28 मई 2011

आदि सृष्टि की रचना 1

धर्मदास बोले - हे साहिब ! अब आप मुझे कृपा करके बतायें । मुक्त होकर अमर हुये लोग कहाँ रहते हैं ? आप मुझे अमरलोक और अन्य दीपों का वर्णन सुनाओ । कौन से दीप में सदगुरु के हँस जीवों का वास है ? और कौन से दीप में सतपुरुष का निवास है ? वहाँ पर हँस जीव कौन सा तथा कैसा भोजन करते हैं ? और वे कौन सी वाणी बोलते हैं ? आदि पुरुष ने लोक कैसे रच रखा है ? तथा उन्हें दीप रचने की इच्छा कैसे हुयी ? तीनों लोकों की उत्पत्ति कैसे हुयी । हे साहिब ! मुझे वह सब भी बताओ । जो गुप्त है ।
काल निरंजन किस विधि से पैदा हुआ ? और 16 सुतों का निर्माण कैसे हुआ ? स्थावर । अण्डज । पिण्डज । ऊष्मज इन चार प्रकार की चार खानों वाली सृष्टि का विस्तार कैसे हुआ । और जीव को कैसे काल के वश में डाल दिया गया । कूर्म और शेषनाग उपराजा कैसे उत्पन्न हुये ? और कैसे मत्स्य तथा वराह जैसे अवतार हुये ? तीन प्रमुख देव बृह्मा विष्णु महेश किस प्रकार हुये ? तथा प्रथ्वी आकाश का निर्माण कैसे हुआ ।  चन्द्रमा और सूर्य कैसे हुये ? कैसे तारों का समूह प्रकट होकर आकाश में ठहर गया ? और कैसे चार खानों के जीव शरीर की रचना हुयी । इन सबकी उत्पत्ति के विषय में स्पष्ट बतायें ।
तब कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! मैंने तुम्हें सत्यग्यान और मोक्ष पाने का सच्चा अधिकारी पाया है । इसलिये मैंने सत्यग्यान का जो अनुभव मैंने किया । उसके सार शब्द का रहस्य कहकर सुनाया । अब तुम मुझसे आदि सृष्टि की उत्पत्ति सुनो । मैं तुम्हें सबकी उत्पत्ति और प्रलय की बात सुनाता हूँ ।
हे धर्मदास ! यह तत्व की बात सुनो । जब धरती और आकाश और पाताल भी नहीं था । जब कूर्म वराह शेषनाग सरस्वती और गणेश भी नहीं थे । जब सबका राजा निरंजन राय भी नहीं था । जिन्होंने सबके जीवन को मोह माया के बंधन में झुलाकर रखा है । 33 करोङ देवता भी नहीं थे । और मैं तुम्हें अनेक क्या बताऊँ ?
तब बृह्मा विष्णु महेश भी नहीं थे । और न ही शास्त्र वेद पुराण थे । तब ये सब आदि पुरुष में समाये हुये थे । जैसे बरगद के पेङ के बीच में छाया रहती है ।


हे धर्मदास ! तुम प्रारम्भ की आदि उत्पत्ति सुनो । जिसे प्रत्यक्ष रूप से कोई नहीं जानता । जिसके पीछे सारी सृष्टि का विस्तार हुआ है । उसके लिये मैं तुम्हें क्या प्रमाण दूँ कि जिसने उसे देखा हो । चारों वेद परम पिता की वास्तविक कहानी नहीं जानते । क्योंकि तब वेद का मूल ही ( आरम्भ होने का आधार ) नहीं था । इसीलिये वेद सत्य पुरुष को अकथनीय अर्थात जिसके बारे में कहा न जा सके ..ऐसा कहकर पुकारते हैं । चारों वेद निराकार निरंजन से उत्पन्न हुये हैं । जो कि सृष्टि के उत्पत्ति आदि रहस्य को जानते ही नहीं । इसी कारण पंडित लोग उसका खंडन करते हैं । और असल रहस्य से अंजान वेद मत पर यह सारा संसार चलता है ।
हे धर्मदास ! सृष्टि के पूर्व जब सत्यपुरुष गुप्त रहते थे । उनसे जिनसे कर्म होता है । वे निमित्त कारण और उपादान कारण और करण यानी साधन उत्पन्न नहीं किये थे । उस समय गुप्त रूप से कारण और करण सम्पुट कमल में थे । उसका सम्बन्ध सत्यपुरुष से था । विदेह सत्यपुरुष उस कमल में थे ।
तब सत्यपुरुष ने स्वयँ इच्छा कर अपने अंशों को उत्पन्न किया । और अपने अंशो को देखकर वह बहुत प्रसन्न हुये । सबसे पहले सत्यपुरुष ने शब्द का प्रकाश किया । और उससे लोक दीप रचकर उसमें वास किया । फ़िर सत्यपुरुष ने चार पायों वाले एक सिंहासन की रचना की । और उसके ऊपर पुण्य दीप का निर्माण किया । तब सत्यपुरुष अपनी समस्त कलाओं को धारण करके उस पर बैठे । और उनसे " अगर वासना " यानी एक सुगन्ध प्रकट हुयी । सत्यपुरुष ने अपनी इच्छा से सब कामना की । और 88  000 दीपों की रचना की । उन सभी दीपों में वह चन्दन जैसी सुगन्ध समा गयी । जो बहुत अच्छी लगी ।
इसके बाद सत्यपुरुष ने दूसरा शब्द उच्चारित किया । उससे कूर्म नाम का सुत ( अंश ) प्रकट हुआ । और उन्होंने सत्यपुरुष के चरणों में प्रणाम किया ।
तब उन्होंने तीसरे शब्द का उच्चारण किया । तो उससे ग्यान नाम के सुत हुये । जो सब सुतों में श्रेष्ठ थे । वे सत्यपुरुष के चरणों में शीश नवाकर खङे रहे । तब सत्यपुरुष ने उनको एक दीप में रहने की आग्या दी ।
चौथे शब्द के उच्चारण से विवेक नामक सुत हुये ।
और पाँचवे शब्द से काल निरंजन प्रकट हुआ । काल निरंजन अत्यन्त तेज अंग और भीषण प्रकृति वाला होकर आया । इसी ने अपने उग्र स्वभाव से सब जीवों को कष्ट दिया है । वैसे ये जीव सत्यपुरुष का अंश है । जीव के आदि अंत को कोई नहीं जानता है ।


छठवें शब्द से सहजनाम सुत उत्पन्न हुये । सातवें शब्द से संतोष नाम के सुत हुये । जिनको सत्यपुरुष ने उपहार में दीप देकर संतुष्ट किया । आठवें शब्द से सुरति सुभाव नाम के सुत उत्पन्न हुये । उन्हें भी एक दीप दिया गया । नवें शब्द से आनन्द अपार नाम के सुत उत्पन्न हुये । दसवें शब्द से क्षमा नाम के सुत उत्पन्न हुये । ग्यारहवें से निष्काम नाम और बारहवें से जलरंगी नाम के सुत हुये । तेरहवें से अंचित और चौदहवें से प्रेम नाम के सुत हुये । पन्द्रहवें से दीनदयाल और सोलहवें से धीरज नाम के विशाल सुत उत्पन्न हुये । सत्रहवें शब्द के उच्चारण से योग संतायन हुये ।
इस तरह एक ही नाल से सत्यपुरुष के शब्द उच्चारण से 16 सुतों की उत्पत्ति हुयी ।
सत्यपुरुष के शब्द से ही उन सुतों का आकार का विकास हुआ । और शब्द से ही सभी दीपों का विस्तार हुआ । सत्यपुरुष ने अपने प्रत्येक दिव्य अंग यानी अंश को अमृत का आहार दिया । और प्रत्येक को अलग अलग दीप का अधिकारी बनाकर बैठा दिया । सत्यपुरुष के इन अंशों की शोभा और कला अनन्त है । उनके दीपों में मायारहित अलौकिक सुख रहता है । सत्यपुरुष के दिव्य प्रकाश से सभी दीप प्रकाशित हो रहे है । सत्यपुरुष के एक ही रोम का प्रकाश करोंङो सूर्य चन्द्रमा के समान है ।
सत्यलोक आनन्द धाम है । वहाँ पर शोक मोह आदि दुख नहीं है । वहाँ सदैव मुक्त हँसों का विश्राम होता है । सतपुरुष का दर्शन तथा अमृत का पान होता है ।
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