कैसे जमेगी ? एक स्त्री को देखकर इन्होंने आंखें फोड़ लीं कि कहीं इससे कामवासना न जग जाए । और इनके जो गुरु हैं । वे नहाती अपरिचित स्त्रियों के कपड़े उठाकर और झाड़ पर बैठ गए हैं । नहीं । यह बात जमती नहीं । तो इसलिए सूरदास ने कृष्ण के बचपन को चुन लिया है । वे उनके बचपन की बातें करते हैं । वे बचपन में जो पांव में पैजनियां बजती है । बस उसी की बात करते हैं । उसके बाद जो बांसुरी बजी है । और ऐसी बजी है कि दूसरे की स्त्रियां अपने पतियों को छोड़कर कृष्ण की हो गईं । उसकी बात करने में डरते हैं कि यह जरा खतरा है ।
उसकी बात करने वाले लोग भी हैं । जैसे गीत गोविंद में, जयदेव ने उसी की बात की है । मध्ययुग में रीतिकालीन कवियों ने बस कृष्ण के उसी श्रंगारिक रूप की चर्चा की है । उसी भोग  विलास को खूब बढ़ाकर बताया है । ये दोनों बातें गलत हैं । कृष्ण को समझना हो । तो पूरा ही समझना चाहिए । अंग नहीं चुनने चाहिए । पूरा ही समझोगे । तो ही कृष्ण के साथ ज्यादती करने से बचोगे । नहीं तो ज्यादती हो जाएगी । फिर मैं समझता हूं कि पूरा समझने में तुम्हें बहुत दिक्कत है । क्योंकि तब बहुत सी असंगतियां दिखाई पड़ेंगी । एक अंग चुनने में संगति मालूम पड़ती है । बहुत से अंग चुनने में असंगति हो जाती है । क्योंकि फिर तुम तालमेल नहीं बिठा पाते । तुम बिठा भी न पाओगे । जब तक कृष्णमय न हो जाओ । कृष्ण की चेतना ही तुम्हारे भीतर जन्मे । तो ही तुम तालमेल बिठा पाओगे । तभी तुम जान पाओगे कि ये सब अंग एक दूसरे के विपरीत नहीं हैं । बल्कि एक दूसरे को समृद्ध करते हैं । रात दिन के खिलाफ नहीं है । रात से ही दिन पैदा होता है । और दिन रात का दुश्मन नहीं है । क्योंकि दिन से ही रात पैदा होती है । जीवन और मृत्यु सब जुड़े हैं । संयुक्त हैं । मोर मुकुट मकराकृति कुंडल, अरुण तिलक दिए भाल । अधर सुधारस मुरली राजति, उर वैजंती माल । छुद्र घंटिका कटितट सोभित । कमर में करधनी बांधे हुए हैं । जिसमें छोटे छोटे घुंघरू बंधे हैं । छुद्र घंटिका कटितट सोभित, नूपुर सबद रसाल । जैसे मीठा मीठा स्वर हो रहा है - ओशो ।
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व्यवहार में मधुरता हो । और वाणी में शहद जैसी मिठास हो । तो किए गये हर काम में खुशबु होती है । यदि व्यवहार और वाणी में कड़वाट हो । तो किया गया हर काम बेकार होता है ।
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रेत के महल -  मृण्मय घरों को ही ही बनाने में जीवन को व्यय मत करो । उस चिन्मय घर का भी स्मरण करो । जिसे कि पीछे छोड़ आये हो ? और जहां कि आगे भी जाना है । उसका स्मरण आते ही ये घर फिर घर नहीं रह जाते हैं । नदी की रेत में कुछ बच्चे खेल रहे थे । उन्होंने रेत के मकान बनाये थे । और प्रत्येक कह रहा था - यह मेरा है । और सबसे श्रेष्ठ है । इसे कोई दूसरा नहीं पा सकता है । ऐसे वे खेलते रहे । और जब किसी ने किसी के महल को तोड़ दिया । तो लड़े झगड़े भी । फिर सांझ का अंधेरा घिर आया । उन्हें घर लौटने का स्मरण हुआ । महल जहां थे । वहीं पड़े रह गये । और फिर उनमें उनका मेरा और तेरा भी न रहा । यह प्रबोध प्रसंग कहीं पढ़ा था । मैंने कहा - यह छोटा सा प्रसंग कितना सत्य है । और क्या हम सब भी रेत पर महल बनाते बच्चों की भांति नहीं हैं ? और कितने कम ऐसे लोग हैं । जिन्हें सूर्य के डूबते देखकर घर लौटने का स्मरण आता हो । और क्या अधिक लोग रेत के घरों में मेरा तेरा का भाव लिये ही जगत से विदा नहीं हो जाते हैं ?  स्मरण रखना कि प्रौढ़ता का उम्र से कोई संबंध नहीं । मिट्टी के घरों में जिसकी आस्था न रही । उसे ही मैं प्रौढ़ कहता हूं । शेष सब तो रेत के घरों में खेलते बच्चे ही हैं ।

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