24 मई 2011

धर्म का क्या अर्थ है ?

एक प्रश्न के उत्तर में - समाधि या सहज समाधि का हमारे यहाँ जो नियम और तरीका है । वह मैं आपको बता सकता हूँ । चाहे कोई भी मनुष्य कितनी ही बङी साधना से आया हो । हमारे यहाँ नियमानुसार पहले हँस दीक्षा देते हैं । और यदि वो ध्यान का अच्छा अभ्यासी है । ध्यान में प्रविष्ट है । तो भले ही अगले दिन परमहँस दीक्षा कर देते हैं । यदि ध्यान का अच्छा अभ्यास नहीं है । तो छह महीने या एक वर्ष कम से कम अभ्यास कराया जाता है । जब ध्यान दसवें द्वार तक पहुँचने लगता है । या दूसरे शब्दों में साधक शरीर से अलग होना सीख जाता है । तब परमहँस दीक्षा करते हैं । इसके बाद इस दीक्षा की क्रियायें जब कुछ हद तक प्रकट होने लगती हैं । तब समाधि दी जाती है ।
सामान्यतः ये सब लगन, मेहनत और जीवन से अनुकूल परिस्थिति वाले के साथ ही हो पाता है । या फ़िर साधक की परिस्थितियां इस बात की इजाजत देती हों कि वह आश्रम में बीच बीच में दस पन्द्रह दिन रुक सके । इससे पूर्व यदि किसी को वैचारिक रूप से सैद्धांतिक अङचन से ध्यान वाधा होती है । तव उसकी जटिल धारणाओं को सतसंग द्वारा निर्मूल किया जाता है । जिससे वह वैचारिक सूक्ष्म होकर उत्तम ध्यान को पाता है । इस तरह सब कुछ साधक की स्वयं की स्थिति परिस्थिति पर अधिक निर्भर होता है ।

अष्टावक्र गीता में राजा जनक का दूसरा प्रश्न ( जिसके उत्तर देने पर इनाम में पूरा राज्य या न देने पर मृत्यु की सजा थी ) था - मैंने सुना और पढा है कि परमात्मा की प्राप्ति इतनी देर में संभव है कि घोङे की एक रकाब से दूसरे रकाब में पैर डालो । क्या ये सही है ? अष्टावक्र ने उत्तर दिया । बिलकुल सही है । जनक बोले - फ़िर साबित करो । और अष्टावक्र ने किया । आत्मज्ञान तत्क्षण भी संभव है । और इसको तत्क्षण ही बताया भी है । लोग सालों लगा लेते हैं सिर्फ़ आदत से मजबूर होने के कारण ।
अहम बृह्मास्मि ! यानी जब जीव रूपी अहम या मैं मेरा का पूर्ण नाश हो जाता है । अंतःकरण नहीं बचता । तब की यह स्थिति है । जब वह साक्षात हो जाता है । इसी को कबीर ने कहा है - अपनी मढी में आप मैं खेलूँ । खेलूँ खेल स्वेच्छा । इसको पतंजलि की भाषा में निर्विकल्प समाधि का पूर्ण होना भी कह सकते हैं । यह एक भाव से बहुत उच्च स्थिति है । जो सिर्फ़ उच्च और पूर्ण योग समर्पित साधकों को ही प्राप्त होती है । बाकी कोई इसके बारे में कुछ और कहता है । तो उसे स्वयं जानकारी नहीं । और दूसरों को भी भृमित ही कर रहा है ।
सन्त मिलन को चालिये तज माया अभिमान ।
ज्यों ज्यों पग आगे धरो कोटिन यज्ञ समान ।
जहाँ तक आर्थिक या अन्य परेशानियों की बात है । हम किसी चमत्कार की बात नहीं कहते । यह व्यक्ति के पूर्व जन्मों के संचित संस्कार अनुसार प्रारब्ध वश उसके शुभ अशुभ कर्मों की फ़ल श्रंखला के कारण हो रहा होता है । यदि शुभ संस्कार हों । तो भक्ति से प्रभाव में बढोत्तरी हो जाती है । और अशुभ होने पर भक्ति दवा की भांति राहत का काम करती है । हाँ यदि कोई वाकई बहुत गिरी हालत में है । तो उसका लाभ गुरु कृपा द्वारा मैंने होते देखा है । इस तरह हजारों लोगों के अलग अलग अनुभवों से यही कहा जा सकता है । जब तक कोई उपचार में नहीं आता । तब तक अंतिम तौर पर कुछ कहना मुश्किल ही है ।
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गुरु ग्रह पढन गये रघुराई । अल्प काल विद्या सब पाई ।
टालस्टॉय ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि - मैं एक दिन जा रहा था एक राह के किनारे से । एक भिखमंगे ने हाथ फैला दिया । सुबह थी । अभी सूरज ऊगा था । और टालस्टॉय बड़ी प्रसन्न मुद्रा में था । इंकार न कर सका । अभी अभी चर्च से प्रार्थना करके भी लौट रहा था । तो वह हाथ उसे परमात्मा का ही हाथ मालूम पड़ा । उसने अपने खीसे टटोले । कुछ भी नहीं था । दूसरे खीसे में देखा । वहाँ भी कुछ नहीं था । वह जरा बेचैन होने लगा । उस भिखारी ने कहा कि - नहीं । बेचैन न हों । आपने देना चाहा । इतना ही क्या कम है । टालस्टॉय ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया । और टालस्टॉय कहता है - मेरी आंखें आंसुओं से भर गईं । मैंने उसे कुछ भी न दिया । उसने मुझे इतना दे दिया । उसने कहा कि - आप बेचैन न हों । आपने टटोला । देना चाहा । इतना क्या कम है ? बहुत दे दिया । न देकर भी देना हो सकता है । और कभी कभी देकर भी देना नहीं होता । अगर बेमन से दिया । तो देना नहीं हो पाता । अगर मन से देना चाहा । न भी दे पाए । तो भी देना घट जाता है । ऐसा जीवन का रहस्य है । बांटते चलो । धीरे धीरे तुम पाओगे । जैसे जैसे तुम बांटने लगे - ऊर्जा । वैसे वैसे तुम्हारे भीतर से कहीं परमात्मा का सागर तुम्हें भरता जाता । नई नई ऊर्जा आती । नई तरंगें आतीं । और एक दफा यह तुम्हें गणित समझ में आ जाए । यह जीवन का अर्थशास्त्र नहीं है । यह परमात्मा का अर्थशास्त्र है । यह बिलकुल अलग है । जीवन का अर्थशास्त्र तो यह है कि जो है । अगर नहीं बचाया । तो लुटे । इसको तो बचाना । नहीं तो भीख मांगोगे - ओशो ।
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धर्म का क्या अर्थ है ? कीचड़ से कमल की ओर जाना । कीचड़ भी वही है । कमल भी वही है । पर कितना भेद है ।
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लोकतंत्र - लोकतंत्र की परिभाषा की जाती है कि लोगों की । लोगों के द्वारा । लोगों के लिए सरकार । लोकतंत्र है । इसमें से कोई भी बात सच नहीं है । न तो यह लोगों के द्वारा है । न ही लोगों की है । न ही लोगों के लिए है । सदियों से जो लोग सत्ता में रहते हैं । वे हमेशा लोगों को बहलाते रहते हैं कि जो कुछ भी किया जा रहा है । वह उनके हित के लिए किया जा रहा है । और लोग इस बात का भरोसा करते हैं । क्योंकि उन्हें भरोसा करने के लिए प्रशिक्षित किया गया है । मानवता के शोषण के लिए यह धर्म और सत्ता के बीच की सांठगांठ है । धर्म विश्वास का पाठ सिखाए चले जाते हैं । और लोगों की बुद्धिमत्ता को । उनके प्रश्न पैदा करने की क्षमता को नष्ट किए चले जाते हैं । उन्हें अपाहिज बना दिया जाता है । और सत्ता हर संभव आयाम से उनका शोषण किए चली जाती है । और तब भी लोग उनको सहारा देते हैं । क्योंकि लोगों को विश्वास करना सिखाया गया है । प्रश्न करना नहीं सिखाया गया । किसी भी तरह की सरकार, वह भले ही राजशाही हो । वह उच्च वर्ग की हो । वह लोकतंत्र हो । वह किसी भी तरह की सरकार हो । सिर्फ नाम बदलते हैं । पर गहरे में असलियत वही बनी रहती है - ओशो ।
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